Friday, 31 July 2020

कविता---(दीवाना रोया है )

(दिवाना रोया है)
ये जो सारी रात------------
शहर मे बरसात हुई है,
कही किसी की याद मे----
कोई दिवाना रोया है।
ये बिजली,ये चमक--------
किसी बंद हवेली के जले चराग से,
लिपट------------------
आखरी लम्हे कोई परवाना रोया है।
कल सहर के बाद--------------
निकल के देखना तुम आलमे बारिश,
एक हमी है जो जानेगे,
कि कल सारी रात तड़प के----
किसी का अफसाना रोया है।
ये जो सारी रात--------------
शहर मे बरसात हुई है,
एै,रंग------किसी की याद मे,
कोई दिवाना रोया है।

Wednesday, 29 July 2020

कविता---(देवता कौन है? )

(देवता कौन है?)
अधर पे गलिज़गी है सबके---------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
खामि अय्यासपन की तकती है जवान लड़की,
आखिर बताओ----------
तुम्हारे घर की जवान लड़की को तकता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके--------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
गरीब क्या जाने,हदीस,तकरीर,मज़हब,
वे रोटी की खातिर--------
मजदूरी मंदिर और मस्जिद दोनो मे कर रहा है,
आखिर इन्हें----------
हिन्दू  और मुसलमान कहता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके--------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
हर दंगे मे जलते है घर तबाह होती है बस्तियाँ,
इन घरो मे तो जिंदा इंसान रहते है,
एै "रंग" बताओ तुम्हें गीता और कुरान की कसम,
कि आखिर-----------
इस मंदिर और मस्जिद मे रहता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके---------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-------7800824758

लेख----(दुसरा पाकिस्तान पनप रहा है )

