एक स्वतंत्र लेख-----------
( दुसरा पाकिस्तान पनप रहा है)
ये लिखते मेरी अंगुलियाँँ लरज रही है,एक झुरझुरी, एक कपकपाहट सी हो रही है कि--"हमारे देश मे एक दुसरा पाकिस्तान पनप रहा है". इसके तमाम विरवे आज देश के हर राज्य मे पुष्पित व पल्लवित हो रहे,ये विष की बेलरी जिस दिन कत्लेआम पे उतरी वे पल बड़ा ही भयावह होगा, ये अंदेशा मेरा हाल-फिलहाल एक पागल-प्रलाप भर लगे लेकिन इसके मूल मे एक डर-एक भय है.
आज देश को एक बडे़ आंदोलन और जन-जागरूकता की आवश्यकता है,इसके लिये मुस्लिम और हिन्दू दोनो कौमो के आलिम और फाजिल लोगो को पहल करनी होगी, हर महिने मे कम से कम दो-दो मिटिंगे इन्हे अपनी-अपनी बस्तियों या कस्बो मे एक दुसरे को बुलाके करनी होगी, ,"और बारुद के ढ़ेर की तरफ जा रहे अधिसंख्य मुस्लिम नौजवानो को रोकना होगा इन्हें मुहब्बत के तराने की तरफ लाना होगा"
हालांकि मैने राजनीति पे कभी देश को विखंडित करती या आहत करती टिप्पणियाँ नही की लेकिन संपूर्ण अवलोकनोपरांत ये पाया है कि देश मे सत्ता सुख की ख़ातिर वे--"वे सभी कुछ हुआ जो की नही होना चाहिये था". शायद जिन्नी और नेहरू का आजादी के बाद की महत्वाकांक्षा ने--"इस देश के सीने पे कुछ बेगुनाह लोगो की लाश बिछाई और प्रधानमंत्री की कुर्सी का रक्त ऋृंगार किया".
काश देश के बंटवारे के समय ही एक स्पष्ट निर्णय ले लिया गया होता तो दोनो देश को इस कैंसर से मुक्ति मिल जाति. "इस देश मे झूठे भाषण, झूठे प्रलाप, घड़ियाली आँसू के इतने अदाकार हुये कि उस स्तर के अदाकार सिनेमा मे भी नही हुये". देश के बंटवारे के समय जो संख्या पाकिस्तान मे हिन्दूओ की थी वे आज खत्म होने की कगार पर है.
"और हमारे यहाँ मुसलमानों को पाकिस्तान के मुसलमानों से भी कही ज्यादा उर्वरा धरती मुहैया कराई गई ,इनकी न मानने वाली बातो का भी राजनैतिक पोषण हुआ". ये जिस तरह रहना चाहे हमेशा रहे. जरूरत पड़ी तो यहां के कानून को भी धत्ता बताया. तमाम हिन्दू आस्थाओ को तोड़ने वाले आक्रांता को हिरो मानने वाले मुसलमान कभी पहल करते नही दिखा कि---" पौराणिक काल से करोड़ो-करोड़ हिन्दूओ की आस्था के राम आज इनके वादी होने से टेंट में पड़े हैं ". कोई पहल नही सच ये देश की राजनैतिक नपुंसकता और अपने ही देश के चंद होनहार गद्दार की बानगी नही तो क्या है?.
सच तो ये है कि इस देश का मुसलमान कुछ को छोड़--" दो-मूँहे साँप सा जी रहा, इन्हें जिस दिन भी ये भान हुआ या ये उस हद तक सच्छम हुये तो निश्चित जानिये कि--" हिन्दुस्तान एक इस्लामिक राष्ट्र होगा". ये लोग बेशक तथाकथित खुद को सेकुलर कहने वाले को बुरा लगे लेकिन--" मै उन बुरा लगने वालो के डर से मै आने वाले वहशी दौर की परिकल्पना से मुकर नही सकता".
