Monday, 30 June 2025

एक खूबसूरत फिल्म थी

(एक खूबसूरत फिल्म थी)
मेरी हर एक साँस,मेरे दिल में थी,,,,,,,
वे मेरी आँखो के कैमरे मे थी।
ऐ,रंग----बाद मे जाना कि वे बेवफा---
बस एक खूबसूरत फिल्म थी।

Sunday, 29 June 2025

राग मल्हार सा गया गाता हूं

(राग मल्हार सा गाता हूँ)
घीर आते है बादल,बरसात बहुत होती है,,
ऐ,रंग----------------
जब मै उसे,राग मल्हार सा गाता हूँ।

कामायनी की तरह पढ़ो

("कामायनी" की तरह पढ़ो)

धूल की एक मोटी परत सी जम गई है
तेरे जाने के बाद,

मैंने भी पलटे नहीं 
अपनी जिस्म के पन्ने,

आओ तुम मुझे 
दूर तलक ले चलो,
मेरे मनु---

और
अगले प्रलय तक
तुम मुझे 

"कामायनी" की तरह पढ़ो.

✍️✍️यह मेरे द्वारा स्व-रचित व अप्रकाशित है इसका बिना मेरी अनुमति के कही अन्य फेसबुक पर ना लगाए अगर शेयर भी करे तो पूर्णतः मेरे नाम और पते के साथ 🙏🙏

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)

Saturday, 28 June 2025

ज्यादा देवता मिलते हैं

(ज्यादा देवता मिलते है)
हाँ!मै तलाशता हूँ------------
अँधेरी रात में आवारा गज़ल,,,,,,,,,,,
क्योकि ऐ,रंग------------
उजाले में ज्यादा देवता मिलते है।

इस्लाम और मां

(इस्लाम और माँ)
ऐ इस्लाम़ के चंद काफ़िरो!
तुम्हारी बेज़ा फतवो से---
इसकी ईज्जत कम नही होती।
क्यूँकि ऐ,रंग--------
मूल्क़ वे मुकद्दस माँ है,
जो कभी मज़हब नही होती।

@@कुछ तथाकथित बेज़ा फतवे के खिलाफ ऐक सच।

(इश्क करके)

(इश्क़ करके)

ना पढ़ सकी कोई किताब, 
मै इश्क़ करके.

मै औरत सुफि हो गई 
इश्क़ करके.

मौलाना और तकरीरे मस्जिद, 
तुम्हे मुबारक!
मै खुद हो गई----
मुकम्मल मुसलमान 
इश्क़ करके.

ये हिज़ाब,ये परदे,ये चारदीवारी 
कैद है औरत की,

तुम क्या निकालोगे इस कैद से मुझको,
मै खुद ही छोड़े जा रही,
अपने जिस्म का मकान, 
ऐ,रंग-
इश्क़ करके. 

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (उत्तर-प्रदेश ).

व्यंग्य

😄😄बेचारे गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे है,,बस ले देकर किसी तरह उनके पास एक स्मार्ट फोन,एक फूल स्क्रीन टीबी, एक वाशिंग मशीन और एक मोटर साइकिल भर है बस 😃😃

Thursday, 26 June 2025

व्यंग्य

😀😀अगर आपके दिन की शुरुआत पत्नी के हंसने और मुस्कुराने से हुई है,,तो उस दिन आपको अपने राशिफल के बारे मे जानने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है😃😃

Wednesday, 25 June 2025

(रोटी किस कौम की है)

(रोटी किस कौम की है)
भरे पेट हिंन्दू-मूसलमां होना आसान है,,,,,
पर ऐ,रंग---किसी भूखे से पुछ------
कि उसकी रोटियाँ किस कौम की है।

(जुल्फों में बांध लेती है)

