Friday, 29 April 2022

(रुबाई बेच देना)
गर किसी भूखे को रोटी मिल सके,
तो बड़े शौक से ऐ,रंग--------
किसी रईस को,
मेरी रुबाई बेच देना।

Thursday, 28 April 2022

(रुबाई बेच देना)
गर किसी भूखे को रोटी मिल सके,
तो बड़े शौक से ऐ,रंग--------
किसी रईस को,
मेरी रुबाई बेच देना।

Tuesday, 26 April 2022

(शमीम रहती थी)
कभी सामने नीम के---------
एक घर था,
जिसमें मेंरी शमीम रहती थी।
वे महज़---------
एक खूबसुरत लड़की नही,
मेंरी चाहत थी।
बढ़ते-बढ़ते ये मुहल्ला हो गया,
फिर काॅलोनी बन गई,
हाय!री कंक्रिट--------
तेरी खातिर नीम कटा,
वे घर ढ़हा--------
जिसमें मेरी शमीम रहती थी।
अब तो बीमार सा बस,
डब-डबाई आँखो से तकने की खातिर,
यहाँ आता हूँ!
शुकून मिल जाता है इतने से भी,
ऐ,रंग-----------
कि यहाँ कभी,
मेरे दिल की हकिम रहती थी!
कभी सामने नीम के--------
एक घर था,
जिसमें मेरी शमीम रहती थी।

Sunday, 24 April 2022

बेटियो और बच्चियो के हर रोज हो रहे बलात्कार पे लिखी रचना.
                         (भयावह जंगल)
शहर की भीड़ मे भी हमने देखा है---------
कुछ आदमियो के अंदर का भयावह जंगल.
मासुम सा सीधा-साधा सा दिखने वाला-----
किसी बच्ची का अकेले मे जब रेप करता है,
और होठो पे कुत्सित हँसी दिखती है तो लगता है,
कि एक कमजोर सी चिड़ियाँ,तड़पेगी,चिचिआयेगी,
रहम की भीख मांगेगी,
मगर फिर भी निगल जायेगा उसे------------
इस शहर के कुछ आदमियो के अंदर का भयावह जंगल.
उसके पंख तितर-बितर हो जायेगे,
सबकुछ हा सबकुछ छिन लेगा,
चिड़ियाँ डरेगी,कापेगी,थरथरायेगी---------
फिर भी मजबुरी है जीना उसे भी ये भयावह जंगल.
उसकी डरी-सहमी खुली आँखो मे ये सवाल,
निरूत्तर सा रहेगा कि आखिर चिड़ियाँ,
किस नीड़,किस डाल,किस छाह जाये,
इस डर से वे रोज मरेगी,
बहुत घुटन है इस भीड़ मे,
बिटिया और चिड़ियाँ अब एक सी ही है,
न जाने दोनो को कब निगल जाये,
शहर के बाहर-----------------
और शहर के अंदर का भयावह जंगल.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी, मियाँपुर
जौनपुर-----222002  (उत्तर-प्रदेश).
no.no.----7800824758

Saturday, 23 April 2022

(मुमताज़ की आँखे)
है सबसे खुबसुरत मेरी मुमताज़ की आँखे,
कितना कशीश,कितना नशा लिये है-----
मेरी मुमताज़ की आँखे!
कभी यहाॅ उठे,कभी वहाँ उठे,
है कैमरे से कही अच्छि--------
मेरी मुमताज़ की आँखे।
है मेरा दिले परिंदा परवाज़ को बेचैन,
ऐ,रंग---आसमाँ है मेरी मुमताज़ की आँखे।
(मुमताज़ की आँखे)
है सबसे खुबसुरत मेरी मुमताज़ की आँखे,
कितना कशीश,कितना नशा लिये है-----
मेरी मुमताज़ की आँखे!
कभी यहाॅ उठे,कभी वहाँ उठे,
है कैमरे से कही अच्छि--------
मेरी मुमताज़ की आँखे।
है मेरा दिले परिंदा परवाज़ को बेचैन,
ऐ,रंग---आसमाँ है मेरी मुमताज़ की आँखे।

Tuesday, 19 April 2022

(मासूम को दूध)
जींस टी-शर्ट मे सिमटा माँ का वजुद,,,,,,,,,,
अब फिगर बिगड़ने के डर से,,,,,,,,,,,,,,
नही पिलाती ऐ,रंग-------------
माँ अपने मासूम को दूध।

Monday, 18 April 2022

सृजन वार्षिकी 2022-23 कथारंग संपादक:हरीश बी.शर्मा।बीकानेर से आज पहुँच गई।इसमें 17 राज्य के 59 नगरों के बेहतरीन रचनाकारों की रचनाओं को शामिल किया गया है।480 पृष्ठों के इस महाशाली अंक में अपना व्यंग्य पृष्ठ 64 पर "पांडेय जी सैर के बहाने अनगिनत यात्राएं" प्रकाशित हुआ है।इस अंक के लिए हरीश भाई व उनकी सक्रिय व समर्पित टीम बधाई की पात्र हैं।
आने वाली सभी परियोजनाओं के लिए अग्रिम बधाई।

#व्यंग्य

Saturday, 16 April 2022

आज के ही दिन दिल्ली से प्रकाशित सर्वप्रिय साप्ताहिक हिन्दी समातार पत्र "हमारा पुर्वाचल" मे बड़े भाई रामाअधार पाण्डेय जी ने मेरी कविता " लगाये बैठा है" को प्रकाशन का स्नेह दिया था.

