Friday, 31 January 2020

व्यंग्य---(आइये हम लंठो को पास करते है )

व्यंग्य----(आईये हम लंठो को पास करते है)


अब इस देश मे वे दिन दुर नही जब हम अन्य 
विज्ञापनो की भांति ही ये विज्ञापन भी अपने टेलीविजन या अखबारो मे लिखा हुआ देखेंगे कि "आईये हम अपनी शिक्षण संस्था से लंठो को पास करते है"।
योग्यता बाधा नही परसेंटेज के हिसाब से सुविधाएँ उपलब्ध,हमारी विशेष उपलब्धि व आकर्षण है कि "हम अपना नाम न लिख पाने वाले छात्र को भी पुरे प्रदेश या राज्य मे टाप करवाते है"। इस तरह के तमाम पीड़ित व कमजोर छात्र मौके का लाभ उठा आज तमाम बड़ी नौकरियो में अपनी सफलता पूर्वक सेवाये दे रहे है।
इन लोगो के जीवन कौशल व उपलब्धि की छटा अद्भूत है,कल हमारे ही कुछ सफल तथाकथित छात्रो को ये समाज नकारा और बेकार कहता था,आस-पास के लोग अपने बेटो को इनसे दुर रहने की सलाह देते थे। आज उन्हीं के वे तमाम उज्ज्वल बेटे स्याह से भी ज्यादा स्याह हो गये है"बेरोजगारी ने चेहरे का सारा लालित्य छिन लिया है"।
जबकि हमारी संस्थान से निकले छात्र--"हृष्ट-पुष्ट गेहूँ की तरह लाल हो गये है रेमंड की शर्ट,रेडचीफ की सैंडल और कार से उतरती उनकी सुदंर पत्नियाँ एैसे उतरती है कि देखते बनता है"।उन्हिं के गाँव-गिराव के वे मित्र जो कभी इनसे दुर रहने के लिये अपने पिता के फरमानो का अक्षरशः पालन करते थे आज अपने उसी सफल मित्र के इस जीवन शैली को देख आह!भरते है और उनके मन की सड़क पे पीड़ा के बुलडोज़र के गुजर जाने कासा ऐहसास होता है।
तमाम कार्यालय,आफिस कुकुरमुत्ते की तरह खुले पड़े है बस लेकिन हमारे कार्य करने का तरिका "फ्राड के श्रेष्ठ नासा के वैज्ञानिक की तरह है"।"यहाँ  तमाम तरह की शैक्षणिक खरिदारी की जा सकती है"।हर रेट वय मे सुविधाएँ उपलब्ध है हम अपने ग्राहक की सुविधा का ध्यान रखते है।
हमारा ये रैकेट विश्वसनीय व खरा है,हमारे यहाँ तमाम तरह के वर्कर हर जगह जुगाड़ बिठाने मे लगे रहते है अर्थात ये फिल्ड वर्क देखते है।इस फिल्डवर्क करने वालो को साम-दाम-दंड-भेद जैसे भी अपना काम निकलवाने के लिये,किसी भी तरह के हथकंडे अपनाने की सुविधा इन्हें होती है।
इस तरह की सुविधाओ से उन नियुक्त करने वाले अधिकारियो व मंत्रियो की सटीक विश्वस्त गोपनीय सुविधा मुहैया करा पैसे के साथ "उनकी पचास साल की उम्र मे हफ्ते-पन्द्रह दिन पे एक खूबसूरत बीस-पच्चीस साल की लड़की उनके आवास या कमरे पे भेज इनके अंग-प्रत्यंग की थिरैपी व मसाज के साथ कामासन कराते है" जिसका परोक्ष लाभ हमारी संस्था पाती है।
"इतने सारे कलात्मक पापड़ बेलने के बाद तब हमारी ये संस्था चल व निखर रही है"।बस हमे और हमारी इस संस्था को उस कालजई निर्णय का राष्ट्रीय इंतजार है,जब सरकार हमें बाकायदा इस तरह के विज्ञापन करने का लाइसेंस दे देगी और हम बाईज्जत टेलीविजन या अखबार मे इस तरह हेडिंग के साथ ये विज्ञापन लगा सकेंगे कि---"आईये ये शैक्षिक संस्था लंठो को पास करती है"।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

यह मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है।

खरी-खरी---(प्रदूषण की सिगरेट )

खरी-खरी-----(प्रदुषण की सिगरेट)

आईये हम आप सभी अपने आस-पास के नगरो व महानगरों में अपने सद्कर्मो से बनी-"प्रदुषण की सिगरेट पीते है. ये वे सिगरेट नही जिसे विल्स या कैप्टन कहा जाता है, जो केवल अपने पीने वालो की साँसे व फेफड़े कमजोर करती है. ये प्रदुषण की सिगरेट वे बेहतरीन सिगरेट है,जिसके कश का जानलेवा धुआँँ कल पैदा हुये मासुम बच्चो की साँसो मे भी जा रहा.एक तरह से ये प्रदुषण का सिगरेट चाहे-अनचाहे सभी को पीना है.

इस प्रदुषण के सिगरेट की स्मोकिंग-" अब जीवन और मृत्यु के स्मोकिंग मे बदल गई है".हमारे चारो तरफ धुआँँ है,धुंध है और कहकहे लगाती,अट्हास करती प्रदुषण की ये हारर सुलगती सिगरेट है.हम पढ़े लिखे-"अंतिम श्रेणी के बेवकूफ" ये जानते हुये भी कि, ये प्रदुषण की सिगरेट एक दिन उसकी ही नही बल्कि उसके पुरे देश की संतति को नष्ट कर देगी फिर भी हम इसे पुष्पित व पल्लवित कर रहे.

आज इस प्रदुषण की सिगरेट के धुएं की वजह से हमारे देश की राजधानी दिल्ली को 32 हवाई उडा़नो के क्षेत्र को डाइवर्ट करना पड़ा. मार्निंग वाक करने वालो को रोका गया,बच्चों के स्कूल व कालेज बंद करने पड़े ,निर्माण आदि का कार्य रोका गया.कही आने जाने के लिये मास्क का सहारा लेना पड़ रहा. यानी-" अब प्रदुषण एक सिगरेट का धुँआ नही बल्कि हमारे इस देश के जीवन का आपातकाल बन गया है".

दिल्ली मे उच्च-स्तरीय बैठक इस सिगरेट के लिये करना ये अपने-आप में साबित करता है कि इससे-"इस देश के शरीर को क्षति पहुंच रही है" और अब इस प्रदुषण के सिगरेट का धुँआ  हमारे चारो तरफ मृत्यु-नर्तन कर रहा.हम ही क्या और हमारा देश क्या पूरी दुनिया भी अपने देश की पूरी आबादी के लिये नशामुक्ति केन्द्र नही बनवा सकता.

अब तो इस सिगरेट के साथ जैसे हम एक कदम और अपने विध्वंस की तरफ बढ़ गये है.क्योंकि इसके धुएं के साथ ही,हम इसकी कागज़ पे रखकर अब अपने जीवन रुपी मृत्यु के हिरोइन का कश भी ले रहे.इसके सारे लक्षण स्पष्ट दिख रहे--"आँखो का लाल सुर्ख हो जाना,नाक से पानी आना,खाँसी आना,जी घबरना ये सारे महान लक्षण उसी प्रदुषण की सिगरेट के धुएं मे मिक्स इस हिरोइन के धुएँ का भी है".

