Wednesday, 28 September 2022

(चन्दन का धुआँ थी)
जो लड़की अभी यहाँ थी,
वे पीरो-फकीरो की दुआ थी।
उफ!अभी तलक है-
सांसो मे उसकी खुशबू,
ऐ रंग,-वे लड़की-
चन्दन का धुआँ थी।
(भूख लिखता रहा)
तु रोटियाँ फेकती रही,अपनी हवेली से--
ऐ रंग--------
मै बगावत और भूख लिखता रहा।
हाथरस की घटना ने एक बार फिर हमे उस निर्भया की याद दिला दी, आप मेरे इस विचार या रचना से आहत हो सकते है, इसलिए इस रचना को पढ़े सहमत होना या ना होना आपके स्वविवेक पर है😢😢😢😢

(एक नई मासूम निर्भया )

निर्भया--------
जो चीखी,तड़पी,छटपटाई
उफ !------
तेरी विकृत कुंठा के 
डाले गये वे सरिये,
कितने घृणित थे!

काश तुम्हारी माँ ने कहा होता,
या तुमने-----------
अपनी सगी बहन के 
वे गुप्तांग याद किये होते,
तो तुम्हारा ज़मीर तुम्हें रोकता कचोटता,
कि ये पाप है,अन्याय है
और तुम कांप जाते!

हां ये जरूर हुआ कि 
तुम्हारी पशुता व अमानवियता से,
निर्भया-----
कुछ ही दिनो मे मर गई,
लेकिन तुम नही मरें, 

क्योंकि अगर तुम मरे होते, 
तो कतई नही, 
चीखती और तड़पती 
हाथरस में,
एक नई मासूम निर्भया. 

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है।

Tuesday, 27 September 2022

(पत्थर न हो सका)
ता उमर रहा बाहर
कभी अन्दर न हो सका।
कुछ प्यास ऐसी थी कि-
मै समन्दर न हो सका।
ऐ रंग,-
कुछ ऐसी मासुमीयत थी मेरी
कि मै कभी पत्थर न हो सका।
(हर शख्स़ अकेला है)
बड़ा हूज़ुम,बड़ा रेला है------
ये हर शहर का मेला है।
सभी लौट जायेगे दफ्ऩ कर मईयत,,,,,,,,,
ऐ,रंग----बारी-बारी यहाँ-----
हर शख्स़ अकेला है।
(सलमान खान की होंठ का धुँआ है )

जावेद अख्तर पहचानों, 
ये तुम्हारी------
जोया अख्तर के होंठ का धुँआ है. 

जया बच्चन पहचानो, 
ये दीपिका पादुकोण के 
जे. एन. यू में गईं गलीज़ 
और--------
काफिर होंठ का धुँआ है. 

नसीरुद्दीन, आमीर 
तुम्हें डर लगता है तो डरो, 
क्योंकि ये फुटपाथ पर सोये, 
तमाम मुफलिशो के कातिल----
सलमान खान की होंठ का धुँआ है. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जिला जौनपुर, उत्तर प्रदेश, 
मोबाइल नंबर 7800 824 758

Monday, 26 September 2022

(अज़नबी के साथ हूँ)
बिस्तर की सिलवटे---------
बिल्कुल खामोश है मेरी तरह।
वे जानती है कि मै-------
बस कहने को खाबिंद के साथ हूँ,,,,,,,,,
वरना ऐ,रंग----ये स्याह सच है---
कि मै एक बंद कमरे मे------
अज़नबी के साथ हूँ।

खाबिंद----पती।

Sunday, 25 September 2022

(अज़नबी के साथ हूँ)
बिस्तर की सिलवटे---------
बिल्कुल खामोश है मेरी तरह।
वे जानती है कि मै-------
बस कहने को खाबिंद के साथ हूँ,,,,,,,,,
वरना ऐ,रंग----ये स्याह सच है---
कि मै एक बंद कमरे मे------
अज़नबी के साथ हूँ।

खाबिंद----पती।
किसान, जिसकी लाश आज भी उसके उम्मीदों के खेत के किनारे बीना कफ़न के पड़ी है 😭😭
(जूड़े का गुलाब)
अब भी रखा है, हमने
अपने कमरे मे -
उनके जूड़े का गुलाब।
वही खुशबू, वही सुगन्ध, वही चाहत
ऐ रंग,-हमसे गुफ्तगू करता है-
उनके जूड़े का गुलाब।

