Saturday, 28 December 2024

कहानी अंतिम संस्कार

*काशी में करोड़पति साहित्यकार का निधन:* 

बेटे-बेटी ने निकाला तो वृद्धाश्रम में रहने लगे; अंतिम संस्कार में भी नहीं आया परिवार
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वाराणसी के साहित्यकार श्रीनाथ खंडेलवाल का शनिवार सुबह निधन हो गया। खंडेलवाल 80 करोड़ की प्रॉपर्टी मालिक थे। उन्होंने 400 किताबें लिखीं थीं। आखिरी बाद उन्होंने दैनिक भास्कर को इंटरव्यू दिया था, जिसमें कहा था- पुराना कुछ नहीं पूछिएगा। वो सब अतीत था, जिसे मैंने खत्म कर दिया। अब नया खंडेलवाल है, जो सिर्फ किताबें लिख रहा है। जब तक सांस है, कलम चलती रहेगी।
खंडेलवाल काशी कुष्ठ सेवा संघ वृद्धाश्रम में 17 मार्च, 2024 से रह रहे थे। श्रीनाथ खंडेलवाल ने शनिवार सुबह 8 बजे वाराणसी के 'दीर्घायु अस्पताल' में अंतिम सांस ली। इसके बाद भी उनके घर से कोई नहीं आया।
सूचना मिलते ही कबीर अमन दोस्तों के साथ अस्पताल पहुंचे। साहित्यकार को मुखग्नि दी और पिंडदान किया।

*अंतिम संस्कार में भी नहीं आया परिवार*

अमन करीब ने ही हीरामनपुर के काशी कुष्ठ सेवा संघ वृद्धाश्रम में खंडेलवाल को रखवाया था। खंडेलवाल मार्च 2024 से यहां रहे रहे थे। वृद्धाश्रम के केयर टेकर रमेशचंद्र श्रीवास्तव ने बताया, उन्हें 25 दिसंबर को सीने में जकड़न, सांस लेने में दिक्कत और किडनी की समस्या के कारण अस्पताल में एडमिट कराया गया। यहां इलाज के दौरान उनका शनिवार सुबह 9 बजे देहांत हो गया।
रमेशचंद्र श्रीवास्तव ने तुरंत इसकी सूचना अमन कबीर को दी। अमन कबीर ने बताया- यहां आने के बाद सबसे पहले कमिश्नर कौशल राजा शर्मा को घटना की जानकारी दी गई। जिस पर उन्होंने परिजनों को सूचना देने को कहा।
श्रीनाथ खंडेलवाल जी के बेटे को फोन किया गया तो उसने आने में असमर्थता जताई। कहा वह बाहर है नहीं आ सकता है। इसके बाद उसकी बेटी को फोन किया गया, लेकिन उसने फोन नहीं उठाया। न ही मैसेज का कोई जवाब दिया।
अमन करीब ने बताया, इसके बाद हम लोग शव लेकर सराय मोहना घाट पहुंचे और उनका अंतिम संस्कार किया। मैंने पिडंदान के ही साथ उन्हें अजय कुमार के साथ मिलकर मुखाग्नि दी।
श्रीनाथ खंडेलवाल ने भास्कर इंटरव्यू में बताया था कि उनका बेटा बड़ा बिजनेसमैन और बेटी सुप्रीम कोर्ट में वकील है। दामाद भी वकील है। उनके पास करीब 80 करोड़ की प्रॉपर्टी है। जिसे हड़प कर बेटे-बेटी ने उन्हें घर से निकाल दिया।

दिलीप तिवारी वरिष्ठ समाजसेवी
दिलीप तिवारी समाजसेवी समर्थक

(पूस की रात)

(पुस की रात)
कहाँ कटती है-
फटे कंम्बल से,ऐ शहर गाँव मे,
पुस की रात।
हाँड़ कंप-कपाती ठंड मे,
कहाँ देख पाता है-शहर
खेत के किनारे पडे किसी-
किसान की लाश।
अखबार की बे-शरमी है,रंग-
वरना गाँव मे आज भी है,वही ठंड
और वही प्रेमचंद के-
               पुस की रात।

(दिसंबर की आखिरी रात)

