Friday, 30 January 2026

घोषणा

व्यंग्य लेख
(चुनावी घोषणापत्र)
मै आज कई वर्षो से हर पार्टी के चुनावी घोषणापत्र को---काफी भावुक तरीके से पढ़ता व सुनता हु लेकिन हर मर्तबा मेरे हिस्से "एक ना खत्म होने वाला विस्फोटक दुख हाथ आता है,और वे दुख मेरे लिये विश्व के प्रथम दुख की तरह है" अर्थात--घोषणापत्र के किसी भी क्रम मे वे लाइन आज तक नही दिखी कि इस देश अर्थात प्रदेश के कुँवारो के लिये,खासकर जो विषम आर्थिक तंगी की वजह से"स्त्री-पुरुष के अश्वमेध मिलन से वंचित है -उन पिड़ित कुँवारो को हमारी सरकार बनते ही,सर्वप्रथम उन्हे एक योग्य व सुशील कन्या की व्यवस्था कर वैवाहिक जीवन से आहलादित किया जायेगा"।
अगर एैसा संभव न हुआ तो जनपद स्तर पर किन्ही अन्य देशो से या यहां न मिलने की सुरत मे बाहरी गरीब देशो की कुँवारी लड़कियो का आयात कर उनकी गरीबी दुर करने के साथ ही समुचित सरकारी अनुदान की व्यवस्था के साथ ही एक हफ्ते का निःशुल्क हनिमून पैकेज दे उन्हे पती-पत्नी की मुख्यधारा मे लाने का अलौकिक प्रयास करेगी।
अब इस बार तो किसी तरह बस दुखी मन से मतदान कर फिर किसी अगले चुनाव में "ये राष्ट्रीय दुख लिये इंतजार करुंगा----शायद किसी पार्टी या नेता को हमारे इस बड़े विकराल और असह्य कुँवारेपन के दुख का आभास हो और वे इस क्रांतिकारी पिड़ा को अपने चुनावी घोषणापत्र में जगह दे हमारे इस विशाल बंजर हृदय में दुल्हन रुपी सुरत की हरितक्रांति ला इस पिड़ा का नैसर्गिक निदान करे"।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!आपका निर्मेश के त्यागी भईया मेरे इस व्यंग्य लेख को दैनिक वर्तमान अंकुर में सस्नेह जगह देने के लिये।

बेटियां

(बेटियां)

वे देखो हंस रही हैं
आंख में आसूं लिए 
भ्रूण में मार डाली गई बेटियां,

कातिल मां भी 
पछता रही 
कि क्यों उसने मार दी 
आखिर 
बेटे की चाह में
अपनी पेट में पल रही 
कई बेटियां 

जिस खेल में
सर झुका आए थे 
तमाम बेटे
उसी खेल में जीती
और हमारी आइकान,
हुई बेटियां 🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर,(U P).

कोटा

मै किसी भी मां बाप को अपने बच्चों का कातिल नही लिख सकता,,,,,लेकिन कोटा में कोचिंग करने वाले बच्चों का इस तरह सुसाइड करना अघोषित रूप से हम सभी के द्वारा किया गया उन बच्चों का एक ऐसा कत्ल है जिसके हम आप सभी कातिल है,,,,

"मुझ मासूम का गला
आप सभी की महत्वाकांक्षाओं ने घोटा,
क्या प्रयाग,क्या कोटा,,,

बस खुदकुशी,लाश
और एक पन्ने के सुसाइड नोट्स में 
मै हार गया
सॉरी,मॉम और सॉरी पापा
फिर आंसू याद बेटा
और कोटा .

बस!
इतना करना 
पापा और मॉम 
अपनी महत्वाकांक्षा का बोझ लादे 
फिर मत भेजना
मेरे छोटे भाई बहन को
तैयारी करने 
या खुदकुशी करने 
प्रयाग या फिर
कोटा 😥😥😥😥😥

Thursday, 29 January 2026

डॉक्टर अजय शर्मा

Dr Ajay Sharma ----

पंजाब के एक ऐसे उपन्यासकार हैं जिनके लिखे उपन्यास पंजाब के विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम मे पढ़ाए जा रहे.

(1) एम. ए. के कोर्स में "बसरा की गलियां"--गुरू नानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर व पंजाब विश्वविद्यालय पटियाला में.

(2) एम. ए. के कोर्स में "कुमुदिनी"--पंजाब सैंट्रल यूनिवर्सिटी बठिंडा.

(3) प्रभारक के कोर्स में शामिल "चेहरा और परछाई"--पंजाब विश्वविद्यालय पटियाला.

 "खेलै सगल जगत" यह महत्वपूर्ण उपन्यास उन तमाम मुसलमानों के नाम हैं जिनके पूर्वज कभी हिंदू थे. यह उपन्यास कोरियर से अभी-अभी मुझे प्राप्त हुआ है. लेकिन यह उनके लिए उपन्यास होगा, मेरे लिए तो यह "एक साहित्य ग्रंथ हैं" जिसे मैं अपने मस्तक रखता हूं. डॉक्टर अजय शर्मा मेरी और आने वाली पीढ़ी की एक जीवित साहित्य वसीयत है. वैसे पंजाब साहित्य में शिव कुमार "बटालवी", अमृता प्रीतम और खुशवंत सिंह जैसे नाम के बाद एक नाम और है, जिन्होंने अपने समय के पंजाब साहित्य को समृद्ध किया है. मैं ऐसी समृद्धता के बोधि वृक्ष का स्नेह पा सका. यह मेरा सौभाग्य नहीं तो और क्या है? खैर इस विषय की भूख मेरे पाठक और लेखक मन में बहुत पहले से थी अब तो यह उत्कंठा बन गई और तब तलक बनी रहेगी जब तक कि मैं इस उपन्यास को पूरा पढ़ नहीं लेता .

वैसे एक मजेदार बात मेरे लिखने से छूट रही थी लेकिन अचानक लगा कि, नहीं यह बात मेरे लिखने से छूटनी नहीं चाहिए. दरअसल शर्मा सर की उम्र मेरे पिता की उम्र के समकक्ष हैं लेकिन मेरा संबोधन हमेशा बड़े भैया ही रहा इससे मुझे उनके अनुज होने के सुख के साथ ही साहित्य छात्र होने का सुख भी मिल रहा.

