Thursday, 30 March 2023

(रजिस्टर्ड अप्रैल फूल हूँ)
शादी के बाद से------
किचन और बच्चे संम्भालने मे मशगूल हूँ,,,,,
महारत हासिल कर ली है,,पैर दबाने में,,,,,,,,
वे अक्सर लाल-पीली होती है-------
मै कुल हूँ।
ऐ,रंग--मै अपनी लुगाई का--------
रजिस्टर्ड अप्रैल फूल हूँ।

आप सभी संम्मानित पतीयो व होने वाले पतीयो को मूर्ख दिवस की ढेर सारी बधाई।
(घर की पैंजनी रोती है)
बद्चलन-------------
रातो की आगोश मे सो तो लिया!
पर कभी सोचना ऐ,रंग-------
कि तुम्हारे इंतज़ार मे सारी रात,
घर की पैंजनी रोती है।
(तलाक न दो)
ख्व़ाहिशो को खाक न दो,
ऐ मेरे शौहर!
शरिया के नाम पे--------
मुझे बेज़ा तलाक न दो।
बख्श़ दो--------
कहाँ जाऊँगी ले मासुम बच्चे,
मुझ बे-गुनाह को इतना भी शाॅक न दो!
बेज़ा तलाक न दो।

@@सुप्रीम कोर्ट के तीन बार तलाक देने के मसले से प्रेरित चंद लाइन।
(जाफ़रान वंदे मातरम)
क्यू नही गायेगा-------------
कोई हिन्दू या मुसलमान वंदे मातरम।
ये जेहनियत के बीमार है इन्हें क्या पता?
कि है हिन्दू के लिये गीता,
और मुसलमानो के लिये है-------
कुरान वंदे मातरम।
यकी न हो तो किसी भी कौम से पुछो,
यही कहेगा कि जिस मुल्क मे जन्मे,
आखिरी लम्हे वहीं की खाक मिले,
उसी ख्वा़हिश की है जुबान---वंदे मातरम।
आओ तरन्नूम मे गायें इसे हम तुम,
क्योंकि ये मुल्क मेरी माँ और तेरी अम्मी है,
एै"रंग" जिसके आँचल की दूध मे है बन के केसर------------
और जाफ़रान वंदे मातरम।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

ये रचना आज वंदे मातरम को लेके छिड़े विवाद से प्रेरित है।
बिहार और बंगाल के दंगे पे लिखि रचना।
                  (मकान जल जाता है)
जब राजनेता कोई घिनौनी चाल चल जाता है---------
तो उससे बिहार और बंगाल जल जाता है।
सब एक दूजे को मरते-मारते है और---------
हमारे खून-पसीने से बनाया मकान जल जाता है।
जिन्हें ठीक से श्लोक नही आता,
और जिन्हें ठीक से आयत नही आती,
उन्ही के हाथो----------
शहर की पूजा और अजान जल जाता है।
कर्फ्यू में--
रेहड़ी और खोमचे वाले मजदूरो के बच्चे,
आँख मे आँसू लिये,
तकते है तवे का सुनापन सच तो ये है कि,
शहर के दंगे मे-----------
गरीबो और मजदूरो की रोटी का सामान जल जाता है।
सब एकदूजे को मरते-मारते है और----------
हमारे खून-पसीने से बनाया मकान जल जाता है।

@@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर--222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758
(आईना रो दे)

ए मेंरी आरज़ू का खूँ करने वाली,
खुदा करे!
कि कल तेरे हाथो की हिना रो दे।
और जब तु
सँवरने के लिये हो आईने के रुबरु,
मेरी वफ़ा का अक्स़ उभरे---
और तेरी कमीनगी पे आईना रो दे।

@Rangnath dubey
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित " इक्कीसवीं सदी के 251 अंतरराष्ट्रीय श्रेष्ठ व्यंग्यकार " का संकलन आज ही के दिन कोरियर से प्राप्त हुआ था.इस संकलन में देश ही नहीं बल्कि विदेशों के व्यंग्यकार भी शामिल है.,💐💐💐💐

व्यंग्य के इस महाग्रंथ के आदरणीय संपादक श्री ललित सर, राजेश सर के साथ ही इंडिया नेटबुक्स और इस पुस्तक के प्रकाशक संजीव जी का दिल से आभार.

