Sunday, 30 August 2020

कविता---(दो घड़ी की रात )

(दो घड़ी की रात)
जिंदगी है बस दो घड़ी की रात,
आओ गुज़ार ले लिहाफ में हम,
एक दुजे के संग---
दो घड़ी की रात।
आयेगी धूप कमरे में कल किसी और के लिये,
खुली खिड़की से फिर बाल सँवारेगी कोई दुल्हन,
फिर अँधेरा होगा!
वे भी गुजारेगी इसी तरह अपनी जिंदगी की-------------
ये दो घड़ी की रात।
भुल जायेंगे सभी एक दिन रफ्ता-रफ्ता,
जैसे हम भुले है औरो के जिंदगी की---
दो घड़ी की रात।
एै,रंग-----यहाँ से हमी फना होगे,
बाकी यही रह जायेगी औरो के लिये---
ये दो घड़ी की रात।

(इश्क़ )

हमारे इश्क़ के--------------
मस्जिद की अजा़न है वो,
मै शेख हुँ उसकी धड़कनो का,
मेरी साँसो की पठान है वो।
हम जीते है मुकद्दस सरियत,
मै उसका पाकिज़ा फतवा हुँ,
चुमता हुं उसे--------------
मेरी इन आँखो की कुरआन है वो।
इल्में चराग रौशन है उसमें भी,मुझमे भी 
मै उसका आसमानी गुफ्तगू हूँ,
सुनता हु उसे!
एै,रंग------वे महज एक लड़की नही,
मेरी मुकम्मल जुबान है वो।
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo. no----7800824758

Saturday, 22 August 2020

कविता---(ब्यॉयफ्रेंड हो गयें )

(लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये)
स्कूल के बस्ते----------------
बढ़ते-बढ़ते बैग हो गये!
खत लिखने वाले देश की संवेदना मर गई,
दिल में रहने वाले लोग------------
सब मोबाइल में टैग हो गये।
माँ यशोदा का आँचल बदला,
वे जिंस और टाप पहन के माम हो गई,
और जितने भी पिता थे वे रफ्ता-रफ्ता डैड हो गये।
दूध-घी खाने-पीने वाले देश ने गिलास रख दिया,
अब उन्ही गिलासो में---------------
बार बालाओ के ढ़ाले पैग हो गये।
अर्द्धनग्न सड़को पे--------------
यौवन उछालती कुछ माडर्न लड़कियाे
के अश्लील और भौड़े कपड़े,
शर्म आती है लिखते,
कि जिस देश में भाई होते थे,
एै,रंग-------आज उसी देश में लड़के,
होटलो के बंद कमरो में--------------
इन लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये।

###इस रचना को तर्क-वितर्क से दुर रख बस पढ़े क्योंकि ये जरुरी नही कि इससे सहमत ही हुआ जाय।

Friday, 14 August 2020

व्यंग्य---(हिन्दी दिवस के इमरान हाशमी )

व्यंग्य-- (हिन्दी दिवस के इमरान हाशमी)
ये हिन्दी साहित्य की--"चाटुकारिता का ओलंपिक युग चल रहा है". जिसके लिये ये चाटुकार महिनो--"अपनी हिन्दी का मेंटल रियाज करते है". उनकी सम्पूर्ण मेंटल रियाज के विशेष दिन का नाम ही हिन्दी दिवस है. "लेकिन ये विशेष दिन इनकी हिन्दी का बसंत नही,बल्कि इनके वर्ड लिट्रेचर का वेलेंटाइन-डे है"


ये हिन्दी दिवस के ऐसे तथाकथित--"शेक्सपियर है,जिन्हें शेक्सपियर का नाम तो लेना आता है लेकिन हिन्दी लिटरेचर की आत्मा को लहू-लूहान करके". ये सभी महंगे होटलो मे जुटते है, और बड़ी गहन वार्ता हिन्दी को लेके करते है, फिर दो-एक आर्टीफिशियल साँसे छोड़ते है तो यूँँ लगता है,कि जैसे-- "पूस की रात का हल्कू इनके महंगे सिगार में अपने तम्बाकू धुआं ढुढ़ रहा हो"

