Monday, 30 September 2024

(राम एक कलाकार में खंडित हो गए)

(राम एक कलाकार में खंडित हो गये)
इंतज़ार कर रही है करके मेकप,
किसी ग्राहक का!
पत्थर की नहीं------------
अपने भूखे पापी पेट की अहिल्या।
आज गुलज़ार भी तो है,
कोठे वाली गली!
क्योंकि आज------------
दशहरे के राम और रावण की झांकी निकलनी है,
उसे याद है,
कि अगले बीते वर्ष भी वे इसी तरह,
मेकप किये अपने कोठे के छज्जे पे खड़ी थी,
तो राम बने कलाकार ने किस तरह काम उन्मुक्त नजरो से,
उसके उन स्तनो को तका था!
पहली बार दशहरे की---------------
उसकी वे पिड़ा असह्य थी!
क्योंकि इस कोठे वाली अहिल्या ने,
जिस राम को अब तलक सुना था,
वे राम जैसे-------------
इस कलाकार में खुद खंडित खड़े थे।

Sunday, 29 September 2024

(चंदन का धुंआ थी)

(चन्दन का धुआँ थी)
जो लड़की अभी यहाँ थी,
वे पीरो-फकीरो की दुआ थी।
उफ!अभी तलक है-
सांसो मे उसकी खुशबू,
ऐ रंग,-वे लड़की-
चन्दन का धुआँ थी।

(एक नई मासूम निर्भया)

हाथरस की घटना ने एक बार फिर हमे उस निर्भया की याद दिला दी, आप मेरे इस विचार या रचना से आहत हो सकते है, इसलिए इस रचना को पढ़े सहमत होना या ना होना आपके स्वविवेक पर है😢😢😢😢

(एक नई मासूम निर्भया )

निर्भया--------
जो चीखी,तड़पी,छटपटाई
उफ !------
तेरी विकृत कुंठा के 
डाले गये वे सरिये,
कितने घृणित थे!

काश तुम्हारी माँ ने कहा होता,
या तुमने-----------
अपनी सगी बहन के 
वे गुप्तांग याद किये होते,
तो तुम्हारा ज़मीर तुम्हें रोकता कचोटता,
कि ये पाप है,अन्याय है
और तुम कांप जाते!

हां ये जरूर हुआ कि 
तुम्हारी पशुता व अमानवियता से,
निर्भया-----
कुछ ही दिनो मे मर गई,
लेकिन तुम नही मरें, 

क्योंकि अगर तुम मरे होते, 
तो कतई नही, 
चीखती और तड़पती 
हाथरस में,
एक नई मासूम निर्भया. 

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है।

(जुलाहा हूं)

(जुलाहा हूँ)
मै पंडित नही------------
तेरी मस्जिद का अजा़न,
और तेरी बस्ती का जुलाहा हूँ।
देख लेता हूँ सारे कौमो का खुदा मै,
फिर बुनता हूं एक धागे से मुहब्बत की चादर,
मै कबीर सा हिन्दू ----------------
और उसकी मस्ती सा जुलाहा हूँ।
मुझे नापसंद है धुआँ अलग-अलग,
मुझे नापसंद है कुआँ अलग-अलग,
मुफ़लिस और रईस सब छके पानी,
आचमन और वज़ू सब एक से ही है,
ये सर जहां झुके---------
मै उस मिट्टी का जुलाहा हूँ।
हर मासूम हँसे खेले एक हो आँगन,
ना समझ सके वे राम और जुम्मन,
जिस गोद खुश हो जाये वे मासूम सी बच्ची,
एै "रंग" मै----------
एैसी हर उस बच्ची का जुलाहा हूँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Saturday, 28 September 2024

(फर्क है)

(फर्क है)
ना मुशायरा,ना कव्वाली,ना उर्स है,
चादर की बात कौन करे।
कभी इस जगह-
चराग भी जले क्या?
ऐ रंग-
यही एक मुफलिस दिवाने
और शहंशाह मे फर्क है।
[मुफलिस-गरीब]
रंगनाथ दुबे

(मेरी हीर लिए चल)