कभी-कभी यहां-वहां खुजली, शरीर पे चकत्ते के निशान का कष्टदायी हो जाना भयावहता का कुरुप दर्शन है.ऐसा नही की ये केवल महानगरों मे ही है,नही इस प्रदुषण की सिगरेट का धुँआ हमारे आपके यहा भी है.यानी ये-"प्रदुषण की सिगरेट का धुआँ हर कही,हर जगह उतने ही नष्ट व हमें तबाह करने की मिज़ाज मे है" आईये हम और आप जीवन के खुशनुमा आसमान में इस  धुंंए को नष्ट करने की तरफ बढ़े अन्यथा ये धुआँँ हमारे जीवन की होठो को काला व स्याह कर देगा.

यह लेख मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है.

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

व्यंग्य--(महंगाई दो प्याजा )

व्यंग्य--(महंगाई दो प्याजा)

आखिर प्याज की इस लगातार बढ़ रही महंगाई ने मुझे प्याज पे व्यंग्य- 'महंगाई दो प्याजा' लिखने को बाध्य ही कर दिया. सच तो यह है कि, अभी तलक बरसात में नदियाँ ही खतरे के निशान से ऊपर बह रही थी, लेकिन इस समय - 'प्याज की महंगाई भी अपने खतरे के निशान से भी ऊपर है.' पत्नी का शेयर बाजार की तरह गिरे हुए मुँह को देखकर तरस आ रहा, पर क्या करूँ? मैं भी अपने जेब की संवैधानिक व्यवस्था से मजबूर हूँ. 'आज किचन की ये श्रृंगारिक हालत है कि वहा पिछले चार दिन से रखा प्याज नकचढ़ी साली की तरह टोकरी में ऐठ रही है.' 

प्याज ने मुझ व्यंग्य लेखक को भी कंफ्यूजा अवस्था में पहुंचा दिया है.  समझ नहीं पा रहा कि मैं प्याज को स्त्रीलिंग लिखूँ या पुलिंग. कभी ये प्याज - 'पत्नी की तरह बे-कीमत थी, आज प्रेमिका के हाव-भाव से भी महंगी लग रही.'  प्याज के चलते इस समय सब्जी मंडी भी.वल्लाह गज़ब है. जो ठेले वाला अपने ठेले पे केवल और केवल प्याज बेच रहा उसका मिजाज जैसे कि-- 'किसी थाने के कोतवाल सा है.'  ग्राहक प्याज का भाव भी पुछने के लिए गर ठेले  से प्याज उठा रहा तो डरते-डरते.  ये डर -- 'ठेले पर प्याज बेच रहे थानेदार रूपी दुकानदार से है.' कि कहीं वे चोर-उचक्के की तरह डाट न दे. 

पहले जो सब्जी मैं 20मिनट में खरीद कर खाली हो जाता था अब वही सब्जी खरीदने में मुझे घंटों लग जाते है. ये सारी महिमा प्याज के बढ़े हुऐ भाव या महंगाई के वजह से है.  सब्जी खरीदने की ये ओलंपिक शुरुआत सब्जी मंडी के पहले ठेले से शुरू हो कर आखिरी ठेले पर जाकर खत्म होती है. 

पहले सब्जी लेने जाता था तो, पत्नी यूँ ही झोले को पकड़ा देती थी और साथ ही दो- एक कड़ी बातें भी फ्री मे कह देती थी. लेकिन इस प्याज के बढ़े हुए दाम या महंगाई ने उसका बॉडी
लैंग्वेज ही बदल दिया है.  वे तीन-चार दिन से झोले को बहुत प्यार से पकड़ा रही और मेरे सब्जी लेके लौटने का इंतजार भी अब ऐसे कर रही जैसे वे तब किया करती थी, जब उसकी और मेरी शादी हुई थी.  ये सब प्याज की वजह से हुआ है.  वे गेट पर खड़ी रहती है और बड़़े उत्साह के साथ झोले को पकड़ती है.  लेकिन जैसे ही मैं उसे प्याज न खरीदने की बात कहता हूँ, उसका सारा उत्साह काफूर हो जाता है. और उसके -- 'किचन की तरफ बढ़ते पांव मन- मन भर के हो जाते है.'

अब तो मुझे और व्यंग्य लेख दोनो को ही --'इस प्याज के बढ़े दाम का खतरे के निशान के नीचे आने का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार है.' क्योंकि प्याज की महंगाई की वजह से अपनी पत्नी का लटका हुआ मुँह मुझे अब बहुत कष्ट दे रहा. काश! सरकार जल्दी प्याज के दाम या महंगाई को कंट्रोल करें.  जिससे मेरी पत्नी के खूबसूरत से मुँह का लालित्य वापस लौटे और हम भी इस 'महंगाई दो प्याजा' से बरी हो.

यह लेख मेरी स्व-लिखित व अप्रकाशित है.

लेखक- रंगनाथ द्विवेदी
जजकालोनी मियांंपुर
जौनपुर 222002(U.P.)
Mo.no.--7800824758

व्यंग्य--(गढ़ायुक्त सड़क )

व्यंग्य----(गड्ढायुक्त सड़क )

गड्ढायुक्त सड़क का व्यंग्य साहित्य मे अपना एक उत्कृष्ट लालित्य है.इस गड्ढायुक्त सड़क का ये उबड़-खाबड़पन व्यंग्य की नायिका का उन्मादी यौवन है जो व्यंग्यकार को ललचाता है,अपने इस सौदर्य वर्णन के लिये. "ये लालच ही उसके व्यंग्य साहित्य का अलंकार है". ऐसी गड्ढायुक्त सड़को पे सवारी लादकर डग्गामार वाहन का जोर-जोर ध्वनि के साथ इधर-उधर हिचकोले की आवाज के साथ चलने की ध्वनि इस व्यंग्य साहित्य की शास्त्रियता है.

अखबारों मे लबालब प्रदुषित पानी से भरे इस गड्ढायुक्त सड़क पे एक पृष्ठ का लेख देकर इसकी रंगीनियत और रोमानियत का जो खाका ये पत्रकार अपनी अलोचना से तैयार करते है,वे व्यंग्य की जड़ में मट्ठा है. वरना ये विभिन्न कीट-पतंगो के नाना-प्रकार की ध्वनियां इस व्यंग्य लेख का वाद्ययंत्र है. जिसमे हम व्यंग्यकार तरह-तरह के तीक्ष्ण शब्दो से अलंकार रुपी गहने पहनाकर इसकी सुंदरता का मानवीय करण करते है.

इस गड्ढायुक्त सड़क के लिये वहा के फला-विधायक पे दोषारोपण करना ये व्यंग्य के सुंदरीकरण के नायक का अलौकिक अपमान है.जबकि ये विधायक हमारी व्यंग्य विधा के पुजनीय और आदरणीय है. क्योंकि ये गड्ढायुक्त सड़क इन्हें हमारे आपकी तरह घर नही अपितु सीधे विधान सभा ले जाती है. फिर ये तथाकथित हमारे व्यंग्य लेख के लिये गड्ढायुक्त सड़क मुहैया कराने वाले पुरोधा अगले पाँच वर्ष अपनी सुख और सुविधा के हनीमून का लुत्फ उठाते है.

अतः ये विधायक केवल विधायक नही अपितु ये हिन्दी व्यंग्य साहित्य के लालित्य है, जिनके कारण व्यंग्य विधा पुष्पित और पल्लवित है. भगवान करे ऐसे अन्य विधानसभा क्षेत्रो मे भी गड्ढायुक्त सड़कों की श्रीवृद्धि हो.जिससे हिन्दी साहित्य की व्यंग्य विधा विलुप्त प्राय न हो. जो भी इस श्रेष्ठ कार्य में अवरोध पैदा करे उन तथाकथित लोगो को हम परम व्यंग्य सिद्ध लेखको का ये राष्ट्रीय श्राप लगे कि वे चाहे जो हो जाये--"लेकिन वे कभी भी विधानसभा का विधायक होकर विधानसभा का मुँह न देखे".

यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

व्यंग्य--(अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस )

व्यंग्य--(अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस )

19 नवंबर केवल अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस ही नही बल्कि ये उसकी पत्नी के प्रेम के-"गुरुत्वाकर्षण की चुंबकीय चाहत का लालित्य दिवस भी है".बेशक ये अंतरराष्ट्रीय पर्व अभी महिला दिवस की तरह मनाये जाने से कई किलोमीटर दुर है. लेकिन मुझे विश्वास है कि एकदिन हमारे देश मे ये पर्व--"करवा चौथ की तरह वायरल होगा". जो तथाकथित पुरुष इस पर्व से वंचित व पुरानी इमारत की तरह धराशायी है. उनके भी इस--"अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के अच्छे दिन आयेंगे" और वे भी इसके रसास्वादन का फीलगुड महसूस करेगे.

इस अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के पर्व व त्योहार के हफ्तो पहले,पुरुषो के भी मेकप की बाजारे सजेगी वे भी अपने मुखमंडल पे मसाज की वे "रंगाई-पुताई करायेगा, कि पत्नियां बस देखती रह जायेगी". ऐसा नही कि वे जानबूझकर अपने--"मुखमंडल को गड्ढायुक्त सड़क की तरह किये रहता है". वे भी चाहता है कि उसे भी इस अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के दिन थोड़ी राहत मिले और वे अपनी पत्नी की--"मोहब्बत के फोरलेन पे उसकी मुस्कुराहट का लांग ड्राइव टेस्ट करे या छायावाद के हिन्दी की रीमिक्स चाऊमीन का रसास्वादन  करे".मुझे पूर्ण विश्वास है कि एक दिन हमारे देश का हर पुरुष अपनी पत्नी के हाथो इस अंतर्राष्ट्रीय पुरूष दिवस को --"24 कैरेट के तनिष्क डायमंड के लव गिफ्ट की तरह इन्ज्वॉय करेगा".

हमारे देश में पतियों या पुरुषो को भी अपनी पत्नी के प्रेम का--"ये स्वादिष्ट व स्वास्थ्यवर्धक डाबर च्यवनप्राश मिलते रहना चाहिये".नही तो पतियो या पुरुषो का मुँह टीबी के उस विज्ञापन की तरह हो जायेगा जिसमे ये दिखाते है कि--"कुछ लेते क्यो नही?". जिन होनहार पुरुषो या पतियो को उनकी पत्नियां ऐसा करती है उनके पतियो के मन का लव टेस्ट--"हल्दीराम के ब्राडेड चटपटे आलू भुजिया की तरह है". जिन पतियो का दिल अपनी पत्नी के प्रेम से वंचित या सुखाग्रस्त है वे बेचारे देखने मात्र से ही-- "अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस नही बल्कि सरकारी अनुदान लगते है".

हम ऐसे प्रेम के लकवाग्रस्त पतियो या पुरुषो के साथ हो रहे--"उनके दिल के आतंकी नुकसान" की खातिर इस अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के एक हफ्ते पहले अपने-अपने पतियो से इस दिन प्रेम करने वाली पत्नियों से एक ग्रुप बनवाकर,
अपने पति से इस अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के दिन भी प्रेम ना करने की इस--"मेंटल लव इलनेस से ग्रस्त पत्नियों की काउंसलिंग करा कर अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस से पहले उन्हे प्रेम या प्यार की मुख्य धारा मे लाने का नैसर्गिक प्रयास करेंगे".

मै सौभाग्यशाली पतियो की श्रेणी का अद्वितीय पुरुष हू,क्योंकि मुझे प्रतिवर्ष इस अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस के दिन मेरी पत्नी बिल्कुल अपने करवा चौथ की तरह मुझे भी सजा व सवाकर--" अपने लग्जरी प्रेम का रोमांटिक इजहार करती है".ये उसी के मोहब्बत की देन है, जो मै आज की तारीख मे--"आउट डेटेड स्कूटर से सेल्फ स्टार्ट न्यू ब्रांड की बाइक हो गया हूं".

वरना व्याह से पहले ही मेरे सर के काफी बाल--"मल्टिडिस्टर्ब टाइप के सर की तरह मेरा साथ छोड़ चुके थे या रिजेक्ट कर चुके थे"  जिसके चलते मेरा मुखमंडल 2019 मे ही "तलत अजीज के गज़ल की तरह हो गया था".लेकिन मेरी जिंदगी मे पत्नी जैसी महिला के आते ही मेरे अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस को चार चाँद लग गये मेरा कायाकल्प हो गया सच मेरी पत्नी मेरे खुशियों की कैडबरी चाकलेट है.

यह व्यंग्य लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

(अयोध्या--के पच्छ में सुप्रीम फैसला )

(अयोध्या---रामलला के पक्ष मे सुप्रीम फैसला)


अयोध्या ने तमाम झंझावात व उतार-चढ़ाव देखे,पर कभी भी सरयू और अयोध्या ने अपने प्रेम और सौहार्द का धैर्य नही खोया, जबकि इसे बार-बार तरह-तरह से चोटे दी गई,इतने लंबे समय और कालखंड तक भारत के किसी भी धार्मिक स्थल का विवाद नही चला, जितना की अकेले रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद का चला. लेकिन कहते है ,कि अंत भला तो सब भला.यानी अयोध्या के सारे विवादों की इस पटकथा का अंत. अंततः सुप्रीम कोर्ट के सुप्रीम निर्णय से हुआ और ये ऐसा एतिहासिक सुप्रीम निर्णय है जिसमे हमारे प्रधानमंत्री के कथनानुसार-"ना किसी की जीत हुई और ना किसी की हार."

रामलला का ये विवाद 1858 से चला आ रहा था, इस बीच तमाम कालखंड और समय अपनी करवटे बदलता रहा,हाँँ अगर इस कालखंड और समय के बीच कुछ नही बदल रहा था, तो वे रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद का विवाद था. इसे खत्म होने को कौन कहे ये हमेशा वैसे ही सुलगता रहा,हाँँ इस सुलगने की वृद्धि या इजाफा इसमें जरुर होता रहा.एक के बाद एक मुकदमे और इसके पक्षकार बढ़ते गये,लेकिन इनमे से कुछ महत्वपूर्ण शुरुआती चार मुकदमे दायर हुये थे उनमे से एक-"16 जनवरी 1950 में गोपाल सिंह विशारद का है-जिनकी मौत के 33 वर्ष बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने पुजा करने का अधिकार दिया".

रामलला और बाबरी मस्जिद के विवाद का मसला हाइकोर्ट के निर्णय के बाद ही सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. क्योंकि हाइकोर्ट के फैसले को किसी भी पक्ष ने स्विकार नही किया.लेकिन इस फैसले और सुनवाई से पहले सुप्रीम कोर्ट ने सभी को आपसी सुलह और समझौते से इस पूरे मामले को हल करने का सुअवसर व मौका दिया,लेकिन कोई भी हल न निकल पाने और समय सीमा खत्म हो जाने पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गगोई ने चालीस दिन लगातार सुनवाई कर इस विवादित मसले को अपने रिटायर होने से पहले ही निबटारे का एक जस्टिस निर्णय लिया और इस मसले का सारगर्भित और एतिहासिक निर्णय व फैसला सुनाया भी.

