Friday, 31 May 2024

(घूंघट नही दिखता)

(घुँघट नही दिखता)
हा!मेरी खता है कि-----------
मै अब चाँद नही लिखता,,,,,,,,,,,,,,,,,,
पर क्या?करु ऐ,रंग--तरक्की के दौर मे
हमे औरत तो दिखती है-------
पर उसका घुँघट नही दिखता।

(शहनाज का मेकअप नही करती)

(शहनाज़ का मेकप नही करती)
हमारी गज़ल वे खूबसूरत औरत है,
जो कभी शहनाज़ का मेकप नही करती।
वे सादगी और सलिके की रस्म़ है,
वे जिधर से गुजरती है निगाहे पाकिज़ा,
अपने सर से दुपट्टे को ओझल नही करती।
हमारी गज़ल--------------------
ये जीनत है ज़मी की आयत है,
ये ज़न्नत से घर को कभी दोज़ख नही करती।
हमारी गज़ल-----------------------
ऐ,रंग----इसकी दुनिया फकत शौहर है,
ये हवस के मारो की तरह कभी ब्रेकप नही करती।
हमारी गज़ल वे खूबसूरत औरत है,
जो कभी शहनाज़ का मेकप नही करती।

(अलकनंदा)

एक धरोहर अलकनंदा जो बनारस मे जन्मी भारत की प्रथम कत्थक नृत्यांगना थी, उसे आज अपने बनारस के लोग ही शायद भूल गये है. 

मेरी ये चंद लाइन महज़ एक कविता नही बल्कि एक दर्द है, जिसे पत्रकारिता जगत के कौटिल्य प्रदीप श्रीवास्तव सर ने पर्यटन की त्रैमासिक पत्रिका "प्रणाम पर्यटन " के इस बार के अंक मे स्थान दिया है.

(कत्थक की अलकनंदा)

 तुम धरोहर हो, 
 आज भी बनारस की---
 ऐ ! कत्थक की अलकनंदा.

वे तुम्हारे पांव
और कत्थक की, 
भंगिमाओ की स्मृति, 
मुझे बरबस खींच लाती है, 
तेरे घराने की तरफ, 
ये जानने के लिए ,कि क्या?? 
तुम बनारस को याद हो, 
या भूल गयी है, 
तुम्हें नई पीढ़ी ---
ऐ ! कत्थक की अलकनंदा. 

रचनाकार---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin.no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758

(कुछ औरते गुजर रही)

दिल्ली में चाकु और पत्थर से कुचकर की गई लड़की की नृशंस हत्या पर मेरी भाव श्रद्धांजलि ✍️✍️

(कुछ औरते गुजर रही)
😢😢😢😢

वे नृशंस चाकुओं से मार रहा,
पत्थर से कुचल रहा,
वही बगल से उसके 
कुछ स्तन शुदा औरते 
गुजर रही.
निर्भया
के गुप्तांग के सरिए से फिर 
खून बह रहा
लेकिन इस बार
मोमबत्तियां जली नही
चलो ! अच्छा है
कि, दिल्ली
का अपना मुर्दापन बच गया.
आखिर राजधानी है
यही तो आना है
कुछ लोगो को 
सदन में घड़ियाली आसूं बहाने
कुछ वोट
टटोलने,
लव जेहाद, हिंदू मुसलमान,जाति
नही, नही
फिर किसी लड़की का कटा स्तन
उछल रहा
और उसके गुप्तांग से
खून की एक पतली धार 
बह रही.
पता नही की राजधानी की तरफ
या फिर, हमारी सूख चुके
आंख के पानी की तरफ
लेकिन हां! कुछ
स्तन शुदा औरते 
उसकी बगल से गुजर रही. 😢😢😢😢

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर (U P)
mo.no.7800824758

Wednesday, 29 May 2024

(उसके हुस्न का पारा)

(उनके हूश्ऩ का पारा)
शहर मे गरमि का रोज टुट रहा पारा,,,
जबकि ऐ,रंग---इसमे नही है शामिल--
उनके हूश्ऩ का पारा।

(दंगा याद है)

(दंगा याद है)
हमें पुराना शहर याद है,
एक-एक गली मुहल्ला याद है।
वे कुर्आनखानी का खुरमा,
मुँह पोछती अपने दुपट्टे से,
अब्दुल की अम्मा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
राखी सुनि थी एक ब्राह्मन के घर,
आँख मे खुशियो के आँसू---------
मेरी इस कलाई को सलमा याद है।
हमें पुराना शहर याद है!
इतने सालों बाद देखा जब जला घर,
पुछा कहां गये ये सब,
तो नये शहर के बाशिंदो ने बताया,
तो अफसोस हुआ,रंग---------------
कि अब नये शहर को,
पुराने शहर की मोहब्बत नही,
नफरत,लाशे और दंगा याद है।
हमें पुराना शहर याद है।

(मुसलमान है साहब)

(मुसलमान है, साहब)

ना ही पूजा 
ना ही किसी मस्जिद की ,
अजान है, साहब.!

ये लड़की ,
इस दौर-ए-ग़ालिब की,
दीवान है , साहब!

बड़़े सलीके और 
तमीज़ से ,
लिखा है कई रात ,
ये एक रात हिन्दू
तो एक रात मेरी ,
गज़लों की ----
मुसलमान है , साहब!