Friday, 23 September 2022

(चाँद )
अच्छा है चाँद------------
कि तु अभी तलक किसी के कब्ज़े मे नही,
वरना तेरा भी किसी रईस से---------
ये शाम तलक सौदा कर देते,
तु भी तड़पता किसी कमरे से सारी रात,
तुझे पिंजरे में कैद--------------
ये परिंदा कर देते।
फिर गरीब और मज़लूम-----------
कैसे तकता तुम्हे अपने खाली पेट,
कैसे कोई माँ सुलाती----------
अपने भूखे बच्चे को ये धोखा दे,
कि बेटा वे देखो---------
तवे पे भगवान पका रहे है,
तुम्हारे लिये एक गोल सी रोटी,
सो जाओ!
चाँद तुम एक उम्मीद हो गर इनके हाथ
लग जाते---------
तो ये तुम्हे किसी रईस के आँगन तक का
एक ब्याज़ के कर्ज़ से बिंधा--------
न भर पाने वाला कारिंदा कर देते।

Thursday, 22 September 2022

(रेगमाल सी जिंदगी)
कौन नही बुनता-----------
जुलाहे के कालीन सी जिंदगी!
तरह-तरह के धागे में पिरो,
कौन नही देखना चाहता मुकम्मल अपना शाहकार,
पर हो नही पाता ज्यो का त्यो चाहा,
फंस के खत्म हो जाती है मछली सी----
किसी मछेरे के जाल सी जिंदगी।
सारी ख्व़ाहिशे धरी रह जाती है,
एक-एक कर खत्म होती जाती है,
एै रंग------------------
यहां पे सबकी है रेगमाल सी जिंदगी।
(जवां कातिल फरेब है)
वे इतनी खूबसुरत है कि--------
हर एक दिले कत्ल पे मूस्कुराती है।
ऐ,रंग----वे औरत नही-------
एक जवां कातिल फरेब़ है।
(khajuraho ke patthar)
bnaya hai ek klakar ne tap kar ,
kamuk nhi uski murtiya kewl ,
ek jaadu hai "rang" 
wrna hme apni trf bulaate hai,
khajuraho ke patthar.
(pyaasa ke guru dtt sa)
mai pdh ke bahut jaar-jaar roya,
ve uska aakhiri khat tha,
ae"rang" isk me ; mai bhi mra,
"pyaasa" ke guru dtt sa.
दीपिका पादुकोण के ड्रग्स मसले में फसने पर---

( दीपिका एक दिलरुबा सिगरेट है)

दीपिका------
तेरे आवारा होंठ की 
ये जुंबिश
ये कश, ये धुँआ, ये नशा 
और उसकी कशिश 
तेरी आँखों में उत्तर आना, 

उफ ! वाकई----
तु एक लाजवाब हीरोइन है, 
तुम्हें पाने और देखने की ये बेचैनी, 
ये चाहत, 
किसी ड्रग्स से कम नही, 

तु इतने इल्जामों के बाद भी, 
एक-----
दिलरुबा सिगरेट है. 

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर
जौनपुर

Tuesday, 20 September 2022

(Bewa ki jmin)
hai bda muskil siyast pe ykin,
ye aise sanp hai , jin pe kar aamd,
nhi koi bin ,
ae "Rang" ye din me kat,te hai chek ,
aur raato ko hdpte hai ,
bewa ki jmin.
(Gulshan nanda ke kitab se)
jo ldki- kbhi lgti thi nalnda ke kitab si,
pyar paake wohi ldki -
ae"Rang" lgne lgi ,
Gulshan nanda ke kitab si.
(टुटी हुई गुड़िया)
गौर से देखती है,वे अक्सर बंद कमरे मे--
ऐ,रंग-------
वे टुटा हुआ गुड्डा और टुटी हुई गुड़िया।
( दो घाव हो गए)

जीन उरोजों को ढ़क, 
वे मासूम देखती थी, 
कभी वात्सल्य का सपना, 
 ए "रंग"-------

उसके वही दोनों उरोज, 
गरीबी के चलते, 
दो घाव हो गए. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी, 
जट कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर उत्तर प्रदेश
मोबाइल नंबर--7800824758
(बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ)
कल शहीद की चीता जला रहा बाप---
रो रहा था!
तभी किसी ने कंधे पे रंखा हाथ,
तो वे चीख पड़ा-----------
कि रहने दो कंधे पे मत रंखो,
इस देश के ये नपुंसक हाथ!
जरुरत नही,
इतनी ही सहानुभूति है मेरे शहीद बेटे से,
तो कहो देश की सियासत से,
कि ला दे-------------
उस हाफिज़ सईद का कटा हाथ,
नही ला सकता ना जानता हूं,
इसी जगह फिर सजेगी,
कुछ फौजी बजायेंगे मातमी धुन,
और अपने शहीद बेटे की चीता को,
आग देगा--------------
किसी बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ।

@@@उरी के तमाम शहीदो को मेरा सलाम।

Monday, 19 September 2022

( बंजारन )

मेरी जिंदगी में आई थी कभी, 
एक खानाबदोश बंजारन.