हालांकि इस चालीस दिन की लगातार सुनवाई से मुस्लिम पक्ष के या बाबरी मस्जिद पक्ष के लोगो ने असंतोष जाहिर किया. हाँँ इस निर्णय से पहले सबसे महत्वपूर्ण बात रही,कि पक्षकार तो पक्षकार सभी हिन्दू और मुसलमान भाईयो ने ध्वनिमत से कहा कि--"सुप्रीम कोर्ट का जो भी निर्णय आयेगा हम अपनी पूरी मोहब्बत और प्यार से उसे स्विकार करेंगे" किया भी यानी ये "विवाद की विजय नही बल्कि प्रेम और सौहार्द की विजय हुई" कुछ राजनीति करने वाले जो इस सुप्रीम निर्णय के फैसले के बाद के ईधन और आग की उम्मीद किये थे, वे अपना सा मुँह लिये रह गये अर्थात उनकी 'राजनीति का तवा इस निर्णय के बाद जैसे उन्ही पे हँस रहा था".

सुप्रीम कोर्ट का ये सुप्रीम निर्णय 1045 पेजो पर लिखा गया,जिसमे 929 पेजो पर सभी जजो ने एकमत से फैसला लिया,116 पेजो पर एक जज की राय और जजो से अलग अथवा भिन्न थी लेकिन उनके नाम का जीक्र नही किया गया ये सही भी है क्योंकि आवश्यक नही कि हर बिन्दु या निर्णय पे सभी जज का विचार एक ही हो अगर एक ही हो जाये तो सुप्रीम कोर्ट मे बैठे मीलार्ड के फैसले को आम जन-मानस स्विकार तो लेता  "लेकिन?" जैसे प्रश्न के साथ जो कि कतई सही नही था,इससे ये साबित होता है कि इस-"सुप्रीम फैसले मे कोई बिन्दु छुटा नही अर्थात् भारत और अयोध्या के इस प्राचीन विवाद का सुप्रीम निर्णय हुआ".

इस सुप्रीम निर्णय की सुप्रीम पीठ के पाँच बेहतरीन और मीलार्ड जैसी गरिमा को सुशोभित करने वाले वे सर्वोच्च विद्वत सदस्य जिनके नाम निम्नवत है-
(1) जस्टिस एस. ए.बोबड़े
(2) डी. वाई. चन्द्रचूड़
(3) अशोक भूषण
(4) एस एन जीव
और स्वयं पाँचवे चीफ जस्टिस--
(5) रंजन गगोई.
चीफ जस्टिस रंजन गगोई चूंकि पता था कि वे 17/11/2019 को रिटायर होने वाले है.अतः उन्होंने सारे पक्षो की सुनवाई के बाद फैसले को अपने पास सुरक्षित रख लिया था,ये सर्वविदित भी हो गया था कि रामलाल और बाबरी का फैसला 17 तारीख से पहले ही आ सकता है और ऐसा हुआ भी इस निर्णय को सुनाने से पहले उन्होंने सुरक्षा के तमाम पहलुओं की गहन मंत्रणा की उन्हे तलब भी किया,उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर भारत के गृहमंत्री तक सभी को सुरक्षा के इंतजमात मे तल्लीनता के साथ खुद लगे रहना पड़ा और पल-पल की जानकारी बीच-बीच में प्रधानमंत्री को भी देते रहे थे. यानी इसे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गगोई के मंशानुसार पूरी गंभीरता से लिया गया.

जैसा कि लोगबाग और मीडिया को उम्मीद थी कि ये सुप्रीम निर्णय किसी अवकाश के दिन ही आयेगा और आया भी.यानि 9/11/2019 को सेकंड सटरडे व उसके दुसरे दिन रविवार की छुट्टी थी को आया.इस निर्णय को सुनाने से पहले चीफ जस्टिस रंजन गगोई ने-वकीलो पत्रकारों से भरे कक्ष मे कहा कि मै इस फैसले को सुनाने के लिये महज़ पैतालीस मिनट लुँँगा.और वाकई उन्होनें केवल पैतालीस मिनट ही लिया--इन पैतालीस मिनटो मे उन्होनें पूरे अयोध्या राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के विवाद के मुख्य-मुख्य बिन्दुओं को पढ़ा.

न्यायपीठ ने कहा कि--"विवादित ढाँचे मे ही भगवान राम के जन्म होने की अवधारणा व आस्था हिन्दुओं की अविवादित है".यही नही पुरातत्व की खुदाई मे बाबरी मस्जिद के नीचे से प्राप्त हुई सीता की रसोई, राम-चबूतरा और भंडारगृह की उपस्थिति इस स्थान के धार्मिक तथ्य की गवाह है. हालांकि न्यायालय ने कहा कि-"सिर्फ आस्था और विश्वास के आधार पर मालिकाना हक स्थापित नही किया जा सकता हा ये विवाद खत्म होने के सुचक हो सकते है".
साथ ही न्यायालय ने ये भी कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड अपनी दावेदारी को पुख्ता पेश कर पाने मे विफल रहा.

कोर्ट चूंकि अपने निर्णय की शुरुआत मे ही शीया वक्फबोर्ड व निर्मोही अखाड़े के दावे को खारिज़ कर दिया था.ये मसला केवल सुन्नी वक्फबोर्ड और हिन्दू पक्ष के बीच का था क्योंकि दोनो पक्षो के मसले तर्कसंगत थे और ये दोनो महज़ इस पुरे मसले मे रोड़े की तरह थे.हिन्दू पक्ष के वकील- के. परासन,पी. एस. नरसिम्हा, रंजीत कुमार, हरिशंकर जैन, सी. एस. वैद्यनाथन, पी. एन. मिश्रा, सुशील कुमार जैन जयदीप गुप्ता थे. जीसमे पूर्व अटार्नी जनरल के. परासन ने अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट मे बहस करते हुये-पौराणिक साक्ष्यों व तथ्यो के आधार पर विवादित ढाँचे पे मंदिर होने की जोरदार तरीके से दलीलें पेश की जो कि अंत तक इस एतिहासिक निर्णय की धुरी बना रहा.अतः चीफ जस्टिस रंजन गगोई  और उनके ज्यूरी के चार अन्य प्रमुख जजो की पीठ को भी इस साक्ष्य ने अपना फैसला मंदिर पक्ष मे देने को विवश किया.

मुस्लिम पक्ष के प्रमुख वकील राजीव धवन ने मुस्लिम पक्ष के मालिकाना हक की दलील पेश की.जफरयाब जिलानी मुस्लिम पक्ष की ओर से कोर्ट मे पेश हुये और इमाम के वेतन आदि के सुबूत पेश कर वहां मस्जिद होने का दावा किया.वकील निजामुद्दीन पाशा ने-"पवित्र कुरान की आयतो के आधार पर देश की सबसे बड़ी अदालत मे इस्लामिक कानून व वहां पर मस्जिद होने की तगड़ी बहस की.इन सारे दलीलों को साबित न कर पाने की स्थिति मे कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष अर्थात सुन्नी वक्फबोर्ड के वहां पर बाबरी मस्जिद होने के दावे को खारिज़ कर दिया.

इस सारे विवाद के निबटारे मे सर्वोत्कृष्ट भूमिका 1990 व 1992 के उत्तर-प्रदेश के पुरातत्व विभाग की खुदाई मे मिले वे साक्ष्य है जो अंत तक कोर्ट नकार ना पाया. जिसने हिन्दू पक्ष के दावे को पुख्ता व मजबूत किया ये वही समय है जब आडवाणी जी सोमनाथ से अपनी रथयात्रा कारसेवकों के साथ लेकर अयोध्या के लिये निकले थे.हालांकि कि इस बीच तमाम हालात ऐसे थे जिनका जीक्र किसी भी लिहाज़ से करना आज प्रासंगिक न होगा. क्योंकि आज हमारा देश शांति और शौहार्द से उनपे अपनी विजय श्री पाली है. 