 उस मोटल में  बीच-बीच में बेयरा आकर इन्हे कोल्डड्रिंक और आइस क्यूब के साथ बिदेशी शराब के पैग थमाता रहता है,एंकर तो ऐसे ही लोगो में से कोई प्रकांड पर्सनैलिटी होती है,जो अपनी हिन्दी की चाटुकार भाषा का--"शब्द दर शब्द और भाव दर भाव अपनी भाषा के चेहरे पे शहनाज का मेकअप किये रहता है".

एंकर इन सभी के कद या पूँँजीपति होने के स्टैंडर के हिसाब से नाम ले इन्हें उस हिन्दी के स्टेज पे बुलाता है और ये हिन्दी के मूर्धन्य  साहित्यकार स्टेज की तरफ जाते समय अपनी टाई-सुट को सेट कर फिर बोलना शुरु करते है. इनके इस कन्फ्यूज ज्ञान से उस मोटल मे यूँँ लगता है कि ,जैसे "हिन्दी साहित्य की ग्राम्य बाला के पसीने की साहित्यिक महक जैसे एसी हाल के परफ्यूम ने छिन लिया हो".

सच तो ये है कि "ये सभी राइटर हिन्दी के इमरान हाशमी है, जिनकी बेवकूफियो की मेंटल स्टेज पे इनके समझ की कन्फ्यूज हिन्दी मल्लिका शेरावत की तरह कैटवॉक कर रही है".

ये सभी तथाकथित हिन्दी के इमरान हाशमी अपनी हिन्दी की लिट्रेचर लैग्वेंज  रुपी नालेज की रेव पार्टी में शब्दो का ड्रग्स, हसीस,कोकीन ले रहे है,इन्हें हिन्दी से कोई मतलब नही,क्योंकि हिन्दी मे इनकी बेवकूफी की इस अय्याश विद्वता को चैलेंज कर पाना संभव नही.इसी से इनकी ये रेव पार्टी पुर्णतः सफल है.ये जानते है कि कल हमी मे से कोई--"हिन्दी साहित्य व भाषा का सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करेगा".
सच अब इन्ही जैसे इमरान हाशमी से हिन्दी अपने माँ बेटे का वात्सल्य नही अपितु लव,सेक्स और धोखा जी रही.ये कटु सत्य अगर कही से किसी को आहत या पीड़ित कर हो,तो वे भी ऐसी हिन्दी की रेव पार्टी से एक कश लगाये और आगे बढ़ जाये.



यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

@@@लेखक---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

लेख----(हिन्दी साहित्य यानि कृष्ण की विश्व-बांसुरी )