साहित्य सिलसिला पब्लिकेशन,कपूरथला रोड, जालंधर से प्रकाशित इस उपन्यास का मूल्य 200/ रुपए रखना समस्त साहित्य पाठक के लिए उनका एक उपहार ही कहा जा सकता है.
सादर प्रणाम ✍️ ✍️ 🙏🙏

कैशलेश इलाज

कैशलेस इलाज 
के फैसले का हार्दिक स्वागत है 
बस एक सम्मान जनक राशि उन दस हजार,पंद्रह हजार संविदा और आउट सोर्सिंग मात्र ग्यारह माह तक पाने वाले 

Wednesday, 28 January 2026

UGC

याद रखना यूजीसी (UGC) पर खामोश रहने वालों, 
कल तुम हमारी बस्तियों में वोट मांगने आओगे,
 
हमारे लिए दलित मुद्दा नहीं, 
क्योंकि उत्पीड़न,उत्पीड़न है 
किसी छात्र की धर्म या जाति नहीं,


लेकिन तुम किस मुँह से 
कल इस अन्याय को 
न्याय की तरह समझाओगे,
लोकतंत्र है नेताजी 
एक बार नजर से उतरे 
तो तुम समझ लेना 
फिर तुम 
अपने इस सत्ता से उतर जाओगे 








चुनावी कटाक्ष विनय कटियार की भाषा

(विनय कटियार की भाषा)
भूल रहे है------------------
चुनावी शुरुवात मे ही,
सारे संस्कार की भाषा!
इससे निकृष्ट क्या?होगी------
व्यभिचार की भाषा!
कि एै"रंग" चुभ रही देखो,
प्रियंका को खूबसूरत कह रहे-------
भाजपा के विनय कटियार की भाषा।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और आज की एक नई चुभन लिये हुये मेरे चुनावी कटाक्ष का।

कुंभ में

कुंभ में 
सबरी और कुबडी में भेद नही है.

वाल्मीकि और रैदास 
डुबकी लगा रहे 
तुम भी नहा लो,
हमें कोई खेद नहीं है.

तुम्हें चीढ़ है 
विश्व कल्याण के मंत्र से 
क्या करोगे 
यह तुम्हारी गलती नही ?

तुम जिस पार्टी से जुड़े हो 
उस पार्टी में बेटे के अलावा 
कोई सिद्धांत 
कोई वेद नहीं हैं.

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियाँपुर 
जौनपुर--222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Monday, 26 January 2026

चुनावी कटाक्ष

(मतदान जरुरी है)
तिरंगे के नीचे-------------
बाअदब राष्ट्रगान जरुरी है!
ठिक वैसे ही जैसे-इस विविधता के देश में,
हमारी पूजा के साथ-साथ----------
तमाम मस्ज़िदो मे अज़ान जरुरी है।
आओ हम वोट करे,
क्योंकि हमारे मजबूत लोकतंत्र के लिये,
एै"रंग" हमारा एक-एक वोट----------
और मतदान जरुरी है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे आज के चुनावी कटाक्ष का।

Sunday, 25 January 2026

चुनावी कटाक्ष

चुनावी कटाक्ष-----बुधवार
(वीजेपी भी सियारो के घाट आ गई)
टिकट बटवारे से-------------
तेरे भी फरेबी चेहरे से मुखौटे उतर गये,
अब तेरे यहाँ भी एै दुध के धुलो,
वही सपा की तरह परिवारवाद की बात आ गई।
यानि की एै"रंग"----------------
अब वीजेपी भी उन्ही सियारो के घाट आ गई।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भइया और प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा कर चुभ रहे मेरे चुनावी कटाक्ष का।

Saturday, 24 January 2026

मुल्क जिंदाबाद

(मुल्क जिंदाबाद)
आने वाली सदियाँ करेंगी उसको याद,
उसने खून के कतरे से लिखा------
मुल्क जिंदाबाद।
ऐ हुश्ऩ आज इतनी कागज पे जगह छोड़,
लिखने दे हमे----ऐ रंग,
उसके कनपटी की आखिरी गोली-----
और मुल्क जिंदाबाद।

रूदाली रह गई

(रुदाली रह गई)

पुरे घोषणापत्र में-----------
दर्शक और उनकी ताली रह गई.

वाह!री दिल्ली की सियासत----
कि लोग पांच वर्ष तकते रह गये,
और अन्ना-हजारे के सम्मान की कुर्सी, 
उनके ही चेले 
अरविन्द केजरीवाल की वजह से 
खाली रह गई.

एै"रंग" इस टिश और चुभन की पिड़ा,
कि वे रोये तो नहीं,
पर लगा जैसे-----------
रेत भरी आँखो में उनके कोई रुदाली रह गई.

वे भी दिल्ली थी और ये भी दिल्ली है. 

विधानसभा चुनाव ---2020.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no-----7800824758

नंदन पंडित

✍️✍️ आज ही के दिन डाक से "श्वेतवर्णा" से प्रकाशित नंदन पंडित का बहुचर्चित उपन्यास "रेती की सौंह" मेरी हाथों को प्राप्त हुआ था----

आज साहित्य में नंदन पंडित किसी परिचय के मोहताज नहीं है,उन्हें किसी विधा विशेष में बांध पाना संभव नहीं वह जिस भी विधा में लिखते हैं वहीं उनकी विधा हो जाती है चाहे वह गीत हो,नवगीत हो,कहानी हो,लघुकथा हो या फिर संस्मरण हो.यू तो नंदन पंडित का जन्म गोंडा जनपद के गजाधरपुर गांव में हुआ है,वह बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं लेकिन उनके उपन्यास की यह प्रेम कथा हमे हमारे गांव की उस महुआ और मंजरी के निस्वार्थ प्रेम तक ले जाती है जिसे हम आप शायद कही किसी गांव में छोड़ आए हैं.

इसके अलावा भी उनकी दो प्रमुख काव्य कृतियां (1)अंखुआ (गीत संग्रह)
(2)बोल कबूतर (बाल काव्य संग्रह)
ने अपने पाठकों के हृदय को ऐसा स्पंदित किया है कि इनकी इन दोनों कृतियों के काव्य रस के आचमन का पाठकीय भाव ज्यों का त्यों बना हुआ है.

हमारे उपन्यासों से गांव ऐसा गायब हुआ कि जैसे हम अपने गांव के एनआरआई हो गए हो,लेकिन ऐसे में मुझे एक फिल्म के गीत का वह मुखड़ा याद आ रहा कि--"घर आजा परदेसी तेरा देश बुलाए रे".वैसे गांव को बहुतों ने लिखा लेकिन"प्रेमचंद" और "फणीश्वर नाथ रेणु" ने जो गांव लिखा बस वही गांव जिंदा रह गया, आज भी फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यास पर राजकपूर की "तीसरी कसम" और फिल्मों में "नदिया के पार" कि गुंजा और चंदन को भला कौन भुला सकता है.

गांव की मोहब्बत आज भी महानगरों के लिव इन रिलेशनशिप जैसा नहीं है, वहां की मोहब्बत में सौम्यता है ,शिष्टता है,शालीनता है,शर्म और संकोच हैं,जबकि वही महानगरी मोहब्बत में एक अजीब सी छटपटाहट है, धुंध है, धुआं है,आक्रोश है,जबकि गांव की मोहब्बत आज भी एक दूसरे के लिए आरती का दिया है.