ए एस आई टी की रिपोर्ट के हवाले से चीफ जस्टिस रंजन गगोई ने कहां कि--"खुदाई से मिले पुरातत्व के साक्ष्य से ये साबित होता है कि मस्जिद के नीचे एक विशाल संरचना थी,जो इस्लामिक नही थी,वहां प्राप्त हुई कलाकृतियां इस्लामिक नही थी,ए एस आई (पुरातत्व विभाग) ने इन संरचनाओं को-"12 वी सदी का मंदिर बताया है". हालांकि 12 वी सदी से 16 वी सदी तक वहांं क्या होता रहा इसका प्रमाण नही मिल पाया है,लेकिन क्रास एक्जामिनेशन के बाद भी वहा मंदिर होने का हिन्दुओं का दावा झुठा साबित नही हुआ. पुरातत्व विभाग ने हिन्दू और मुस्लिम दोनो पक्षकारों की मौजुदगी में 100 रंगीन व श्वेत श्याम तस्वीरों की फोटोग्राफी व वीडियोग्राफी करायी.

अयोध्या राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के फैसले के अहम बिन्दु------
(1) कोर्ट ने कहा कि मस्जिद के नीचे कोई भी इस्लामिक ढ़ाचा नही मिला.
(2) मुस्लिम पक्ष अपना दावा सशक्त तरीके से पेश नही कर पाया.
(3) जमीन बटवारे का हाइकोर्ट का फैसला कही से तार्किक व न्यायसंगत नही.
(4) भगवान श्रीराम के जन्मस्थान के दावे का विरोध नही.
(5) आस्था पर किसी भी तरह का विवाद नही.
साथ ही कोर्ट ने अपनी टिप्पणी भी इस विवाद के फैसले के तहत की जो निम्नवत है----
(1)मस्जिद को यूँँ ढ़हाया जाना सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन था.
(2)कोर्ट ने रामलला को कानूनी व्यक्ति माना.
(3) साथ ही कोर्ट ने पुरसंगत ये टिप्पणी की कि मे इस विवादित जगह पे मस्जिद थी.
कोर्ट ने साथ ही उन तीन कमेटी के सदस्यों की प्रशंसा भी की जिनमे कलीफुल्ला, श्रीराम पंचू और श्री श्री रविशंकर जी थे. जिन्होंने इस विवाद को आपसी सहमति से निबटाने का भरपुर प्रयास किया.

इसके साथ ही कोर्ट ने सबसे महत्वपूर्ण जो निर्णय लिया वे मंदिर निर्माण व उसकी कार्य योजना का जिम्मा सरकार को देने के साथ ही अयोध्या मे ही कही मुस्लिम पक्ष को पाँच एकड़ जमीन उनके मस्जिद के लिये मुहैय्या कराने की जिम्मेदारी सौपी.पूनर्विचार याचिका दायर करने के लिये कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को तीस दिन तलक का मौका दिया.इस निर्णय के आने के बाद प्रधानमंत्री ने खुद इशारो से अपनी बात स्पष्ट करते हुये कहा कि-"अब ये देश किसी अन्य मंदिर और मस्जिद के नये विवाद के लिये तैयार नही".यानी स्पष्ट है कि आईये हम आप और सब देश के नव-निर्माण में लगे.

अयोध्या का अर्थ ही है जिसे किसी भी युद्ध मे हराया ना जा सके और वाकई "विवाद से लेकर फैसले तलक अयोध्या हारी नही".इस विवाद के दो खास पक्षकार परमहंस रामचंद्र दास और हाशिम अंसारी आज जीवित नही लेकिन उनका सौहार्द और उनकी मित्रता अयोध्या मे आज भी जीवित है.मुझे खुद लग रहा जैसे इस फैसले के बाद दोनो एक साथ हँसते हुये कोर्ट से निकले हो एक दुसरे को जीत की बधाई देकर  एक ही रिक्शे पे बैठे हो. अयोध्या मे कभी होली का रंग हाशिम को लगा तो कभी ईद की सीवई को पूरी चटखारे के साथ परमहंस रामचंद्र दास जी ने पूरी मस्ती और चटखारे के साथ खाया.मंदिर और मस्जिद के विवाद की सारी पटकथा का सुप्रीम कोर्ट मे सुप्रीम अंत जरुर हुआ. लेकिन इस सुप्रीम अंत मे भी हमारे देश और अयोध्या के शांति,सद्भाव, प्यार की सुप्रीम मोहब्बत जीत गई.


यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

(अलाव )

ठंड के मौसम की संवेदना पे लिखा लेख-------

                  ( अलाव )

हमारे शहर,तहसील और बाजारों के फुटपाथों पे जब बीना किसी शाल के ठंड से अकड़ी 20-30 लाशे मिलती है तो पहली बार---" अखबारों को थोड़ी सी गर्मी प्राप्त होती है और अखबारी जमीर की वही गर्मी इनसे थोड़ा बहुत दो-तीन दिन सच लिखवा लेती है, फिर यही सच की गर्मी शहर के कुछ नामचीन लोगों व सरकारी लोगों तक पहुचती है".

ये गर्मी चंद चौराहे के जलते हुये अलाव मे परिवर्तित हो जाती है,इसे तमाम सरकारी अमले अपनी उपलब्धियो मे गिनाने मे लग जाते है. सर्वविदित है कि पुरी दुनिया मे कागज की लिफाफेबाजी मे मेरे इस देश का कोई जवाब नही. " और ठंड के मौसम मे भी ये लिफाफेबाजी उसी पुराने गोल्डेन लुक मे दिखती है". आप जब अखबार उठाके पढ़ेंगे तो--"फुटपाथ पे ठंड से मरे गरीब, असहाय लोग किसी भी प्रकार के ठंड से नही मरते ऐसा हमारे यहाँ के अलौकिक डाक्टरों का कथन है".

वैसे भी हमारा ये वृहद देश--"अपनी वेदना का चरम जीता है,उसी एक चरम वेदना का एक नाम है यहाँ की पड़ने वाली भयंकर ठंड़". और कुछ तथाकथित पहुंच वाले लोगों के चौराहे पे जलवाया गया ये अलाव, हां कुछ स्वयंसेवी संस्थायें या बड़े स्तर के अधिकारी बीच-बीच में कंबल वितरण कर कुछ तो इन गरीबो-असहायों की ठंड से बचने भर की एक अल्प ही सही व्यवस्था करा देते है.
चाहे कुछ भी हो पर चौराहे पे जलवाई गई ये लकड़ी--"जब शहर के लोग अपने-अपने सुसज्जित कमरो में जाके सो जाते है तो, चौराहे पे अलाव की यही लकड़ियां आवारा पशुओं और फुटपाथों पे अपनी नंगी आँखों से जी रहे इस ठंड व ठिठुरन को अपने से दुर कर आने वाले कल की सुबह का दर्शन कर पाते है. 

यही वे है जो हर मौसम का आहुत जीवन जीते है इनके लिये---"रैन-बसेरे और अलाव किसी भी सुखमय विश्वठहराव की तरह है". आइये हम अपने इस लेख से आपकी वेदना को एक आवाज़ लगाते है कि अगर मालिक ने आपको इस लायक किया है कि इस कपकंपाती ठंड मे कही आप अलाव जलवा सके तो छुट्टे व अवारा पशु, बीना किसी शाल स्वेटर के फुटपाथ पे टहल रहे चंद पागल को कुछ महिनो के अलाव की तपिश दे दो साहब"

@@@रचयिता--रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (उत्तर-प्रदेश)

Mo.no.7800824758

लघुकथा---(दंगा )

( दंगा )

उस समय गफूर मिस्त्री मंदिर और मस्जिद दोनो को ही बनाने के लिये मशहूर थे,शायद ही शहर का कोई भी मंदिर-मस्जिद बीना गफूर मिस्त्री के हाथ लगाये पुरा हुआ हो, उन्होंने कभी भी मंदिर- मस्जिद बनाने मे अपने मजहब को आड़े नही आने दिया ,दोनो को उन्होंने उसी मुहब्बत से बनाया व तराशा.