एक स्वतंत्र लेख-----------
                      ( दुसरा पाकिस्तान पनप रहा है)
ये लिखते मेरी अंगुलियाँँ लरज रही है,एक झुरझुरी, एक कपकपाहट सी हो रही है कि--"हमारे देश मे एक दुसरा पाकिस्तान पनप रहा है". इसके तमाम विरवे आज देश के हर राज्य मे पुष्पित व पल्लवित हो रहे,ये विष की बेलरी जिस दिन कत्लेआम पे उतरी वे पल बड़ा ही भयावह होगा, ये अंदेशा मेरा हाल-फिलहाल एक पागल-प्रलाप भर लगे लेकिन इसके मूल मे एक डर-एक भय है.
आज देश को एक बडे़ आंदोलन और जन-जागरूकता की आवश्यकता है,इसके लिये मुस्लिम और हिन्दू दोनो कौमो के आलिम और फाजिल लोगो को पहल करनी होगी, हर महिने मे कम से कम दो-दो मिटिंगे इन्हे अपनी-अपनी बस्तियों या कस्बो मे एक दुसरे को बुलाके करनी होगी, ,"और बारुद के ढ़ेर की तरफ जा रहे अधिसंख्य मुस्लिम नौजवानो को रोकना होगा इन्हें मुहब्बत के तराने की तरफ लाना होगा"
हालांकि मैने राजनीति पे कभी देश को विखंडित करती या आहत करती टिप्पणियाँ नही की लेकिन संपूर्ण अवलोकनोपरांत ये पाया है कि देश मे सत्ता सुख की ख़ातिर वे--"वे सभी कुछ हुआ जो की नही होना चाहिये था". शायद जिन्नी और नेहरू का आजादी के बाद की महत्वाकांक्षा ने--"इस देश के सीने पे कुछ बेगुनाह लोगो की लाश बिछाई और प्रधानमंत्री की कुर्सी का रक्त ऋृंगार किया".
काश देश के बंटवारे के समय ही एक स्पष्ट निर्णय ले लिया गया होता तो दोनो देश को इस कैंसर से मुक्ति मिल जाति. "इस देश मे झूठे भाषण, झूठे प्रलाप, घड़ियाली आँसू के इतने अदाकार हुये कि उस स्तर के अदाकार सिनेमा मे भी नही हुये". देश के बंटवारे के समय जो संख्या पाकिस्तान मे हिन्दूओ की थी वे आज खत्म होने की कगार पर है. 
"और हमारे यहाँ मुसलमानों को पाकिस्तान के मुसलमानों से भी कही ज्यादा उर्वरा धरती मुहैया कराई गई ,इनकी न मानने वाली बातो का भी राजनैतिक पोषण हुआ". ये जिस तरह रहना चाहे हमेशा रहे. जरूरत पड़ी तो यहां के कानून को भी धत्ता बताया. तमाम हिन्दू आस्थाओ को तोड़ने वाले आक्रांता को हिरो मानने वाले मुसलमान कभी पहल करते नही दिखा कि---" पौराणिक काल से करोड़ो-करोड़ हिन्दूओ की आस्था के राम आज इनके वादी होने से टेंट में पड़े हैं ". कोई पहल नही सच ये देश की राजनैतिक नपुंसकता और अपने ही देश के चंद होनहार गद्दार की बानगी नही तो क्या है?. 
सच तो ये है कि इस देश का मुसलमान कुछ को छोड़--" दो-मूँहे साँप सा जी रहा, इन्हें जिस दिन भी ये भान हुआ या ये उस हद तक सच्छम हुये तो निश्चित जानिये कि--" हिन्दुस्तान एक इस्लामिक राष्ट्र होगा". ये लोग बेशक तथाकथित खुद को सेकुलर कहने वाले को बुरा लगे लेकिन--" मै उन बुरा लगने वालो के डर से मै आने वाले वहशी दौर की परिकल्पना से मुकर नही सकता".
हमें बताये उत्तर दिजिये क्या आप भारत या हिन्दुस्तान के है? नही अगर होते तो--" जे. एन. यू  से ये आवाज़ न आती कि--भारत तेरा टुकड़े होंगे, हम लड़के लेंगे आजादी ,तुम जितने अफ़जल मारोगे, हर घर से अफ़जल निकलेगा" . मदरसो के हालात भी इतर नही--"हरे चाँद तारे वाले पाकिस्तानि झंडे को इस्लामिक झंडे का नाम दे सगर्व फहराया जा रहा और उसपे तुर्रा ये कि सरकारे बाकायदा इन्हें आर्थिक खाद-पानी दे भरपूर लह-लहाने का मौका दे रही". ये इतने बड़े मुल्क मे रहते हुये भी--" आज तक यहाँ के राष्ट्रगान तक को नही स्वीकार पाये है जबकि राष्ट्रगान किसी सिनेमा का गीत नही अपितु हमारा राष्ट्र-गौरव है". हमने अक्सर इनके मुशायरा मे कुछ को राष्ट्र-विरोधी गज़लो को तरन्नुम मे पढ़ते सुना है. बकायदा इतने बड़े लोकतंत्र के चुने हुये प्रधानमंत्री को ममता बनर्जी के तथाकथित मुस्लिम बंगाल से एक मुस्लिम मौलाना को---" म्यानमार से भा भागकर  आये हुये रोहिग्यांओ के लिये ये कहते देखा व सुना है कि दुनिया का कोई भी मुसलमान, मुसलमान पहले है, वे उनके अपने है, उनका हमारा कुरान अपना है, नरेन्द्र मोदी ये जान ले अगर इन रोहिग्यांओ के साथ कुछ हुआ तो खून की नदी बह जायेगी ". जबकि देश विरोधी कुछ कार्यो मे हमारे इंटेलिजेंस ने इनके शामिल होने की आशंका जगाई है. पुरी दुनिया पहले अपने मुल्क की बात करती है तब कही उसके बाद धर्म की. जबकि पुरी दुनियां मे मुसलमान एक कौम है जो पहले अपने धर्म और मज़हब की बात करता है. 
मुसलमान अगर इस देश का होता तो यहाँ की जम्मूरियत और मोहब्बत कब की सीख लेता और अपने ही मज़हब की एक बेगुनाह औरत--" निदा खान को उसके शौहर के द्वारा दिये गये बेजा तलाक का समर्थन न करती, उसे हलाला जैसे दुष्कर्म को न कहा जाता, उसके खिलाफ एक टुच्चा मौलवी ये फतवा कभी जारी न करता कि निदा के बीमार होने पर कोई दवा या पानी न दे, कोई भी उससे किसी तरह का रिश्ता न पंखे, उसका सर मूँड़ा दिया जाये, उसके चप्पलो से पिटा जाये और उसको मारने वाले को इतनी रकम दी जाये, उसे इस देश से निकाल दिया जाये ये सब यहाँ के मुकम्मल नागरिक होने के लच्छण तो नही. 
आखिर ये देश कब तलक एक कलाम और अब्दुल बन्द के तराने गायेगा (हाँ यहाँ मै ये जरूर लिखता हूँ कि ये दोनो महापुरुष मुकम्मल हिन्दुस्तान हैं  ). इतिहास गवाह है कि अगर गलत मानसिकता को समय से न कुचला  जाये तो--" आने वाली नस्ले उसकी किमत चुकाती है, कास कांग्रेसी हुकूमत ने पुरी बर्बरता के साथ गलत और बेजा मुस्लिम मांगो को इसके शैशवकाल मे ही कुचल दिया होता तो ठीक था".
"आज "राज-तरंगिणी" जैसे साहित्य, केशर और गुलाब की खुशबू, सेब के बाद, डलझील-शिकारे सी खूबसूरती का राज्य कश्मीर--अपनी साँस मे बारूद की बू लिये है". अलगाववादी वहाँ की दशा और दिशा तय कर रहे, उनके ऊपर करोड़ो-अरबो खर्च हो रहा और हासिल क्या है? आतंकवादी-पत्थरबाज हमारे छुट्टी पे गये जवानो को अगवा कर कत्ल करना. कश्मीरी पंडितो का आज इतने सालो से भयावह, यातनामय शरणार्थियो की तरह जीवन, सरकार कोई भी हो लेकिन--"मैने हमेशा कश्मीर के नाम पे महज अपने यहाँ की सत्ता को नपुंसक होते देखा है ".
सच पुरी दुनियां मे इस्लाम कत्ल, कत्ल और बस कत्ल का एक मज़हब बनके रह गया है. उफ! रोंगटे खड़े हो जाते है. जब कही दो सौ, तीन 
सौ बेगुनाह लोग ,आतंकवादी विस्फोट मे मारे जाते है. ये इन आतंकवादियो के जन्नत मे मिलनेवाला हीरो का कौन सा नशा है अल्लाह जाने. अब अपने देश भारत मे भी पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगते है, झंडा तक फहराया जाता है, आई. यस. आई. यस. जैसी आतंकी संगठन के लोग पकड़े जा रहे. आखिर ये कौन है? मुसलमान, खलिफा, इस्लाम के ही माननेवाले लोग न तो फिर क्यू? ये बात हमेशा इतने रटे-रटाये से वाक्य मे खत्म कर दी जाती है कि--"आतंक का कोई मजहब नही होता ". सच तो ये है कि --" सावधान! जाने-अंजाने मे हमारे आस-पास हमारे ही मुल्क मे एक दुसरा पाकिस्तान पनप रहा है".