(जूल्फों में बांध लेती है)
उतरते है,घिरते है उसकी जूल्फों की तरफ बादल,
और वे इन बादलो को-------------
अपनी जूल्फों में बांध लेती है।
वे हुस्ऩ-ए-ज़ीनत है शहर की,
लोग तकते है उसके छत की तरफ,
वे उम्मीद-ए-बरसात है,
जो एक अदा से------------
अपनी जूल्फ़ो में सावन बांध लेती है।
है तैरने भर का पानी उसकी आँखो में,
ऐ,रंग-------------------
वे हम शायरो का सागर भी,
अपनी जूल्फ़ो में बांध लेती है।

(भूख ने अपना बदन बेचा है)

(भूख ने अपना बदन बेचा है)

✍️✍️स्याह अँधेरी रात में सन्नाटे को चीरती,
पुलिया के उस तरफ की चीख,
उफ!शायद ऐ,"रंग"
फिर भूख ने किसी को,
अपना बदन बेचा है😢😢

Monday, 23 June 2025

युद्ध

युद्ध 

भाविका मम्मी के साथ टीबी वाले कमरे में बैठी थी कि तभी न्यूज चैनल में एक हंसती मुस्कुराती हुई छोटी सी बच्ची दिखाई पड़ती हैं तभी कुछ देर बार अचानक से वहां बम गिरा और उस मासूम बच्ची के परखच्चे उड़

अखबार भी धंधे की तरह है

(अखबार भी धंधे की तरह है)
सच लिखने की कुबत न रही,,,,,,,,,,,,,
अब इस मूल्क में ऐ,रंग---------
अखबार भी धंधे की तरह है।

एक बांझ औरत

(एक बाँझ औरत)
एक बाँझ औरत---------------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।
क्या करती----------
सास,ससुर,शौहर की उम्मीदे उसपे तलाक का डर,
वे भीगी आँख------------
इस दर पे अपना घर बचाने आ गई।
एक बाँझ औरत--------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।
औरत को तो ये भी हक नही कि वे कह सके,
कि बाँझ वे नही!
एै! पीर उठ और जग इस मज़ार से,
और देख एक औरत----------
अपने शौहर का मज़हब बचाने आ गई।
एक बाँझ औरत--------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

मोहब्बत को विज्ञान मान ले

(मोहब्बत को विज्ञान मान ले)

ए दुनिया 
मोहब्बत को विज्ञान मान ले,

क्योंकि चाहने वाले
ख्व़ाहिशो की लैब में,,,
ए,"रंग"--
खुद को मिटा कर के
प्रैक्टिकल देते हैं.✍️✍️

कथन

✍️✍️"कोठे पर सरकारी ताले तो लटक गए,,, लेकिन जिस्म के तवे पर खुदरी रोटियों की बेवा अपनी भूख को कौन सी सलवार पहनाए "🥲🥲