Thursday, 14 April 2022

गायत्री प्रकाशन से प्रकाशित कथारंग का सृजन वार्षिकी 22-23 अंक प्राप्त हुआ..इसमेँ  कहानी कविता, निबंध लघुकथा, व्यंग्य,आलेख अनुवाद, उपन्यास अंश, नाटक, यात्रा वृतांत, संवाद, साक्षात्कार समीक्षा आदि सभी विधाओं को समाहित किया हैइससे यह अंक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक बन गया है..यह बहुत श्रमसाध्य काम था.सभी को सहेजना, संवारना ही  जटिल प्रक्रिया से गुजरना होता है.जिसे कथारंग के यशस्वी संपादक,लेखक डाँ.हरीश बी शर्मा  ने बहुत मेहनत, लगन से फलीभूत किया है.डाँ.हरीश बी शर्मा को बहुत बहुत बधाई.यह सुखद अनुभव है कि इसमें हमारा व्यंग्य पर केन्द्रित साक्षात्कार है जिसे वरिष्ठ लेखिका विनिता शर्मा ने लिया है..

Wednesday, 13 April 2022

(ठुमरी की रात है)
अजी बैठिये----------
मसनद से टेक लगाकर!
क्यूँकि आज-आपकी खिदमत मे--
इस शहर-ए-तवायफ़ के-----
ठुमरी की रात है।
1-----ठाकुर का कुँआ
गर अंबेड़कर न होते-------
तो चढ़ नही पाते तुम मंदिर की सिढ़ियाँ,,,,,,,
पीने नही देता तुम्हे पानी,ऐ-रंग------
आज भी ठाकुर का कुँआ।
            2----बुधुवा की लुगाई
दलित को ऐहसास अपनी ईज्ज़त का हुआ,
अब चीखती नही किसी भी कोठरी से----
ऐ-रंग----बुधुवा की लुगाई।

अंबेड़कर जयंती पर विशेष।

Monday, 11 April 2022

(माँ की हथेली में)
किसी भी बिमारी मे-----
मै ठीक हो जाता था बहुत जल्द!
क्योकि ऐ,रंग------
दवाओ से कही ज्यादा था असर,
मेरी माँ की हथेली में।
(कंगन उदास है)
विरह की सेज है,सिलवट है
करवट उदास है-------------
कि चले आओ परदेश से--कंगन उदास है।
जब से तुम गये हो न सजी-सँवरी,
यहाँ तलक कि-----------
कमरे का दर्पन उदास है।
कि चले आओ परदेश से--कंगन उदास है।
पाँव से निकाल करके रख दिया,
आपके पसंद की वे घुँघरू वाली पायल,
मै फिर पहन के थिरकुँगी आपके हाथो,
अभी तो उस पायल की छन-छन उदास है।
कि चले आओ परदेश से कंगन उदास है।