ऐसे ख्वातिलब्ध वरिष्ठ व्यंग्यकारों के अंतरराष्ट्रीय संकलन में, जनपद जौनपुर (उत्तर प्रदेश ) का मुझ जैसा एक अदना सा कलम का विरवा भी शामिल है, यह एक तरह से हमें और हमारे लेखन के लिए गौरवान्वित करने वाला क्षण है.

ऐसे में मैं अपने समस्त वरिष्ठ जनों को अपना प्रणाम प्रेषित करता हूं.🌹🌹🙏🙏

Wednesday, 29 March 2023

(प्रदेश मे चुनाव होना है)
मंदिर मे कटी गाय,मस्ज़िद मे कटा सुअर,
तुम्हे हिन्दु और मुझे मुसलमान होना है।
क्यूँकि ऐ,रंग-------------
अब पुरे प्रदेश मे चुनाव होना है।

Tuesday, 28 March 2023

(क्रिकेट-गदर एक प्रेम कथा)
विराट की शकीना तो नही थी,
फिर ये कैसी गदर-एक प्रेम कथा!
पुरे लाहौर मे मातम आँसू,हर चेहरा गमज़दा!
धोनी के शेरो ने----------
जो लिखी है पटकथा,
ऐ,रंग---चार साल तलक पाक में----
क्रिकेट--गदर एक प्रेम कथा।