(हिन्दी साहित्य यानि कृष्ण की विश्व बाँसुरी)
आज हम और पुरी दुनिया जिस सुमधुर हिन्दी से जुड़े है या जिस हिन्दी साहित्य का रसास्वादन कर रहे है,उस हिन्दी ने एक अनवरत यात्रा तय की है.इसके तमाम समकालीन बेटो ने इस हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने के लिये एक माँ की तरह इसकी सेवा की है.हालांकि इसके प्रथम प्रादुर्भाव की तमाम बाते और किवंदतियां है लेकिन कहते है कि--"इसके प्रथम पुत्र संत कवि गंगादास जी थे जिनका कालखंड(1823-1913) था".
जैसा कि सर्वविदित है और हम ये जानते भी है कि--"हिन्दी भारत ही नही अपितु विश्व मे सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं मे से एक है इसकी जड़े बहुत गहरी है". वैसे भी हिन्दी मे सर्व-प्रथम जैसा कि अध्यनोपरांत लगता है कि काव्य यानि कविता साहित्य का विकास हुआ,उसके बहुत बाद गद्य साहित्य का विकास हुआ. वे साहित्य काव्य चाहे संस्कृत मे रहा हो,चाहे मध्यकाल की व्रजभाषा, चाहे अवधी,मैथली मे रहा हो. चूँकि काव्य रसमय,सुमधुर और कर्णप्रिय होता था इसलिये ही शायद सर्वप्रथम हिन्दी मे काव्यशास्त्र का ही विकास हुआ.
वैसे बाद मे गद्य-साहित्य भी काफी समृद्ध व पुष्पित-पल्लवित हुआ.इस विधा मे भी तमाम श्रेष्ठ रचनाये लिखी गई चाहे वे नाट्यविधा हो,चाहे उपन्यास विधा.इसकी प्रमाणिकता सर्व-प्रथम जिस किताब से होती है वे उपन्यास साहित्य था,जोकि बाबू देवकीनंदन खत्री ने लिखा था. ये किताब रहस्य और तिलिस्म के ऐसे ताने-बाने मे लिखा गया कि लोग इस कथानक मे गहरे तक डुब गये. इसका एक ताजा और आधुनिक उदाहरण हम लोगो के सामने है--"जब बाबू देवकीनंदन खत्री के बहु प्रतिक्षित उपन्यास को टीबी सिरियल के रुप मे चन्द्रकान्ता के नाम से बनाया गया तो जितनी देर तक चन्द्रकान्ता सीरियल का समय होता था उतनी देर जैसे पुरा भारत ही एक अघोषित बंदी की चपेट मे हो".
वैसे तो हिन्दी साहित्य को कयी कालखंडों मे विभक्त कर ही समझा जा सकता है,जोकि एक वृहद वटवृक्ष की तरह हो जायेगा,फिर भी इसे और इसके बेटो का जिक्र या चर्चा किये बगैर लेख को थाम देना--"ये हिन्दी साहित्य के कत्ल सरीखा होगा जोकि न्यायोचित नही". इस लेख मे ऐसे कुछ महाश्रेष्ठ साहित्य पुत्रों की चर्चा करता हूँँ जोकि हिन्दी काव्य शास्त्र को असीम ऊँचाई दी जिसपे केवल हम,हमारा देश ही नही बल्कि पुरी दुनिया गर्व करती है उनमें से सर्व-प्रमुख नाम है.
सूरदास जी का जो अंधे और कृष्ण भक्ति शाखा के सर्वोत्कृष्ट और अमर कवि है इन्होंने वात्सल्य और विरह पे जो कुछ कहा पढा वे भारत ही नही अपितु पुरी दुनिया का दिल और आँख भिगो दे-----
मैया मोरी मै नही माखन खायो,
भोर भये गैयन के पाछे,मधुबन मोही पठायो-----
मैया मोरी मै नही माखन खायो.
चाहे गोपियों का विरह वर्णन हो------
कि उद्धव मन नही दस-बीस,
एक हुतौ सो गयो स्याम संग, जैसी अमर कृतियां अब यहा ही नही अपितु पुरी दुनिया मे दुर्लभ है.