(दिसंम्बर की आखिरी रात)
शकीना कलेन्डर मे लपेट के लाई है रोटी,
ऐ,रंग----इसके भूखे पेट का पागलपन देख-----
और देख हवस के खरोचो ने इसके पुरे बदन पे लिखा है------
दिसंम्बर की आखिरी रात।

(जनवरी आई थी)

जनवरी से लेकर दिसंबर तक के रोमांटिक प्यार की काब्य गाथा।
(दिसंबर बनके हमारे प्यार की ऐनवर्सरी आई थी)
कभी बन सँवर के दुल्हन सी---------
मेरे कमरे मे जनवरी आई थी।
सच वे गुलाब ही तो पकड़ा था तुमने,
जो इतने सालो से बेनुर था,
मेरी जिंदगी में-----------
वेलेनटाइन डे की रोमानियत लिये,
वे पहली फरवरी आई थी।
मार्च के महिने मे-----------
पहली बार खिले थे मेरी अरमान के गुलमुहर,
हमारे प्यार की डालियो पे कोयल कूकी थी,
वे मार्च ही था-----------
जब आम और महुवे पे मंजरी आई थी।
अप्रैल याद है---------
जब तुम मायके गई थी,
मै कितना उदास था-------
कई राते हमे नींद कहां आई थी।
फिर मई महिने ने ही उबारा था,
हमे तेरी विरह से!
इसी महिने इंतज़ार करते हुये मेरे कमरे मे---
कमरे की परी आई थी।
फिर जून की तपिस में--------
हम घंटो टहलने निकलते थे एक दुजे का हाथ पकड़े,
नदी के तट की तरफ,
वे शामे शरारत याद है और याद है वे कंपकपाते होंठ,
जब हमने अपनी अँगुलियो से छुआ था,
और तुम्हारी झील सी आँखो मे शर्म उतर आई थी।
फिर जुलाई की---------
वे घिरी बदलियां,
वे बारिश मे पहली बार तुम्हे छत पे भीगा देखना एकटक,
फिर बिजली की गरज सुन,
तुम एक हिरनी सी दौड़ी मेरी बाँहो मे चली आई थी,
मुझे भी तुम्हे छेड़ने की---------
इस बरसात मे मसखरी आई थी।
फिर पुरा अगस्त-----------
तुम्हारी बहन की चुहलबाजियो में गुजरा,
मौके कम मिले,
तब पहली बार तुम्हे चिढ़ाते आँखो से मुस्कुराते कनखियो से देखा,
मै मन ही मन कुढ़ता रहा क्या करता?
मेरे हारने और तेरी शरारतो के जितने की घड़ी आई थी।
फिर सितम्बर ने दिये मौके,
वे मौके जो मै भुलता नही,क्योंकि इसी महिने
तेरी कलाई की तमाम चुड़ियाँ टूटी,
और इसी महिने तेरे लिये,
मैने दर्जनो की तादात मे खरिदे,
तुम्हारी साड़ी से मैच करती तमाम चुड़ियाँ,
उन चुड़ियो मे तुमने कहा था---------
कि तुम्हे पसंद दिल से चुड़ी हरि आई थी।
फिर अक्टुबर के महिने मे,
हमने-तुमने अपनी जिंदगी के इस हनीमून को,
फिर टटोला!
लगा कि अभी भी तुम सुहागरात सी हो----
जैसे घूँघट किये आई थी।
फिर नवंबर---------
हमारी-तुम्हारी जिंदगी मे महिना नही था,
हम माँ-बाप बन गये थे,
हमारे आँगन में-----------
हँसने-खेलने एक गुड़िया चली आई थी।
इस दिसम्बर----------
जो हमारे कमरे मे कैलेंडर टंगा है,
उसमे एक छोटी सी बिटिया को,
छोटे-छोटे नन्हे पाँवो मे----------
घूँघरुओ की पायल पहने चलते दिखाया है,
हमारी बिटिया केवल बिटिया नही,
इस दिसम्बर बनके--------------
हमारे प्यार की ऐनवर्सरी आई थी।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

###अखबार मे छपी रचना को न पढ़ पाने वाले परम स्नेही लोगो की शिकायत को दुर करने का एक प्रयास।

Friday, 27 December 2024

(पहली जनवरी हो)

( पहली जनवरी हो )

तुम मेरी पहली जनवरी हो,
मैं तुम्हे,
बहुत ही टूट कर चाहता हूं,
तुम मेरी हर पल और हर सांस की,
14 फरवरी हो.