@@कल विराट की बैंटिग देख दो साल पुरानी रचना पोस्ट कर दी।
(कैंडिल नाइट)
बहुत उदास है—————
आज हमारे तुम्हारे मोहब्बत की,
कैंडिल नाईट।
मै वही बैठी हूँ ठिक सामने,
बस वे जगह खाली है-
जहां तुम बैठते थे,
आज बहुत उदास है मेरे अंदर जिंदगी,
मै टुट रही हूँ!
मेरे संग बीत रही है,
बस तुम्हारे खूबसूरत यादो की—–
कैंडिल नाईट।
शायद कही चुक गये हम,
इसी से हमारे रिश्ते में गलतफ़हमी बढ़ती गई!
तुम अलग हो गये मै अलग हो गई,
अब तो अक्सर————–
डिनर मेज पे ही रह जाता है,
और मै कुर्सी पे बैठी यु ही,
गुजार देती हू————-
अपनी कैंडिल नाईट।
गर गुंजाइश हो तो लौट आओ,
एक मर्तबा ही सही मुआफ करने,
क्योंकि ऐ,रंग—–कही ऐसा न हो,
कि तेरा इंतजार करते-करते,
हमेशा के लिये बुझ जाये,
मेरी ये कैंडिल नाईट।
(यही धारावी)
मै रोज थकी मांदी,
काम से लौटती हूं जीने------
यही धारावी।
वे चारपाई पे लेटा है,धुत्त कच्ची पिये
गंदी गालियाँ दे रहा,
अभी जबरदस्ती खीचेगा,
मै अपनी ऊबकाईयां रोके,
बर्दाश्त करुंगी एक बलात्कार,
फिर उठुंगी वे सो जायेगा,
थका मांदा!
मै उल्टीयां कर,
पुरे बदन से अपने एै,रंग-------
छुड़ाऊँगी सारी रात मै यही धारवी।
(बेजा तलाक न दो)
ख्वा़हिशो को खाक न दो!
एै मेरे शौहर-----------
सरिया के नाम पे,
मुझे बेजा तलाक न दो।
बख्श दो---------
कहा जाऊँगी ले मासुम बच्चे,
मुझ बेगुनाह को-------
इतना भी शाॅक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न उड़ेलो कान में पिघले हुये शीशे,
मुझ बांदी को सजा तुम--------
इतनी खौफ़नाक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न छिनो छत,न लिबास
खुदा के वास्ते रहने दो,
मेरी बेगुनाही झुलस जाये-------
मुझे वे तेजाब न दो,
बेजा तलाक न दो।
सी लुंगी लब,रह लुंगी लाशे जिंदा,
लाके रहना तुम दु जी निकाहे औरत,
मै उफ न करुंगी!
बस मेरे बच्चो की खुशीयो को कोई बेजा,
इस्लामी हलाक न दो-------
बेजा तलाक न दो।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
____तलाक एक दर्द है जो इसे भुगत रही कोई औरत ही समझ सकती है!अगर संभव है तो मेरी इस रचना के पढ़ने वालो से मेरी कलम अनुरोध करती है प्लीज कभी किसी भी औरत से बेजा तलाक न ले,शुक्रिया।
लगाये बैठा है—————-
होंठो पे अपनी वे सुलगती सिगरेट!
बगल में अनगिनत टुकड़े गिरे है,
धुआँ है!
उस कमरे में जिस कमरे में कभी तुम,
छिन के फेक दिया करती थी,
उसकी अधजली सिगरेट।
अब होंठ पे लगा भुल जाता है,
वे तो सुलगते-सुलगते,
जब होंठ के आखिरी सिरे पे पहुँचती है,
तो वे चौकता है!
फिर जला होंठो पे रख लेता है,
वे अपने एक नई सिगरेट।
और तकने लगता है दरवाजे की तरफ,
कि शायद तुम लौट के आओ,
छिन के फेकने इसके होंठो से,
अधजली सिगरेट।
एक सुबह———-
दरवाज़ा खुला था लोगो की भिड़ थी,
शायद कुछ देर पहले ही मरा है,
क्योंकि—————-
अभी भी उसकी होंठो पे एै,रंग
धीरे-धीरे आगे बढ़ रही बुझने के लिये,
बिल्कुल इसके जीवन की तरह——-
ये सुलगती सिगरेट।
(ओढ़नी)
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।
(सेब द चाइल्ड लिखवा रही है)
किसी कन्या भ्रूण को कोई क्या मारेगा?
माँ खुद मरवा रही है।
हँसी-खुशी के साथ हजार दो हजार दे,
हर शहर के पैथालाॅजी मे रिपोर्ट ले,
किसी डाक्टर के टंगे नीले परदे के उस तरफ,
अपना एबार्शन करवा रही है।
आँख इसलिये भर आती है कि-------
इन तथाकथित माँओ ने कालेज मे पढ़ा है,
"इनके पथराये हृदयो ने--------
माँ शब्द की कोमलता खो दी है",
वही निरक्षर माँ----------
चार बेटिया जन पाप-पुण्य से डरती है,
सच तो ये है कि अपनी बेटियो के लिये-----
"उन पढ़ी-लिखि ढोंगी माँओ से ज्यादा,
अपनी इन बेटियो के लिये लड़ती है"।
सरकारी अमले की कारस्तानी तो और है,
जो महिला डाक्टर पैसे ले,
एबार्शन करवाने के लिये चर्चित है,
सुना है कि वही,
पुरे शहर की दिवालो पे-------------
"सेब द चाइल्ड लिखवा रही है"।

@@@भ्रूण हत्या को इंगित करती एक कविता।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
(शबरी के है राम)

सबकी भक्ति-------
सबकी श्रद्धा के है राम!

कौन कहता है कि केवल-----
अयोध्या के है राम.

ऐ,रंग--जुठे बेर जाती की छोटी,,,,,,
शबरी जैसी वृद्धा के है राम.