कबीरदास--ये हिन्दी साहित्य के प्रथम बागी रचनाकार है,इनकी जनप्रियता अजर-अमर है ये एकलौते ऐसे कवि है जिन्हें देश का साक्षर व निरक्षर दोनो ही उतनी मस्ती से जानता व पहचानता है इन्होनें अपने समय की विसंगतियों पे प्रहार ही नही किया बल्कि ध्वस्त और धर्मान्धता पर खुला आक्रमण किया कुछ उदाहरण देखे----
1--कांकर-पाथर जोड़ के मस्जिद लिया बनाय,
ता चढ़ मुल्ला बाग दे------
का बहरी हुई खुदाय.
2--मुड-मुडाये हरि मिले,तो हर कोई लेय मुडाये,
बार-बार के मुडते भेड़ बैकुंठ न जाय।
या काशी मे स्वर्ग की परिकल्पना या फिर मगहर मे नर्क की परिकल्पना हो सब पे बराबर चोट व प्रहार किया-----
जो कबिरा काशी मरै तो रामही कौन निहोर.
आज उसी कबीर पे पुरी दुनिया शोध व रिसर्च कर रही जो की खुद कबीर पढे लिखे न थे.
ऐसे ही तमाम-तमाम नाम है "जिन्होंने हिन्दी को विश्व हिन्दी बना दिया" इनमे संत-कवि रैदास जी है जिनकी एक लाईन तो हमारे यहाँ किवंदती की तरह इस्तेमाल की जाती है अर्थात "मन चंगा तो कठौती मे गंगा". मीराबाई को भला कौन भुल सकता है जो साक्षात कृष्ण की प्रेम-दिवानी है "हेरी मै तो प्रेम दिवानी मेरा दर्द न जाने कोय".या फिर नरोत्तमदास जी का "सुदामा चरित" हो. इन सबो के अलावे एक बड़ा नाम हिन्दी साहित्य का है जिसे हम सब "रहिम खानखाना" के नाम से जानते है ये अकबर महान के नौरत्नों मे से एक श्रेष्ठ रत्न थे. इन्हे अरबी,उर्दू और हिन्दी का एक समान ग्यान था. कहते है कि इनके एक-एक दोहो मे दो-दो,तीन-तीन अर्थ निकलते थे-
रहिमन धागा प्रेम ना तोरो चटकाय,
जोरे से फिर ना जुरै,जुरै गाँठ परि जाय.
"आज पुरी दुनिया मे बाईबिल के बाद सबसे ज्यादा बिकने वाला कोई अमर काव्य ग्रंथ है तो वे है रामचरितमानस" जिसकी रचना हमारे देश के अमर कवि बाबा तुलसीदास जी ने की है कहते है कि इसे जितनी बार पढिये इसके फिर-फिर पढने की प्यास बढती जाती है सच तो ये है कि एक ये ही किताब सारी दुनिया को अपने मे बांध लेने की क्षमता रखता है.हिन्दी साहित्य विराट और काफी अलौकिक है.
हिन्दी साहित्य की ग्राह्यता का पुरी दुनिया मे कोई जवाब नही महाभारत, गीता सबकुछ तो है जिसको कम मे समेट पाना समुद्र को कटोरे मे भरने के समान है.हिन्दी साहित्य ने समय-समय पे हमारा मार्ग ही नही प्रशस्त किया बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अपनी छाती ठोक कर अपने समय को ललकारा भी है. याद करिये "आनंद मठ" का वे वंदेमातरम जिसने ब्रिटिश हुकूमत की चुले हिला दी थी.
आज आधुनिक हिन्दी साहित्य मे तमाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय लेखन हो रहा है हिन्दी और सुघर और समृद्ध होती जा रही है.हिन्दी आज दुनिया के सबसे सुमधुर भाषाओं मे से एक होता जा रहा है.मुझे गर्व है कि मै हिन्दी के ऐसे ही समृद्ध गाँव व देश मे जन्मा व पला बढ़ा. "मै हिन्दी को महज हिन्दी नही बल्कि कृष्ण के अधर की विश्व बाँसुरी कहता हूँ".
वे पनघट------
वे राधा के पाँव की हिन्दी,
मै आज भी नही भुला ऐ "रंग' नीम के छाँव,
और वे अपने गाँव की हिन्दी.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला---जौनपुर pin.no.222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.7800824758

यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

Tuesday, 4 August 2020

कविता---(मील का सायरन )

( मील का सायरन) 
मील का सायरन बजा है----------
शायद आज फिर किसी मील के मजदूर को, 
घर पे भूखे बच्चो की रोटी, 
और बीमार बीबी की दवा ने, 
असमय ही इसे मार दिया है. 
रोज लौटता था थका-मांदा,
फिर उसके लौटने के थोड़ी देर बाद, 
घर से-----------
ईधन के जलने का धुआँ उठता था, 
वे धुआँ ------------
जो उसकी बीमार बीबी के साँसो मे घुसते ही, 
उसके न थमने वाली खाँसी मे बदल जाती. 
आज न लौटेगा-----------
तकते--तकते जब इनकी आँखें थक जायेंगी, 
तो इस मजदूरे की बीमार बीबी, 
किसी बच्चे को भेजेगी,
अपने बापू का पता करने, 
फिर कुछ मील के मजदूर मिलके उसकी लाश लायेंगें, 
रोना-पीटना होगा कुलबुलाते खाली पेट. 
फिर अल-सुबह रोज की तरह बजेगा----
मील का सायरन, 
इन्हीं मे से कोई निकलेगा जाने के लिये, 
क्योकि इनकी जिंदगी है एै "रंग"
यही मौत और बजता हुआ मील का सायरन. 

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी. 
जज कालोनी, मियाँपुर 
जिला---जौनपुर पिन नं.  222002 ( उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.----7800824758
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है ।

Monday, 3 August 2020

कविता----(गीतों का सर्कस )

( गोपालदास नीरज के गीतो का सर्कस) 
नीरज ने मेरा नाम जोकर लिखा था, 
लोग आते रहे, लोग जाते रहे
अँधेरा--उजाला होता रहा, 
ये सर्कस सा जीवन--------
कभी इस शहर, कभी उस शहर चलता रहा. 
कोई बसा, कोई ठहरा कुछ ही दिन, 
फिर चल पड़ा ,
सर्कस ही सर्कस चारो तरफ, शहर दर शहर 
वे सिनेमा का सर्कस 
ये जीवन का सर्कस, जोकर के आँसू भी 
एक तमाशा, 
वे जोकर थे नीरज जो हँसे और रोये,
कभी खाली तो कभी भरी पेट सोये,
फिर थिएटर भरा और तमाशा हुआ, 
खाली हुआ फिर एक दिन-------
वे देखो चला दुनिया को छोड़े कोई नीरज नही,
गीतो का अपने वे राजू जोकर. 

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी. 
जज कालोनी, मियाँपुर 
जिला---जौनपुर पिन नं. --222002 (उत्तर-प्रदेश)
मो. नं. --7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है. 
महा-गीत पुरूष को हमारा प्रणाम ।

Sunday, 2 August 2020

हास्य-व्यंग्य---(म्हारी लुगाई खो गई )

हास्य-व्यंग्य ----------
(म्हारी लुगाई खो गई )
दरोगा साहब-------
म्हारी रिपोट लिख ल्यो,
की म्हारी लुगाई खो गई.
ससुरे दरोगा ने-------
म्हारी रिपोट लिखणे से मना कर दियो,
पट्ठे ने रिपोट न लिखणे का जैसे------
खुटा गाड दियो.
मैणे कहा की आप म्हारी रिपोट,
लिखते क्यू नही?
तो उसणे अपणी थूथण लटका,
के म्हारे से पुछ्या,
कि ये बता थारी शादी हुये कितने साल भयो,
तो मैणे कहा की चौदा साल,
तो वे बोल्या चिंता न करो,
वे कुछ ही दिन मे खुद ही लौट आवेगी,
और थारी छाती पे ससुरी मूँग दल्येगी .
क्योकि ------
म्हारी भी लुगाई ऐसे ही थारी तरह खोई थी,
मै बहुत खुश थ्या.
लेकिन एक दिन घर पहुँचा तो देख्या,
कि वे ससुरी अपणे खूसट बाप के,
दिये पलंग पे किसी डायण सी सोई थी.
तबसे बीसो केस इस म्हारे थाणे पे आयो,
वे सारे बेवकूफ मण-ही-मण बहुत खुश थे,
कि उणकी लुगाई खो गई.
बाद मे घर जाणे पे,
वे म्हारे इस थाणे पे नही लौटे,
इसका मतलब तु जाणे है,
कि उणको भी म्हारी तरह खुद ही,
बिना खोजे लुगाई मिल गई,
जा भाई--------
थारी लुगाई भी इसी तरह से मिल जावेगी.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला---जौनपुर पी. नं--222002 (उत्तर--प्रदेश).
मो.नं.----7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

लघुकथा---(चितचोर )

लघुकथा----(चितचोर )

हां आनंद मेरा चितचोर ही तो था, जो--"धीरे-धीरे मुझे चुराता रहा और मैं चोरी होती रही". उसके बात करने की कशिश, चलने का अंदाज सब कुछ मुझे मंत्रमुग्ध कर देता. 