ये तुम्हारी शर्म का,
गुलाबी आंचल
मुझे बावला सा कर देता है.
सच तुम केवल मार्च की होली ही नहीं.
बल्कि,
मेरे दिल के आम के बगीचों की 
पहली मंजरी हो.

सच तुम यूं ही सिलसिलेवार,
मेरे रोमांटिक कविता की दिसंबर हो.
तुम्हें मैंने टांग रखा है,
अपने दिल में,
और तुम हमारे उसी दिल के दीवाल की,
कभी ना उतरने वाली.
एक बेशकीमती कैलेंडर.
की पहली जनवरी हो.

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जौनपुर-(उत्तर-प्रदेश )
मोबाइल नंबर---7800824758

(सांवली)

एक रोमांटिक कविता---(सांवली मछेरन )

मै नदी के किनारे बैठा,
अपलक---
उस सांवली सी मछेरन को देख रहा था.
जो डुबते हुये सूरज की लालिमा मे
अपनी कसी हुई देहयष्टि के 
कमर तक साड़ी खोसे,
एक खम और लोच के साथ
अपनी मछली पकड़ने वाले जाल को 
खींच रही थी.
मुझे यूं लगा कि जैसे--
उसकी जाल की फंसी मछलियों मे से,
एक फंसी हुई मछली सा 
मेरा मन भी है.

वह इससें बेखबर,
एक-एक मछली निकाल--
अपने पास रखे पानी से भरे डिब्बे
मे डालती रही.
बस ! इतना उसने 
इतनी देर मे जरुर किया,
कि अपने माथे पे गिर आये,
बाल को पीछे कर
उसने कुछ और बची मछलियां,
उस डिब्बे मे रख
गीले जाल और डिब्बे को पकड़,
ज्यो घुटनों भर पानी से निकली,
तो यूं लगा कि जैसे--
वे सांवली मछेरन,
विश्व कैनवास की सबसे खूबसूरत औरत हो.

नाम---रंगनाथ द्विवेदी
ईमेल आईडी--rangnathdubey90@gmail.com
फोन और वाट्सप--7800824758

(टंगा था कैलेंडर)

(टंगा था कैलेंडर)

तमाम हादसों से दुखी था कैलेंडर 
आँख मेरी भरी थी,
पर रोया था कैलेंडर.

सच तो ये है कि,
हमें तारीख बताने के लिए 
ऐ "रंग"–
पूरे साल भगवान यीशु की तरह,
मेरे कमरे की कील में-
टंगा था कैलेंडर.

यह रचना मेरी स्वरचित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जौनपुर,(उत्तर-प्रदेश )

Thursday, 26 December 2024

(साधना कट)

अपने समय की मशहूर अदाकारा साधना की मौत आज ही के दिन हुई थी और उस दिन मैने चंद लाईन मरहूम साधना के लिये लिखि थी।
खासकर आज भी महिलाओ के हेयर कट की बात अगर आती है तो सबसे पहले एक कट का नाम आता है और वे कट है साधना कट।

(साधना कट)
सिसक उठे मोहब्ब़त के सभी खत,
उफ!खत्म हो गया-------
हमारी दौर का आखिरी चित्रपट।
वे सिटियां,वे तालियां याद आ रही,
हाय!आज कितनी तन्हा जा रही है-----
ऐ,रंग---हम लोगो की साधना कट।

Tuesday, 24 December 2024

(सेंटा क्लॉज हो जाए)

(सेंटा क्लाॅज़ हो जाये)
आओ बाँटे तोहफ़े यतिमो में हम,
किसी अपाहिज़ की बैशाखी,
या किसी गुँगे की मीठी ज़ूबान हो जाये।
ऐ,रंग----आओ एक रात ही सही---
हम सेंटा क्लाॅज हो जाये।

Saturday, 21 December 2024

(मुसलमान बना दो)