@@ Rangnath dubey

Sunday, 10 April 2022

(आँखे रोटियाँ पढ़ती है)
तेरे स्कूल के दाखिले निशूल्क है लेकिन,,,,,,
ऐ,रंग----जब पेट हो खाली-------
तो आँखे रोटियाँ पढ़ती है।
(तील का दाग देखा था)
वे घुँघट गायब है---------
जिसमें कभी कवियो ने चाँद देखा था!
वे नायिका विलुप्त हो गई इस सदी में,
ऐ,रंग--------
जिसके लरज़ते हुये होंठो पे,
कभी कवियो ने--------
तील का दाग देखा था।
(याद तुम्हारी नही गई)
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई,
वे पिंक से सूट मे तुम्हे देखना,
जैसे अभी कल की बात हो,
तुम गई तो बेशक---------
पर मेरी जेहन में ज्यो की त्यो तुम आज भी हो,
तुम्हारी कसम मौसम बदले,साल बदला
लेकिन तुम्हें चाहते रहने कि--------
मेरी खुमारी नही गई,
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई।
वे पतझड़ की हवा,
और उनकी शाखो से गिरते पत्ते,
और तुम्हारे कालेज से छुटने का वे वक़्त,
जब तुम्हारे खुले बाल,
हवाओ से इधर-उधर बिखर जाते थे,
फिर उन्हे तुम अपनी नाज़ुक अँगुलियो से,
जब पिछे की तरफ करती थी,
वे मेरा तुम्हे देखने का खूबसूरत लम्हा था,
मै आज भी उसी लम्हें से मोहब्बत करता हूँ,
सच तो ये है कि----------
बिना तुम्हारी याद के हमसे,
कोई दिन या रात गुजारी नही गई!
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर निर्मेश के त्यागी भईया जो आपने आज के काव्य-संग्रह के कालम मे"याद तुम्हारी नही गई" को अपना स्नेह देने के लिये।
(यही धारावी)
मै रोज थकी मांदी,
काम से लौटती हूं जीने------
यही धारावी।
वे चारपाई पे लेटा है,धुत्त कच्ची पिये
गंदी गालियाँ दे रहा,
अभी जबरदस्ती खीचेगा,
मै अपनी ऊबकाईयां रोके,
बर्दाश्त करुंगी एक बलात्कार,
फिर उठुंगी वे सो जायेगा,
थका मांदा!
मै उल्टीयां कर,
पुरे बदन से अपने एै,रंग-------
छुड़ाऊँगी सारी रात मै यही धारावी।
(नकाब देखा था)
वे नायिका विलुप्त हो गई इस सदी में,
जिसके लरज़ते हुये होंठो पे-------
कभी कवियो ने तील का दाग देखा था।
वे घुँघट का सौंदर्य कही खो गया,
जिसमें कभी कवि ने----------
अपनी कविताओ का चाँद देखा था।
अब तो तोड़ देती है वे दिल बे-मुरौवत,
ऐ,रंग---कभी शायरो ने
जिस लड़की में शीरी का अक्स़------
और फरहाद की मोहब्बत का नकाब देखा था।

Saturday, 9 April 2022

(भरपेट दूध मिलेगा)
झोपड़ी से------------
नरगिस के सिसकने की,
आवाज़ आ रही है!
ऐ,रंग----आज शायद,
उसके भूखे बेटे को-----
भरपेट दूध मिलेगा।

Wednesday, 6 April 2022

(आधा शहर कत्ल हो जाये)
उनके निगाहो की है,,,तासीर कुछ ऐसी,,,,
गर तबीयत से देख ले तो,,,,,,,,,,,
दावा है,ऐ,रंग--------
कि आधा शहर कत्ल हो जाये।
(मकान बेच आये)
नीम बेच आये,उसकी छाँव बेच आये!
जीस कमरे मे हमें माँ की लोरी सुलाती थी,
ऐ शहर तेरी ज़वा आगोश की खातीर,
हम वे मकान बेच आये।
(शाम आवारा भटकना चाहता हूँ)
देवताओ से उबन होने लगी है---------
मै कुछ शाम आवारा भटकना चाहता हूँ।
हर एक के ख्व़ाहिश के फूल की तरह,
मै किसी मंदिर-मस्जिद या कब्र पे चढू----
ये गवारा नही,
हाँ मै किसी तवायफ़ के गजरे से लग-----
एक रात ही सही महकना चाहता हूँ।
ये दावते रईशी के निवाले बहुत हुये,
मै किसी फुटपाथ पे-------------
उस हरामी बच्चे की तरह,
अखबार पे सुखी रोटियां रख,
मै भी शहर के नाले की बजबजाती बू के पास,
उस सरकारी नल के पानी से----------
कुछ कौर निगलना चाहता हूँ।
देवताओ से उबन होने लगी है"रंग"-------
मै कुछ शाम आवारा भटकना चाहता हूँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

Saturday, 2 April 2022

(प्यार की किताब)
हमारे और तुम्हारे प्यार की किताब,
पे महज़ जिम्मेदारियो कि धूल भर पड़ी है!
बाकी तुम वही हो और मै वही हूँ!
हाँ!कुछ पल मिल जाते है जब हम और तुम-----------
मिल के इस किताब की धूल को साफ करते है,
फिर पहले की तरह चमकने लगते है,
हमारे तुम्हारे प्यार के सारे हर्फ,
जिसे हमने-तुमने------
प्यार भरे उन दिनो मे लिखा था,
जब तुम-तुम थी और मै-मै था!
हाँ!याद करो जब घंटो हम,
एक दुसरे की शानो पर अपना सर रंखे,
शाम तलक सपने बुना करते थे,
आज उन्ही सपनो मे रंग भरने के लिये,
हम और तुम---------------
अपने दो मासूम जीवन फूलो की खातिर लगे है!
शायद या यकीनन हम फिर पढ़ेगे पहले की तरह ही----------
एक दूजे की शानो पर अपना सर रंखे,
पुराने दिनो की तरह ही-----------
अपने इस प्यार की किताब।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758