@ रंगनाथ द्विवेदी

(जोक)

🌹पत्नी और प्रेमिका में मुख्य अंतर यही है कि,वह एक प्लेट गोलगप्पे में ही आपसे खुश हो सकती है और प्रेमिका सोने की सिकड़ी दिलाने के बावजूद भी गोलगप्पे की तरह अपना मुंह फुला सकती है😀😀

Tuesday, 28 May 2024

(नक्सली हो गए)

(नक्सली हो गये)
गुमराह रास्तो से गुजरे--------
हम जंगली हो गये,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग---अपनो का सीना चाक कर----
हम नक्सली हो गये।

(रूह तलक जल गई)

(रुह तलक जल गई)
रख दिया-----------------
दहलीज़ पे खुद को दिये की तरह,
ऐ,रंग-------------------------तुम नही आये
जबकि मेरी रुह तलक जल गई।

(चरागो की रात)

(चरागो की रात)
लफ्ज़ो की नदी मे घिर गई है किश्ती,
मै कहा ढ़ुढू----------
है कहाँ किनारो की रात।
ना कोई दर,ना ठौर,ना ठिकाना 
कैसे लिखू कि---------
कहाँ गुजरी है मेरे बहारो की रात।
महकते फूलो की खुशबू ना रास आ रही,
कितनी मनहूस लग रही है---------
चमकते सितारो की रात।
एक सिलसिला लिये है गम जो ना खत्म हो रहा,
कैसे लिखू---------
बजती बाँसुरी और पहाड़ो की रात।
वे कहकशे,वे शायरो की महफ़िल छिन गई,
अब याद है बस----------
कुछ मुशायरे की रात।
तु लौट आ एै दिल उस आसमा से,
तेरे इंतज़ार में है-------
किसी के चरागो की रात।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

(खूबसूरत हो नहीं सकती)

(खूबसूरत हो नही सकती)
तु चाहे जितना भी मेकप कर ले एै अमीरजादी,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
पर तु किसी मजूरन से ज्यादा---------
खूबसूरत हो नही सकती।

(ताबूत ना कहे)

(ताबूत ना कहे)

अभी लोकतंत्र जिंदा है
इसे भूत ना कहे,
सदन मंदिर है,
इसे ताबूत ना कहे,

खूब करे मोदी का विरोध
ये विपक्ष की खूबसूरती है,
लेकिन हमारे अमृत को आप 
जहर का घूट ना कहे.

"शेंगोल" सदन में रखे "भरत के त्याग के 
खड़ाऊ की तरह है",
आप भी आएंगे यही जीतकर,
प्लीज,अपना सर झुकाइए यहां,
भले ही आप
भाजपा के राम को सांप्रदायिक,
ओर सदन के बाहर
अयोध्या को अयोध्या
या अपने मूंह से
"चित्रकूट" को "चित्रकूट" ना कहे

आज सत्ता इनकी है
कल आपकी होगी,
प्लीज,
अपनी राजनीति की नीचता से,
इसे नेश्ते नाबूत ना करे 
अभी लोकतंत्र जिंदा है,
इसे भूत ना कहे,
सदन मंदिर है 
इसे ताबूत ना कहे .✍️✍️🙏🙏🙏🙏

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर, उत्तर प्रदेश

Monday, 27 May 2024

(औरत होने का हक)

(हमने औरत होने का हर हक़ अदा किया)
हमने औरत होने का हर हक अदा किया,
फिर भी तिलाक देके तुमने गमज़दा किया।
हमने औरत होने का हर हक अदा किया।
रोई,सिसकी तेरी बंदिशो मे चराग सी जली,
हाय!कभी उफ कहां किया।
हमने औरत होने का हर हक अदा किया।
तेरी मर्दे परस्ती को कहीं चोट ना आये,
मैने तुम्हे इस्लाम के इतर अपना खुदा किया।
हमने औरत होने का हर हक अदा किया।
ये तिलाक नही कत्ल है मेरा,
ऐ,रंग----चंद लोगो के इस्लाम ने,
बेगुनाह औरत को उसका हक
और उसकी वफा का सिला नही दिया।
हमने औरत होने का हर हक अदा किया।

(आशिकी टू का रिंगटोन बजता रहा)

(आशिकी--2 का रिंगटोन बजता रहा)
वे तेरी बेवफ़ाई के बाद भी,
तुमसे मोहब्बत करता रहा।
तभी तो अपनी कलाई की नशे काट,
वे पुरे बिस्तर पे-----------
तुम्हें याद कर हँसता रहा।
देख ये वही मोबाइल है,
जिसपे तु कभी उससे घंटो बतियाती थी,
आज उसकी लाश के सिरहाने,
बिना किसी रिसीब के,
इसके नाकाम मोहब्बत की तरह,
रुंधे गले से एै"रंग"----------
आशिकी--2 का रिंगटोन बजता रहा।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

एक माडर्न नाकाम मोहब्बत।

Sunday, 26 May 2024

(सरस्वती पत्रिका

निश्चित ही अपने छात्र जीवन में या एक हिंदी पाठक के तौर पर शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने "सरस्वती" पत्रिका का नाम सुना या उसे पढ़ा ना हो,,,"सरस्वती हिंदी उत्थान की संवाहक पत्रिकाओं में से एक है, जिसमें कभी भी छपना आसान नहीं रहा"-----

ऐसे में सरस्वती पत्रिका में इस बार के अंक में मेरी कहानी का छपना आप बड़ों के मार्गदर्शन और आशीर्वाद का प्रतिफल है,,,,,
खासकर मैं विशेष रूप से पटना (बिहार) के बहुचर्चित व उत्कृष्ट लेखक व साहित्यकार डॉक्टर संजय पाठक जी का बहुत आभारी हूं कि उन्होंने मुझे यह जानकारी दी.
शेष पत्रिका की लेखकीय प्रति प्राप्त होने पर ✍️✍️🙏🙏

(गीत गाता हूं)

(गीत गाता हूँ)
रोता हूँ शब्द-शब्द भीग जाता हूँ,,,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----------
मै दर्द के मंजिरे पे गीत गाता हूँ।

@रंगनाथ द्विवेदी।

(औरत)

(औरत इस ज़मी की पहली गज़ल है)
आसमा पे-------------------------
किसी मकबूल शायर से लिखी गई,
औरत------------
इस ज़मी की पहली गज़ल है।
बहुत बाद में तक्सीम हुये है सभी महल,
औरत इस ज़मी पे-----------------
पहली तराशी गई ताज़महल है।
कोई कुछ लिखे या उड़ेल दे खुद को,
पर लिख न सकेगा,
औरत------------------
इस ज़मी के झील की पहली कवल है।
ना हिन्दू बनाया,ना मुसलमान उसने,
गर बनाता तो खता होती,
इसी से ऐ,रंग---औरत----------------
इस ज़मी पे मोहब्बत की पहली शकल है।
आसमा पे------------------
किसी मकबूल शायर से लिखी गई,
औरत-----------------
इस ज़मी की पहली गज़ल है।