Monday, 27 March 2023

आज फिर से मुहब्बत याद आई,
मौसम से पहले आँखो मे सावन सी बरसात आई,
लौट आ एै दिल फिर अपने शहर,
खिड़की,दरवाजे सब बिरान हुये कुछ इस तरह----
हमे आज तेरे छत की याद आई।

                     (मै शम्म-ऐ-चराग हूँ)
मै शम्म-ऐ-चराग हूँ खामोश हो जलुंगी!
ये घुटन है हासिल महज़ यहाँ शमा को,
बुझ जाऊँगी सहर से पहले,
वफा तो न मिली मुझको कही किसी महफ़िल
लेकिन फक्र है मुझे की बेवा हुई तो क्या ?
मैने शौहरे शहर को,
आखिरी लम्हे तक रौशनी तो दी,
बस इतनी खुशी लेके मै मौत से मिलुंगी,
हाँ! वादा रहा फिर भी मुझको जब भी जलाओगे,
हर एक सब पहले की तरह----------
मै हूबहू जलुंगी।
मै शम्म-ऐ-चराग हूं खामोश हो जलुंगी।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222001(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

कुछ रचना के शब्दो का अर्थ-------
सब------रात
सहर----सुबह।
(चुल्हा नही जलता)

तुम तो
बात-बात मे शहर जलाना जानते हो,
तुम्हारे पास तो
कौमो को जलाने का ईधन है!
पर यहाँ फाँकाकशी सोने नही देती,
पेट तो जलता है
ऐ,रंग---------
पर इस बस्ती मे अक्सर
चुल्हा नही जलता.

Saturday, 25 March 2023

(माँ की कोख़ आती है)
हमारे शहर मे-----------
जेहनी बेहयाई मुस्कुराती है!
क्यूँकि ऐ,रंग----------
अस्पतालो मे अब कत्ल करवाने,
माँ की कोख़ आती है।

@@सेब द चाइल्ड।
(माँ की तरह बात करती है)
गर आँखे बांध के भी थमाओगे,
मेरे मुल्क़ की मिट्टी!
तब भी मै उसकी छुवन से पहचान जाऊँगा,
क्यूँकि ऐ,रंग---एकलौता है मेरा मुल्क़,
जहाँ की मिट्टी भी-----------
माँ की तरह बात करती है।

Wednesday, 22 March 2023

(नदी रो रही)
रोज लहू-लुहान हो रही-----
हमारे शहर मे नदी रो रही।
ये माँ थी हम बेवफा बेटो की----
आज जलिल हो रही।
ऐ,रंग--हमारे शहर मे नदी रो रही।

जल दिवस के संम्मान मे।
(राम)
तेरी पीड़ा की प्रत्यंचा को------
सब खीच रहे है राम!
तेरी नगरी मे,
तुम्हें टेंट से ढक कर,
मंदिर यहीं बनायेंगे-----
बस चीख रहे है राम।
हर चुनाव के मुद्दे मे,
बस भुना रहे अयोध्या को,
कुछ न किया और कुछ न करेंगे,
सच तो ये है कि,
ये नकली भक्त है आपके सारे,
जो अपने-अपने स्वार्थ का चंदन-----
भर माथे पे टीक रहे है राम।
तेरी पीड़ा की प्रत्यंचा को------
सब खीच रहे है राम।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर---222002 (उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.----7800824758
जल दिवस के उपलक्ष्य मे मां गंगा की पीड़ा पे लिखी कविता--

    (मां गंगा)

मां गंगा--
अब धरती पे रो रही है!

इसके बेवफ़ा बेटो मे अब,
भगीरथ का किरदार न रहा,
रोज शहर और घर के मैलो से पाट रहे,
उफ!अब गंगा अपने बेटो का प्यार नही,
बल्कि उनके हाथो मिला जहर--
अपने अंदर शमो रही है,
मां गंगा---
अब धरती पे रो रही है।

देखो इसी का असर है कि,
इसके पानी का पुरा बदन,
जहर से नीला पड़ता जा रहा,
तड़पती गंगा मां,
अब बह नही रही---
बल्कि अपनी लाश को बस धो रही है.

मां गंगा----
अब धरती पे रो रही है.