Wednesday, 18 June 2025

बनारस की चाची मर गई

कल एक माँ का घर टूटा है 
     चंचल 

चाची कि दुकान 

ख़बर है - लंका (बनारस ) में चाची की और पहलवान की दुकान तोड़ दी गई । सरकारी बुलडोजर और मजदूरों के चले हथौड़े चाची की दुकान पर नहीं , काशी विश्व विद्यालय के छात्रों की पीठ पर गिरे हैं । यह कोई युक्ति या तंज नहीं है , यही हकीकत है । चाची केवल कचौड़ी , तरकारी या जलेबी भर नहीं देती थी , साथ में जबरदस्त गालियाँ भी देती थी । शब्दों की तहक़ीक़ात की जाय तो कई दफ़े गालियों की तासीर जलेबी के सीरे से भी ज़्यादा मीठी मिलेगीं । गालियाँ बनारस की मान्यताप्राप्त कुटीर संस्कार है । चाची तो फिर भी एक संस्थान थी , जिस पर दैश के उस हर हिस्से में चाची की गालियां ज़ेरे बहस होती आ रही हैं जहाँ विश्व विद्यालय से पढ़ कर निकला एक भी छात्र होगा । इसी अनुपात में विदेशों में भी चाची चर्चित है । चाची का एक बेटा काशी विश्वविद्यालय में ओहदेदार है , उससे दरियाफ़्त करिए चाची के इस बेटे की पूरी तनख़्वाह विदेशों से आते ख़तों के जवाब देने में खर्च होते रहे । हम और हमारे जैसे अनगिनत लोग मिल जाएँगे जो नियमित रूप से चाची की गाली सुनने जाते थे । इनमें डॉ निर्मल , डॉ मलिक , महावीर , वगैरह ऐसे लोग रहे जो चाची की बनाई कचौड़ी और जलेबी उधार में तो खाते ही थे , सिगरेट का नकद पैसा भी लेकर हटते थे । हम कई बार चाची की गाली “झेले” हैं । दो एक की बानगी सुनिए । 78 का वाक्या है हम छात्र संघ अध्यक्ष पद से मुक्त हुए थे । हम विश्वविद्यालय के मल्टी फ़्लैट में रह रहे थे । हमारे बगल में एक स्काटिस लड़की रहती थी , मेव मुहिन । वह यूनेस्को और वर्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन की तरफ़ से - वह भारत के परिवार नियोजन की विफ़ताओं पर काम कर रही थी , एक दिन उसने प्रस्ताव रखा कि तुम हमारे प्रोजेक्ट के स्केचेज तैयार कर दो । हमसे अच्छी दोस्ती हो गई । एक दिन उसने प्रस्ताव रखा - चलो चाची की दुकान पर कचौड़ी खाया जाय ! 
    - चचिया गाली भी देती है जानती हो कि नहीं ? 
   - जानती हूँ इसी लिए तो कह रही हूँ 
  - तुम जानो तुम्हारा काम जाने ! चलो 
और हम रिक्शे पर बैठ कर सामने दुकान पर रुके ही थे कि चाची की निगाह पड़ गई । कचौड़ी बेलते - बेलते चाची ने पहला जुमला सुनाया - 
     - का रे ! ई अंग्रेज़ कहाँ से फँसाये ? 
हम कुछ बोलें इसके पहले ही मेव ने भोजपुरी में जवाब दिया - चाची ! ई हमे ना फँसाये , हम ही इन्हें फँसाये हैं । चाची हँसने लगी - ई त हिंदी बोले ला रे ! ले कचौड़ी खा । इस तरह चाची की दोस्ती मेव मुहिन से हो गई । लंदन वापस जाने के बाद भी चाची और मेव में खतो किताबत जारी रहा । 
    दूसरा वाक़या हुआ काका यानी राजेश खन्ना के साथ । एक साँझ हम काका के साथ बैठे थे कि अचानक काका ने कहा - साहिब बनारस घूमने का मन है , तैयारी होने लगी , पूरी फ़ेहरिस्त बनी कहाँ कहाँ और किस किस से मिलना है । बाबा विश्वनाथ दर्शन , चाची की कचौड़ी , केशव का पान , असलम ( हमारे दोस्त असलम परवेज ) के घर बिरयानी , डॉ नजीर बनारसी के घर उनसे मिलना वगैरह वगैरह । फिर विंध्याचल । पंडा कौन होगा वह भी तय हो गया हमारे मित्र रति शंकर जी की सारी जिम्मेदारी होगी । काशी की वह यात्रा बहुत बढ़िया हुई । झाम फँसा चाची की दुकान पर , जब हम चाची की दुकान पर पहुँचे तो अच्छी भीड़ थी , ज्यों हम गाड़ी से उतरे और चाची की तरफ़ बढ़े तो चाची ने एक नज़र से हम सब को देख लिया । कचौड़ी तलते - तलते ब आवाजे बुलंद बोली - का बे चंचल ! भोसड़ी के ! ई राजेश खन्ना के कहाँ घुमावत बाड़े ? भीड़ हल्का बक्का । काका को हम पहले ही बता चुके थे चाची के बारे में । सबसे बड़ी गाली काका को और उनके साथ आए नरेश जुनेजा को , । नरेश जी की गलती रही वे पेमेंट के लिए अपना बटुआ निकाल लिए थे । 
     - भो स के तोर औकात बा कचौड़ी के दाम देवे क ? किसी तरह हम वहाँ से निकले । चाची ने फिर रोका - केशव पान के हियाँ जात अहे ? राजेंदरवा ( केशव पान के मालिक राजेन्द्र ) भो के बड़ा कंजूस है ले पैसा देई दिहे । कहते हुए चाची ने दस रुपये गल्ले से निकाल कर काका के बढ़े हुए हाथ की गदोरी पर रख दिया । काका ने उसे माथे से लगाया - चाची यह दस रुपये अब हमारे साथ रहेगा ता उम्र । उन दोनों के अलावा कइयों की आँख नम हो गई थी । 
     चाची लाखों की माँ रही । आज जब प्रशासन का बुलडोजर दुकान तोड़ रहा होगा तो बनारस चुप क्यों रहा ?