(उम्र की किताब)

(उम्र की किताब)
पुरे बदन में--------
झुरझुरी सी उठ रही,
हे सखी!बसंत पढ़े छेड़-छेड़----
मेरे उम्र की किताब।

Saturday, 25 May 2024

(बरसात हो रही है)

(मेरे शहर में बरसात हो रही है)
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।
दिवाने हो गये है सारे स्याह बादल,
भूल गये है ये कुछ और शहर है,
जहां इनको बरसना है!
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।
कही तेरी खातिर यही न ठहर जायें,
भेज दे इन्हे ये बस तेरी सुनेंगे,
ये कैदी हो गये है------------
तब से तेरी रुप के,
जब से तुम्हें राग मल्हार लिखा है,
तब से मेरे शहर में बरसात हो रही है।

व्यंग्य

हास्य व्यंग्य के एक दार्शनिक का कथन है कि कुछ व्यक्तियों का मूंह,,,भंडारे की पूड़ी की तरह होता है😀😀

Friday, 24 May 2024

(कमल खिलता रहा)

( कमल खिलता रहा )

कल पूरे देश की ई.वी.एम. में,
खोट मिलता रहा.
विपक्ष के लोग तिलमिलाते रहे
और भाजपा को 
वोट मिलता रहा.
माफ!करना ----
ये फैलाया कीचड़ तुम्ही ने था 
इसमें तो ----
बस कमल खिलता रहा .

@@रंगनाथ द्विवेदी
## 7800824758

(नरेंद्र मोदी की सत्ता में पुनर्वापसी)

नरेन्द्र मोदी की सत्ता मे पुनर्वापसी----------
  (आवश्यकताओ का एक विशाल अग्निपथ)

सर्वप्रथम तो मै भारत के इतने बड़े और समृद्ध लोकतंत्र मे एक बार पुन: नरेन्द्र मोदी को पिछली बार से कही ज्यादा सीटे जीतकर आने और उनके प्रधानमंत्री बनने की बधाई देता हूं.अब दो टूक और स्पष्ट बात करते हुये अपनी लेखनी से मै उन तमाम मुद्दों व विसंगतियों की तरफ ध्यान आकृष्ट करना चाहुंगा जहां अब भी बहुत ज्यादा करने की इस मोदी सरकार से जन-अपेक्षा है, इस जन-अपेक्षा को पुरा करने के लिये मोदी के साथ ही उनकी कैबिनेट को भी खपना और तपना है. इस खपने और तपने के लिये सत्ता के नशे से इन सभी को दुर रहना होगा तभी सकुशल सबका साथ,सबका विकास हो पायेगा.
इस वृहद व ऐतिहासिक जीत के साथ ही तमाम बिसंगतियांं भी अपना विकराल मूँह बाये खड़ी है,बेशक अगली बार मोदी ने जाती,संप्रदाय व भाषा से ऊपर उठकर काम किया तभी ये प्रचंड बहुमत उन्हे व उनके किये गये कार्यो को मिला इसलिये ये विजय खैरात नही बल्कि उनके किये गये पिछली सरकार के कार्यो का प्रतिफल है,लेकिन इस प्रतिफल को बनाये रखने और आगे ले जाने के लिये नरेन्द्र मोदी को जन-आकांक्षाओं के अग्निपथ पे खरा उतरना होगा.
ये सत्य है कि किसी भी समृद्ध व विकासशील देश की महति-आवश्यकता है शिक्षा,स्वास्थ्य, सुरक्षा,रोजगार आदि .ऐसे ही कुछ कार्य है जिसे पुरा करना हर सरकार को अग्निपथ पे चलने के बराबर है,इधर कुछ एक सालो से मतदान का ट्रेड हमारे भारत मे तीव्रगति से बदला है. अब जनता अपने जनाधिकार से उसी सरकार का चयन कर रही है जो उनके मानको पे कुछ खरी उतर रही है,जो ऐसा नही कर रही उन्हें जनता खानदानी सीटो से पटखनी दे ससंम्मान उनकी हैसियत काग्रेंस के राहुल की तरह बता दे रही. बहुमत के साथ सत्ता देने पे आप ये विधवा-विलाप नही कर सकते की जनता ने आपको एक असहाय व लगड़ी सरकार दी थी. नरेन्द्र मोदी आज युवाओं के एंग्री यंग मैन है,तरक्की व उनके अथक श्रम ने आज देश ही नही विदेश मे भी भारत के आत्म-संम्मान का मस्तक ऊँचा किया है,सच तो ये है कि आज वे हर उम्र वय के लोगो के हिरो है. मै उसी हिरो यानी---"विजय दीनानाथ चौहान रुपी नरेन्द्र मोदी को भी इस विशाल व वृहद भारत की आवश्यकताओं के अग्निपथ पे विजय पानी होगी".आईये कुछ ऐसी ही आवश्यकताओ के अग्निपथ की तरफ हम इस चुनी सरकार से खरे उतरने की उम्मीद करे.
    ( 1) शिक्षा किसी भी विकसित या विकासशील देश की रीढ़ है जिसको लेके प्लेटो जैसे विद्वान ने कहा कि---"शिक्षा एक जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है" .सच ये है कि हमारे यहां की शिक्षा बड़ी बदहाल है,ये देश के कुछ समृद्ध व साफ्ट डकैतों के हाथ है,इसका ये आलम है कि विश्व के सौ कालेजों मे भारत के किसी कालेज का नाम न आना ये सरकार के आदेशों को भी अपने ठेंगे पे रखते है,इस हालात से बाहर सर्व-सुलभ व उत्कृष्ट शिक्षा उपलब्ध कराना इस सरकार की बड़ी जिम्मेदारी है.