उसकी कत्थई आंखों को याद कर, 
मैं लिखता गया, लिखता गया
ना जाने कब, 
एक मुकम्मल किताब बन गई, 
ए रंग-------
वे खानाबदोश बंजारन. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी 
 जिला जौनपुर, मोबाइल नंबर 7800824758
(Apne daur ka galib hu)
mai chdha nhi kbhi masjid ki sidhiya,
thi kafir-a-lt hme chhk ke pine ki ,
gr salike se likhu "Rang"
to mai apne daur ka galib hu.
(Apne daur ka galib hu)
mai chdha nhi kbhi masjid ki sidhiya,
thi kafir-a-lt hme chhk ke pine ki ,
gr salike se likhu "Rang"
to mai apne daur ka galib hu.

Sunday, 18 September 2022

(बे-नकाब हुई हूँ)
आओ मुझे लेने-------
ओ मेरी मौत के शौहर,,,,,,,,,,,,
तेरी खातिर मै-------
फिर बे-नकाब हुई हूँ।

Saturday, 17 September 2022

(अच्छे दिन आ गये)

चचा---
साठ की उम्र में
तीस वाली को पटा गये,,,

ए "रंग"
नौजवानो से कही ज्यादा,
तो बुज़ूर्गो के-----
अच्छे दिन आ गये।
(माँ की चुपड़ी हुई रोटी)
मै बच्चो के लंच मे---------
देखता हूँ टीफीन अक्सर,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग---इस उम्मीद मे---------
कि शायद किसी बच्चे के टीफीन से,,,,,,,,
माँ की चुपड़ी हुई रोटी निकल आये।
(taj ka patthar)
gaur se dekho siskta hai,
             taj ka patthar.
dard ki had hoti hai, chitkta hai,
             taj ka patthar.
shahanshahe hind pe, ek katl hai aayd,
               tbhi to kbra pe bnke aanshu ,
       ae "rang" tpkta hai ,
        taj ka patthar.
(तवायफ़ की कब्र है)

यहाँ चराग नही जलते,
कोई चादर नही चढ़ती!
ये शहर की मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है.

आज भी करती है,ये रुहें मूज़रा,
फिर फूट के रोती है.

ऐ,रंग---
बस आ जाते है खिज़ा में,
दरख्त़ो के चंद पत्ते------
आवारगी करने।
ये शहर की मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी 
जज कालोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (U P)
Mo. no. 7800824758
(अच्छे दिन आ गये)

चचा---
साठ की उम्र में
तीस वाली को पटा गये,,,

ए "रंग"
नौजवानो से कही ज्यादा,
तो बुज़ूर्गो के-----
अच्छे दिन आ गये।

Thursday, 15 September 2022

(chupke se bchpna)
tera alhadpan,chidiyo sa fudakna,
ye kya?
jhuki nazar , angudhe se mitti kurchna
ae "rang" nikl gya kitne chupke se bchpna.
(नील-कमल)
तड़पता है,सिसकता है,बुलाता है कोई नील-कमल-----
सदियो चुनी दिवाल से,गाता है कोई नील-कमल।
एै "रंग" किसी यूग में------------
कोई पाता है कहाँ नील-कमल।
(parindo ka ghar)
masini ho gya shahari basindo ka ghar,
nikl aata hu , kafi dur mai tnha ,
aur dekhta hu "rang" bnte parindo ka ghar.

Wednesday, 14 September 2022

(hindi)
mai ab tlk nhi bhula ,
apne gau ki hindi.
ve panghat ki trf jati,
tare paaw ki hindi.
kya jane hai aakhir ?
bhla "rang" ye kankrit ka jangl , 
kya hoti hai apno se lagaw ki hindi.
           hindi diwas ki shubh kamnao ke sath - rangnath dubey.
(हिन्दी मे लोरी थी)
कभी श्याम थी,कभी गोरी थी,,,,,,,,,,,
हिन्दी ब्रज की छोरी थी।
माँ लल्ला को अपने-------
जो कभी थपकी दे गाती थी,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----वे हिन्दी मे लोरी थी।

