Thursday, 30 September 2021

(सीता का पिंड़दान)
कितनी विविधता समेटे है-----
अपना ये हिंन्दुस्तान,,,,,,,,,,,,
कौन भूल सकता है आखिर ऐ,रंग-----
वे रेत के गोले से दशरथ व उनके पितरो को---------
अर्पित सीता का पिंडदान।
पितरो को हमारी श्रद्धा के चंद पुष्प।

Sunday, 26 September 2021

आज, रश्मि प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशित वरिष्ठ कहानीकार राम नगीना मौर्य का साहित्यिक अनाउंसमेंट  मुझे जैसे जनपद जौनपुर के साहित्यकार के कान से होते हुए दिल तक पहुंची. 

आइए हम आप आज की जिंदगी और उसकी कहानियों के  "चारबाग स्टेशन" से उस साहित्यिक अनाउंसमेंट को सुने जहां से ये कहानियां कह रही है------

"यात्रीगण कृपया ध्यान दे ".

धन्यवाद, बड़े भैया आज आपका ये बेशक़ीमती कहानियों का शाहकार प्राप्त हुआ.

Saturday, 11 September 2021

(अच्छे दिन आ गये)
चचा---------
साठ की उम्र में
तीस वाली को पटा गये,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----नौजवानो से ज्यादा----
तो बुज़ूर्गो के अच्छे दिन आ गये।

Wednesday, 8 September 2021

(तेरे शहर में)
तेरे शहर में--------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।
ले लेना तुम हमारी गज़ल का जर्रा-जर्रा,
कोई बंदिश नही----------
यहाँ जाफ़रान की खुशबू है हर शख्स़ की खातिर,
यहाँ न कोई कौम न मज़हब और----------
ना ही सरियत है।
तुम्हारें शहर में--------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।
आहिस्ता-आहिस्ता उतरेगा जे़हन मे तेरे,
इन लफ्ज़ो का गुलाबीपन,
मै याद आऊँगा तुम्हारें शहर को,
यहाँ से जाने के बाद भी,
क्योंकि मोहब्बत ही एै "रंग"--------
इस अदब के दिवान की नियत है।
तुम्हारें शहर में------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

Tuesday, 7 September 2021

तुम बेरोजगारी को,
समझ नही सकते
क्योंकि तुम्हारें सदन में शिवा
झूठे आकड़ो के
है क्या?


Thursday, 2 September 2021

(मै लिखता हूँ कोई गीत)
जब बेचैन कर देता है------------
मेरे अंदर का मरुस्थल मुझको,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
शब्द के होंठ पे चुभती है कोई नागफनी,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब पथ की रेत पे-----------
चलता जाता हूँ दूर पथिक सा
और फूट जाते है पाँव के छाले,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
बहुत सन्नाटा मेरे भीतर का,
उधेड़ता है मुझको---------
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
बोता हूँ रेत पे कुछ शब्द,
पर कटिले वृक्ष के विरवे ही पनपते है,
उन्ही वृक्षो की------------
खरोंच जब आ जाती है बन के पीर,
तब मै लिखता हूँ कोई गीत।

Wednesday, 1 September 2021

(एक जिंदा दिया हूँ)
ताउम्र अपनी मै जल-जल के जिया हूं,
मै आदमी नही-----------
एक जिंदा दिया हूँ।
तमाम खराशे है,है तमाम सिलवटे
उधड़ा रहा मै----------
किसी मुफ़लिस के बिछौने सा,
हर जख्म जिंदगी का-------
मै खुद से सिया हूं।
मै आदमी नही--------
एक जिंदा दिया हूँ।
हु मै एक एैसा सजायाफ्ता,
जो रो नही सकता!
खौलते है आँसू मेरे दिल के अंदर,
मै कभी बहार में नही-------
खिजा़ में जिया हूं।
मै आदमी नही------
एक जिंदा दिया हूँ।
(दिवाली नही आई)
भरपेट भोजन की थाली नही आई,
कुछ एैसे भी घर है----------
जहां दिवाली नही आई।
रो रही घर में---------
तक-तक के दरवाजे को भूखी बेटिया,
उन्हे अपनी माँ की बुलाती आवाज़,
प्यार भरी थपकी,
छोटी बिटिया के खुशीयो की------
वे ताली नही आई!
अभी तलक----------
लौट कर इस घर की दिवाली नही आई।
सुबह के धुधलके में--------
दो पुलिसिये चादर में लपेटकर,
लाये थे नग्न लाश!
बेटिया डर गई,
एकटक देखा कि कौन है?
फिर माँ कह झिंझोडा--------
लेकिन उसकी माँ की खुली आँखो ने तका नही,
पहली बार-उसकी माँ के चेहरे पे
कोई लाली नही आई।
ये बेटिया क्या जाने?
कि करोड़ो के पटाखो में दब गई,
इनके माँ की सिसकिया!
देख लो आज तुम भी मेरी कविता,
इसके बदन पे हवस के निशान-----
ये आज भी अपने घर खाली नही आई,
ये और बात है कि----------
इसके घर कोई दिवाली नही आई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

----शायद कुछ एैसे वंचित घर है जहां दिवाली नही आती,फिर भी ईश्वर हर घर को रौशनी दे।
(एकलौता दीया सरहद पर रख दिया है)
और घर रौशन हो---------------
इस खातिर माँ ने अपना एकलौता दीया,
सरहद पे रख दिया है।
वे दिवाली की रात छत पे खड़ी है,
बहु रखे जा रही मुंडेर पर दीये,
माँ जानती है कि बहु ने भी तो,
अपने अमर-सुहाग का दीया------
सरहद पे रख दिया है।
और घर रौशन हो---------
इस खातिर माँ ने अपना एकलौता दीया,
सरहद पे रख दिया है।
पोते भी बस दिखाने को खुश है,
पटाखे और रौशनी के धुँये को माँ तक रही,
जानती है कि उसके मासूम पोतो ने,
अपने पापा के प्यार का दीया-----------
सरहद पे रख दिया है।
और घर रौशन हो-----------
इस खातिर माँ ने अपना एकलौता दीया,
सरहद पे रख दिया है।

@@@उन तमाम सरहद के दीयो को मेरी लेखनी का प्रणाम जो हमारी और मुल्क की रौशनी के लिये सरहद पे खड़े है।----वंदे मातरम।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
(मेरी किस्मत मे ये जागना आया)

उन्हे कहा, 
कभी हमे चाहना आया.
मेरी ख्व़ाहिशो को रौदा, 
बस उनकी समझ मे, 
वासना आया.

मै घुटी बंद कमरे मे,
वे चैन से सोये, 
ऐ,रंग--
मेरी किस्मत मे ये जागना आया. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी
 जिला---जौनपुर, ( उत्तर प्रदेश)