(2)स्वास्थ्य---भारत मे शिक्षा से कही ज्यादा बदहाल तो यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था है,एक रुपये की गोली सौ रुपये मे आराम से बेची जाती है दस हजार का इलाज एक लाख मे. और यही दस हजार का इलाज जब लाख मे परिणत होता है तो इनके चम-चमाते अस्पताल की सीढियों पे एक गरीब माँ अपने जवान बेटे की लाश के साथ निर्जीव सी एकटक अस्पताल को तकती है,इस माँ के बेटे के इलाज का सबसे कठीन अग्निपथ है,ये डाक्टर भगवान नही पैसो के हैवान है,सरकार को सरकारी कालेजों से पढ़े सभी डाक्टरों से कडाई के साथ सप्ताह मे एक दिन जनसेवा के तहत कार्य लेना होगा, इस कार्य मे कोताही या हिला-हवाली करने पे आम आदमियों के टेक्स से पढ़े ऐसे डाक्टरों की डिग्री अवैध कर दी जाये.
(3)सुरक्षा के कई चक्र है सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वे एक भयमुक्त समाज की श्री वृद्धि करे. महिला सुरक्षा लगभग हर चुनाव मे मुद्दा रहा लेकिन ये अभी भी कुछ एक को छोड़ मुद्दे के आगे बहुत बढ़ नही पाया.हालांकि इस सरकार ने सेना के संम्मान व इनके आयुधो पे बहुत कार्य किया.लेकिन आंतरिक अपराध के मामले आज भी विकराल है,चाहे वे बाल-अपराध हो या कोई अन्य अपराध. वैसे " एक कैंसर अपराध है नक्सलवाद" इसने देश-विरोधी अपराध से लेके हमारे तमाम सैनिकों के जानमाल का भी नुकसान किया है,इसका उन्मूलन एक चैलेंज है ये कठीन अग्निपथ है.
(4)रोजगार इतने बड़े देश मे सभी को रोजगार मुहैय्या करा पाना मुमकिन तो नही,लेकिन जरुरत है जिस स्तर का हूनर उस स्तर का रोजगार युवा व सभी को मिले भले चुनाव मे ये कहना कि---"रोजगार के लिये पकोड़े तले लेकिन ये चुनाव तलक ही ठीक था क्योंकि कि कोई अभिभावक लाखो का कर्ज ले अपने बेटे को महंगी व्यवसायिक डिग्री इसलिए नही दिलवाता की आगे चलकर उसका बेटा पकौड़े तले".अगर पकौड़े ही उसे अपने बेटे से तलवाना होता तो फिर क्या जरुरत थी उसे अपने बेटे को महंगी शिक्षा दिलवाने की .सरकार को समुचित और न्यायसंगत रोजगार, उपलब्ध कराना आंकडे के तहत नही बल्कि यथार्थ के तहत करना होगा,ये उम्मीद आज हर भारतीय नरेन्द्र मोदी से कर रहा.

(5)हमारे एक पूर्व-प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने एक नारा दिया था--"जय जवान और जय किसान का" ये नारा आज भी उतना ही प्रासंगिक है. किसान किसी भी अरबपति व उद्योगपति से ज्यादा पुज्य व श्रेष्ठ है.किसान को किसी कवि ने अपनी कविता मे "ग्राम्य देवता" कहा है.पिछली मोदी सरकार ने ये कार्य तो अवश्य किया कि---"बीना किसी भेदभाव के व किसी ब्लैकिये के खाद,पानी व विजली मुहैय्या कराई". लेकिन ये सरकार अगली बार सबसे ज्यादा आवारा पशुओं के मुद्दों पे घिरती दिखी ये मुद्दा यथार्थ भी था.किसान की आय दोगुनी हो ये इस देश की सबसे बड़ी खुशी होगी लेकिन आय के साथ ही सरकार को किसानों की फसलो को इन आवारा पशुओं से छुटकारा दिलाना होगा.

(6) इस बहुमत व जादुई आकडे के साथ चुनी सरकार को सभी के लिये स्वच्छ पीने का पानी मुहैय्या कराना बहुत आवश्यक है. जैसा की दुनिया के तमाम भूगर्भ जलवेत्ता कह रहे है कि---"तीसरा विश्व युद्ध पानी को लेकर होगा" अगर होगा तो ये अतिसयोक्ति न होगी क्योंकि हमारे यहा बहुत पहले ही पानी को महत्ता दी गई. तभी तो रहीम जैसे कवि ने कहा कि---
        "रहिमन पानी राखिऐ, बीन पानी सब सून
        पानी गये न उबरै मोती,मानुष, चून"
भारत जैसे वृहद देश मे भांति-भांति के प्रदेश व आवश्यकताये है किसी राज्य मे पानी की दयनीयता बड़ी भयावह है,इस मोदी सरकार से उम्मीद है स्वच्छ व पीने योग्य पानी मुहैय्या कराने की.

इसके साथ अन्य भी तमाम-तमाम आवश्यकताओ का अग्निपथ है अपने पड़ोसी देशो से संबंधों मे नीत सुधार का वैश्विक प्रयास भी मोदी सरकार को करना होगा.अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कालजयी प्रधानमंत्री ने कहा भी कि---"हम अपना पड़ोसी नही बदल सकते".तेजी से गिरती अर्थव्यवस्था को कंट्रोल करना,धार्मिक व जातिगत द्वेश की खाई को पाटना.ये तमाम वे बिंदु है जिसपे--" इस ऐतिहासिक विजय नायक नरेन्द्र मोदी को कार्य करना है" और जनता के जनमत से लग रहा कि नरेन्द्र मोदी को अब ये रहते कायनात न भुलेगा,उन्हें विश्वास है की हमारा मोदी ये करेगा आजादी के कुछ एक प्रधानमंत्री हुये जिसे जनता ने अधिकार पुर्वक हमारा या अपना कहा,.ऐसे मे मोदी की जिम्मेदारी पहले से चौगुनी बढ़ जाती है ये जिम्मेदारी और आम-आदमी की आवश्यकताओ का विशाल अग्निपथ मोदी अवश्य पार करेंगे ये इस देश के जनता की उम्मीद है.