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी. 
जज कालोनी, मियाँपुर.
जिला---जौनपुर, पिन नं. 222002 (उत्तर -प्रदेश). 
मो.नं.----7800824758.

यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है. 
इस लेख का मक़सद किसी के प्रभावित होने से नही है इसे एक लेख के नजरिये मात्र से पढ़े.

Sunday, 26 July 2020

कविता--(कारगिल रह गया )

(करगिल रह गया)
सरहद से नही लौटा----------
एक नई दुल्हन का वही दिल रह गया,
सीने पे थे गोलियो के निशान,
उसकी खुली आँखो मे---------
लहराता तिरंगा और करगिल रह गया।
माँ भुलती नही जार-जार रोती है,
उसे गम नही------------------
अपने एकलौते बेटे की शहादत का,
उसे गम है कि सरहद के उस तरफ,
तमाम साँप------------------
और उन साँपो का बील रह गया।
राखी के दिन बहन उसकी--------
बंद कमरे मे सुनती है राष्ट्रगान,
और फक्र करती है उस भाई पे एै,रंग----
जिसके नाते
हिंद के नक्शे में करगिल रह गया।
###करगिल के तमाम शहीदो को एक श्रद्धांजलि।

Saturday, 25 July 2020

कविता---(माँ )

(माँ)
तेरा हर बेटा मुल्क की खातिर-------
यूं शहीद और कुर्बान हो माँ!
ना बटने दे किसी को मजहब के नाम पे,
समय से पूजा समय से अजा़न हो माँ।
फक्र हो तुम्हे अपने आँचल और दूध पे,
तेरी लोरी में राष्ट्र हो और राष्ट्रगान हो माँ।
ना पंजाब,ना गुजरात,ना महाराष्ट्र निकले,
आखिरी लम्हें गर लब भी फड़फड़ाये,
तो लब पे तुम और हिन्दुस्तान हो माँ।
गर सुपुर्द-ऐ-खाक होने लगू,
तो मुट्ठी में मुल्क की मिट्टी-------
और डालने वाले के होंठो पे मुस्कान हो माँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
###आप सभी को हमारे मुल्क की ये आजाद सुबह मुबारक हो।