(मेरी हीर लिये चल)
मेरा दर्द,मेरी पीर लिये चल-----
ऐ भीड़---उस बेवफ़ा की,,,,,,,,,,
एक तस्ब़ीर लिये चल।
रुह़ानी गुफ्त़गु की खातिर ऐ,रंग-----
उसके घर की मिट्टी को-----
समझ मेरी हीर लिये चल।

(हाजी पीर)

(1965 की जंग और हाजी पीर)
आज भी उभर आती है बनके ताजी पीर,
हम कैसे भुले वे जंगे लम्हा,
जब एक-एक कर मर रहे थे------
हमारी बटालियन के बीर।
कैसे भुले हम उस अब्दुल को जो------
लहू से तरबतर कह रहा था,
अल फतह एै मादरे वतन------
तेरे लिये हाजी पीर।
वे जंग 65 की हम जीत तो गये,
पर हमारे घर के चंद सियासी गद्दारो ने,
गवा दिया अपने सुख के लिये मेज पे,
हम शहीदो के लहू से----------
जीता हुआ हाजी पीर।
वे घुसपैठिये या दहसतगर्द नही,
वे आर्मी थी दुश्मने पाक की-----
मेरे मूल्क ने मुआफ कर उन्हें,
झुका दिया सर हमारे हर बीर की।
आज भी चुभता है---------
मुझ रिटायर फौजी के सीने में,
जहां गोली लगी थी!
अब भी आवाज आती है मेरे कानो में एै,रंग---------
मेरे बटालियन के उस अमर शहीद अब्दुल की---------
जैसे कह रहा हो कि हम हार गये भाई,
अपने ही सरहद वालो से जो जीता था---
हमने इतनी शहादत से हाजी पीर।

@@@@1965 के पाकिस्तानी जंग में शहीद हुये तमाम शहीदो को मेरा सलाम।

Thursday, 26 September 2024

(दूरदर्शन)

दूरदर्शन अब काफी दूर हो चुका है क्योंकि वह उतना नायक और नायिका का दैहिक दर्शन नहीं दिखा पाता जितना की और चैनल आजकल दिखा रहे हैं✍️✍️

(यात्रीगण कृपया ध्यान दे)

आज, रश्मि प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशित वरिष्ठ कहानीकार राम नगीना मौर्य का साहित्यिक अनाउंसमेंट मुझे जैसे जनपद जौनपुर के साहित्यकार के कान से होते हुए दिल तक पहुंची. 

आइए हम आप आज की जिंदगी और उसकी कहानियों के "चारबाग स्टेशन" से उस साहित्यिक अनाउंसमेंट को सुने जहां से ये कहानियां कह रही है------

"यात्रीगण कृपया ध्यान दे ".

धन्यवाद, बड़े भैया आज आपका ये बेशक़ीमती कहानियों का शाहकार प्राप्त हुआ.

Tuesday, 24 September 2024

(पहले गान लिखूं)

(पहले गान लिखूँ)
कब तक जादू ,टोने का मै
अन्धा ज्ञान लिखूँ।
आज तो वे दिन आया है
कि,मै विज्ञान लिखूँ।
चाँद-सितारे,रूप-जवानी बाद की चीजे है,
धन्य! हुये माँ के बेटो का,
पहले गान लिखूँ।

विश्व शिखर होने पर(मंगलयान)-
                             रंगनाथ दुबे

(बरसात रहेगी)

(बरसात रहेगी)
ना पुछ किसके घर,किसके साथ रहेगी
मईया!तो हर घर मे,नवरात रहेगी।
बढेगी यश,कीर्ति और सम्पदा
ऐ रंग,-नवो दिन -
ये बरसात रहेगी।
   जय माता दी।-रंगनाथ दुबे

(जिबह खाने)

(ज़िबह खाने)
मै नही जानता स्वर्ग और जन्नत माने---
बस ये जानता हूँ ऐ,रंग-------
कल बे-ज़ूबानो के खूं से----------
तर हो जायेगे ज़िबह खाने।

(मेरे यार की बस्ती)

(मेरे यार की बस्ती)

कभी पतझड़ , कभी बहार की बस्ती
है शहर से दूर - 
मेरे गुनहगार की बस्ती ।
ऐ रंग ,- रूहे चैन की खातिर
ले चल मेरा जनाजा - 
मेरे यार की बस्ती ।

(पायल कर दे)

(छम से पायल कर दे )

भूख तब है, भूख 
जब रोटी की गंध पागल कर दे
प्यार तब है, प्यार 
जब कहीं से थके आओ, 
और बीवी सामने आंचल कर दे. 