@@@लेखक---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला---जौनपुर 222002 (U.P.)
Mo.no.7800824758

यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

(नीला आसमा सो गया है)

(नीला आसमा सो गया है)
वक्त के सानो पे सर रख नही पाई,
ऐ,रंग---------------
इस रेखा की चाहत और ख्व़ाहिशो का भी ,
नीला आसमा सो गया है।

(स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है)

(स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है)
मै उसे छक के पिता हूँ-----------
पैक दर पैक बीना डर के,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
क्योकि ऐ,रंग--उसके बदन पे कही नही लिखा-----------!
कि वे स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।

(नीलकमल)

(नीलकमल )

तड़पता है,सिसकता है
बुलाता है कोई "नीलकमल"

सदियों चुनी दीवाल से
गाता है कोई "नीलकमल"

ए "रंग" किसी युग में
कोई पाता है कहां "नीलकमल"

(उमराव जान)

(उमराव जान )

वही छत, वही छज्जे, वही दालान
लखनऊ में अब,
नहीं तो केवल
ए "रंग "----
रुसवा की "उमराव जान".

Thursday, 23 May 2024

(किस्सागोई करता हूं)

(किस्सागोई करता हूँ)
अक्सर मेरा कत्ल इसलिये होता है,,,,,,,,,
कि मै झुठ और फरेब़ के शहर मे----
ऐ,रंग-------------
सच की किस्सागोई करता हूँ।

(बादल आज रूठ गए है)

(बादल आज रुठ गये है)
जो कभी हरसते थे,
खेत-खेत बरसते थे---------
वे बादल आज रुठ गये है।
माँ के आँचल मे छिप बच्चे डरते थे,
एक जमाना हुआ जब इस तरह-----
बादल गरजते थे।
वे बादल आज रुठ गये है।
वे लह-लहाते तालाब,पोखर खत्म हुये
जहां कभी हम बंसी लगा-----------
मछलियाँ पकड़ते थे।
वे बादल आज रुठ गये है।
वे दादुर,मोर,पपिहा,झिंगुर का गान
पंत,निराला अपनी कविताओ मे लिखते थे,
तब बादल हमारे देश में,
मन के अंदर भी बरसते थे,
ऐ,रंग----वे बादल आज रुठ गये है।

(अमेठी गई)

(अमेठी गई)

बाप - दादा की ,खेती गई ,
उनके आत्म-सम्मान की ,पेटी गई.
अब तो राजनीति से ----
सन्यास ले लो मियां ,
क्योंकि ,- रूझानों से लग रहा 
कि ,- तुम्हारे हाथ से अमेठी गई .

@@ रंगनाथ द्विवेदी
## 7800824758

Wednesday, 22 May 2024

(मेंहदी लगाने के लिए)

(मेंहदी लगाने के लिये)
जीसे ता-उम्र खुद की मेंहदी ने रुलाया,,,,,,,,,
ऐ,रंग---वही खातुन पुरे शहर मे------
मशहूर है,मेंहदी लगाने के लिये।

(इतवार जीते है)

(इतवार जीते है)
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है,
वे उस शहर,हम इस शहर
दूर रहके भी-------------
हम इतना प्यार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
वे गीले बाल उनका कमरे में आना,
उतने ही पानी से हम--------------
तड़प के सावन की फुहार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
छः दिन गुजारते है हम नागफनी के,
फिर लौटते है लेके उन्हे केवड़े का गजरा,
ऐ,रंग---------------
हम इतनी ही खुशी का त्यौहार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।

(कुछ खूबसूरत औरते)

(कुछ खूबसूरत औरते)
हाँ मैने देखी है कुछ खूबसूरत औरतें,
नदी के किनारे स्याह वर्ण मल्लाहन का------
वे कसे बदन साड़ी खोसे,
जूठे बरतनो का तल्लीन हो माजना,
और उसके उसकनो से आती एक मधुर सी,
खुरचने या रगड़ने की आवाज़,
हाँ एैसी ही खूबसूरती को देख मै कहता हूँ,
कि हाँ मैने देखी है----------
कुछ खूबसूरत औरते।
इस चिलचिलाती धूप में खामोश और बंद,
शहर की खिड़कियो के मौनपन को तोड़ती,
वे कुछ बड़े पत्थरो को,
छोटी-छोटी गिट्टियो में बदलती,
पुरे लय से हथौड़ी की आवाज़,
और उसकी हर चोट पे पसीने से तर-बतर हिलते,
उसके वे दो उरोज़,
मुझे उस मशहूर खजूराहो से ज्यादा खूबसूरत लगे,
हाँ इसिलिये एै"रंग" मै अक्सर कहता हूँ----------
कि हाँ मैने देखी है,
कुछ खूबसूरत औरते।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(पेट्रोल सी लागे है)

(पेट्रोल सी लागे है)
धीरे-धीरे मुझको कब्ज़ाती जा रही है,,,,,,,
अपने रुप के जादु से।
एै "रंग" ---वे मुझे अब-------------
अच्छे दिन के धोखे में,पेट्रोल सी लागे है।

पेट्रोल की बढ़ी हुई किमत पे।

(बांह में मदिरा रही)

(बाँह मे मदिरा रही )

जब सभी ने छोड़ा मुझको-
तो हाथ मे मदिरा रही.

हम तड़प के रो उठे,
कोई नही,कोई नहीं-------
बस साथ मे मदिरा रही.

घर मेरा शमशान सा था,
और साँस मे मरघट मेरे ,
मै फिर भी जिंदा रह गया ,
क्योंकि बिस्तर पे भी मेरे---
रात में मदिरा रही.

रोजगाली ,रोज-नफरत 
है इसे जाने क्यों हासिल ?
ये वफा है,ये वफा है
बाकी दुनिया बेवफा है,
मै गिरा तो ये गिरी,
सब आते जाते रह गये,
उस राह मे भी साथ मेरे--
बाँह मे मदिरा रही.