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर ---222002 (उत्तर--प्रदेश)
mo.no.----7800824758

Tuesday, 21 March 2023

(ट्रेन हादसे)
हाई स्पीड़-बुलेट ट्रेन-अच्छे दिन,,,,,
सब ख्व़ाब से,,,,,
मै कैसे गुफ्त़गु करु हर लाश से,,,,,,
छुट गई कलम भी कंप-कपाके मेरे हाथ से।
आखिर कब तलक होते रहेगे,ऐ,रंग----
इस मूल्क़ मे ऐसे ट्रेन हादसे।

ट्रेन हादसे मे मरे हुये लोगो को मेरी श्रद्धांजली।

Monday, 20 March 2023

(मेरा घर जलाके चली जा रही)
कुछ जली जा रही,कुछ बुझी जा रही,,,
मै चुप हूँ,मेरी दुनियाँ लुटी जा रही।
है उसकी विदाई,अपने बाबुल के घर से,,,
ऐ,रंग--वे नया घर बसाने------
मेरा घर जलाके चली जा रही।
(माँ की तरह बात करती है)
गर आँखे बांध के भी थमाओगे,
मेरे मूल्क की मिट्टी!
तब भी मै उसकी छुवन से पहचान जाऊँगा,
क्यूँकि ऐ,रंग---एकलौता है मेरा मूल्क,
जहाँ की मिट्टी भी-----------
माँ की तरह बात करती है।
(गीत)
गीत----------
केवल उर्वशी या शकुंतला नही!
ऐ,रंग----ये उस गरीब की पतीली भी है,
जिसमें कई रोज से-चावल पके नही।
(केदारनाथ सिंह-एक श्रद्धांजलि)
केदारनाथ------------
के साहित्य से यहां की मिट्टी बोलती थी,
शब्द-दर-शब्द का खाटीपन था,
पन्ने-दर-पन्ने उनकी किताबभर नही,
दोस्तो को लिखि उस दौर की-------
उनकी हर चिट्ठी बोलती थी।
लेकिन एक-एककर सब जाते गये,
और टुटता गया ये सिलसिला,
गाँव की उबड़-खाबड़ सड़के,
और उनके साथियो की तरह बिछड़े,
किनारे पड़े छिटके आँख नम किये-------
उस सड़क के यादो की गिट्टी बोलती थी।
लेकिन आज वे भी चले गये,
उनके जाने का रुंधापन और नम आँखे,
कह रही कि---------
उनके साहित्य का ये रितापन,
शायद फिर न भर सके।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर--222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Saturday, 18 March 2023

(मज़हब हो के रह गई)
हर रात लहू-लूहान सेज़ पे सोती है,,,
इसका शौहर----
इसकी ख्व़ाहिशो का कत्ल़ करता है।
ये मोहब्ब़त तलाशती है कतरा-कतरा,,,
वे मोहब्ब़त के लम्हो मे तकरिर करता है।
ऐ,रंग--वे यहाँ आई थी औरत होने-----
मज़हब होके रह गई।

तकरिर--धार्मिक भाषण।
(तिलिस्म़-ऐ-होशरुबा)
कई रात जगा हूँ,नींद टुटी है,,,,
हर बार------
बार-बार तेरा चेहरा नुमाया हुआ है।
ऐ,रंग--कह दो-----
अब उतर आये मेरी कागज़ पे,,,,
मेरे ख्वाहिशो की-----
तिलिस्म़-ऐ-होशरुब़ा।
(मकान से अच्छा)
वे अपनी तोतली जुबान से बोलता है----
किसी भी हिन्दू या मुसलमान से अच्छा।
मुझे बहुत खूबसूरत लगता है----------
वे गली मे नंगा खेलता बच्चा ।
क्या?करुंगा जा के मै मंदिर या मस्जिद में,
मुझे पता है कि---------
तुम बांध दोगे बंदिशो मे एक दिन इसे भी,
ये भी समझ जायेगा जाती और मज़हब,
और बन जायेगा ये खो के अपना बचपना,
हमारी गीता और तुम्हारे कुरान का बच्चा।
तब तलक तो तक लु इस मासुम से बच्चे को,
जो खुद मे खो बना रहा मिट्टी से एै"रंग"----
एक घर इस शहर मे हर मकान से अच्छा।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
(तवायफ़ की कब्र है)
यहाँ चराग नही जलते,
कोई चादर नही चढ़ती!
ये शहर की मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है।
आज भी करती है,ये रुहें मूज़रा,
फिर फूट के रोती है!
ऐ,रंग---बस आ जाते है खिज़ा में,
दरख्त़ो के चंद पत्ते------
आवारगी करने।
ये शहर की मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है।
(मुसलमान है, साहब)

