(हिन्दी साहित्य यानि कृष्ण की विश्व बाँसुरी)
आज हम और पुरी दुनिया जिस सुमधुर हिन्दी से जुड़े है या जिस हिन्दी साहित्य का रसास्वादन कर रहे है,उस हिन्दी ने एक अनवरत यात्रा तय की है.इसके तमाम समकालीन बेटो ने इस हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने के लिये एक माँ की तरह इसकी सेवा की है.हालांकि इसके प्रथम प्रादुर्भाव की तमाम बाते और किवंदतियां है लेकिन कहते है कि--"इसके प्रथम पुत्र संत कवि गंगादास जी थे जिनका कालखंड(1823-1913) था".
जैसा कि सर्वविदित है और हम ये जानते भी है कि--"हिन्दी भारत ही नही अपितु विश्व मे सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं मे से एक है इसकी जड़े बहुत गहरी है". वैसे भी हिन्दी मे सर्व-प्रथम जैसा कि अध्यनोपरांत लगता है कि काव्य यानि कविता साहित्य का विकास हुआ,उसके बहुत बाद गद्य साहित्य का विकास हुआ. वे साहित्य काव्य चाहे संस्कृत मे रहा हो,चाहे मध्यकाल की व्रजभाषा, चाहे अवधी,मैथली मे रहा हो. चूँकि काव्य रसमय,सुमधुर और कर्णप्रिय होता था इसलिये ही शायद सर्वप्रथम हिन्दी मे काव्यशास्त्र का ही विकास हुआ.
वैसे बाद मे गद्य-साहित्य भी काफी समृद्ध व पुष्पित-पल्लवित हुआ.इस विधा मे भी तमाम श्रेष्ठ रचनाये लिखी गई चाहे वे नाट्यविधा हो,चाहे उपन्यास विधा.इसकी प्रमाणिकता सर्व-प्रथम जिस किताब से होती है वे उपन्यास साहित्य था,जोकि बाबू देवकीनंदन खत्री ने लिखा था. ये किताब रहस्य और तिलिस्म के ऐसे ताने-बाने मे लिखा गया कि लोग इस कथानक मे गहरे तक डुब गये. इसका एक ताजा और आधुनिक उदाहरण हम लोगो के सामने है--"जब बाबू देवकीनंदन खत्री के बहु प्रतिक्षित उपन्यास को टीबी सिरियल के रुप मे चन्द्रकान्ता के नाम से बनाया गया तो जितनी देर तक चन्द्रकान्ता सीरियल का समय होता था उतनी देर जैसे पुरा भारत ही एक अघोषित बंदी की चपेट मे हो".
वैसे तो हिन्दी साहित्य को कयी कालखंडों मे विभक्त कर ही समझा जा सकता है,जोकि एक वृहद वटवृक्ष की तरह हो जायेगा,फिर भी इसे और इसके बेटो का जिक्र या चर्चा किये बगैर लेख को थाम देना--"ये हिन्दी साहित्य के कत्ल सरीखा होगा जोकि न्यायोचित नही". इस लेख मे ऐसे कुछ महाश्रेष्ठ साहित्य पुत्रों की चर्चा करता हूँँ जोकि हिन्दी काव्य शास्त्र को असीम ऊँचाई दी जिसपे केवल हम,हमारा देश ही नही बल्कि पुरी दुनिया गर्व करती है उनमें से सर्व-प्रमुख नाम है.
सूरदास जी का जो अंधे और कृष्ण भक्ति शाखा के सर्वोत्कृष्ट और अमर कवि है इन्होंने वात्सल्य और विरह पे जो कुछ कहा पढा वे भारत ही नही अपितु पुरी दुनिया का दिल और आँख भिगो दे-----
मैया मोरी मै नही माखन खायो,
भोर भये गैयन के पाछे,मधुबन मोही पठायो-----
मैया मोरी मै नही माखन खायो.
चाहे गोपियों का विरह वर्णन हो------
कि उद्धव मन नही दस-बीस,
एक हुतौ सो गयो स्याम संग, जैसी अमर कृतियां अब यहा ही नही अपितु पुरी दुनिया मे दुर्लभ है.