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)

@@@एक अलहदा टेस्ट की अलहदा रचना जो शायद आपको भी रास आये।

(जोक)

✍️✍️शादी के बाद अगर आपके बाल 70% तक झड़ जाए,,तो समझ जाइए कि आपको बहुत योग्य पत्नी मिली है 😀😀😀😀

Tuesday, 21 May 2024

(पगली)

(पगली बना दो)
नन्हे-नन्हे पाँव----------
छोटी-छोटी अँगूली बना दो,
ऐ,खुदा----------
मुझे फिर से बचपन की तितली बना दो।
मै तैरु गाँव के पोखर,
और तोडू फिर बाग से अंम्बिया,
मुझे माँ की डाँट-------
और बापू के दुलार की पगली बना दो।

(घर की दहलीज रोई)

(घर की दहलीज़ रोई)
 तुम किसी गैर औरत की आगोश में लेटे रहे,
वे इंतज़ार के दिये की तरह,
अपने अंदर तक भिग रोई।
तेरी बेवफ़ाई को तो एक आवारा निद आई,
मगर यहां वफ़ा अपनी आँख मे आँसू लिये,
तकती रही तेरा रास्ता----------
एै"रंग" उसके संग केवल पुरी रात,
तेरे घर की दहलीज़ रोई।

(जोक्स)

शादी विवाह में ज्यादातर महिलाओं की फोटो ऐश्वर्या राय की तरह खूबसूरत आती है जबकि वही बेचारे पुरुषों की फोटो,उनके लाख प्रयास करने के बावजूद भी प्रेम चोपड़ा से ज्यादा खूबसूरत नही आ पाती 😀

Sunday, 19 May 2024

(बांह में मदिरा रही)

(बाँह मे मदिरा रही )
जब सभी ने छोड़ा मुझको--------------
तो हाथ मे मदिरा रही ।
हम तड़प के रो उठे,
कोई नही,कोई नहीं-------
बस साथ मे मदिरा रही ।
घर मेरा शमशान सा था,
और साँस मे मरघट मेरे ,
मै फिर भी जिंदा रह गया ,
क्योंकि बिस्तर पे भी मेरे---
रात में मदिरा रही ।
रोजगाली ,रोज-नफरत 
है इसे जाने क्यों हासिल ?
ये वफा है,ये वफा है
बाकी दुनिया बेवफा है,
मै गिरा तो ये गिरी,
सब आते जाते रह गये,
उस राह मे भी साथ मेरे-----
बाँह मे मदिरा रही ।

@@@एक अलहदा टेस्ट की अलहदा रचना जो शायद आपको भी रास आये।

(कई मर्तबा)

(कई मर्तबा उजड़ा हूँ)
मेरे दिल को मकान मत लिख,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----मै वे शख्श़ हूँ--------
जो कई मर्तबा उजड़ा हूँ।

@रंगनाथ द्विवेदी।

(चुनाव)

(चुनाव)
कही बंगाल तो कही आसाम जा रहा है,
कोई तड़प रहा है कि------------------
उसका निज़ाम जा रहा है।
ये जम्हूरियत है ऐ,दोस्त------
अब न चलेगी मज़हबी अईय्यारी,
क्योंकि कि वोट देने--------------
ना अब कोई हिन्दू ,ना मूसलमान जा रहा है।

Saturday, 18 May 2024

(अगले घर की रात)

(अगले घर की रात)
मै देखता हूँ-------------
कभी इस शहर,कभी उस शहर की रात,,,,,
मै देखता हूँ-----------
एक अंजानि मंजील और लंम्बे सफर की रात।
करता हुँ गुफ्त़गु मै हर मील के पत्थर से,,, 
कभी उठते है कुहाँसे,कभी उठता है धुँआ,,,
मै जानता हूँ ऐ,रंग-------
क्या है?अगले घर की रात।

(मुमताज सोई है)

(मुमताज़ सोई है)
 ढक दो आज उसे------------
एै मेरी गज़लो के हर्फ,
वे कोई और नही मेरी महबूब है------
जो बेलिबास सोई है।
रख दो कुछ मिट्टी उसके सिरहाने,
एै मेरी गज़लो के हर्फ,
वे कोई और नही मुझ गरीब और मुफलिस की-------
मुमताज़ सोई है।

2 शेर

(1)
जहां से रईस की बिटिया ने----------
हटा रखा है दुपट्टा अपना,
ऐ,रंग----वही पे गरीब की बिटिया,
बदन को ढ़कने के लिये------------
अपने फटे दुपट्टे को रोज सिलती है।

                 (2)
जिन उरोजो को ढक-----------
वे मासूम देखती थी,
कभी वात्सल्य का सपना,
ऐ,रंग----उसके वही दोनो उरोज,
गरीबी के चलते दो घाव हो गये।

(सिंदूर रोए)

(सिंदूर रोये)
तेरी परी तेरी हूर रोये-----------------
एै रात अय्याशियों मे बिताने वाले,
तेरे घर मे तड़पे है एक औरत,
उसकी भरी मांग मे---------------
तेरे नाम का सिंदूर रोये।
मेंहदी और व्याह के जोड़े को,
वे किस तरह तकती है मजलूम,
उफ़! छाले फूटते हो जैसे------------
जब वे रात को तन्हा अपने पिया से दूर रोये।
सारे किये श्रृंगार उसपे हँसती है सौत सी,
वे जी रही है जिंदगी,
जिंदा रहके भी मौत सी,
वे दरवाज़े पे छोड़ आती है आँख अपनी,
तेरे आने के इंतज़ार मे,
कभी लौटना वक्त़ से और देखना,
कि तेरे कंधे से लग,
किस तरह तेरा प्यार पाने को,
तेरे घर मे तेरी पत्नी का,
शर्म से लरजता,
पहले रात किसी छुवन लिये,
तुम्हे पाने की खुशी मे बिस्तर की हर एक सीलवट,
कुछ टूटी चूड़ी, बिखरे गजरे
इधर-उधर कही खोई बिंदियां,
उसके टूटते बदन से,
तुमसे मिले प्यार की खुशी मे---------
उसकी उम्र और यौवन का अब तलक की तड़प को भुला,
तृप्त आँखों मे------------
जहा का मिल चुका शुरूर रोये।
एै रात अय्याशियों मे बिताने वाले,
तेरे घर मे तड़पे है एक औरत,
उसकी भरी मांग मे------------
तेरे नाम का सिंदूर रोये।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Wednesday, 15 May 2024