वही गफूर मिस्त्री की अचानक एकदिन अलसुबह गली मेंं चीखो-पुकार सुन कर आँख खुल गई, तो उन्होनें घर के लोगो से पुछा कि ये क्या हुआ ? तो उन्हें घर के लोगो ने बताया कि शहर मे दंगे भडक गये है और रात मे काफी हिन्दू-मुसलमान काट मार दिये गये. कई मंदिर और मस्जिदें जला दी गई.

ये सुन गफूर मिस्त्री के सीने मे दर्द उठा और वे तड़पने लगे तो घर वालों ने उनके सीने को बहुत देर तक मला, तो उन्हें थोड़ी राहत मिली . राहत मिलने पे वे अपनी कंपकपाती अँगुलियों को उठा के रोते हुये बोले--कि जिस मंदिर-मस्जिद को मैने इस गफूर मिस्त्री ने बीना किसी भेदभाव के बनाया था आज उसे शहर के दंगे ने हिन्दू-मुसलमान बना दिया, सच आज केवल गफूर मिस्त्री नही रो रहा बल्कि उसके सीने मे--"उसके बनाये और तराशे अल्लाह व राम रो रहे" .

@@@रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.--222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.--7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

लघु-कथा--(जुड़े बेचने वाली लड़की )

(जुड़े बेचने वाली लड़की)

मुझे बहुत पसंद है--फुटपाथ पे वे जुड़े बेचने वाली लड़की,सीधा-सादा सा बीना किसी मेकप या धोखे से पुते उसका मासूम चेहरा! बीन व्याह के भी रोज बीना नागे उसे करीब और करीब से देखने की चाह में खरीद लाता हूं उससे मै बीना मतलब एक जुड़ा।
मेरे इस सीलसीले को दो साल होने को आये,बस हमेशा की तरह वे मुझे जुड़े देती है और मै उसके पैसे! शायद उसे भी मेरी इस बात का एहसास भर है लेकिन वे चुप है शायद उसके अंतस में--आधुनिक लड़कियो सा उच्छृंखल भाव नही। आज ये सोच मै घर से निकला हूं कि चाहे जो हो आज आफिस से छुटते और लौटते वक़्त हमेशा की तरह फिर उससे जुड़ा खरीदुंगा और आज उसे पैसा देने से पहले अपने दिल की हर बात कह लुंगा क्योंकि अगर मैने अब भी देर की तो कही एैसा न हो कि मेरे न कह पाने की वजह से "हमेशा के लिये जुदा हो जाये हमसे इस फुटपाथ पे ये जुड़ा बेचने वाली लड़की"।
आफिस टाइम खत्म होते ही जब मै उस फुटपाथ की तरफ़ बढ़ा तो लगा जैसे कि आज मेरे पाँव लरज रहे थे,ये वही फुटपाथ और पाँव थे जिससे मै अब से पहले बड़ी उतावली मे पहुँच लिया करता था,लेकिन आज वही उतनी दूरी मुझे तय करने मे पसीने छुट रहे थे।अचानक से पता नही क्यू आज पहली बार इस तरह एक बार तक--फिर अपने जुड़े इधर-उधर कर अपने को जैसे वे भी आज बहला रही थी।मैने पर्स निकाले और उसे आज भी वही एक जुड़ा देने को कहा,उसने भी रोज की तरह जुड़ा उठाया और मुझे थमा दिया।
लेकिन आज मै उससे जुड़े लेने के बाद अपने जुड़े वाले हाथ को वापस नही किया अपितु मैने उससे कह दिया--"कि शायद तुम नही जानती कि मै बीना व्याह के सिर्फ तुम्हें और तुम्हें देखने की खातिर मै एक जुड़े रोज प्रतिदिन खरिदता रहा,लेकिन मै आज अपने आपको रोक नही पा रहा प्लीज बताओ--क्या तुम मेरी जीवनसंगिनी बनोगी? क्या मै तुम्हें अपना बना पाऊँगा?"।
तो अचानक से उसने जुड़े को थाम ये कहा कि मै जानती हूं कि आप पिछले दो सालो से--आप बेवज़ह मुझसे जुड़े लेते रहे,लेकिन मै कहा और आप कहा के अंतर से डरी रही बाबू मुझे स्वीकार है और मै आपको ये विश्वास दिलाती हूँ कि कभी नही बदलुंगी आपकी जीवन- संगिनी बन,"आपके प्रेम और प्यार के इस फुटपाथ पे हमेशा खरी उतरेगी ये गरीब जुड़े बेचने वाली लड़की"।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

(इज्जत घर )

 ( इज्ज़त घर)

हमारे गाँव में सबसे पहला "इज्ज़त घर" बनवाने का श्रेय बंसीलाल को जाता है. हालांकि मैने जितनी आसानी से बंसीलाल और उनके पहले इज्ज़त घर बनवाने की बात लिख दी वे मेरे लिखने जितना आसान न था. इसके लिये बंसीलाल को तमाम ग्रामीण झंझावातों का सामना करना पड़ा. उनके खिलाफ तरह-तरह की कानाफूसी हुई,चोरी छिपे पंचायते बुलाई गई, उनपे गाँव के बिगाड़ने के आरोप लगाये गये. हद तो तब हो गई जब उनके खिलाफ टोने-टोटके होने लगे.

"कई गाँव-गिराव के तांत्रिकों ने अपने तांत्रिक शैली में बंसीलाल के नाम से नीबू काटे".लेकिन बंसीलाल मे ये इंकलाब यूहीं नही आया था,इसके मूल मे उनकी साक्षर बहू का बहुत बड़ा योगदान था,हालांकि बंसीलाल के मन मे पहले से ही मुख्यधारा के प्रति-ललक व इच्छा  थी लेकिन गाँव-गिराव से बगावत का मन मे एक भय था. बहू के आने से पहले ही उसने अपनी पत्नी और बहन के चेहरे पे वे भय बंसीलाल ने बखूबी देखी थी.

जब उसकी पत्नी और बहन गहरे-अंधेरे मे डरी-सहमी सी हाथ मे लोटा लिये घर से शौच जाने  के लिये निकलती थी,तो उनके पाँव-"मन-मन भर के होते थे",उनके मन मे एक अजीब सा डर व भय रहता था, कि कही कोई फबत्ती न कस दे,कोई मनचला रास्ते में शरारत न कर दे,लेकिन वही बहन और पत्नी जब सकुशल घर लौट आती थी, तो उनके चेहरे पे लौटने की खुशी साफ दिखती थी,बंसीलाल जी मसोसकर रह जाता और ये सोचता कि- कास इनकी ये खुशी वे इनके चेहरे पे  प्रतिदिन की खुशी मे वे बदल पाता.लेकिन ये पत्नी और बहन की खुशी केवल अगले दिन शौच जाने तक ही रहती.

बंसीलाल की इस इच्छा को पुरी करने के लिये जैसे भगवान ने भी , बंसीलाल का चयन  गाँव के पहले इज्ज़त घर के लिये कर लिया हो. तभी तो उसके घर गाँव मे सबसे ज्यादा पढ़ी-लिखी बहू को, इसके घर बहू के रुप मे भेज दिया. उसकी बहू ने जैसे ही बाबू जी कहकर ये कहना शुरु किया कि--"बाबू जी आज तमाम अखबार, टीबी मे ये दिखा व बता रहे है कि घर मे शौचालय की कितनी जरुरत है,घर से बाहर शौच को गई बहु-बिटियो के साथ किस तरह बलात्कार व उनकी नृशंस हत्यायें हो रही है".