मैं उसकीआगोश में घंटो-घंटो तक खोई रहती शाम धुंधला कर कब रात होने की तरफ बढ़ने का इशारा कर देती मुझे यह भी तभी पता चलता जब आनंद मुझे अपनी आगोश से अलग कर यह कहता कि चलो अब काफी शाम हो गई आओ अब घर चलते हैं तब मुझे न जाने क्यों शाम के इतनी जल्दी ढल जाने और उसके गहराने से चिढ़ होती. 


मैं और आनंद हरदिन रेत पर घर बनाते उन्हें सजाते लेकिन कोई ना कोई समंदर की एक तेज लहर ना सिर्फ उस- "रेत के घर को बहा ले जाती बल्कि उसके निशानात  को भी मिटा देती थी'.

तब शायद सपनों के घर के टूटने का वे दर्द उस तरह चेहरे पर नहीं दिखता था, जैसा कि आज मेरी चेहरे पर दिख रहा है. क्योंकि उन दिनों मुझे और आनंद को यह अच्छे से पता था कि कल फिर हम इसी तरह मिलके एक नये रेत का घर बना लेंगे. 

लेकिन उस रेत के घर के--"टूटने के पीछे की जो हकीकत थी उससे हमें समंदर की लहरें आगाह करती थी". जिसे मैं नासमझ तब समझी जब सब कुछ मेरा तबाह व बर्बाद हो गया. 

यानी मेरे चितचोर आनंद ने एक दिन मेरा वह भी चुरा लिया जिसे कि मुझे हरगिज भी नहीं चोरी होने देना चाहिए था उस चोरी के दाग को यह दुनिया आज भी माफ नहीं करती. 

लेकिन उन दिनों मैं आनंद के प्यार में इतनी अंधी व पागल थी कि मुझे आनंद के सिवा कुछ ना दिखता था और ना ही समझ में आता था मैं आज उसी चितचोर की चुराई दुश्वारियां जी रही हूं. आनंद मेरी जिस्मानी चोरी के बाद फिर नहीं लौटा मैं बस केवल उसका इंतजार करती रही. 

लेकिन यह इंतजार भी मैं कब तलक करती क्योंकि उसकी चोरी का अंश अब तलक मेरे पेट में पांव पसारने लगा था और धीरे-धीरे वे 3 महीने से ज्यादा का हो गया लोगों ने कानाफूसी शुरू कर दी और इस कानाफूसी का मैं विरोध भी नहीं कर पाई करती भी कैसे मैं उनके सवालों के क्या जवाब देती? अतः आनंद के बच्चे को जन्म दे मैं हमेशा के लिए वे शहर वह अपना घर बार छोड़ आई.

आज मैं एक अजनबी और अनजान शहर में जीने के लिए संघर्ष कर रही, बहुत ढूंढने के बाद बमुश्किल एक प्राइवेट ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिल गई है जिससे मेरा और मेरे मासूम बच्चे का जीवन चल रहा.

आज ऑफिस से लौटते समय अचानक मेरी नजर  चितचोर आनंद पर पड़ गई वे एक नई और खूबसूरत लड़की के साथ खिलखिला कर हंसता हुआ बाहों में बाहें डाले चला जा रहा था, मैं समझ गई कि यह लड़की भी अब आनंद के चितचोर वाले धोखे से बच नहीं पाएगी यानी इस लड़की का नसीब भी इसे किसी अजनबी या अनजान शहर की तरह धीरे-धीरे ले जा रही.


यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758