(बीरान बहुत है)

(बिरान बहुत है)
भीड़ मे लोग बहका रहे है खुद को,,,,,,,,,,,,
वरना ऐ,रंग------------
इस शहर मे अंदर से बिरान बहुत है।

Tuesday, 14 May 2024

(हज किया है)

(हज़ किया है)
उसे टुट के चाहा है,,उससे लव किया है,,,,,,
ऐ,रंग----हमने अक्सर--------
उसकी गली में हज़ किया है।

(उठाओ फेक दो मुझको)

(उठाओ फेक दो मुझको)
उठाओ फेक दो मुझको----------------
जरा सा दिल कड़ा करके,
भला कौन रखता है?
घर में आईना टुटा।
उठाओ----------
लौट जाना तुम किनारे से,
समंदर के!
भला कौन ले जाता है?
आखिर साथ अपने------
रेत का घर बना टुटा।
उठाओ--------------
मै मौसमे खिज़ा का मारा हूँ,
ना मुझसे दिल लगाना तुम!
ऐ,रंग------भला कौन ले जाता है?
अपना घर सजाने------------
पत्ता शाख से टुटा।
उठाओ फेकदो मुझको,
जरा सा दिल कड़ा करके,
भला कौन रखता है------
घर में आईना टुटा।

(मां की दुआ आती है)

(माँ की दुआ आती है)
मै घंटो बतियाता हूं माँ की कब्र से,
मुझे एैसा लगता है कि जैसे-------
इस कब्र से भी मेरी माँ की दुआ आती है।
नही करती मेरी सरिके हयात भी ये यकिने मोहब्बत,
कि इस बेटे से मोहब्बत के लिये,
कब्र से बाहर निकल----------
मेरे माँ की रुह यहां आती है।
जब कभी थकन भरे ये सर मै रखता हू,
कुछ पल को आ जाती है नींद,
किसी को क्या पता?-----------
कि मेरी माँ की कब्र से जन्नत की हवा आती है।
एै,रंग----ये महज एक कब्र भर नही मेरी माँ है,
जिससे इस बेटे के लिये अब भी दुआ आती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

####माँ पे लिखी एक बेहतरीन नज्म़ आप सबो के हवाले।

(ड्रग्स लेता हूं)

(ड्रग्स लेता हूँ)

मेरे रोम-रोम में है,
उसके चुभने के निशानात--
ऐ,रंग----
मै उसकी मोहब्ब़त का ड्रग्स लेता हूँ।

Monday, 13 May 2024

(इंदिरा थी)

(इंदिरा थी)

वे दर्द थी, पीडा़ थी
वे प्रियंका नही इंदिरा थी.
वे दृढ थी, लौह थी
उसने मिथक गढ़े,
आपातकाल लगाया,
पाक को टुकड़े मे तोड़ दिया,
वे राजनीति की नपुंसक नही,
एक दहाड़ थी,
तुम प्रियंका हो वे इंदिरा थी.
वे बचपन की गूंगी गुडिया थी,
लेकिन-------
जब बोली तो लोग गूंगे हो गये,
प्रियंका तुम बस प्रियंका हो,
नकल करो,
कोयले को कोयला रहने दो,
वे हिरा थी.
दादी तलक तो ठीक है,
लेकिन वे तुम्हारी नही,
हमारे इस देश की इंदिरा थी.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U.P.)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

(जन्म से गूंगी है)

(जन्म से गुँगी है)
वे थिरकती है----------
तो उसके घुँघरु और पाँव बोलते है,,,,,,,,
ऐ,रंग----------
वे मासुम जन्म से गुँगी है।

Sunday, 12 May 2024

(वह,बड़ा शायर था)

(बड़ा शायर था)

जिस शख्स को
भूख और मुफलिसी ने मारा 
ऐ,रंग--
अब उसी को लोग
कहते है कि----
वे बड़ा शायर था।

Saturday, 11 May 2024

(इश्क लिखूंगा)

(ईश्क़ लिखुँगा)
आओ मेरा सर कलम कर दो,,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----------
गर मैं जिंदा रहा तो-ईश्क़ लिखुँगा।

(पानी बचाते है)

(पानी बचाते है)
तेरे इंतकाल पे आबे जमजम,
तो हमारी मौत पे-----------
गंगा का पानी पीलाते है।
तुम्हे जन्नत मिलती है,
तो हम भी स्वर्ग जाते है!
तो फिर क्यू हम नदियो और कुँओ,
के पानी को रुलाते है।
आओ तुम्हें एक इंकलाब की खातिर,
हम मंदिर और मंस्ज़िद से बुलाते है।
पानी को वालिद समझ के तुम बचाओ,
और हम भी पानी को ऐ,रंग------------
एक माँ की तरह बचाते है।

@@@सेब द वाटर।

(मुसलमान बना दो)

(हिन्दू --मुसलमान बुना दो)
आप जीत जायेंगे अबकी चुनाव भी,
बस शहर मे अपने कुछ लाश गिराकर-------
उन्हें आप हिन्दू --मुसलमान बना दो।

(वोट करेंगे)

कल हमारे जौनपुर मे मतदान है,आईये इस लोकतंत्र के प्रति हम अपना कर्तव्य निभाये।

                        (वोट करेंगे)

क्या तुमने किया है ?
सब नोट करेंगे-सब नोट करेंगे,
कल अपनी बूथ पे जाके,
जब तुम्हें वोट करेंगे.

ये तेरी सियासत है या----
उसकी सियासत है,
कल मंदिर और मस्जिद मे,
हम,हरगिज नही बटेंगे, 
तेरी गलीज़ ख्वाब पे,
कल फेर देंगे पानी,
तुम चुनाव बाद----
आये नही कभी,
कल अपने इस गुस्से को,
हम इवियम के जरिये,
तुम्हें चोट करेंगे.