(मुसलमान बना दो)
गर मासुमो का कत्ल इतने से-
थम जाये वहसियो,
तो हमे शौक से हिंन्दू या मुसलमान बना दो।
ढहा दो मेरे जेहन का मंदिर,
मै शायर हूँ,मुहब्बत मेरी भूख है,
गर मै तेरी पूजा ना बन सका तो,
अज़ान बना दो।
बेशक मेरे हाथो से तुम छिन लो गीता
ऐ रंग-ये ख्वाहिश है
कि मासुमो का कत्ल ना हो,
चाहो तो इसके लिये,
इस ब्राह्मन को मुसलमान बना दो।

पेशावर मे मासुमो की कत्ल पे।

Tuesday, 17 December 2024

(पत्थर की हो गई)

(पत्थर की हो गई)
मै जबसे---------------
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
सूख गये अरमान मैं पत्थर की हो गई।
क्या-क्या नही छोड़ा खातिर उसके,
वालिद का दिल तोड़ा!
बसने आई थी मैं बेघर की हो गई।
मै जबसे---------------
सुर्ख जोड़े,हिना,आईना सिसके
ये अज़ीब निकाह है देखो,
कुबूल कर भी ऐ,रंग----------
मै बीना शौहर की हो गई।
मै जबसे--------------
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
सूख गये अरमान मैं पत्थर की हो गई।

(अपने पापा की गुड़िया)

(अपने पापा की गुड़िया)
दो चुटिया बांधे और फ्रॉक पहने,
दरवाजे पे-खड़ी रहती थी---------
घंटो कभी अपने पापा की गुड़िया।
फिर समय खिसकता गया,
मै बड़ी होती गई!
मेरे ब्याह को जाने लगे वे देखने लड़के,
फिर ब्याह हुआ,
मै विदा हुई पापा रोये नही,
पर मैने उनके अंदर----------
के आँसूओ का गीलापन महसूस किया,
पीछे छोड़ आई सब कुछ
अपने पापा की गुड़िया।
सुना था बहुत दिनो तक,
पापा तकते रहे वे दरवाज़ा,
शायद ये सोच----------------
कि यही खड़ी रहती थी कभी,
उनके इंतज़ार में घंटो,
फ्रॉक पहने दो चुटिया बांधे
इस पापा की अपने गुड़िया।
फिर आखिरी मर्तबा उन्हे बीमारी मे देखा,
वे चल बसे!
अब यादो में है-------------------
कुछ फ्रॉक दो चुटिया
और तन्हा खड़ी-----------------
दरवाजे के उस तरफ,
आँखो में आँसू लिये----------------
अपने पापा की गुड़िया।

(लड़कियों के बॉयफ्रेंड हो गए)

(लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये)
स्कूल के बस्ते----------------
बढ़ते-बढ़ते बैग हो गये!
खत लिखने वाले देश की संवेदना मर गई,
दिल में रहने वाले लोग------------
सब मोबाइल में टैग हो गये।
माँ यशोदा का आँचल बदला,
वे जिंस और टाप पहन के माम हो गई,
और जितने भी पिता थे वे रफ्ता-रफ्ता डैड हो गये।
दूध-घी खाने-पीने वाले देश ने गिलास रख दिया,
अब उन्ही गिलासो में---------------
बार बालाओ के ढ़ाले पैग हो गये।
अर्द्धनग्न सड़को पे--------------
यौवन उछालती कुछ माडर्न लड़कियाे
के अश्लील और भौड़े कपड़े,
शर्म आती है लिखते,
कि जिस देश में भाई होते थे,
एै,रंग-------आज उसी देश में लड़के,
होटलो के बंद कमरो में--------------
इन लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये।

(दो घड़ी की रात)

(दो घड़ी की रात)
जिंदगी है बस दो घड़ी की रात,
आओ गुज़ार ले लिहाफ में हम,
एक दुजे के संग---
दो घड़ी की रात।
आयेगी धूप कमरे में कल किसी और के लिये,
खुली खिड़की से फिर बाल सँवारेगी कोई दुल्हन,
फिर अँधेरा होगा!
वे भी गुजारेगी इसी तरह अपनी जिंदगी की-------------
ये दो घड़ी की रात।
भुल जायेंगे सभी एक दिन रफ्ता-रफ्ता,
जैसे हम भुले है औरो के जिंदगी की---
दो घड़ी की रात।
एै,रंग-----यहाँ से हमी फना होगे,
बाकी यही रह जायेगी औरो के लिये---
ये दो घड़ी की रात