Thursday, 23 July 2020

व्यंग्य----(राहुल गाँधी का सदन में भूकंप )

व्यंग्य----------
          (राहुल गाँधी का सदन मे भुकंप)
हालाँकि राहुल गाँधी ने ये बयान बहुत पहले से ही दे रंखा था कि--"अगर मै सदन मे इतने मिनट बोल दु तो पुरे सदन मे भुकंप आ जायेगा",और वाकई वे ऐतिहासिक कारनामा काग्रेंस के राहुल गाँधी ने कर दिखाया. भारतिय स्वतंत्रता के बाद मेरी जानकारी मे कभी भी--"इतने बड़े देश के सदन मे इतना भयंकर और भिषण भुकंप नही आया".
और भुकंप भी ऐसा आया कि--"काग्रेंस खुद अपने ही रिऐक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता का आकलन नही कर पा रही". इसके चपेट का आलम ये था कि--खुद प्रधानमंत्री मोदी इस सुंदर और कलात्मक भुकंप को काफी देर तलक समझ नही पाये और जब तलक समझ आया तब तलक--"काग्रेंस के भुकंप यानी आदरणीय राहुल गाँधी अपना काम कर चुके थे".
                         बेबाकी तो उनकी पुरे सदन मे देखते बन रही थी खुद को पप्पू तलक कहते हुये भी उनके चेहरे पे कही से भी जारा सा सिकन नही था,लेकिन अब बेचारे राहुल करते भी तो क्या? खुद अपने ही मुखारबिंद से पप्पू कह बैठे तो उस शब्द की गरिमा का भी ध्यान रखना था अतः इसी शब्द को प्रमाणित करने हेतु वे अचानक से उठे बीना किसी तरह के आव-ताव देखे--"झट प्रधानमंत्री के गले लग पड़े और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी खुद को इस अप्रत्याशित भुकंप से बचा नही पाये".
जब थोड़ा सा इस गले आ पड़े भुकंप से राहत मिली तो पुनः प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने--"बड़े आदर से इस काग्रेंस के भुकंप से हाथ मिला कर जोशो-खरोश के साथ राहुल की पीठ थपथपाई".
ये भुकंप फिर बड़ी अदा से अपनी उस सीट की तरफ बढ़ा जिसपे बैठ उसने इतने बड़े सदन की गरिमा को अपनी हरकत से चार चाँद लगाया था. मैने भी जिंदगी मे पहली बार एक विपक्ष व राष्ट्रीय पार्टी के सर्वेसर्वा को इतने जाँलि मुड मे देखा सच क्या वे पल था--"कि अभी तलक वे भुकंप का झटका खुद मुझे महसूस हो रहा".
उनके वे आँख मारने की अदा ने--सदन को बेशक शर्मिंदा किया हो पर कालेज के उन छात्र व छात्राओं को जैसे--"उन्होंने रिवाइटल की गोली दे दी हो". उफ! कितना कौमार्य था उनके आँख मारने की उस अदा मे ये वे भुकंप है जिसकी चपेट मे आये व्यक्ति का जीवन धन्य होता है. राहुल गाँधी को मै प्रधानमंत्री होने की तो अभी नही पर---"हा मै विवाह के एक पहुँचे हुये नास्त्रेदमस की तरह ये भविष्यवाणी जरुर करता हूँ कि इनके मानसिक व शारिरीक भुकंप को सह पाने वाली एक अदद पत्नी की आवश्यकता है".
अब हालाँँकि राहुल गाँधी के इस भुकंप की राजनैतिक गलियारे मे लोकसभा चुनाव तक चर्चा व परिचर्चा होगी तमाम प्रिंट मिडिया और इलेक्ट्रॉनिक मिडिया --"अपने-अपने टीआरपी के लिहाज से भुकंप के इस मोमोज को विथ चटनी परोसेंगे पर राहुल की मुन्नाभाई वाली झप्पी इनमे हमेशा इतर रहेगी".