ऐसे में मुझे यकीन है कि नंदन पंडित के इस उपन्यास की भाषा इसके पात्र इसके कथानक "रेती की सौंह" के साथ हमारे दिल के भावों को पत्थर और कंक्रीट से निकाल कर उस संवेदना तक ले जाएंगे जहां कभी हम आपने भी किसी से मोहब्बत की होगी या किसी की प्रेम गाथा किसी के मुंह से सुनी होगी,,,,,,,,

वैसे इस उपन्यास को हाथ में लेते ही ऐसा लग रहा है कि जैसे कोई मुझसे कह रहा हो---

"इसके हर पन्ने में मेरी सांस है,मेरी नब्ज़ है,
जरा सलीके से पढ़ना मेरे महबूब,
तुम्हें 'रेती की सौंह' है".

Thursday, 22 January 2026

चुनावी कटाक्ष

चुनावी कटाक्ष-----सोमवार
(राम और लक्ष्मण की बात)
नेता जी--------------
अब पुरे चुनाव तक करेंगे,
अपने चुनावी रण की बात।
करेंगे मतदान तक एक दुसरे को नंगा,
हम चटखारे ले सुनेंगे------------
इनसे ही इनके कण-कण की बात।
कभी बनवायेंगे ये मंदिर,
और करेंगे किसी संत से ज्यादा ये------
एै"रंग"हमसे ये राम और लक्ष्मण की बात।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भइया और आज के मेरे इस प्रकाशित चुनावी कटाक्ष का।

मुल्क की याद आती है

(मुल्क की याद आती है)
इस गैरे मुल्क में-----------------
बड़ी शिद्दत से मुझे अपने मुल्क की याद आती है।
खोल देता हूं खिड़कियाँ,
और घंटो टहलता हूं कमरे मे-------
जब रात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
तकता हूं चाँद तो बीबी का चेहरा नुमाया होता है,
याद फिर उसकी हर बात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
तारे जैसे हो मेरे मासूम बेटे,
उन तारो से गुफ्तगू करता हूं,
लेकिन उन्हे जब प्यार करने को बढ़ाता हूं हाथ,
तो बस खाली हाथ रहता है,
मेरे हिस्से यही इतनी सी सौगात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
फिर खिड़की से---------------
अंदर आती है एक झीनी सी रौशनी,
जैसे मेरे अब्बु की दुआ!
फिर हवा की एक ठंडी छुवन मे अम्मी की मोहब्बत,
उफ!ये रोटी,ये दोज़ख की बेबसी
कि सहर होने तलक-------------
अपने घर के हर शख्स की जरुरत,
और बहन के निकाह की-----------
याद बस इमदाद आती है!
इस गैरे मुल्क मे------------
बड़ी शिद्दत से मुझे अपने मुल्क की याद आती है।
## # मुल्क से बाहर कमा रहे एक शख्स के अंतरमन की व्यथा।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

26 जनवरी है

(26 जनवरी है)
कीटनाशक पी के-----------
अभी ख़ुदकुशी किये किसान की लाश,
उसके खेत की मेड़ पे पड़ी है-----------
सुना है आज 26 जनवरी है।
एकटक तके जा रही उसकी बिटिया,
अपने बापु की लाश को,
क्या करे बेचारी रो भी तो नही सकती,
अपने भाई और बहनो मे सबसे बड़ी है,
तभी वे अपने जवान सिने से दुपट्टा उतार,
ढ़कती है अपने बापु की लाश,
उसकी पैबन्द लगी सलवार का यू नंगा होना,
साबित करता है कि----------
अभी बहुतो से दुर इस देश मे 26 जनवरी है।
बस कुछ देश लुटने वाले घंटो बोलेंगे भाषण देंगे,
इशारो पे तालियाँ बजाई जायेगी,
इन्ही के अगल- बगल किमती सोफे होगे,
पांव तले मसलने को दरी होगी,
शायद एै "रंग" इतने ही लोगो तलक पहुँची-----
हमारे इस देश की 26 जनवरी है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

पद्मावत क्यू हैं

जोधा-अकबर और पद्ममावत फिल्म में डायरेक्टर के द्वारा हमारे गौरवशाली इतिहास के साथ की गई छेड़छाड़ के बिरोध में लिखी एक रचना.

(जोधा-अकबर और पद्ममावत क्यू है?)

बता एै सिनेमा-
आखिर तुम्हें हमारी इतिहास से,
इतनी अदावत क्यू है?
तेरे दामन मे-----
जोधा-अकबर और पद्ममावत क्यू है?.

सवाल है मेरा तुझसे,
कि सिनेमा के वे--
सेंटीमेंटल और अंतरंगता के सीन,
कोई मनोरंजन नही,
ये इतिहास की पद्ममिनी का,
सीने से खिचा आँचल है,
हद तो ये है कि,
इतने टुच्चे सिनेमाकारो के साथ आखिर--
हमारे यहाँ की अदालत क्यू है?.

ठीक है माना कि,
पद्ममावत जायसी की है,
लेकिन एक तरफ "लव माई बुरका" पे रोक,
लगाने वाली अदालत बता,
कि पद्ममावती हर सिनेमाघर मे लगे,
आखिर ये तेरी---
दो मुँही इजाज़त क्यू है? ।
तेरे दामन मे---
जोधा-अकबर और पद्ममावत क्यू है?.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
rangnathdubey90@gmail.com

Wednesday, 21 January 2026

आतंकवाद और बेगुनाह लाशें

(आतंकवाद और बेगुनाह लाशे)
मै मासुमो की लाशो पे मरसिया लिख रहा हूँ,
अभी कल बीता है लम्हे चेहल्लुम,
सीना फट गया हिन्दु का,कलम सदमे में है।
रोजा,नमाज,जकात,खैरात,हज़------
सब हराम है ऐ आतंकी मुसलमानो,,,,
आखिर तुम्ही बताओ इस,रंग को-------
आखिर मज़हब के नाम पे इतना कत्ल,
कुर्आन की किस आयत या पन्ने मे है।

@बेगुनाह लाशो को मुझ हकिर से शख्स़ का एक आँसु-ए-मरसिया।
मरसिया------शोकगीत।

चुनावी कटाक्ष

चुनावी कटाक्ष-----शनिवार
(टिकट खुद उनकी बहु का कट रहा है)
सपा में बहत कुछ घट रहा है----------
शिवपाल तो थे ही,
अब कलेजा मुलायम का भी फट रहा है!
तभी तो अंसारी और अतिक के संग,
एै"रंग" अब टिकट----------
खुद उनकी बहु का कट रहा है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

विशेष----टंकण गत गलती के कारण बहुत की जगह बहत लिखा गया है अत:इसे बहत न पढ़के बहुत पढ़े इसके लिये हमे खेद है।
धन्यवाद एक मर्तबा फिर से दैनिक वर्तमान अंकुर का निर्मेश के त्यागी भइया का और आज के प्रकाशित चुनावी कटाक्ष का।

प्राण प्रतिष्ठा में नहीं आए

हे!श्री राम आप विपक्ष को सद्बुद्धि दे!
 
(प्राण प्रतिष्ठा में नही आए!)

हे!राजनीति के असुरों,
तुम,हमारी धर्म और निष्ठा में नहीं आए
प्रभू श्री राम कि
प्राण प्रतिष्ठा में नही आए.