(मैं सयाना नहीं हुआ)

(मै सयाना नही हुआ)
माँ बुढ़ि हो गई------------
मै सयाना नही हुआ।
चाहे जितना जहां से भी खाके लौटु,
फिर भी जब तलक अपने हाथ के,
दो निवाले न खिला ले---------
कहती है तब तलक माँ कि बेटा झूठ न बोल,
अभी तलक तेरा खाना नही हुआ।
माँ बुढ़ि हो गई----------
मै सयाना नही हुआ।
बीबी मेरी दरवाज़े पे खड़ी हो,
तकती है माँ का प्यार!
उसने गिली आँखो से कई मर्तबा कहां,
मै कितनी खुशनसीब हूं,आप सा पती पा
जिसका कभी कमरे में,
बीना माँ से मिले अपने------
कभी आना नही हुआ।
माँ बुढ़ि हो गई--------
मै सयाना नही हुआ।
सच मुझे भी लगता है उतनी देर,
माँ के पास-------
जब बाल सहला वे बचपन सा,
मुझे घंटो,अच्छा-बुरा समझाती है,
तो लगता है बस कुछ वक्त सरका है----
मै सयाना नही हुआ।
माँ बुढ़ि हो गई--------
मै सयाना नही हुआ।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

(दलित हो गई)

(दलित हो गई)

रात के अंधेरे में सोने आई थी 
दलित बस्ती से 
छूपके-छूपाके 
लेकिन सुबह के धुंधलके में 
उठी,
तो उसने अपने दुखते बदन को
थोड़ा सा,तोड़ा 
फिर,पलंग के अगल बगल
बेतरतीब लटकी साड़ी
को उसने बिना पहने ही कुछ देर देखा
और सोचा
कि रात भर छुई हुई उसकी देह
इस कोठरी से
बाहर निकलते ही
दिन के उजाले में
दलित हो जाएगी
वे भी क्या करे
जिससे व्याही है 
वे नीरा शराबी हैं
उसे शराब मिल जाए बस
क्या फर्क पड़ता है
कि उसकी ब्याहता
रात के अंधेरे में
छुप छुपा के कहा
और क्यों जाति हैं?
वह भी एक औरत थी
अपनी देह को
पति के देह से आत्मसात कर
उसके पौरुष की गंध को 
अपने सांसों में महसूस करना चाहती थी 
लेकिन
शराबी पति की वजह से 
उसकी देह 
रात में रानी 
और दिन के उजाले में दलित हो गई .

✍️✍️

Sunday, 8 December 2024

(औरत बांझ है)

(औरत बांझ है)
ये मेरी कलम-ए-तोहमत है,
ऐ,रंग---------
कि जिस औरत ने बेटी न जनी,
वे औरत बांझ है।

(बेटी के ब्याह का लिबास दिखाऊं)

(बेटी के ब्याह का लिबास दिखाऊ)
आओ अय्याशियो मे डुबे हुये चौथे स्तंभ,
तुम्हे इस मुल्क मे रेप से इतर,
खेत के मेड़ पे पड़ी बीना कफ़न--------
किसान की लाश दिखाऊ।
बंद कमरे मे बरसता सावन,
तीतर-बीतर कपड़े पैमाने से छलकी शराब,
किसान की आँखो मे सुखा,
उसकी दुपट्टे के फंदे से मरी बेटी,
रुदाली सी बीबी,लंबा सन्नाटा
उसकी जंग खाई पेटी में,
एै,रंग------------
बेटी के ब्याह का लिबास दिखाऊ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Saturday, 7 December 2024

(शहीद)

(शहीद)
इस गाँव की औरत कभी बेवा नही होती।
इस गाँव मे कभी भी लाशे नही आती,
तिरंगे मे लिपटे शहीद आते है।
यहाँ की कोई भी बुढी माँ-
काशी या काबे नही जाती।
ऐ रंग-
वे फिर से शहीद बेटे की वर्दी का
धुल साफ कर
सरहद की हिफाजत के लिये-
पोते पालती है।

(कंगन भई सौतन)