(तमाशे करता रहा)

(तमाशे करता रहा)
मै--
अपने ही चेहरे पे तमाँचे करता रहा,,,,,,,
ऐ,भूख मै तेरी खातीर----------
पुरे शहर में तमाशे करता रहा।

Monday, 16 June 2025

(इज्जत कि है)

(औरत की इज्ज़त की है)
हाँ!इस ब्राह्मन ने-------------------
इस शहर की मशहूर फिरदौस से मोहब्बत की है,
कोई गुनाह नही-----------------
हमने तो बस एक औरत की इज्ज़त की है।
माँग भरा है-----------------
उसे निकाल कर इस गलिज़ गली से,
उसके नाम हमने----------
एक मकान और पुरी छत की है।
कोई गुनाह नही---------------
हमने तो बस एक औरत की इज्ज़त की है।
मै श्लोक पढ़ता हूँ----------------
वे नमाज़ पढ़ती है मेरे पूजे के कमरे में,
उसे ये इजाज़त ऐ,रंग----------------
मेरे मोहब्बत के शरियत की है,
कोई गुनाह नही--------------
हमने तो बस एक औरत की इज्ज़त की है।

(एक टिप्पणी)

जब तुम्हे अपनी मां और उसकी लोरी की बहुत याद आए ✍️✍️ तब अपनी यादों के कागज पर तुम "अमीर खुसरो" लिख देना🙏🙏

(वह अखबार कहा है)

(वह अखबार कहां है?)

हमारी बेरोजगारी, 
परीक्षा के निरस्त होने का समाचार कहां है?
मैंने पढ़ा नहीं,किसी पेज पर 
तैयारी करते हुए 
किसी बेटे के पिता की खुदकुशी,
अगर तुमने पढ़ा है,
तो मुझे बताओ कि 
उस तारीख का 
वह अखबार कहां है?

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, जज कॉलोनी 
मियांपुर,जौनपुर 

✍️✍️यह रचना मेरी स्वरचित है बिना अनुमति के इसे शेयर ना करें🙏🙏

Sunday, 15 June 2025

(राग झूमर सुन रहा हूं)