तुम्हें राज चाहिए
तो तुम भूल जाओ 
ऐ हमारी आस्था के औरंगजेबों 
हमे पता है कि, तुम फर्जी 
दलित हित में चीखते हो 
जबकि तुम
इंतजार करती हुई किसी 
राम भक्त शबरी के घर नही आए.

अयोध्या में
भरत के प्रेम के खड़ाऊं 
में राम परिलक्षित थे 
लेकिन तुम
भीतर के अक्रांता
उस खड़ाऊ में
भाई के लिए ,किए गए
एक भाई के सत्ता त्याग को
देख नही पाए.

सरयू के पानी में 
कैकई और कौशल्या के आंसू 
टपके थे,
तुम ऐसी मां की पीड़ित
उस प्रतीक्षा में नही आए.

जाओ! तुम्हें 
अयोध्या शापित करती है,
कि तुम 
सिर्फ मुस्लिमों के यहां
इफ्तार करोगे,
क्योंकि तुम
हमारे प्रभू श्री राम
कि होली, दीवाली की भक्ति 
और उनके किसी इफ्तार में नही आए.

तुम,हमारी धर्म और निष्ठा में नही आए
प्रभू श्री राम कि
प्राण प्रतिष्ठा में नही आए.

✍️✍️ यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियापुर
जिला-जौनपुर (U P)

(चूड़ीहार हो जाऊँ)

(चूड़ीहार हो जाऊँ)

तेरी चाहत में 
सारी हदों से पार जाऊँ.

तुम्हें देखने की खातिर टहलू तेरी गली ,
बेशक ऐ,"रंग" मै-
ब्राह्मण से चूड़ीहार हो जाऊँ.

Tuesday, 20 January 2026

अदब की लाश देखी है

(अदब की लाश देखी है)
तु शौक से शामिल हो,रईसो के उर्स में,
हमने कई दिन से भूखि-
ऐ,रंग-शहर मे,
अदब की लाश देखी है।

अदब-साहित्य।

आईनो पर गीत लिखे

(आईनो पे गीत लिखे)
हमने टुटे हुये ख्व़ाबो पे गीत लिखे,
सारी रात तड़पे हुये चिरागो पे गीत लिखे।
लोग कहते रहे कि-------
उसके घर का आईना खुबसुरत है,
ऐ,रंग---हमने उसी के हाथो टुटे हुये,
कई आईनो पे गीत लिखे।

चुनावी कटाक्ष

चुनावी कटाक्ष-----शुक्रवार
(मतलबी निबाह कर रहे है)
चुनाव मे जिस तरह-------------
आस्तीनी साँपो से दोस्ती,
वीजेपी के अमित शाह कर रहे है!
उससे नाराज़ पार्टी कार्यकर्ता-------
कही पुतला दहन कही आत्मदाह कर रहे है।
ये मौसम के विभिषण है,
कल फिर खेमा बदल लेंगे,
ये क्षणिक नौटंकी के किरदार है,
जो अमित शाह के दिये रोल का-----
एै"रंग"बस मतलबी निबाह कर रहे है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भइया और चुनावी कटाक्ष।

रेपिस्ट विधायक

(रेपिस्ट विधायक )

रेपिस्ट----
विधायक को टिकट मिलते ही,
ए "रंग"
हमारे शहर की एक 'द्रोपदी',
अपने पुराने जिस्मानी---
घावों पे रो उठी 😭😭😭😭

एक नीलकमल तेरी होठों पर

(एक नीलकमल तेरी होठों पर)

लोग 
तेरी रूप कुंभ में डूब रहे हैं,
तू मालाएं बेच रही 
पर इनके मन का पाराशर भटक रहा 
तेरी आंखों की,
आसक्ति त्रिवेणी में 
तू श्यामल है,
पर गौर वर्ण से सुंदर है 
है कस्तूरी महक 
तेरे होने की 
तू एक स्वर्ण हिरन है मेले की,
प्रकृति ने भी रचकर जैसे 
रख दिया हो 
एक नीलकमल तेरी होठों पर.

✍️✍️नोट--सुना है कि कभी पराशर ऋषि सत्यवती के प्रेम में आसक्त हो गए थे.

Sunday, 18 January 2026

चुनावी कटाक्ष

चुनावी कटाक्ष-----बुधवार
(बेटे से हार गया है)
चुनाव आयोग----------
बाप की साइकिल है,
ये मानने से इंकार गया है।
सच तो ये है कि--------
इस प्रदेश मे पहली मर्तबा,
एै"रंग"सपा का धरती पुत्र-----
अपने ही बेटे से हार गया है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान-अंकुर,निर्मेश के त्यागी और मेरे चुनावी कटाक्ष।

(पुराना खत)

(पुराना खत)
बड़ा संभाल के रंखा है,
तेरी याद की दराज़ में------
हमने पुराना ख़त।
तु बिछड़ी,जुदा हुई हमसे,
फिर भी ये शकु था कि,हमसे ना मांगा--
तुमने पुराना ख़त।
है ये ख्व़ाहिश कि गर----
आखिरी हिंचकी भी आये,
तो मेरी तकिये के नीचे से----
निकले पुराना ख़त।
ऐ,रंग----वे लाश-ए-दफ्ऩ पे भी,
नही आयेगी,
उसे उसकी मजबुरियाँ रोकेंगी,
पर गम नही,
बस मेरे कब्र-ए-सिरहाने कोई चराग नही,
जलाना पुराना ख़त।

व्यंग्य बच्चा झूठ बोले

✍️✍️ जो लड़का आपके घर में सर्वाधिक झूठ बोले,,उसका मुंह बीच-बीच में मीठा कराते रहे,,क्योंकि वह भविष्य में विधायक या मंत्री हो सकता है🤠🤠

मैं गांधी नहीं हूं

मैं गांधी नही हू
मै चरखे पर सूत नही काटता
मैं किसान हू
रोज लड़ता हू भूख से
मुझे मुफ्त के राशन नही चाहिए,

Saturday, 17 January 2026

उनके आधे शरीर पर लकवा मार गया था। ये देख डायरेक्टर ने शूटिंग रोक दी। लेकिन उन्होंने कहा,"नहीं, अभी एक शॉट बाकी है। जिस तरफ से मेरा शरीर हिल रहा है, उस तरफ कैमरा लगा लो।" डायरेक्टर ने वैसा ही किया। लीला जी ने जैसे-तैसे अपना शॉट पूरा कर दिया। उसके बाद फौरन उन्हें मुंबई ले जाया गया। एक बढ़िया हस्पताल में एडमिट कराया गया। मगर कुछ ही दिनों बाद हार्ट अटैक की वजह से उनकी मृत्यु हो गई। 
 