उसकी बहू के कहे एक-एक वाक्य बंसीलाल के कलेजे को चुभ रहे थे,आंदोलित कर रहे थे,पहले से ही ये बात उनके मन मे थी,लेकिन गाँव की भय से वे मौन हो जाते थे लेकिन आज वे अकेले नही पुरा परिवार उनके निर्णय के साथ था,ये खुशी बंसीलाल से ज्यादा उनकी पत्नी,बहन,बिटिया और बहु की गीली आँखो मे दिख रही थी उन्होनें भी मारे खुशी के घर में रंखे फावड़े को उठाया और "गाँव के पहले इज्ज़त घर की नीव रख दी".

शौच मुक्त भारत का ये "इज़्जत घर" केवल किसी सरकार का समर्थन या राजनीति नही,बल्कि न जाने कितने बंसीलाल के गाँवो-घरो की बहू-बेटियों के आत्मसंम्मान का पहला "इज्ज़त घर" है.आईये हम सभी बंसीलाल अपनी-अपनी बहुओं को मुँह दिखाई में कुछ दे या न दे पर उनके हाथ में हम उन्हेंं "इज्ज़त घर"  की एक चाभी अवश्य दे.

यह लघुकथा मेरी स्व-लिखित व अप्रकाशित है.


लेखक---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

लेख--(महात्मा गाँधी-एक विश्व-चिंतन )

 (महात्मा गाँधी--एक विश्व चिंतन)

2 अक्टूबर महज़ गाँधी जयंती ही नही अपितू हमारे इस देश और संपूर्ण विश्व का गौरवशाली क्षण या दिन है.वे स्वतंत्रता आंदोलन की विश्व धरोहर है.उनपे कुछ लिख पाना सहेज पाना संभव नही क्योंकि--"वे खुद मे किताब के प्रथम पृष्ठ व आखिरी पृष्ठ है". इस बार महात्मा गाँधी की ये 150 वी जयंती है.महात्मा गाँधी की जयंती को "अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस" के रुप मे मनाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2007 मे ही कर दी थी.

महात्मा गाँधी हमारी स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक थे.इन्होंने दक्षिण अफ्रीका में काले-गोरो का भेद मिटाने के लिये सफल लड़ाई लड़ी,उन्हें स्वयं रेल के डिब्बे से बेइज्जत कर के बाहर फेक दिया गया था.इस विजय के साथ जब 1915 मे वे भारत आये,तो यहा भी हालात कमोबेश उससे खराब ही थे.सच तो ये है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन मे जिस महात्मा गाँधी को आज पुरी दुनिया जानती है--"उस महात्मा गाँधी का जन्म उसी सफल आंदोलन की गर्भ से हुआ".चूंकि महात्मा गाँधी ने अपने बैरिएस्टर की पढ़ाई यूनिवर्सिटी कालेज लंदन से की थी,इसलिये उन्हें काफी हद तक मानव स्वतंत्रता व उसके मूल अधिकारों की जानकारी थी.

महात्मा गाँधी को सर्वप्रथम--"महात्मा गाँधी कहकर राजवैद्य जीवन राम कालीदास ने संबोधित किया".आजाद हिंद फौज के नेताजी सुबाष चन्द्र बोष ने 1944 मे रंगुन रेडियो से--"उन्हें पहली बार राष्ट्रपिता कहा".इतना ही नही बल्कि अपने समय के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक अल्बर्ट आइस्टिन ने 2 अक्टूबर 1944 को उनके 75 वे जन्मदिवस पे अपने खत में लिखा कि--"आनेवाली नस्ले शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता फिरता था".जबकि अल्बर्ट आइस्टिन महात्मा गाँधी से उम्र मे 10 वर्ष छोटा था,और महात्मा गाँधी से कभी भी उसकी मुलाकात आमने सामने न हुई थी वे एक दुसरे से खतो मे मिला करते थे,ये उस महात्मा गाँधी का प्रभाव था.

महात्मा गाँधी आज बेशक दुनिया मे नही है फिर भी यूँँ लगता है कि जैसे वे--" हम लोगो के साथ जीवित है,चल रहे है,प्रांसगिक है उन्हेंं आने वाली सदियों ने भी शायद अपने पास हमेशा के लिये सहेज रखा है".

महात्मा गाँधी ने हमेशा ऐसे मार्ग का चयन किया जहा सिर्फ और सिर्फ अहिंसा थी,ये अहिंसा कितनी मूल्यवान है,इसे हर कालखंड स्विकारता है आने वाले कल भी स्विकारेगा क्योंकि--"हिंसा नष्ट करती है और अहिंसा निर्माण".हा ये सच है कि हम और हमारी पीढ़ियों ने भी गाँधी को नही देखा,उनके चिंतन को नही समझा,गाँधी पे बहुतो के आरोप भी लगते है इसके पक्ष व विपक्ष में तर्क भी दिये जाते है.

लेकिन मैने अपनी दादी व उनके उम्रवय के लोगो से जिज्ञासावस महात्मा गाँधी के बारे में  पुछा तो उनका दिया जवाब मेरे अब तलक के जीवन के--"सबसे मूल्यवान और सुखद सुनने के क्षणो मे एक धरोहर की तरह हमेशा के लिये घर कर गया".उन्होंने कहा बेटा महात्मा गाँधी को तुम ही नही इस देश के न जाने कितने लोग नही समझ पायेंगे.

वे उनकी दुबली-पतली सी काया कितनी महान थी कि उनके पीछे उनकी एक आवाज पे--"जो जिस स्थिति मे होता बिना सुध-बुध के रेला का रेला चल पड़ता था".दादी और उनके उम्रवय के लोगो ने कितना सच कहा था "आज हम स्वहित व राष्ट्रहित में सौ-पचास भी नही चल पाते उस देश में महात्मा गाँधी ने राष्ट्रहित व देश की स्वतंत्रता के लिये करोड़ो को चला दिया".उनके सारे आंदोलन विश्वव्यापी होते थे व अग्रेंजी हुकूमत की बर्बरता की चूले हिला देते थे.सच तो ये है कि--"अग्रेजों की बर्बरता की लाठियां भी उस महात्मा गाँधी से नतमस्तक हो जाती थी".

स्वतंत्रता के लिये इस अहिंसा के पुजारी को कई वर्ष जेल मे भी रहना पड़ा.उनके आंदोलन चाहे 1930 का नमक सत्याग्रह हो,चाहे 1942 का असहयोग आंदोलन अपने मंतव्य को सफल रहे.महात्मा गाँधी स्वतंत्रता आंदोलन के एक कुशल महानायक ही नही अपितु एक उत्कृष्ट लेखक भी रहे उनकी आत्मकथा--"सत्य का प्रयोग" से ये साबित होता है,ये पुस्तक "गाँधी के चिंतन व लेखन को समझने वाले आज भी इसे किसी विश्व लेखक की तरह पढ़ते है"

महात्मा गाँधी किसी को आदर्श समझाने से पहले उसे स्वयं अपने आचरण में लाते थे यही कारण है कि वे अब " सादगी की प्रतिमूर्ति की तरह हमेशा के लिये इस विश्व के स्मृति पट पे दुनिया के जीवित रहेंगे". उनकी सादगी,सौम्यता, शाकाहार सब आज की परिकल्पना में बेमेल लगे लेकिन सच है.उनका "वैष्णव जन ते तैनो कहिये या रघुपति राघव राजा राम जैसे अब भी इस संत के साबरमती आश्रम में गुज रहा हो".बेशक इस अहिंसा के पुजारी को--"नाथूराम गोडसे ने अपनी हिंसा से मार दिया हो,लेकिन नाथूराम का वे आक्रोश और उसके पिछे का तर्क विफल हुआ और महात्मा गाँधी की अहिंसा जीत गई और हमेशा जीतेगी,क्योंकि महात्मा गाँधी व्यक्ति नही विश्व-बारुद की जहरीली साँसो की एकलौती दवा है".