(राग झुमर सुन रहा हूँ)
मै उसके कान की बाली का राग झुमर सुन रहा हूं,
कंगन,बिछुवे,चुड़ियां संगत कर रही,
कोई घराना नही दिल है-----------
जिससे मै राग चाहत सुन रहा हूं,
मै उसके कान की बाली का राग झुमर सुन रहा हूं।
उसका इस कमरे,उस कमरे आना-जाना,
एक सुर,लय,ताल का मिलन है
उस मिलन से उपजी-----------
मै राग पायल सुन रहा हूं,
मै उसके कानो की बाली का राग झुमर सुन रहा हूं।
कपकंपाते होंठ सुर्खी गाल की,
तील जैसे लग रही उसकी सखी,
और कर रही छेड़छाड़ भर बदन,
उफ!उसकी उम्र के उन्माद का------
मै राग काजल सुन रहा हूं,
मै उसकी कान की बाली का राग झुमर सुन रहा हूं।
घन-गरज है,बिजलियाँ है
काँधे पे वे श्वेत आँचल लग रहा कि मछलियाँ है,
उन मछलियो के प्रेम की--------
मै राग बादल सुन रहा हूं,
मै उसके कानो की बाली का राग झुमर सुन रहा हूं।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(बिना शौहर के हो गई)

( बीना शौहर की हो गई)

मै जबसे--
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
मेंरे सूख गये अरमान
मैं पत्थर की हो गई.

क्या-क्या नही छोड़ा
खातिर उसके,
वालिद का दिल तोड़ा!
और अम्मी का यकीन

मैं कहां बसने आई थी---
भागकर घर से, 
देख लो आज मैं 
बिना घर की हो गई.

मै जबसे---
उस बेवफा सितमगर की हो गई.

सुर्ख जोड़े,हिना,आईना सिसके
अज़ीब निकाह किया मैंने 
कुबूल कर भी ए,"रंग"--
मै बीना "शौहर की हो गई".

Sunday, 8 June 2025

(आज रात)

(आज रात)
ऐ बेवफ़ा सामने बैठ और सभल आज रात,
मै पढुँगी तेरे शहर में गज़ल आज रात।
लब पे हँसी होगी दिल में आँसू ,
रोशनी लुटाऊँगी-----------------
मै चराग की तरह जल आज रात।
तड़प उठेगी चाँदनी मेरी सदा से,
पछतायेगी वे भी निकल आज रात।
मै ये मुशायरा छोड़ जाऊँगी,
उस बेवफ़ा के दिल में--------
ऐ,रंग----रह जायेगी एक कसक आज रात।

टिप्पणी

✍️✍️ एक मोहतरमा दिनभर अपनी फेसबुक पर मोहब्बत की इतनी कविताएं लिखती है💘♥️कि मैं सोचता हूं कि हे!भगवान अगर फेसबुक ना होता तो बेचारे उनके पति के दिल की क्या हालत होती😀😀

(केरल से लौट आई है)

(केरल से लौट आई है)

शायद जल्द ही घिर जाए,
हमारे शहर में मानसून के बादल,
क्योकि ऐ,"रंग"
हमने सुना है
कि मेरी मोहब्बत,
केरल से लौट आई है.

Saturday, 7 June 2025

पेन किलर है

(पेन किलर है)
हाँ!मेरी तबियत पहले से कही बेहतर है,,,,
क्योकि ऐ,रंग-----मेरे रुबरु-------
मेरे दिल की पेन किलर है।

टिप्पणी

✍️✍️🌹🌹 तुम आज भी मेरी यादों में प्रतिध्वनित होती हो,,मैं तुम्हें आज भी अपनी कविता की प्रेयसी और प्रेमिका लिखता हूं,,क्योंकि मेरे प्रेम के चलन में बेवफा लिखने की कोई रस्म ही नहीं है 😢😢

Friday, 6 June 2025

(हम शुकू से नहीं सोए)

(हम शुकू से नही सोये)
तड़पे सारी रात,हम चाँदनी मे रोये,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----जबसे टुटा दिल------
हम शुकू से नही सोये।

(सखी हे! रे बदरवा)

बारिश ने अचानक से रोमांटिक कर दिया----------
                     (सखी हे रे बदरवा)
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा,
करे छेड़खानी मोहे छेड़े बदरवा।
सिहर-सिहर जाऊँ शरमाऊँ इत-उत,
मोहे पिया की तरह सखी घेरे बदरवा----
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।
चुंबन पे चुंबन की है झड़ी,
बूँद-बूँद चुंबन सखी ले रे बदरवा-----
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।
अँखियो को खोलु,अँखियो को मुदू,
जैसे मेरी अँखियो मे कुछ सखी ढुढ़े बदरवा----
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।
मेरी यौवन का आँचल छत पर गिरा,
मेरी रुप का पढ़े मेघदुतम सखी हे रे बदरवा-----
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758