जिस तारीख को लीला मिश्रा जी की मृत्यु हुई थी वो थी 17 जनवरी 1988. और जिस फिल्म की शूटिंग के दौरान लीला मिश्रा जी को पैरालाइज़ अटैक आया था वो थी साल 1989 में रिलीज़ हुई दाता, जिसमें मिथुन चक्रवर्ती हीरो थे। हीरोइन थी पद्मिनी कोल्हापुरे। लीला मिश्रा जी के किरदार का नाम इस फिल्म में जमुना था। दाता लीला मिश्रा जी की आखिरी फिल्म साबित हुई। वैसे दो-तीन फिल्में ऐसी भी थी जो उनकी मृत्यु के बाद भी रिलीज़ हुई थी। मगर उन सबकी शूटिंग लीला मिश्रा जी दाता से भी पहले कर चुकी थी। वो सभी लेट रिलीज़ होने वाली फिल्में थी।  

यूं इस तरह पांच दशकों से चला आ रहा लीला मिश्रा जी का फिल्मी सफ़र उनके साथ ही खत्म हो गया। लीला मिश्रा जी की कहानी जानने का प्रयास करें तो पता चलता है कि 1 जनवरी 1908 को अमेठी ज़िले के जायस कस्बे में उनका जन्म हुआ था। वो एक अमीर परिवार में पैदा हुई थी। उनके पिता ज़मींदार थे। हालांकि उस दौर की रूढ़िवादी सोच के चलते लीला जी को पढ़ाया-लिखाया नहीं गया था। और मात्र 12 साल की उम्र में ही उनकी शादी भी करा दी गई थी। 
 
लीला जी के पति का नाम था राम प्रसाद मिश्रा। उनके बारे में भी बताया जाता है कि वो एक एक्टर थे और छोटे-मोटे किरदार फिल्मों में निभाते थे। 17 साल की उम्र तक लीला मिश्रा दो बेटियों की मां बन चुकी थी। एक दिन लीला जी के पति ने उन्हें मामा शिंदे नामक एक व्यक्ति से मिलाया। मामा शिंदे उस वक्त दादा साहेब फाल्के की फिल्म कंपनी नासिक सिनेटोन में नौकरी करते थे। लीला जी से मिलकर मामा शिंदे ने सुझाव दिया कि इन्हें भी एक्टिंग करनी चाहिए। पहले तो लीला जी हिचकिचाई। क्योंकि उस ज़माने में औरतों का फिल्मों में काम करना पाप समझा जाता था। 

और लीला मिश्रा जी तो थी भी एक अच्छे खानदान से। मगर बाद में पति के कहने पर वो फिल्मों में काम करने को तैयार हो गई। मगर उन्होंने तय किया कि किसी भी तरह का रोमांटिक किरदार वो नहीं निभाएंगी। उनके इस फैसले की वजह से कई ओपर्च्यूनिटीज़ भी उनके हाथों से निकल गई थी। मगर लीला जी अपनी सभ्यता से परे ना जाने के अपने फैसले पर अडिग रही। विकीपीडिया पर बताया जाता है कि नासिक फिल्म कंपनी में लीला मिश्रा जी को 500 रुपए महीना तनख्वाह पर बतौर एक्ट्रेस नौकरी पर रखा गया था। 
 
जबकी उनके पति राम प्रसाद को 150 रुपए महीना तनख्वाह देना तय हुआ था। पांच सौ रुपए बहुत ही बड़ी रक़म थी उस ज़माने में। और लीला जी को इतनी ज़्यादा फीस दिए जाने की वजह ये थी क्योंकि उस वक्त फिल्मों में काम करने के लिए महिलाएं मिलती ही नहीं थी। अन्य महिलाएं भी फिल्मों में काम करने को प्रोत्साहित हों, इसलिए लीला मिश्रा को इतनी बड़ी रक़म दी गई थी। हालांकि जब एक्टिंग की बारी आई तो कैमरे के सामने लीला मिश्रा जी परफॉर्म नहीं कर पाई। तो नासिक फिल्म कंपनी ने उन्हें व उनके पति को नौकरी से निकाल दिया।

स्वर्गीय तबस्सुम गोविल जी ने एक बार अपने एक यूट्यूब वीडियो में बताया था कि जब उन्होंने अपने मशहूर शो 'फूल खिले हैं गुलशन गुलशन' के लिए लीला मिश्रा जी का इंटरव्यू लिया था तब लीला जी ने उन्हें बताया था कि हीरोइन बनना उनका ख्वाब था ही नहीं कभी। जिस तरह से उनकी परवरिश हुई है, और जिस तरह के संस्कार उन्हें दिए गए हैं, वो कभी किसी पर-पुरुष के साथ रोमांस नहीं कर सकती थी। ना ही किसी और से प्यार का इज़हार कर सकती थी। 
 
बकौल लीला मिश्रा, उन्हें इस तरह की बातें बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी। इसलिए उन्होंने फैसला किया था कि वो सिर्फ़ अच्छे चरित्र किरदार ही निभाया करेंगी। और वैसा ही उन्होंने किया भी था। अपने शुरुआती करियर में उन्होंने भाभी, बहन व कुछ अन्य प्रकार के चरित्र किरदार निभाए। आगे चलकर वो फिल्मों में मोस्टली दादी-नानी के किरदारों में दिखी। और ऐसे ही किरदार निभाते हुए ही लीला मिश्रा जी ने अपनी ज़बरदस्त पहचान कायम की। शोले में बसंती की मौसी का किरदार लीला मिश्रा जी ने कालजयी बना दिया। वो भले ही थोड़ी सी देर के लिए ही शोले में नज़र आई। लेकिन अमर हो गई।

ऐसा नहीं है कि लीला मिश्रा जी ने कभी हीरोइन का किरदार नहीं निभाया। शुरुआत में एकाध फिल्मों में वो बतौर हीरोइन नज़र आई थी। मगर इसी शर्त पर कि वो हीरो के साथ ऐसे दृश्य शूट नहीं करेंगी जिसमें किसी तरह की कोई नज़दीकी दिखाई दे। विकीपीडिया पर ही बताया जाता है कि 1936 में एक फिल्म में लीला जी को बतौर हीरोइन साइन किया गया था। मगर कुछ दृश्य शूट करने के बाद लीला जी ने वो फिल्म छोड़ दी थी। क्योंकि उस फिल्म के डायरेक्टर एक ऐसा दृश्य लीला जी से शूट करने को कह रहे थे जिसमें उन्हें हीरो के गले में अपनी बाहें डालकर कुछ संवाद बोलने थे। 
 
लीला जी की नज़रों में ऐसा करना गलत था। वो किसी पराए मर्द के साथ इस तरह की शारीरिक अवस्था में जाने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी। इसलिए उन्होंने फौरन वो फिल्म ही छोड़ दी। कुछ ऐसा ही हुआ था उनके साथ 1936 की ही होनहार नामक फिल्म में। उस फिल्म में लीला जी के अपोज़िट शाहू मोडक हीरो थे। उस फिल्म के एक दृश्य में लीला जी को शाहू मोडक को गले लगाना था। मगर लीला जी ने ऐसा करने से साफ इन्कार कर दिया। बाद में उस फिल्म के मेकर्स ने लीला जी को शाहू मोडक जी की मां के रोल में ले लिया। और वहीं से बतौर चरित्र अभिनेत्री लीला मिश्रा जी की फिल्म जर्नी स्टार्ट हो गई। जबकी उनकी उम्र तब बहुत ही कम थी।
 