यह लेख मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है.

@@लेखक--रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

लघु-व्यंग्य---(लव की डायबिटीज)

लघु-व्यंग्य    
              (लव की डायबिटीज)

जी हां अक्सर मेरी वाइफ से लव की डायबिटीज घटती-बढ़ती रहती है.जबकि मै इस डायबिटीज से बचने के लिये तमाम परहेज करता रहता हूं,लेकिन फिर भी मेरे इस मैराथन प्रयास की इन्सुलिन फेल हो जाती है.

 इसका मुल कारण "उसकी सुंदरता का वे उतप्लावन बल है, जिसकी गुरुत्वाकर्षण बल का मै पिड़ित या शिकार हूं". उसकी सुंदरता से परहेज कर पाना बहुत मुश्किल है! क्योकि जब कभी मेरी नज़र उसके-"रुप-लावण्य की रसमलाई या रसगुल्ले पे पड़ती है ,तो मै बरबस अपनी वाइफ के लव के डायबिटीज का एकाध पीस मार बैठता हूं"

ये मेरी वाइफ का हसबैंड को लव की डायबिटीज से पिड़ित करने, का गुण उसे अपनी माँ से मिला है.ये मुझे पहले तो नही लेकिन शादी के बाद समझ मे आया.क्योंकि इस समय लव की डायबिटीज से पिड़ित मै जितना स्मार्ट व सुंदर लग रहा हूं,उतने ही स्मार्ट व सुंदर मेरी शादी के समय मेरे ससुर लग रहे थे.

वैसे अभी तलक वाइफ के लव की डायबिटीज से बचने का कोई सक्सेस इलाज पुरी दुनिया मे नही खोजा जा सका है.बस इतना गर संभव हो सके तो करे कि अपनी व्यूटीफुल वाइफ को कम से कम मेकअप करते हुये देखे. क्योंकि वाइफ से लव के डायबिटीज की शुरुआत ही--"फेरन लवली,लोटस की लिपस्टिक व लैकमे के काजल से होती है". 

यह लघुव्यंग्य मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है.

@@@लेखक---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

लेख----(बसंत)

लेख-----(बसंत )

बसंत प्रकृति पर्व  के साथ ही, युवा उन्माद और उमंग का एक रसमय पर्व भी है.ये कामदेव के साथ रति-- "की कलात्मक छेड़छाड़ की वे शास्त्रीय अभिव्यक्ति है, जिससे हमारे देश को छोड़कर , बाकी विश्व दुनिया वंचित है". हमारे आस-पास के वातावरण में एक मकरंद, महक व खुशबू हवा के झोंके से हमारी सांस-सांस में कुछ इस तरह से घुल-मिल जाती है कि-" हमारे मन के बसंत का जादू, किसी नायिका के  
उस पिले सलवार सी हो जाती है, जहाँ काव्य के सरसो के फूलों  रूपी नायिका अपनी  युवा ख़ूबसूरती से साहित्य भ्रमर को ललचाती है". 

बसंत प्रकृति की सबसे बेहतरीन और खूबसूरत वे जिन्दा पेंटिंग है,जहा की उकेरी गई  मादकता भी हमें कामांध नही करती, ये पूरी उम्र वाटिका की भ्रमर-अनुगूंज है, जिसे पुरे बसंत मतवाला भ्रमर इस डाली से उस डाली एक प्रेम राग के रसीक की तरह मंडराता व गाता फिरता है और आये हुये प्रकृति बसंत का चुम्बन वे फूल दर फूल लेने की अपनी बसंत लिप्सा मे अपने मन  की रमणीयता का बासंतिक रसास्वादन करता है, एक तरह से भ्रमर को हम प्रकृति बसंत का  वे सजीला नौजवान कह सकते है जिसके लिये बसंत, अकेले प्रेम का-विश्व महीना है.

बसंत महीने को हम राग व ध्वनि का महीना भी कहते है.इस माह के राग-ध्वनि का सर्वोपरि गायक व संगीतकार आम की मंजरियो 
का वे सिरमौर है जिसके वाद्य-शास्त्र से सुशो भित  ध्वनि की कलात्मक  अभिव्यक्ति को हम सभी प्रकृति प्रेमी आम बोलचाल की भाषा में उसको--राग कोयल के नाम से जानते है. उसके गले से निकली कुक चहुओर दिशाओ में प्रेम की अभिव्यक्ति है, जहाँ साहित्य, संगीत, साधना के साथ ही नायिका के परदेश में रह रहे नायक का संयोग व वियोग श्रृंगार है. 

बसंत केवल माह या महीना नही बल्कि हमारे आस-पास की प्रकृति प्रदत्त केनवास  पे वे तमाम जीवित चित्र है जिसे अपने तूलिका या ब्रश से रंगने के लिये ईश्वर अपनी दुनिया के बेहतरीन कलाकार भेजता है. यानि कि ये हम कह सकते है कि--बसंत का महीना हमारे देश में कमोबेश सभी को अपनी चपेट मे लेता है चाहे वे-कुंवारे हो, गृहस्थ हो, साधु-संत हो, पशु-पंछी हो यानि की इस प्रेम के एकाकार  का नाम ही बसंत है. 

भारत मे बसंत और प्रेम पुरी विश्व-दुनिया से अलग है. इसमें नायक और नायिका का प्रेम कही प्रतिकात्मक तो कही इतने कलात्मक  हो जाते  है कि शब्द गौड़ व मौन हो जाते है. नायक और नायिका की सारी अभिव्यक्ति उनके कापते होंठ व उनकी झुकी नजर से व्यक्त हो जाती है, ये मनोरम दृश्य व ये रमणी यता केवल यही ख़त्म नही होती बल्कि घर लौटी हुई ननद से उसकी भाभी की छेड़छाड़ की शास्त्रीयता  है. सच हमारे देश मे भाभी केवल रिश्ता ही नही बल्कि--"सच्चे अर्थो मे देवर और ननद के शरीर मे हो रहे युवा परिवर्तन की वे पूर्ण  बसंत है" भाभी जैसे रिश्ते का सानिध्य--हमारे अंतर्मन के युवा बसंत को  कही से अपवित्र या कलंकित नही होने देती.


लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
पता-जज कालोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर, pin-222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.7800824758 

Thursday, 16 January 2020

(चुडिहार हो जाऊ)

(चुडिहार हो जाऊँ)
तेरी चाहत में-
सारी हदो से पार हो जाऊँ।
तुम्हे देखने की खातिर,टहलु तेरी गली,
बेशक ऐ,रंग मै-
ब्राह्मन से चुडिहार हो जाऊँ।

Sunday, 12 January 2020

तेरी कोख माँ

(तेरी कोख़ माँ)
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ,
लड़ खड़ी हो ज़माने से,
तु भी है एक बेटी ये सोच माँ।
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ।
दे प्यार,लोरियाँ गा,मेरा हक दे,
उठा!एक बेटे की तरह,
मुझको भी ले अपनी गोद माँ।
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ।
उगने दे ये चाँद,उतरने दे अपने आँगन,
मै यकीन दिलाती हूँ-----
कि तुम अपने बेटे से भी ज्यादा करोगी----
एक दिन इस बेटी पे नाज़ माँ।
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ।

सेब द चाइल्ड।