(हास्य व्यंग्य)

विदेशों में जितना लोग पढ़ लिखकर ज्ञानी होते हैं,उतने बड़े ज्ञानी तो आपको हमारे देश के किसी भी देशी के ठीए पर मिल जाएंगे,,इसलिए अपने ज्ञान का घमंड ना करे बल्कि अंतिम ज्ञान के लिए देशी पिए😀

Thursday, 5 June 2025

(भूख जिंदा है)

(भूख जिंदा है)
पेट तो भर गया लेकिन भूख जिंदा है,
ऐ तरक्की---------------------
तेरी आड़ में हर झूठ जिंदा है।
हरिया की लाश आज भी है लहूलुहान,
कातिलो के हाथ में बंदूक जिंदा है।
लुट रही है आबरु हर एक स्याह रात,
पुरे बदन पे अबला के ये जूठ जिंदा है।
ख़ुदकुशी कर ली कल किसान ने,
ऐ,रंग-----आज अखबार में
उसकी कर्ज माफी और छुट जिंदा है।
पेट तो भर गया लेकिन भूख जिंदा है।

###इस रचना को पुरा पढ़े ये अनुरोध है।

(ईदी मांगती हैं)

(ईदी मांगती है)

दो दिन से भूखी बच्ची---
कुछ दे दो,दीदी
मांगती है.
गरीबी वे शै है,---
जो हर रोज,
ईदी मांगती है.
उसके नन्हे-नन्हे पांव,
दूर निकल आते है,
उसकी थकन फिर चल पड़ना,
उफ!! कलेजा हिल जाता है,
जब किसी दरवाजे पे
अपनी चारपाई पे पड़ी,
बीमार मां के लिए,
एक फटी ,---
धोती मांगती है.
ऐ"रंग"-गरीबी वे शै है,---
जो हर रोज,
ईदी मांगती है.

@@ रंगनाथ द्विवेदी
## 7800824758

(शकुनि मामा उर्फ गुफी पेंटल)

(शकुनी मामा उर्फ गुफी पेंटल)

महाभारत
के किरदार का शकुनी 
बेशक वक्त और समय के पासे से हार गया.
लेकिन 
उसके भांजे कहने की वे स्टाइल 
वह अदा
जेहन में जिंदा है.

वे सच मे
एक पूरी दौर का मामा था 
जिसने महाभारत में
अपने भांजो के हक में 
द्रोपदी को जुए में जितने 
के सारे पासे,फेके.

वह सिसकती फ़रियाद करती द्रोपदी
वे चीर खींचते दुशासन
वे मामा के होठों की तिर्यक मुस्कान
ओर भांजे कहने के 
दृश्य सामने आ गए .

लेकिन समय के साथ 
उसके भांजों के लिए फेके पासे 
मनहूस हो गए 
वे नाटक था
किरदार था,झूठ था उसका 
लेकिन गुफी पेंटल,
केवल गुफी पेंटल नही
वे हम भांजों की जूए फड़ का
उस्ताद था.

लेकिन उसकी जिंदगी के पासे  
को इस मर्तबा
ईश्वर के दूतो ने
उसकी फड़ के बाहर फेक दिया,
तुम्हे आखिरी विदाई
हम सभी के महबूब गुफी पेंटल.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर,222002 (U P)
mo.no.7800824758

(वृक्ष को बेटियों की तरह पाले)

(वृक्ष को बेटियों की तरह पाले)

प्यार,दुलार और स्नेह की खाद चलो डाले,,
ऐ,रंग-आओ हम वृक्ष को 
बेटियो की तरह पाले.