कबीरदास--ये हिन्दी साहित्य के प्रथम बागी रचनाकार है,इनकी जनप्रियता अजर-अमर है ये एकलौते ऐसे कवि है जिन्हें देश का साक्षर व निरक्षर दोनो ही उतनी मस्ती से जानता व पहचानता है इन्होनें अपने समय की विसंगतियों पे प्रहार ही नही किया बल्कि ध्वस्त और धर्मान्धता पर खुला आक्रमण किया कुछ उदाहरण देखे----
1--कांकर-पाथर जोड़ के मस्जिद लिया बनाय,
ता चढ़ मुल्ला बाग दे------
का बहरी हुई खुदाय.
2--मुड-मुडाये हरि मिले,तो हर कोई लेय मुडाये,
बार-बार के मुडते भेड़ बैकुंठ न जाय।
या काशी मे स्वर्ग की परिकल्पना या फिर मगहर मे नर्क की परिकल्पना हो सब पे बराबर चोट व प्रहार किया-----
जो कबिरा काशी मरै तो रामही कौन निहोर.
आज उसी कबीर पे पुरी दुनिया शोध व रिसर्च कर रही जो की खुद कबीर पढे लिखे न थे.
ऐसे ही तमाम-तमाम नाम है "जिन्होंने हिन्दी को विश्व हिन्दी बना दिया" इनमे संत-कवि रैदास जी है जिनकी एक लाईन तो हमारे यहाँ किवंदती की तरह इस्तेमाल की जाती है अर्थात "मन चंगा तो कठौती मे गंगा". मीराबाई को भला कौन भुल सकता है जो साक्षात कृष्ण की प्रेम-दिवानी है "हेरी मै तो प्रेम दिवानी मेरा दर्द न जाने कोय".या फिर नरोत्तमदास जी का "सुदामा चरित" हो. इन सबो के अलावे एक बड़ा नाम हिन्दी साहित्य का है जिसे हम सब "रहिम खानखाना" के नाम से जानते है ये अकबर महान के नौरत्नों मे से एक श्रेष्ठ रत्न थे. इन्हे अरबी,उर्दू और हिन्दी का एक समान ग्यान था. कहते है कि इनके एक-एक दोहो मे दो-दो,तीन-तीन अर्थ निकलते थे-
रहिमन धागा प्रेम ना तोरो चटकाय,
जोरे से फिर ना जुरै,जुरै गाँठ परि जाय.
"आज पुरी दुनिया मे बाईबिल के बाद सबसे ज्यादा बिकने वाला कोई अमर काव्य ग्रंथ है तो वे है रामचरितमानस" जिसकी रचना हमारे देश के अमर कवि बाबा तुलसीदास जी ने की है कहते है कि इसे जितनी बार पढिये इसके फिर-फिर पढने की प्यास बढती जाती है सच तो ये है कि एक ये ही किताब सारी दुनिया को अपने मे बांध लेने की क्षमता रखता है.हिन्दी साहित्य विराट और काफी अलौकिक है.
हिन्दी साहित्य की ग्राह्यता का पुरी दुनिया मे कोई जवाब नही महाभारत, गीता सबकुछ तो है जिसको कम मे समेट पाना समुद्र को कटोरे मे भरने के समान है.हिन्दी साहित्य ने समय-समय पे हमारा मार्ग ही नही प्रशस्त किया बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अपनी छाती ठोक कर अपने समय को ललकारा भी है. याद करिये "आनंद मठ" का वे वंदेमातरम जिसने ब्रिटिश हुकूमत की चुले हिला दी थी.
आज आधुनिक हिन्दी साहित्य मे तमाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय लेखन हो रहा है हिन्दी और सुघर और समृद्ध होती जा रही है.हिन्दी आज दुनिया के सबसे सुमधुर भाषाओं मे से एक होता जा रहा है.मुझे गर्व है कि मै हिन्दी के ऐसे ही समृद्ध गाँव व देश मे जन्मा व पला बढ़ा. "मै हिन्दी को महज हिन्दी नही बल्कि कृष्ण के अधर की विश्व बाँसुरी कहता हूँ".
वे पनघट------
वे राधा के पाँव की हिन्दी,
मै आज भी नही भुला ऐ "रंग' नीम के छाँव,
और वे अपने गाँव की हिन्दी.
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला---जौनपुर pin.no.222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.7800824758
यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.