(कंगन भई सौतन)
तुम्हरे न आये--------
हाय! कंगन भई सौतन।
रही-रही के हियरा मे हुक उठे हमरे,
हाय! तुम्हरे न आये---------
यौवन भई सौतन।
इ कजरा,इ बिंदिया,इ सेन्हुर,महावर
कैसे सजु और सँवरु,
हाय! चुभे अँगुरी मे बिछुवा,
तुम्हरे न आये---------
मोरे बैरी बलम कि पऊवाँ क हमरे पायल भई सौतन।
तुम्हरें न आये--------
हाय! कंगन भई सौतन।
हे पियवा तु आवअ छोड़ आपन नोकरिया,
तड़पत हौ दिल सेजिया पे पनिया से निकालल मछरी नियन,
हाय! बीना तोहरे रहले--------
कमरा के हमरे पलंग भई सौतन।
तुम्हरें न आये------
हाय! कंगन भई सौतन।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Friday, 6 December 2024

(कितनी भीड़ है अम्मा)

(कितनी भीड़ है अम्मा)

तमिलनाडु का सारा आलम रो रहा,
उन आँसूओ के कतरे मे तेरी तस्वीर है अम्मा,
सच!तु बड़ी खुशनसीब और अमीर है अम्मा।
तुझे हर शख्स का कांधा नसीब हो रहा,
ये पूजा मे तेरी उम्र और अजान मे तेरी साँस मांग रहे थे,
सच तु इस दौर की जहाँगीर है अम्मा।
फिर लोग आयेंगे-जायेंगे----------
जारी रहेगा ये ज़मी का फ़नापन,
लेकिन तेरा जाना एक सदमा एक पीर है अम्मा।
उठ!हाथ हिला,बात कर,गरीब मुफ़लिसो से
अब भी इन्हे यकीन नही तेरी मौत का,
देख तुझे सुनने को आज--------------
तमिलनाडु मे कितनी भीड़ है अम्मा।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

(उतर रेलवे)

( उत्तर-रेलवे )
उत्तर-रेलवे----------
के एक मुसाफ़िर खाने मे बैठी, 
एक चौबीस-पच्चीस साला पगली,
अपने गंदे बाल खुजला रही थी,
मैने देखा---------
उसके आसपास आठ-नौ आवारा बद्चलन,
पुरुष खड़े--------
अश्लील फब्तियां कस रहे थे,
वे इस सबसे बेखबर-----
अपने गंदे बाल खुजलाये जा रही थी,
तो अचानक मेरी नजर भी,
उनका अनुसरण कर,
पगली की गदराई हुई देहयष्टि से चिपक सी गई.
फिर वे सभी मेरी तरफ मुड़े--------
और खिलखिला के हँस पड़े.
मै झेपा---------
और सोचने लगा कि क्या ?
मेरा चरित्र भी अब गिरने लगा है,
शायद नही,
अगर ये सच है तो फिर.
न जाने कल आने वाली पीढ़ी का---
चरित्र क्या होगा.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (उत्तर-प्रदेश)

Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

(गुनगुनी धूप)

( गुनगुनी धूप )
मै टैरेस पे---------
कुर्सी निकाल गुनगुनी धूप मे घंटों बैठी,
वे तुम्हारी चाहत के एहसेसात को-----
अपने भीतर कही हौले-हौले टटोल रही.
लेकिन उस टटोलने मे न जाने कहां,
तुम्हारा श्पर्ष मुझे मिला नही,
सच अब तुम्हारे--------
चाहत का बासीपन अब टीस रहा.
याद है मुझे अच्छे से-------
ठंड की ये गुनगुनी धूप,
जब तुम्हारा छुना और श्पर्श करना,
मेरे प्यार के अंतरतक को गुनगुना जाता,
वे शायद युवापन था------
लेकिन आज जैसे टैरेस की गुनगुनी धूप,
एक सखी सी-------
मेरी युवावस्था से कह रही,
नही ऐसा कुछ नही,
ये जीवन के पलछिन की करवट भर है,
फिर यही टैरेस और कुर्सी के बगल-----
दोनों का गुनगुनी धूप मे बैठे,
काफी पीना होगा.
तभी एक झोका सा हवा का आता है,
और उन्हें मै थका मांदा,
आफिस से बैग लटकाये,
टैरेस पे पड़ी हुई एक खाली सी कुर्सी,
निढ़ाल सा पाती हूं,
तब मै-------
उनकी मजबूरियों की गुनगुनी धूप को,
अपने अंतर मे एक बार फिर महसूस कर पाती हूं.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर pin no.222002
Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Thursday, 5 December 2024