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जौनपुर---222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.---7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Wednesday, 22 July 2020

कविता---(सखी हे रे बदरवा )

तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा,
करे छेड़खानी सखी छेड़े बदरवा।

सिहर-सिहर जाऊँ शरमाऊँ इत-उत,
मोहे पिया की तरह सखी घेरे बदरवा,
तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

चुम्बन पे चुम्बन की है झड़ी,
बुँद-बुँद चुम्बन सखी ले रे बदरवा,
तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

अँखियो को खोलु अँखियो को मुँदू,
जैसे मेरी अँखियो में कुछ सखी हे रे बदरवा,
तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

मेरी यौवन का आँचल छत पे गिरा,
मेरी रुप का पढ़े मेघदुतम सखी हे रे बदरवा,
तन मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

###हिन्दी प्रतिलिपि में इस रचना को प्रकाशित 
करने के लिये मै विणा वत्सल सिंह जी का तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ।

Monday, 20 July 2020

(चरागों की रात )

(चरागो की रात)
लफ्ज़ो की नदी मे घिर गयी है किश्ती,
मै कहां ढुंढु!है कहां किनारो की रात।
ना कोई दर,ना ठौर,ना ठिकाना,
कैसे लिखूँ कि कहां गुजरी है मेरी बहारो की रात।
महकते फूलो की खुशबू ना राश आ रही,
कितनी मनहुस लग रही है-----
चमकते सितारे की रात।
एक सील-सीला लिये है गम जो,
ना खत्म हो रहा-------
कैसे लिखूँ बजती बाँसुरी और पहाड़ो की रात।
वे कहकशे,वे शायरो की महफ़िल छीन गयी,
अब याद है बस कुछ मुशायरे की रात।
तु लौट आ ऐ दिल उस आसमाँ से------
तेरे इंतज़ार मे है किसी के चरागो की रात।

@@मरहूम नीरज साहब को अपनी मौसकी का एक सलाम।

Wednesday, 15 July 2020

कविता---(पन्द्रह अगस्त )

(पन्द्रह अगस्त)
एक माँ----------------
अपने दुध-मुँहे बच्चे का पेट भरने के लिये,
लूट के आई है अस्त-ब्यस्त,
क्या?एैसे ही देश मे-----------
हम मनाते है पन्द्रह अगस्त।
फिर रहा युवा--------------
डिग्रीयो की लाश लिये काँधो पे,
माँ बहन की आबरु चिथड़ो में लिपटी है,
बाप टी बी से खाँस रहा,
कहां है इनका वंदेमातरम,
कहां है इनका पन्द्रह अगस्त।
देश के रहनुमा वे है,
जिन्हे मादरे-तमीज़ तक नही,
फहरा के लौटे तिरंगा---------
बंद कमरे में खुली शराब की बोतल,
बगल में सोफे पे गिरी गाँधी टोपी,
अस्त-ब्यस्त खद्दर की धोती,
वाह!क्या खुब क्रांति है,
ये है वर्तमान भगत सिंह-----
और इनका है पन्द्रह अगस्त।

###पन्द्रह अगस्त के प्रकाशनार्थ पत्रिका में छपने हेतु भेजी गई एक रचना।

कविता----(शराब नही लेकिन )

(शराब नही लेकिन)
तेरी सरिया मे शराब नहीं लेकिन-----------
हम पीने वालो के लिये खराब नही लेकिन।
हम बाँट लेते है अक्सर नशे मे जूठन भी-----
यहाँ के पंडित और मियाँ का जवाब नही लेकिन,
तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन।
ना वे गीता जानता है और न मै कुरान की आयत,
जबकि उसका घर मंदिर की तरफ है,
और मेरा घर मस्जिद की तरफ है,
हमारे लिये जुम़ा और मंगलवार एक सा है,
हम पीते है,किसी दिन का हमारे पास एै"रंग"-----
कोई हिसाब नही लेकिन।
तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन,
हम पीने वालो के लिये खराब नही लेकिन----
तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

कविता---(फिर घिरे आज बादल )

(फिर घिरे आज बादल)
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।
है तेरी हुस्न के ये बादल भी मारे,
ये जाना सनम--------------
जब तुम्हे चुमने की हसरत लिये,
आपस मे ही खुद भिड़े आज बादल।
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।
मांगा सभी ने पानी मगर,
ना सुनी बादलो ने-------
किसी की दुआ!
वे तो तुम थी हमारे शहर में सनम,
जो बूँद बनकर ज़मी पे गिरे आज बादल।
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।

###हमारे शहर में आज लगातार बादल घेरे हुये है अब बरसात कितनी होती है ये बात की बात है।

Monday, 13 July 2020

कविता----(मेरी कविता की बुढ़िया )