Sunday, 11 September 2022

(काहे के इमाम हो)
जब शहर------
सुलगता है मज़हब के नाम पे,,,,,,,,
तो तुम काहे के पंडित-----
ऐ,रंग-----
तुम काहे के इमाम हो।
(अच्छे दिन आ गये)
चचा---------
साठ की उम्र में
तीस वाली को पटा गये,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----नौजवानो से ज्यादा----
तो बुज़ूर्गो के अच्छे दिन आ गये।
(वे मेरे गज़ल की किताब)
साजिल्द अभी यही बैठी थी------
वे गज़ल की किताब।
चंद हर्फों पे ही अभी नज़र पड़ी थी,
कि आँख मुंद ली हमने,
साँस में महकी थी अभी----------
वे संदल की खूसबु सी!
आँख खोला तो खाली थी वे कुर्सी,
दराज़ सी जिसपे बैठी थी करीने से---
वे गज़ल की किताब।
मै साजिल्द तलाशुंगा----
हर गली,हर मुहल्ले!
पाऊँगा यकीनन मै इसी शहर में---
वे गज़ल की किताब।
फिर निकाह कर पढुँगा------
वे मुझको थमा देगी ता उम्र के लिये,
वे मेरे गज़ल की किताब।

Saturday, 10 September 2022

आज के ही दिन संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत देश की सर्वाधिक लोगो तक पहुंचने वाली राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका "प्रणाम पर्यटन" का अंक आदरणीय प्रदीप श्रीवास्तव सर के सौजन्य से मुझे प्राप्त हुआ था जिसमे मेरी कविता "राम" भी शामिल थी.

    ( राम )

तेरी पीड़ा की प्रत्यंचा को----
सब खींच रहे है राम.

तेरी नगरी मे,
तुम्हें टेंट से ढ़ककर,
मंदिर यहीं बनायेंगे----
बस चीख रहे है राम.

हर चुनाव के मुद्दे मे,
बस भुना रहे अयोध्या को,
कुछ न किया और कुछ न करेंगे,
सच तो ये है कि,
ये नकली भक्त है आपके सारे,
जो अपने-अपने स्वार्थ का चंदन---
भर माथे पे टीक रहे है राम.

तेरी पीड़ा की प्रत्यंचा को----
सब खीच रहे है राम.

इतने वर्षों का दर्द असह्य,
ना मिला कभी रावण से,
जितना अपनी नगरी मे---
तुम आज पा रहे राम.

मुझे तो यू लगता है जैसे,
टेंट मे बैठे अपनी ही आँसू से---
खुद भीग रहे है राम.

अब तो न्याय की उम्मीद भी बेमानी लगती है,
ये सच कांंपती अँगुली से----
हम लिख रहे है राम.
तेरी पीड़ा की प्रत्यंचा को---
सब खीच रहे है राम.

लेकिन अब ऐसा नही है.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758
(वे मेरे गज़ल की किताब)
साजिल्द अभी यही बैठी थी------
वे गज़ल की किताब।
चंद हर्फों पे ही अभी नज़र पड़ी थी,
कि आँख मुंद ली हमने,
साँस में महकी थी अभी----------
वे संदल की खूसबु सी!
आँख खोला तो खाली थी वे कुर्सी,
दराज़ सी जिसपे बैठी थी करीने से---
वे गज़ल की किताब।
मै साजिल्द तलाशुंगा----
हर गली,हर मुहल्ले!
पाऊँगा यकीनन मै इसी शहर में---
वे गज़ल की किताब।
फिर निकाह कर पढुँगा------
वे मुझको थमा देगी ता उम्र के लिये,
वे मेरे गज़ल की किताब।
(umrao jaan)
wahi chhat , wahi chhajje, wahi daalan
lacknow mai ab gar nhi to kewl-
ruswa ki umrao jaan.
(शमा गायेगी)
तेरे निकाह की रात में--------
शमा गायेगी।
आँखे रोयेंगी मेरी,बीना आँसू 
अंदर एक ताजमहल टुटेगा-----
और शमा गायेगी।
तु अगर सोयेगा भी--------
अपनी सेजे मोहब्बत!
तो तेरी शरिके हयात की हर चुड़ी से---
शमा गायेगी।
तु तड़पेगा मेरी सदा से भागने वाले,
कभी बच न सकेगा!
क्योंकि इस कायनात के हर जर्रे से----
शमा गायेगी।

Thursday, 8 September 2022

(मेरी रुह कैद है)
ऐ बेवफ़ा मुझे आजाद कर दे,,,,,,,,
क्यूकि तेरे शहर मे---------
अब तलक मेरी रुह कैद है।
(बच्चा पेट भरता है)

तुम जिस अखबार को
इंकलाब कहते हो
उसी अखबार पर चंद रोटियाँ रखकर 
ऐ,रंग---
स्लम ऐरिये का बच्चा
अपना पेट भरता है. 