ना ही , पूजा 
ना ही , किसी मस्जिद की ,
अजान है , साहब.

ये लड़की ,
इस दौर-ए-ग़ालिब की,
दीवान है , साहब.

बड़़े सलीके और 
तमीज़ से ,
लिखा है , कई रात ,
ये एक रात , हिन्दू
तो एक रात मेरी ,
गज़लों की , ----
मुसलमान है , साहब.

@ रंगनाथ द्विवेदी

Friday, 17 March 2023

(मज़हब हो के रह गई)
हर रात लहू-लूहान सेज़ पे सोती है,,,
इसका शौहर----
इसकी ख्व़ाहिशो का कत्ल़ करता है।
ये मोहब्ब़त तलाशती है कतरा-कतरा,,,
वे मोहब्ब़त के लम्हो मे तकरिर करता है।
ऐ,रंग--वे यहाँ आई थी औरत होने-----
मज़हब होके रह गई।

तकरिर--धार्मिक भाषण।
(आईना रो दे)
मेरी आरज़ू का ऐ खूँ करने वाली,
खुदा करे!कल तेरे हाथो कि हिना रो दे।
तु जब सँवरने के लिये हो आईने के रुबरु,
मेरी वफ़ा का अक्स़ उभरे-----------
और तेरी कमीनगी पे आईना रो दे।

Thursday, 16 March 2023

(कलम तोड़ दी है)
मोहब्बत के---
ताजिराते हिंद की दफा से,,
वे बचती रही है।
हमने पहली दफा ये,वहम तोड़ दी है,,
ऐ,रंग--उन्हे बेवफा लिखके कलम तोड़ दी है।
(लोरियाँ होती)
बचपन होता---------
बचपन की चोरियाँ होती!
माँ!मै शुकून से सोता,
इस पत्थर के शहर मे!
अगर तु होती--------
और तेरी लोरियाँ होती।

Wednesday, 15 March 2023

(अपनी लटो को)
अपनी लटो को----
चेहरे पे आने ना दिया करो,,,
बड़ी जलन होती है------
जब ये तुम्हे चुमते है।
(घुँघरु बांधती थी)
रईसो के दरमियां वे सलिके से जाती थी,
कभी ठुमरी,कभी दादरा गाती थी।
ऐ,रंग--वे पाक थी कोठे पे सुना है-----
कि केवल!वे पाँव मे घुँघरु बांधती थी।
(बंजारन)

मेरी जिंदगी मे आई थी कभी--
एक खानाबदोश बंजारन.

उसकी कत्थई आँखो को यादकर,
मै लिखता गया,लिखता गया,
न जाने कब--
एक मुकम्मल किताब बन गई!
ऐ,रंग--
वे खानाबदोश बंजारन.