(घुंघरू बांधती थी)

(घूँघरु बांधती थी)
रईसो के दरमियाँ वे सलिके से आती थी,
कभी ठुमरी,कभी दादरा गाती थी।
ऐ,रंग-----------
वे पाक थी कोठे पे सुना है,
कि वे केवल पाँव मे घूँघरु बांधती थी।

(जीवित कमायनी)

(जीवित कामायनी)
इंतजार करती है-----------
अपने कोठे पे बैठ हर शाम कोई ग्राहक।
न आने पे फिर वहीं से खोलती है,
जहा से उसने मोड़ रखा था--------
जय शंकर प्रसाद की कामायनी।
डबडबाई आँख मे मनू और इडा से ज्यादा,
भर आते है आँसू !
ये अथाह पिड़ा के फफोले का फूटना रोज सहती है,
इसी कोठे पे-----------
जब कोई आता दिखता है,
तो टुटी कुंडी वाले दरवाज़े की तरफ बढ़ चलती है,
ग्राहक की जल्दबाजी में------------
बंद करते दरवाज़े की टुटी कुंडी की आवाज़,
का मतलब वे समझ----------------
अपने एक-एक कपड़े को उतारती है,
और चारपाई पे--------------
उसका ग्राहक पैसे सुलता है!
फिर थकी मादी उठती है----------
मरहूम जय शंकर प्रसाद की ये जीवित कामायनी।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Tuesday, 3 December 2024

(मासूम लड़की)

(मासुम लड़की)
तुम जीसे कहते हो गुँगी------
वे अक्सर मेरी गज़लो मे ढ़लती है,
वे थिरकती है------
जब पाँवो में बाँध के घूँघरु,
तो कितना बोलती है,
ऐ,रंग----वे गुँगी नही-------
एक मासुम लड़की है।

विश्व विकलांग दिवस पे।

(बातूनी लड़की)

(बातुनी लड़की)
मुस्लिम हो गई-----------
मुझ ब्राह्मण के गोद की वे बातुनी लड़की।
एक वालिद सा मेरा ख़याल रखती थी,
आज आई तो----------
पर दहलीज़ पे कुछ पल रुक,
फिर अपनी आँख में आँसू लिये लौट गई,
शायद वे समझ गई---------
कि अब वे पहले की तरह गले से नही लग सकती,
क्योंकि मुस्लिम हो गई समय के साथ--------
मुझ ब्राह्मण वालिद की वे बातुनी लड़की।
सर से पाँव तलक--------
बुरके से ढकी मुझे न जाने क्यू ,
आज एक मज़हब की कैद मे लगी एै "रंग"---
इस वालिदे ब्राह्मण की वे बातुनी लड़की।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Monday, 2 December 2024

(पोलियो ग्रस्त लड़की)

विश्व दिव्यांग दिवस पे लिखी कविता---------
         
             (पोलियो ग्रस्त लड़की )
वे लंगड़ी--------
पोलियो ग्रस्त लड़की,
तुम्हारी कुछ नही शायद,
पर मेरी बहुत कुछ है,
वे फूल है, कविता है मेरी
उसे छूता हूं, प्यार देता हूं
भावनाओं के कोरे कागज़ पे,
मेरे कही कोई रुपसी नही,
वही है----------
जिसे मै हुबहू उतार देता हूं.
कहा-अनकहा कुछ नही है तो बस,
उसकी मजबूरियों से नहाई आँखे,
मै उसके आँसुओं को------
शबनमी बूँदों की तरह पीता हूं,
उसे मै--------
अपना पहला और आखिरी,
प्यार देता हूँ.
मै अपने अंदर के कवि को उसपे---
और उसकी भावनाओं पे वार देता हूँ.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.---7800824758.