अपने यूट्यूब चैनल तबस्सुम टॉकीज़ के अपने एक वीडियो में स्वर्गीय तबस्सुम जी ने बताया था कि लीला मिश्रा जी ने एक दफ़ा उन्हें अपने घर खाना खाने के लिए इनवाइट किया था। तब उन्होंने तबस्सुम जी से पूछा था कि तबस्सुम, तू कच्ची रसोई खाएगी या पक्की रसोई? हैरान तबस्सुम जी ने जब लीला मिश्रा जी से पूछा कि ये कच्ची रसोई और पक्की रसोई क्या होती है तब लीला मिश्रा जी ने उनसे कहा था कि तेरी मां तो यूपी से है। क्या उसने तुझे नहीं बताया कि कच्ची रसोई और पक्की रसोई में क्या फ़र्क होता है। अपने वीडियो में तबस्सुम जी कहती हैं कि लीला मिश्रा जी खाने की बहुत शौकीन थी। और पक्की रसोई ही खाया करती थी।
 
लेकिन दिक्कत ये थी कि लीला मिश्रा जी हमेशा पक्की रसोई ही खाया करती थी। नतीजा ये हुआ कि उनका वज़न बहुत ज़्यादा बढ़ गया। वो काफ़ी मोटी हो गई। और वही मोटापा उनकी जान का दुश्मन साबित हुआ। सन 1988 की 17 जनवरी को हार्ट अटैक की वजह से लीला मिश्रा जी का निधन हो गया। जबकी लीला मिश्रा जी पैदा हुई थी 1 जनवरी 1908 को। लीला मिश्रा जी को किस्सा टीवी का नमन। #LeelaMishra #remeberingleelamishra

चुनावी कटाक्ष

चुनावी कटाक्ष---मंगलवार
(चरित्रहीन औरत अपने एैश तक आ गई)
बात---------------
अखिलेश के लैपटॉप से,
मायावती के कैश तक आ गई।
यानी अब----------
बकरी की बात भैंस तक आ गई।
वाह!रे चुनाव--------
कि एै"रंग"लग रहा जैसे,
कि एक चरित्रहीन औरत अपने एैश तक आ गई।
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
 
धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,धन्यवाद निर्मेश के त्यागी भइया और धन्यवाद मेरे आज के चुनावी कटाक्ष का।

मुन्नवर राना

✍️✍️वैसे मुन्नवर राना के जाने से ऐसा लग रहा है कि, जैसे हमारे गले से "मां के दुआओं की बांधी हुई वह ताबीज कही खो गई है, जिसे हमारी मां ने बुरी नजरों से बचाने के लिए हमारे गले में बांधा था"😥😥

Wednesday, 14 January 2026

चुनावी कटाक्ष

चुनावी कटाक्ष-----शनिवार
(चुनाव की खिचड़ी)
बड़ी गुलज़ार है दलित के गाँव की खिचड़ी,
चटखारे लेके खा रहे बेस्वाद-बेमन,
क्या करे मजबूरी है--------------
सामने है इनके चुनाव की खिचड़ी।
एै"रंग" दलित बहुत खुश है इनके आचरण से,
वे भी खिला रहा है इन्हे अपने तरिके से----
बेमन-बेभाव इस चुनाव की खिचड़ी।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान-अंकुर,निर्मेश के त्यागी भइया,और आज के चुनावी कटाक्ष के साथ स्नान-दान पर्व खिचड़ी की ढ़ेर सारी बधाई।

संगम पर स्नान करती है

(संगम पर स्नान करती है)

हमारी आस्था सभी को,
हैरान करती है,
कभी पूजा,
कभी अजान करती है.

एक तरफ शायर करता है वजू,"रंग"-
तो एक तरफ हमारी कविता भी-
संगम पे स्नान करती है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर 222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Tuesday, 13 January 2026

चैन से सोने नहीं देगी

(चैन से सोने नही देगी)
मेरा कत्ल-
तेरी जिंदगी का आखिरी होगा।
तडपोगे,ऐ रंग-जब मेरी चीख,
तुम्हे चैन से सोने नही देगी।

तेरी कोख मां

(तेरी कोख़ माँ)
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ,
लड़ खड़ी हो ज़माने से,
तु भी है एक बेटी ये सोच माँ।
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ।
दे प्यार,लोरियाँ गा,मेरा हक दे,
उठा!एक बेटे की तरह,
मुझको भी ले अपनी गोद माँ।
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ।
उगने दे ये चाँद,उतरने दे अपने आँगन,
मै यकीन दिलाती हूँ-----
कि तुम अपने बेटे से भी ज्यादा करोगी----
एक दिन इस बेटी पे नाज़ माँ।
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ।

सेब द चाइल्ड।

चुनावी कटाक्ष

चुनावी कटाक्ष------शुक्रवार
(बेचैन एक शुपनखा हो गई)
जब से साथ में डिंपल और प्रियंका हो गई,
तब से और खूबसूरत-----------
ये चुनाव की लंका हो गई।
एै "रंग" साँप लोट रहा सीने पे-----
इनके मिलने से बेचैन एक शुपनखा हो गई।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान-अंकुर,निर्मेश के त्यागी भइया और धन्यवाद चुनावी कटाक्ष के उस कालम का जहाँ मुझे अनवरत प्रकाशन के साथ नित नये कटाक्ष की अभिव्यक्ति को व्यक्त करने का सुअवसर मिल रहा है।

खिचड़ी व्यंग्य

✍️✍️कल पति-पत्नी एक साथ बैठकर दही–चूड़ा खाते हुए, अपनी एक रोमांटिक फोटो फेसबुक पर लगाए ताकि पति- पत्नी कि मोहब्बत की रेटिंग में सुधार हो सके.खासकर ऐसे पति-पत्नी जिनके प्यार करने की रेटिंग शादी के 2 वर्ष बाद काफी खराब स्थिति में है.😀😀😀😀

Monday, 12 January 2026

कत्ल का निमंत्रण

(मेरी कत्ल का निमंत्रण है)
मेरी दिल फरेब चाहत से,
ऐ,रंग-कह दो
कि उसे मेरी-कत्ल का निमंत्रण है।

निमंत्रण शब्द का इस्तेमाल मैने बस एक प्रयोग के तौर पर किया है।

चुनावी कटाक्ष

चुनावी कटाक्ष---वृहस्पतिवार
(चुनाव में ये जिस तरह से बोल रहे है)
साधु-संत भी अब वोटर टटोल रहे है,
तभी तो वे----------------
चार बीबीयाँ और चालीस बच्चो पे बोल रहे है।
एै"रंग"अच्छे दिन का मुलम्मा उतर जायेगा--
चुनाव मे ये जिस तरह से बोल रहे है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
## # धन्यवाद!दैनिक वर्तमान-अंकुर,धन्यवाद निर्मेश के त्यागी भईया,और धन्यवाद मेरे चुनावी कटाक्ष।

कामायनी नहीं

(कामायनी नही)

हाँ!
मै भी पढ़ी जाती हूँ,
किसी बंद कमरे में नंगे बदन,
ऐ "रंग" ये और बात है कि,
मै किसी जय शंकर प्रसाद की,
कामायनी नही.