Tuesday, 14 March 2023

(शराबी आचमन है)
ये जो तेरा अल्हड़ बाकपन है,,,
कशीश है शायर का----
ऐ,रंग--कवि का------
शराबी आचमन है।
(गौरैया)
याद करो बचपन--------
वे फुदक के!चहक के!कितना बहलाती थी!
एक बेटे की तरह।
ऐ,रंग-------गौरैया
केवल हमारे छत की चिड़ियाँ नही,
आज रुठ गई!
जो कल हमारी माँ थी।
(याद तुम्हारी नही गई)
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई,
वे पिंक से सूट मे तुम्हे देखना,
जैसे अभी कल की बात हो,
तुम गई तो बेशक---------
पर मेरी जेहन में ज्यो की त्यो तुम आज भी हो,
तुम्हारी कसम मौसम बदले,साल बदला
लेकिन तुम्हें चाहते रहने कि--------
मेरी खुमारी नही गई,
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई।
वे पतझड़ की हवा,
और उनकी शाखो से गिरते पत्ते,
और तुम्हारे कालेज से छुटने का वे वक़्त,
जब तुम्हारे खुले बाल,
हवाओ से इधर-उधर बिखर जाते थे,
फिर उन्हे तुम अपनी नाज़ुक अँगुलियो से,
जब पिछे की तरफ करती थी,
वे मेरा तुम्हे देखने का खूबसूरत लम्हा था,
मै आज भी उसी लम्हें से मोहब्बत करता हूँ,
सच तो ये है कि----------
बिना तुम्हारी याद के हमसे,
कोई दिन या रात गुजारी नही गई!
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Sunday, 12 March 2023

(सनी लियोन हुई)
मेरी गज़ल,मेरी कविता मौन हुई,,
ऐ,रंग----
देखते-देखते हमारे साहित्य की शकुंतला--
सनी लियोन हुई।
(आचमन करना)
मै इस ज़मी पे----------
किसी देवता के प्याले से छलक आई हूँ।
ऐ,रंग-------जरा संम्भल के-------
मेरी रुप का आचमन करना।
(ताजमहल )

उस बेवफ़ा के हाथ से---
गिरा और गिरके टूट गया,
ए "रंग "
वे मेरा तोहफ़ा नही---
कांच का ताजमहल था.

Saturday, 11 March 2023

(उपले जला रही थी)
कल जिस अखबार मे छपी थी-तिरंगे की तस्बीर,
ऐ,रंग----उसी अखबार से गरीबी,
अपने तीन दिनो से ठंड़े-----------
चूल्हे के उपले जला रही थी।
(माँ की दुआ आती है)
मै घंटो बतियाता हूँ माँ की कब्र से,
ऐ,रंग----ऐसा मुझे लगता है कि!
जैसे इस कब्र से भी----------
मेरे माँ की दुआ आती है।

Wednesday, 8 March 2023

(बच्चा पाल रही हूँ मै)
इस सुंदरतम सृष्टि को आहूति----
डाल रही हूँ मै,,
दोज़ख मे अपने नन्हा सा-----
एक बच्चा पाल रही हूँ मै।
देगा मुझको अपना ही कोई गाली,,
ये नाज़ायज फिर भी ,रंग----
कुम्हार की मिट्टी सा-----
इसको ढ़ाल रही हूँ मै।
इस सुंदरतम,सृष्टि को आहूति डाल रही हूँ मै----
दोज़ख मे अपने नन्हा सा----
एक बच्चा पाल रही हूँ मै।

महिला दिवस पे मेरी लंबी कविता की शुरुआती लाईने।
(पती के हाथ से जली)
कभी मिट्टी के तेल तो कभी तेज़ाब से जली,
औरत सीता भी हुई तो आग से जली।
ये दुनिया मर्दें शहर है आज भी,
गर मासुम सजी-सँवरी भी तो ऐ,रंग-----
अपने पती के हाथ से जली।

Tuesday, 7 March 2023

(नीलकंठ हूँ)
छक के पिया है-------
हमने भी तमाम हालातो का ज़हर!
ऐ,रंग------------
मै भी अपने दौर का नीलकंठ हूँ।

@@@@हर हर महादेव।
(टुटी चुड़ी)
तेरे पहले छुअन से टुटी चुड़ी को,
मैने अब तलक संभाल रंखा है----
जब तु नही आता कई राते---
तो मै उसी से बात करती हूँ।
(खूबसुरत औरत नही देखी)

माथे पे चुह-चुहाता पसीना,
कमर पे खुशी साड़ी!