क्या तुमने किया है ?
सब नोट करेंगे-सब नोट करेंगे,
कल अपनी बूथ पे जाके,
जब तुम्हें वोट करेंगे.

@@@आईये हम अपने ससंक्त लोकतंत्र के लिये कल वोट करे.

Friday, 10 May 2024

(लोरी रह जाती है)

(लोरी रह जाती है)
माँ-------
मै ढ़ेरो खाता हूँ---------
पर तेरी चुपड़ी रोटी की भूख,रह जाती है।
आज सब कुछ है----
स्लिपवेल के गद्दे,ऐसी कमरे,,,,,,,,,,,,
पर नींद घंटो नही आती है।
ऐ,रंग--यादो में माँ की गोद------
और लोरी रह जाती है।

मदर्स डे स्पेशल।

Wednesday, 8 May 2024

(मां की यादों के नाम)

(माँ की यादो के नाम)
१-------
मै घंटो बतियाता हूँ माँ की कब्र से,
एै,रंग----ऐसा मुझे लगता है कि!
जैसे इस कब्र से भी---------------
मेरे माँ की दुआ आती है।

२--------------
भूखी माँ सुबह तलक----
भूख से बिलबिलाती बेटी के लिये,
लोरी गाती रही।
पड़ोसियो ने कहा बेटी मर गई,
एै ,"रंग"----वे इस सबसे बे-खबर!
कहके चाँद को रोटी गाती रही।

३-----------
माँ---------------
मै आज ढ़ेरो खाता हूँ,
पर तेरी चुपड़ी रोटी की भूख रह जाती है।
आज सब कुछ है-----------
स्लिपवेल के गद्दे,एसी कमरे,
पर नींद घंटो नही आती है।
एै,"रंग"----यादो मे!
माँ की गोद और लोरी रह जाती है।

४-----------
बचपन होता बचपन की चोरियाँ होती,
माँ मै चैन से सोता--------------
इस पत्थर के शहर में,
गर तु होती और तेरी लोरियाँ होती।

@@@एक मर्तबा अवश्य पढ़े शायद यादो की रेत पे माँ की सुरत उभर आये।
@@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,जौनपुर।

(शाखो से मोहब्बत की है)

(शाख़ो से मोहब्ब़त की है)
गर तुम काटोगे--तो मै चिखुँगा,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग--------हमने---
दरख्त़ो के शाखो से मोहब्ब़त की है।

Tuesday, 7 May 2024

(अवैध संबंध है)

(अवैध संम्बंध है)
हाँ मुझे कुब़ूल है,तेरे इल्ज़ाम से पहले,,,,,,,,
ऐ,खुबसूरती-----कि मेरा
तेरी तारिफो से अवैध संम्बंध है।

(मीर तड़पता है)

(अंदर एक मीर तड़पता है)
जब भी शहर में कोई भूख से मरता है,
मेरी नज्म़ो का कूनबा उजड़ता है।
ऐ,रंग----मैं सीसक उठता हूँ लफ्ज़-लफ्ज़,
और मेरे अंदर एक मीर तड़पता है।

Sunday, 5 May 2024

(बेरोजगार एक अनकहा दर्द)

(बेरोजगार _एक अनकहा दर्द)
मै रोज चढ़ता हूँ--------
इस महानगर मे देने इंटरव्यूव की सीढ़ियाँ!
पर;ऐ रंग ------------
मेरी हार की सलीब पे,
लटक जाती है,मेरी डिग्रियाँ।
ये बेरोजगारी का भयावहपन और घुटन !
फिर वही इंटरव्यू------------
और मेरे हताश लौटते कदमो पे,
कहकहे लगाती---------
महानगर के दफ्तरो की सीढ़ियाँ।

@@@रंगनाथ द्विवेदी।

(रोमांटिक वैगन वेलियां)

(रोमांटिक वैगन बेलियाँ)

वे सायबान के पिछे---
शाम को छिपता हुआ सूरज,
और काम से लौटती पहाड़ि लड़कियाँ, 
ना कोई थकन,ना कोई सिकन,
अलमस्त,अल्हड़पन--------
बाते करती,खिल-खिलाती ऐ,रंग--------
मेरी कविता की 
वे रोमांटिक वैगन बेलियाँ।

Wednesday, 1 May 2024

(पी एच डी कर ली)

(पी.एच.ड़ी.कर ली)
मोहब्बत में---------
मै आज तलक स्नातक न हुआ,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----उसने कईयो का दिल तोड़----
इस हूनर पे पी.एच.ड़ी.कर ली।

(बुखार में सोया है)

(बुखार में सोया है)
ऐ अमीरी कहाँ तेरी तरह--------
वे किसी तीज या त्योहार मे सोया है।
अपने मासूम बच्चो के दोज़ख के लिये,
ऐ,रंग----एक मज़दूर--------
पुरी रात बुख़ार में सोया है।

@@मज़दूर दिवस।

(साइकिल है भाई)

(साइकिल है,भाई)

ये हमारी यादों में, --
बसी हुई, बचपन के--
फिल्म की कुछ रील है, भाई.
ये कैची, मार के चलाता हुआ, मैं
और हमारे दादा की----
बहुत प्रिय ,साइकिल है, भाई.
इस तरफ ----
धान की लहलहाती फसल
और उस तरफ ----
सिंघाड़े वाली झील है, भाई.
जहां गिरे ,चोट तो न आई ,
पर डर गया , उस समय
घर लगा जैसे ----
बहुत मील है, भाई.
दबे पांव,
बचने की जुगत फेल हुई,
दादा ने ,कड़क कर पूछा ,
कहांं गये थे,
उफ !! डर-सहम गया 
और सांस यूं लगा कि,जैसे
साइकिल की----
टूटी हुई तील है, भाई.
लेकिन ,दादा समझ गये ,
प्यार से मुझे दुलारा - पुचकारा
और कहा,----
पगले !!मेरे पोते से अच्छी
और प्यारी इस दुनिया में----
नहीं कोई साइकिल है, भाई.

@@ रंगनाथ द्विवेदी