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

(कुंभ--अलौकिक विश्व आस्था)

(कुंभ--अलौकिक विश्वआस्था )
प्रयाग के कुंभ का स्नान, महज स्नान ही नही अपितु--"ये एक विश्वआस्था है जो पुरी दुनिया मे अन्यंत्र दुर्लभ है ऐसा तीन महान नदियों का संगम केवल और केवल अनादि और अनंत काल से प्रयाग मे होता आया है और शायद इस धरती के रहते कायनात तक होता रहेगा".
ऐसा सदियों से धार्मिक व आध्यात्मिक मान्यता है कि--"यहाँ पे स्नान करने के लिये तमाम देवी-देवता बड़ी तल्लीनता के साथ इस सुअवसर का पुरे वर्ष इंतजार करते है".
ये प्रयाग के कुंभ का स्नान धीरे-धीरे और ज्यादा वृहद व समृद्ध होता गया,आज हालत ये है कि प्रयाग जैसे जिले मे इन तीन महान नदियों के यानी--गंगा,यमुना, सरस्वती के संगम तट पर--"लगभग-लगभग कुछ बड़े देशो की कुल संख्या को छोड़कर उसके बाद की कुल जनसंख्या वाले देश के इतनी संख्या महज संगम तट पे ठहरती है".
इस स्नान मे भारत की तमाम बहुरंगी और बहुआयामी धार्मिक संस्कृति का एक वृहद दृश्यावलोकन होता है,तमाम तरह के अखाड़े का ढोल-ताशे के साथ स्नान को आना एक अद्भुत और एक अलौकिक छवि का दर्शन कराते है.
इनके दर्शन की बड़ी ही समुचित व उच्च स्तर की व्यवस्था रहती है, अगर कहे तो इसे सकुशल संपन्न होने तक---"हमारे इस उत्तर-प्रदेश जैसे राज्य के मुख्यमंत्री तक को चैन की नीद नही आती".
संगम तट की धूनी,अलाव,संतो,महंतो और तमाम-तमाम मठो और गृहस्थो का एक महिने का कल्पवास इस संगम नगरी को एक दैवीय स्वर्ग सी धरती मे परिवर्तित कर हमे हमारे अंदर के मोह,माया,दंभ,द्वेश को मानो नष्ट कर देते है अर्थात " ये महज तीन नदियों के संगम का स्नान भर नही, बल्कि ये हमारी आत्म सिद्धि का त्रिलोक भी है".
  
आप सभी आईये----"हमारी आस्था संगम पे स्नान करती है".

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.7800824758

यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

(कमरे की चूड़ियां)

( कमरे की चूड़ियां )

मै हर रोज,
बहाने बनाकर घूम जाता हूं 
नमाज़ के वक़्त
मस्जिद के बगल से,
जो गुजरती है--
चंद चूड़ीहारो की गली की तरफ से!

मैं-
उसे एक बार फिर से देखने की चाह में, 
तमाम चूड़ियों के,
दुकानो की तरफ देखता हूं,
कि शायद वे किसी दुकान पे,
दिख जाए मुझे,
अपनी नाजुक सी कलाई में,
पहनती हुई 
किसी चूड़िहार से चूड़ियां.

वे मुझे,अगले जुमें तक!
नही दिखी,
शायद वे किसी और शहर से थी,
मै ज्यों घुमा,उदास होकर 

तभी मेरी अचनाक नज़र पड़ी,
और मैं अपने होशो हवास खो बैठा 
क्योंकि-
वे आ रही थी सामने से,
अपनी सहेलियो के संग,
चूड़ीहारों की गली की तरफ,
मुझे यूं लग रहा था,
कि जैसे,
बज रही हो उस पूरी गली में,
चूड़ीहारों की,
मेरी महबूबा के हाथों में पहनी,
मेरे मोहब्बत की---
महबूब चूड़ियां!

सच आज---
वे मेरी शरीके हयात है,
जिसकी कलाई को चूमता हूं मैं 
एक-एक आयत की तरह,
सच किसी मस्जिद से कम नहीं,
पाकीजा,
मेरे घर और मेरे कमरे की चूड़ियां.

🌹🌹सर्वाधिकार सुरक्षित 🌹🌹

(सुकरात को भी)

"सच की जुबा अगर खामोश करनी है,तो इस दौर के सुकरात को भी जहर दे दो"---- रंगनाथ द्विवेदी