और सर पे सीमेंट की भदेली,
श्रम की मादक चाल!

ऐ,रंग---
मेरी कविता ने कभी--
इतनी खूबसुरत औरत नही देखी।

Monday, 6 March 2023

(अब्बु ने लगाया था)
हर चोट पे------------
चिखेगी तुम्हारे माँ की मोहब्बत।
क्यूॅकि ऐ,रंग----इस बुढ़े दरख्त़ को------
तेरे अब्बु ने लगाया था।

Saturday, 4 March 2023

(आओ जिहाद करे)
बेटे और बेटियाँ-----
माँ-बाप की मोहब्ब़त को याद करे।
ना कत्ल हो,ना शहर जले,
ऐ,रंग--हम जिस्मानी हवस के खिलाफ--
आओ जिहाद करे।
(शबे भहफ़िल)
बेशक लौट जाना तुम सहर से पहले,
ऐ मेरे कातिल!
पर मै टुट के गाऊँगा कल के मुशायरे में,
है दिली ख्व़ाहिश कि तुम सामने रहना,
तुम नही मिली तो गम नही--
बस बीना आँसुओ के रोना चाहता हूँ,
कल मै शबे महफ़िल।
(राम को अल्लाह कहता हूँ)
फकिरी तबियत है--------
मै मस्ज़िद में नमाज पढ़ता हूँ!
बस फर्क ये है ऐ,रंग---------
मै राम को अल्लाह कहता हूँ।
अगले वर्ष, होली में यह रचना लिखी है.

(पिया आ जाओ)

होली मे दुखे है अंग-अंग------
कि पिया आ जाओ!
भरो पिचकारी से रंगो अंग-अंग-------
कि पिया आ जाओ।
छेड़ो मै छिटकु,भागु फिर पकड़ो,
मै शर्माऊ तेरे सीने से लग,
जीऊँ मै होली के सारे उमंग,तेरे संग-----
कि पिया आ जाओ।
फिर हँसे अँगना और मोरा कंगना,
नथिया करे ननद सी शरारत,
मै हारु तुम जीतो,ये होली की जंग------
कि पिया आ जाओ।
नयनो मे सब कुछ,नयनो मे मदिरा,
आँचल मे महुवा,
और साँसो में महके अमवा की बौर,
कुके है चोली मे कोयल,
कि होली मे सिसके ना हमारी पलंग-----
कि पिया आ जाओ।

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी, मियाँपुर,
जिला--जौनपुर pin no.222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.No.----7800824758

Friday, 3 March 2023

(उपले जला रही थी)
कल जिस अखबार मे छपी थी-तिरंगे की तस्बीर,
ऐ,रंग----उसी अखबार से गरीबी,
अपने तीन दिनो से ठंड़े-----------
चूल्हे के उपले जला रही थी।
(जवान हुई)
कैसे निखरते------------
किसी मजदूर बाप की बिटिया के अंग,
इसके पेट और नाभी का पिचकापन,
गर पढ़ सके तो पढ़,
अरे ये वो पगली है------------
जो आधे से ज्यादा फाकाकसी मे जवान हुई।
रातभर खाँसती माँ के सिरहाने बैठी रही,
दवा की खाली शीशी का दर्द पूछ इससे,
एक झपकी का इसके झोंका भी टूट गया------
ये एैसी ही गुजरी रातो मे जवान हुई।
बापु के काम से लौटने के पदचाप की पीड़ा,
का असह्यपन जानती है!
फिर भी मूक और मौन है,
अंदर ही अंदर बेटी को न व्याह पाने का सुलगापन क्या है?
ये जानती है!
तभी तो कभी सजी-सँवरी नही ना आईना देखा,
एै "रंग" ----------
ये एैसे ही अभागेपन मे जवान हुई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर---222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758