हमें बताये उत्तर दिजिये क्या आप भारत या हिन्दुस्तान के है? नही अगर होते तो--" जे. एन. यू से ये आवाज़ न आती कि--भारत तेरा टुकड़े होंगे, हम लड़के लेंगे आजादी ,तुम जितने अफ़जल मारोगे, हर घर से अफ़जल निकलेगा" . मदरसो के हालात भी इतर नही--"हरे चाँद तारे वाले पाकिस्तानि झंडे को इस्लामिक झंडे का नाम दे सगर्व फहराया जा रहा और उसपे तुर्रा ये कि सरकारे बाकायदा इन्हें आर्थिक खाद-पानी दे भरपूर लह-लहाने का मौका दे रही". ये इतने बड़े मुल्क मे रहते हुये भी--" आज तक यहाँ के राष्ट्रगान तक को नही स्वीकार पाये है जबकि राष्ट्रगान किसी सिनेमा का गीत नही अपितु हमारा राष्ट्र-गौरव है". हमने अक्सर इनके मुशायरा मे कुछ को राष्ट्र-विरोधी गज़लो को तरन्नुम मे पढ़ते सुना है. बकायदा इतने बड़े लोकतंत्र के चुने हुये प्रधानमंत्री को ममता बनर्जी के तथाकथित मुस्लिम बंगाल से एक मुस्लिम मौलाना को---" म्यानमार से भा भागकर आये हुये रोहिग्यांओ के लिये ये कहते देखा व सुना है कि दुनिया का कोई भी मुसलमान, मुसलमान पहले है, वे उनके अपने है, उनका हमारा कुरान अपना है, नरेन्द्र मोदी ये जान ले अगर इन रोहिग्यांओ के साथ कुछ हुआ तो खून की नदी बह जायेगी ". जबकि देश विरोधी कुछ कार्यो मे हमारे इंटेलिजेंस ने इनके शामिल होने की आशंका जगाई है. पुरी दुनिया पहले अपने मुल्क की बात करती है तब कही उसके बाद धर्म की. जबकि पुरी दुनियां मे मुसलमान एक कौम है जो पहले अपने धर्म और मज़हब की बात करता है.
मुसलमान अगर इस देश का होता तो यहाँ की जम्मूरियत और मोहब्बत कब की सीख लेता और अपने ही मज़हब की एक बेगुनाह औरत--" निदा खान को उसके शौहर के द्वारा दिये गये बेजा तलाक का समर्थन न करती, उसे हलाला जैसे दुष्कर्म को न कहा जाता, उसके खिलाफ एक टुच्चा मौलवी ये फतवा कभी जारी न करता कि निदा के बीमार होने पर कोई दवा या पानी न दे, कोई भी उससे किसी तरह का रिश्ता न पंखे, उसका सर मूँड़ा दिया जाये, उसके चप्पलो से पिटा जाये और उसको मारने वाले को इतनी रकम दी जाये, उसे इस देश से निकाल दिया जाये ये सब यहाँ के मुकम्मल नागरिक होने के लच्छण तो नही.
आखिर ये देश कब तलक एक कलाम और अब्दुल बन्द के तराने गायेगा (हाँ यहाँ मै ये जरूर लिखता हूँ कि ये दोनो महापुरुष मुकम्मल हिन्दुस्तान हैं ). इतिहास गवाह है कि अगर गलत मानसिकता को समय से न कुचला जाये तो--" आने वाली नस्ले उसकी किमत चुकाती है, कास कांग्रेसी हुकूमत ने पुरी बर्बरता के साथ गलत और बेजा मुस्लिम मांगो को इसके शैशवकाल मे ही कुचल दिया होता तो ठीक था".
"आज "राज-तरंगिणी" जैसे साहित्य, केशर और गुलाब की खुशबू, सेब के बाद, डलझील-शिकारे सी खूबसूरती का राज्य कश्मीर--अपनी साँस मे बारूद की बू लिये है". अलगाववादी वहाँ की दशा और दिशा तय कर रहे, उनके ऊपर करोड़ो-अरबो खर्च हो रहा और हासिल क्या है? आतंकवादी-पत्थरबाज हमारे छुट्टी पे गये जवानो को अगवा कर कत्ल करना. कश्मीरी पंडितो का आज इतने सालो से भयावह, यातनामय शरणार्थियो की तरह जीवन, सरकार कोई भी हो लेकिन--"मैने हमेशा कश्मीर के नाम पे महज अपने यहाँ की सत्ता को नपुंसक होते देखा है ".
सच पुरी दुनियां मे इस्लाम कत्ल, कत्ल और बस कत्ल का एक मज़हब बनके रह गया है. उफ! रोंगटे खड़े हो जाते है. जब कही दो सौ, तीन
सौ बेगुनाह लोग ,आतंकवादी विस्फोट मे मारे जाते है. ये इन आतंकवादियो के जन्नत मे मिलनेवाला हीरो का कौन सा नशा है अल्लाह जाने. अब अपने देश भारत मे भी पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगते है, झंडा तक फहराया जाता है, आई. यस. आई. यस. जैसी आतंकी संगठन के लोग पकड़े जा रहे. आखिर ये कौन है? मुसलमान, खलिफा, इस्लाम के ही माननेवाले लोग न तो फिर क्यू? ये बात हमेशा इतने रटे-रटाये से वाक्य मे खत्म कर दी जाती है कि--"आतंक का कोई मजहब नही होता ". सच तो ये है कि --" सावधान! जाने-अंजाने मे हमारे आस-पास हमारे ही मुल्क मे एक दुसरा पाकिस्तान पनप रहा है".
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर.
जिला---जौनपुर, पिन नं. 222002 (उत्तर -प्रदेश).
मो.नं.----7800824758.
यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.
इस लेख का मक़सद किसी के प्रभावित होने से नही है इसे एक लेख के नजरिये मात्र से पढ़े.