(मेरी कविता की बुढ़िया)
मेरी कविता की बुढ़िया उदास है,
विदेश मे रहते है इसके बेटे और बहु,
इसका पुरा मकान खाली है।
वे देखो आँगन और सुखी तुलसी,
और किनारे खड़ी----------------
बिल्कुल बुढ़िया के दिल की तरह,
टुटी चारपाई,
जिसपे वे ठंड के दिनो मे,
गुनगुनी धूप मे सरसो के तेल की,
घंटो बेटे की किया करती थी मालिश,
आज उसी तेल की कटोरी में,
उसके वात्सल्य का अरमान खाली है।
वे देख रही है एकटक------------
दिवाल पे टंगी अपने बेटे के बापु की,
वे धूल भरी फोटो!
फिर बुदबुदा के लौटती है बीना रोये,
जैसे पढ़ लेगे फोटो से ही,उसके बापु
उसका दर्द उसकी पिड़ा!
आँखो में उसके अब तुफान खाली है।
अभी पिछले ही दिनो,
मेरी कविता की ये बुढ़िया बिमार हुई है,
अब न बचेगी!
इसकी हिचकियाँ और बार-बार
दरवाजे की तरफ तकना,
वही हुआ बुढ़िया मर गई,
मेरी कविता तो पुरी हो गई,
पर उसके विदेशी बेटे और बहु नही आये,
जहाज़े आती और जाती रही,
एै,रंग------फिर भी हर ऐयरपोर्ट पे,
मेरी कविता की बुढ़िया उदास खड़ी है।

###मेैने ये रचना कमेंट और टिप्पणी के लिये नही लिखी है इसे कमही लोग पढ़े पर पुरी रचना पढ़े इसका लास्ट इस रचना का प्राण है ये बिदेश मे रह रहे उन तमाम बेटे और बहुओ के ऐहसास के उस मौत से है,जहाँ पर मेरी कविता की ये बुढ़िया अर्थात एक माँ का वात्सल्य दरवाजे पे मुँदती हुई अपनी आँखो से एक मर्तबा बस बेटे को देख भर पाने का मोह लिये दुनिया छोड़ देती है,ये मेरे लेखन की एक सदा है या मालिक ये सदा 
गर इस तरह के एक बेटे के कान तलक भी गई तो मै समझुगा की ये मेरी इस रचना की पुर्णता हुई।

Thursday, 2 July 2020

कविता---(पहला सावन था )

(पहला सावन था)
जब तुम भीगे थे,मै भीगी थी
वे पहला सावन था।
सिहर के तेरे सीने से,
शर्मा के लिपटी थी
वे तेरी बाँहो का,मेरी बाँहो से-----
पहला सावन था।
तुमने होंठो पे रंखा था,होंठ मेरे
वे तेरी होंठो का,मेरी होंठो पे-----
पहला सावन था।
तुम बूँद-बूँद भीगे थे,
मै साँस-साँस भीगी थी----
वे तेरी साँसो का,मेरी साँसो से
पहला सावन था।
जब तुम भीगे थे,मै भीगी थी------
वे पहला सावन था।

###आज हमारे शहर के बरसात की रोमानियत है ये।

Wednesday, 1 July 2020

कविता--(आखिरी सेल्फी )

(आखिरी सेल्फी)
तुम्हे-------------
कहा था कई मर्तबा,
पर तुम माने कहां,
रोज खिचते रहे-------
हमारी और अपनी निजी पलो की सेल्फी।
आज वे सभी शहर में वायरल हो गये,
मै नंगी गुजर रही हूँ सड़क से,
हर भूखी आँख देख रही है जैसे,
तुम्हारे द्वारा ली गई-------------
सहवास के पलो की वे सारी सेल्फी।
काश तुम मान गये होते!
तो आज ख़ुदकुशी न करती,
और न छोड़ती अपने सिरहाने,
तुम्हारे लिये मै-----------
अपनी आखिरी सेल्फी।
देखना ता उम्र-----------
अपनी डबडबाई आँखो से,
मै तुम्हारे बहुत पास रहुँगी,
कभी डिलिट नही होगी तुम्हारी जेहन से,
ये हमारी आखिरी सेल्फी।

###आधुनिकता नितांत आवश्यक है पर आजकल कुछ घटनाये रोंगटे खड़ी कर दे रही है सेल्फी के द्वारा हमने एक भाव व्यक्त किया है,मेरा उद्देश्य किसी का समर्थन या विरोध नही है,धन्यवाद।