Tuesday, 3 June 2025

(हां! मैं भी बुनकर हूं)

(हाँ!मै भी बुनकर हूँ)
हाँ!मै भी बुनकर हूँ------------
तुम तिनका-तिनका कालीन बुनते हो,,,,,,
और मै शब्द-शब्द गीत बुनता हूँ।
हाँ!मै भी बुनकर हूँ।

(पत्थर की हो गई)

(पत्थर की हो गई)
मै जबसे---------------
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
सूख गये अरमान मैं पत्थर की हो गई।
क्या-क्या नही छोड़ा खातिर उसके,
वालिद का दिल तोड़ा!
बसने आई थी मैं बेघर की हो गई।
मै जबसे---------------
सुर्ख जोड़े,हिना,आईना सिसके
ये अज़ीब निकाह है देखो,
कुबूल कर भी ऐ,रंग----------
मै बीना शौहर की हो गई।
मै जबसे--------------
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
सूख गये अरमान मैं पत्थर की हो गई।

(बिना शौहर की हो गई)

( बीना शौहर की हो गई)

मै जबसे----
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
मेंरे सूख गये अरमान
मैं पत्थर की हो गई.

क्या-क्या नही छोड़ा
खातिर उसके,
वालिद का दिल तोड़ा!
और अम्मी का यकीन

मैं कहां बसने आई थी---
भागकर घर से, 
देख लो आज मैं 
बिना घर की हो गई.

मै जबसे---
उस बेवफा सितमगर की हो गई.

सुर्ख जोड़े,हिना,आईना सिसके
अज़ीब निकाह किया मैंने 
कुबूल कर भी ऐ,"रंग"--
मै बीना "शौहर की हो गई".

ट्रेन हादसा

(उड़ीसा के आंसुओं वाली ट्रेन)

ऐ उड़ीसा--
तेरी यह आंसुओं वाली ट्रेन 
हमे याद रहेगी,
ना भूलूंगा क्योंकि
इस हादसे की मरसिया 
नीरज की तरह 
अब हमारे पास रहेगी.

मैं जानता हूं कि
तेरी फाइलों में गुम हो जाएगा यह दर्द 
तू सरकारी महकमा है,
पर जीना है उन घरों को यह हादसा
उनके दिलों में आंसू रहेगा और
ता-उम्र चेहल्लुम की यह रात रहेगी.

ऐ उड़ीसा-
तेरी पटरियों से होकर फिर गुजरेगी ट्रेन
फिर उतरेंगे चढ़ेंगे मुसाफिर
तेरी कानों में
हर रोज एक नई आवाज रहेगी.

ऐ उड़ीसा--
तेरी यह आंसुओं वाली ट्रेन
हमें याद रहेगी.

✍️✍️वैसे इस भाव श्रद्धांजलि में एक जगह मैंने मरसिया शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ "शोक गीत" से है.
😢😢😢😢😢😢

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758

Sunday, 1 June 2025

(चुनावी दलितनाना)

(चुनावी दलितनामा)
1------------
अयोध्या छोड़ अब काशी आ रहे है,
चोला बदल के सियासत के संन्यासी आ रहे है।
ऐ,रंग-----महिनो चलेगा इनका ये कुम्भ,
कुर्सी के भक्त बनके कल्पवासी आ रहे है।
                 (2)
पहले राम ठिकाने लगे है,
सावधान हो जाओ-------
हे!लोकतंत्र की शबरी,
ये तुमको दलित बता------
अब तुम्हारे घर खाने लगे है।
पहले राम ठिकाने लगे है।

@@@ये साहित्यकार की अभिब्यक्ती है इसका आशय किसी पार्टी से जुड़े ब्यक्ति को आहत करना नही है,गर संयोग वस ऐसा है तो मै पहले ही इसके लिये क्षमा मांग लेता हूँ।