Sunday, 11 January 2026

रेप से जैनब मरी है

उफ! मासूम जैनब
                     (रेप से जैनब मरी है)
ये जो रेप से जैनब मरी है,
किसी वालिद की बिटिया,
किसी की जीऩत,किसी की परी है-------
ये जो रेप से जैनब मरी है।
जिस्मानी भूख और हवस की हद है,
वे मासूम कितनी चीख़ी होगी,
या अल्लाह! वे कौन? नमाज़ी था,
कि मरने के बाद भी लग रहा की,
जैसे जैनब बहुत डरी है---------
ये जो रेप से जैनब मरी है।
इंसाफ़ मांगे किससे,
खामोश है पाक मे तहरिक-ए-इंसाफ़,
गोलियां मिली शायद यही किस्मत है,
हर मुल्क के जैनब की,
लेकिन जैनब सी किसी मासूम की लाश,
शर्मिंदगी से सर झुका देती है,
क्योंकि किसी भी मुल्क की जैनब,
हमारे मज़हब और मज़हबी किताब से कही बड़ी है,
ये जो रेप से जैनब मरी है।

@@@पाकिस्तान मे एक मासूम जैनब को मेरी श्रद्धांजलि।

चुनावी कटाक्ष

चुनावी कटाक्ष----बुधवार
(किसको मिलेगी साइकिल अबकी चुनाव में)
बाप,चाचा,भतीजा,सभी इतने हैं ताव में,
कि मनाते-मनाते आ गई है थकन-------
आजम के पाँव में।
कन्फ्युज है समर्थक और है तनाव में,
कि एै"रंग" आखिर--------------
किसको मिलेगी साइकिल अबकी चुनाव में।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
## # धन्यवाद दैनिक समाचारपत्र वर्तमान-अंकुर,न
िर्मेश के त्यागी भइया और आज के चुनावी कटाक्ष का।

चुनावी कटाक्ष

✍️✍️चुनाव के समय एक दैनिक समाचार पत्र के लिए कभी प्रतिदिन "चुनावी कटाक्ष" नाम से कॉलम लिखा करता था फेसबुक ने याद दिलाया तो सोचा कि एक बार फिर से उन्हें आप लोगों से शेयर करूं----

(चुनावी कटाक्ष)

"बिना सेनापति के सारे कांग्रेसी 
बड़े पेशोपेश में है,
इनके राहुल गाँधी विदेश में है.
उफ!लुटिया डुबो देंगे ये बची-खुची भी,
क्योंकि ऐ "रंग"
इनका यह राजनीतिक लड़कपन 
अक्षम्य---
इतने बड़े प्रदेश में है."😀😀

Saturday, 10 January 2026

रोना

राहुल गाँधी के बहरीन मे कही बातो पे एक तिखा कटाक्ष--------
              (चीन और बहरीन मे रोते है)
वाह रे! सत्ता कि तेरे जाने के गम में------
राहुल गाँधी चीन और बहरीन मे रोते है।
तु इनसे छिन गई,
और थम गई इनके खानदानी जश्ऩ की शहनाई,
अब ये किसी लुटे दलिद्र की तरह,
असह्म पीड़ा की पीपीहिरी,
और किसी मज़मे मे कम कमाई करने वाले सपेरे,
की खिसियाई बीन मे रोते है।
वाह रे! सत्ता कि तेरे जाने के गम मे-----
राहुल गाँधी चीन और बहरीन मे रोते है।
ये हिन्दू ,मंदिर,जनेऊ,दलित,मुस्लिम 
सब होने को तैयार है,
लेकिन शायद इन्हें नही पता,
कि सत्ता अब इनके दुर की कौड़ी है,
क्योंकि इस देश मे मोदी और शाह,
सियासत के बड़े अईयार है,
तभी तो दाल इनकी न गल रही किसी हाँडी,
कुछ नही यार ये काग्रेंसी दुर्दिन है,
जब जिते तो ठीक था,
हार गये तो इवियम मशीन मे रोते है।
वाह रे! सत्ता कि तेरे जाने के गम मे----
राहुल गाँधी चीन और बहरीन मे रोते है।

@@@इस रचना का उद्देश्य किसी पार्टी के सिद्धांतो से जुड़े व्यक्ति को आहत करना नही है,ये महज एक त्वरित घटना की अभिव्यक्ति मात्र है,लेखन पार्टीगत नही अपितु घटनागत होता है।

Friday, 9 January 2026

चुनावी कटाक्ष

चुनावी कटाक्ष
सोमवार---(हाथी चुनाव चिन्ह पे मौन साधे है)
बिरादरी के लोकलाज बस झोपड़ी मे अपने,
राकेश धर त्रिपाठी----------
और सतीश मिश्रा को टांगे है!
वरना इस मर्तबा पंडित जी अपने होठो पे रहस्य------
और हाथी चुनाव चिन्ह पे मौन साधे है।
@@@मेरे स्नेहवत बड़े भइया निर्मेश के त्यागी जी ने दैनिक समाचारपत्र वर्तमान-अंकुर मे प्रतिदिन चुनाव की मतगणना तलक एक कालम"चुनावी कटाक्ष"की शुरुवात की है जिसमे आपके इस भाइ की चंद लाइन हर रोज रहेगी।
मै अपने नन्ही कलम से पुरे चुनाव की खट्टी,मिठी,तिखी तमाम हालात के दिदार कराऊँगा और जैसे-जैसे चुनाव का पारा चढ़ेगा इस कालम की टिस और चुभन प्रतिदिन बढ़ती जायेगी।
और संपादक बड़े भइया के इतने बड़े विश्वास को मै पुरा करने कर उसपे खरे उतरने की एक परिपक्व कोशिश करुंगा।
एक मर्तबा फिर आपको मेरा हृदय से आभार निर्मेश भइया।

Thursday, 8 January 2026

मेरी रूह कैद है

(मेरी रुह कैद है)
ऐ बेवफ़ा--------
मुझे आजाद कर दे,
क्यूकि तेरे शहर में-----
अब तलक मेंरी रुह कैद है।

वीरान थिएटर

( वीरान थिएटर )

चला गया--
इस फानी दुनिया से
करके विरान थिएटर.

ये खालीपन न जाने कब भरेगा,
फिर कौन?
निभायेगा और डूब जायेगा,
सिनेमा के उस
"अर्धसत्य" के किरदार में,
शायद कोई नहीं!

वे खुरदरा सा चेहरा--
अब भी मेरी जेहन में घुमड़ रहा है,
जिसकी सीरत की खूबसूरती से,
बन जाया करता था--
उन दिनों बहुत महान थिएटर.