रंगनाथ द्विवेदी
जिला जौनपुर,उत्तर प्रदेश.
(धान की यौवन शिखर पर)
इस बार की बरसात का पानी गिरा है,
धान की फसलो के यौवन शिखर पर।
वे देखो-------------
खेत में सिहरी खड़ी है एक बाला गाँव की,
उसका भीगा आँचल गिर गया है खेत में,
वे उठा के रख रही है जिस लोच से,
बरबस नयन थम जा रहे------------
धान की यौवन शिखर पर।
धान की ये बालियाँ खुद चाहती है,
कि खेत में आये पिया-------------
वे भी सुहागिन हो उठे बरसात में!
आँख मुँदे,साँस फूले,धान भीगे
दे बालियाँ!न्योता खुदी आँचल गिरा,
कि हे बादलो तुम खुब बरसो--------
अब मेरी यौवन शिखर पर।
(तेरे शहर में)
तेरे शहर में--------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।
ले लेना तुम हमारी गज़ल का जर्रा-जर्रा,
कोई बंदिश नही----------
यहाँ जाफ़रान की खुशबू है हर शख्स़ की खातिर,
यहाँ न कोई कौम न मज़हब और----------
ना ही सरियत है।
तुम्हारें शहर में--------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।
आहिस्ता-आहिस्ता उतरेगा जे़हन मे तेरे,
इन लफ्ज़ो का गुलाबीपन,
मै याद आऊँगा तुम्हारें शहर को,
यहाँ से जाने के बाद भी,
क्योंकि मोहब्बत ही एै "रंग"--------
इस अदब के दिवान की नियत है।
तुम्हारें शहर में------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

Tuesday, 6 September 2022

(मिट्टी से जुदा मत करना)
बेटे मै बुढ़ि हो गई हूँ-------------
मुझे इस उम्र में अपने अब्बु से जुदा मत करना।
ना बेचना किसी को-------------
दरवाज़े पे जो उन्होनें लगाया है दरख्त़,
मै उसी से बतियाती हूँ अक्सर,
मुझे दर्द होगा------------
जब कोई काटेगा टंगारे से तेरी अब्बु की याद को।
बेटा बेशक तु मुझे हज़ ना कराना,
पर लेने देना मुझे आखिरी साँस इस मकान में,
मर जाऊँ तो तेरा हक है इस पर,
पर जीते जी मेरे बेटे,
अपनी इस अम्मी को अपने अब्बु के-----
इस मुकद्दस मिट्टी से जुदा मत करना।
(स्मारके मोहब्बत है)

तुम जीसे कब्र कहते हो
ऐ शहर वालो!
वे इस "रंग" की 
स्मारके मोहब्बत है।
(मंदिर और मस्जिद मकान सा लगता है)
हमने देखी है---------
दंगे मे अल्लाह और राम की लाशे,
ऐ,रंग----तब से हमे-----
ये मंदिर और मस्जिद एक मकान सा लगता है।

Sunday, 4 September 2022

(शिक्षक दिवस है)
ना पहले सी किर्ति,ना पहले सा यश है---
सरकारी तरिके से शिक्षक विवश है।
स्कूलो मे जिसने कदम भी न रंखा-----
उसी के लिये,रंग---शिक्षक दिवस है।

Saturday, 3 September 2022

(चुड़ियो की भाषा)
हाँ मै औरतो के चुड़ियो की भाषा जानता हूँ----------
क्यूकि एक लय है दर्द का,,
और एक लय है खुशी की-------!
लाख छिपाये कोई चुड़ियाँ अपनी,,,
मै फिर भी----------
बीना उसके खनके ही जान जाता हूँ।
हाँ!मै औरतो के चुड़ियो की भाषा जानता हूँ।
(मै लिखता हूँ कोई गीत)
जब बेचैन कर देता है------------
मेरे अंदर का मरुस्थल मुझको,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
शब्द के होंठ पे चुभती है कोई नागफनी,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब पथ की रेत पे-----------
चलता जाता हूँ दूर पथिक सा
और फूट जाते है पाँव के छाले,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
बहुत सन्नाटा मेरे भीतर का,
उधेड़ता है मुझको---------
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
बोता हूँ रेत पे कुछ शब्द,
पर कटिले वृक्ष के विरवे ही पनपते है,
उन्ही वृक्षो की------------
खरोंच जब आ जाती है बन के पीर,
तब मै लिखता हूँ कोई गीत।