मुझे भली-भांति वे सीन याद है,
जब दंगे पे लिखे नाटक का दर्द,
उस चेहरे पे उभरा,
तो मैं एकटक तकता रहा,
जैसे जिंदा हो गया हो
हू–ब–हू वही दंगा,
मारकाट,लाशो की पीड़ा,
उफ!उस किरदार की
दोनो आँखो के आँसूओ से,
बन गया था, कुछ घंटो के लिये,
वही दंगाई शहर!
उफ!नही दे सकता
वरना देता--
ओमपुरी के लिये एक बयान थिएटर.

चला गया---
इस फानी दुनिया से
करके विरान थिएटर.

""""ओम पुरी जैसे एक महान कलाकार को मेरी श्रद्धांजलि"""""

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Wednesday, 7 January 2026

लघुकथा कलश

आदरणीय साथियो,
.
प्रभु की असीम अनुकंपा, वरिष्ठजनों के स्नेहिल आशीर्वाद और मेरे बेटों चिरंजीव राहुल प्रभाकर तथा रोहन प्रभाकर की सतत् मेहनत और समर्पण से 'लघुकथा कलश ' सोलहवाँ अंक (जुलाई–दिसंबर 2025) अब प्रकाशन के लिए तैयार-बर-तैयार है। यह हमारे लिए केवल एक अंक नहीं, बल्कि सामूहिक श्रम, विश्वास और साहित्यिक उत्तरदायित्व की निरंतर यात्रा का अगला सोपान है। यदि सब कुछ योजनानुसार रहा, तो इस अंक का विधिवत विमोचन 18 जनवरी 2026 को दिल्ली पुस्तक मेले के अवसर पर 'वनिका पब्लिकेशन ' के तत्त्वावधान में संपन्न होगा। कुल 192 पृष्ठों में विन्यस्त इस अंक में हिंदी के 88 रचनाकारों की 163 लघुकथाएँ तथा पंजाबी भाषा के मूर्धन्य लघुकथाकार बिक्रमजीत ‘नूर’ की 11 चयनित लघुकथाएँ सम्मिलित की गई हैं। इसके अतिरिक्त इस अंक को वैचारिक दृष्टि से समृद्ध बनाने के उद्देश्य से सुकेश साहनी, संतोष सुपेकर और योगराज प्रभाकर के विचारोत्तेजक आलेख शामिल किए गए हैं। वसुधा गाडगिळ द्वारा दीपक मशाल से की गई सशक्त बातचीत तथा दीपक गिरकर द्वारा राम मूरत राही के लघुकथा संग्रह 'जंबो पैकेट 'की विस्तृत और समीक्षात्मक विवेचना भी इस अंक की विशेष उपलब्धियाँ हैं। इस अंक का आवरण-पृष्ठ आपके सादर अवलोकनार्थ प्रस्तुत है। 
.
इस अंक में शामिल हिंदी लघुकथारों की सूची निम्नलिखित है:.
.
अंकुश्री, अखिलेश शर्मा, अनिता रश्मि, अनीता पंडा 'अन्वी', अनीता मिश्रा सिद्धि, अपराजिता रंजना, अरुण कुमार गुप्ता, अर्चना राय, अशोक बाधवानी, आशागंगा प्रमोद शिरढोणकर, उमेश महादोषी, ऋचा वर्मा, कमल चोपड़ा, कल्पना भट्ट, कृष्णलता यादव, कोमल वाधवानी ‘प्रेरणा’, गार्गी राय, चंद्रेश कुमार छ्तलानी, चाँद मुंगेरी, चितरंजन गोप 'लुकाठी', जयप्रकाश मानस, ट्विंकल तोमर सिंह, दिलबाग सिंह विर्क, नलिनी श्रीवास्तव नील. नितीन उपाध्ये, नीना मंदिलवार, नीरज सुधांशु, पदम गोधा, पवन शर्मा, पुरुषोत्तम दुबे, पूजा अग्निहोत्री, पूनम कतरियार, पूनम झा ‘प्रथमा’, पूनम सिंह ‘भक्ति’, पूरन सिंह, प्रताप सिंह सोढ़ी, प्रवीण कुमार श्रीवास्तव, प्रियंका श्रीवास्तव ‘शुभ्र’, बलराम अग्रवाल, भगवती प्रसाद द्विवेदी, भगीरथ, मधु जैन, मनन सिंह, मनीष कुमार पाटीदार, महावीर रंवालटा, महेंद्र कुमार, मानसिंह ‘शरद’, मिन्नी मिश्रा, मीना कुमारी परिहार ‘मान्या’, मीरा जैन, मुकेश कुमार मृदुल, यशोधरा भटनागर, योगराज प्रभाकर, रंगनाथ द्विवेदी, राजेंद्र वामन काटदरे, राजेंद्र पुरोहित, राम मूरत ‘राही’, रामकुमार घोटड़, रेनू सिंह, वंदना गुप्ता, वंदना सहाय, विजय सिंह चौहान, विभा रानी श्रीवास्तव, वीणा सिंह, श्रुत कीर्ति अग्रवाल, संगीता गांधी, संजय रॉय, संजीव ठाकुर, संदीप तोमर, सजय कुमार पी एस, संतोष सुपेकर, सरस दरबारी, सारिका भूषण, सुकेश साहनी, सुदर्शन रत्नाकर, सुधा भार्गव, सुधाकर मिश्रा, सुनीता मिश्रा, सुनील गज्जाणी, सुमन लता शर्मा, सुरेंद्र कुमार अरोड़ा, सुरेश बरनवाल, सुरेश रायकवार, सुशील चावला, सुषमा व्यास 'राजनिधि', सैली बलजीत, सोमा सुर और हरभगवान चावला।
.
सादर
योगराज प्रभाकर
संपादक: 'लघुकथा कलश'
चलभाष: 98725-68228

Monday, 5 January 2026

(सुहागरात)

(सुहागरात)

यूँही पड़ी रहने दो कुछ दिन और कमरे मे,
हमारे सुहागरात की बिस्तर
और उसकी सिलवटे.

मोगरे के अलसाये व गजरे से गिरे फुल,
खोई बिंदिया,टूटी चुड़ियाँ!
और सुबह के धुंधलके की अंगडाई मे,
हमारे बाँहो की वे मिठी थकन!
कुछ दिन और----------
हमारे तन-मन,बिस्तर को जिने दो
ये सुहागरात.

फिर जिवन की आपाधापी मे,
ये छुवन की तपिस खो जायेगी,
तब शायद तुम और हम बस बाते करेंगे,
और ढ़ुढ़ेंगे पुरी जिंदगी---
इस कमरे मे अपनी सुहागरात.

और याद करेंगे हम बिस्तर की सिलवटे,
मोगरे के फुल,खोई बिंदिया,टूटी चुड़ियाँ
और सुहागरात के धुंधलके की
वे अंगडाई,
जिसमे कभी हमारे तुम्हारे प्यार की
मिठी थकन थी.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर 222002 (U P )
mo. no.7800824758
mo.no.-----7800824758