गीत तब है 'रंग: गीत
जब उसकी खन से चूड़ी, 
और छम से पायल कर दें. 

@@@रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर (U P )
Mo.no. 7800824758

(मेहर का दुपट्टा)

उससे
मेरा तलाक तो हो गया लेकिन
ऐ "रंग",
मैं उसकी मोहब्बत की मेहर के
पहले दुप्पटे को,लौटा नही पाई .

(किडनी बेच दू)

(किडनी बेच दू)

मैं कहां कमा सका
दो वक्त की रोटी.
उस पर बिटिया सयानी हो गई 
सोचता हूं,कि 
मैं उसकी ब्याह की खातिर 
ऐ "रंग"––
शहर के किसी डॉक्टर को 
अपनी किडनी बेच दूं.😢😢

Monday, 23 September 2024

(एक गोल सी रोटी)

(चाँद )
अच्छा है चाँद------------
कि तु अभी तलक किसी के कब्ज़े मे नही,
वरना तेरा भी किसी रईस से---------
ये शाम तलक सौदा कर देते,
तु भी तड़पता किसी कमरे से सारी रात,
तुझे पिंजरे में कैद--------------
ये परिंदा कर देते।
फिर गरीब और मज़लूम-----------
कैसे तकता तुम्हे अपने खाली पेट,
कैसे कोई माँ सुलाती----------
अपने भूखे बच्चे को ये धोखा दे,
कि बेटा वे देखो---------
तवे पे भगवान पका रहे है,
तुम्हारे लिये एक गोल सी रोटी,
सो जाओ!
चाँद तुम एक उम्मीद हो गर इनके हाथ
लग जाते---------
तो ये तुम्हे किसी रईस के आँगन तक का
एक ब्याज़ के कर्ज़ से बिंधा--------
न भर पाने वाला कारिंदा कर देते।

Sunday, 22 September 2024

(रेगमाल सी जिंदगी)

(रेगमाल सी जिंदगी)
कौन नही बुनता-----------
जुलाहे के कालीन सी जिंदगी!
तरह-तरह के धागे में पिरो,
कौन नही देखना चाहता मुकम्मल अपना शाहकार,
पर हो नही पाता ज्यो का त्यो चाहा,
फंस के खत्म हो जाती है मछली सी----
किसी मछेरे के जाल सी जिंदगी।
सारी ख्व़ाहिशे धरी रह जाती है,
एक-एक कर खत्म होती जाती है,
एै रंग------------------
यहां पे सबकी है रेगमाल सी जिंदगी।

(जवा कातिल फरेब है)

(जवां कातिल फरेब है)
वे इतनी खूबसुरत है कि--------
हर एक दिले कत्ल पे मूस्कुराती है।
ऐ,रंग----वे औरत नही-------
एक जवां कातिल फरेब़ है।

(खजुराहो का पत्थर)

(khajuraho ke patthar)
bnaya hai ek klakar ne tap kar ,
kamuk nhi uski murtiya kewl ,
ek jaadu hai "rang" 
wrna hme apni trf bulaate hai,
khajuraho ke patthar.

(प्यासा के गुरुदत्त सा)

(pyaasa ke guru dtt sa)
mai pdh ke bahut jaar-jaar roya,
ve uska aakhiri khat tha,
ae"rang" isk me ; mai bhi mra,
"pyaasa" ke guru dtt sa.

(दीपिका दिलरुबा सिगरेट है)

( दीपिका दिलरुबा सिगरेट है)

दीपिका------
तेरे आवारा होंठ की 
ये जुंबिश
ये कश, ये धुँआ, ये नशा 
और उसकी कशिश 
तेरी आँखों में उत्तर आना, 

उफ ! वाकई----
तु एक लाजवाब हीरोइन है, 
तुम्हें पाने और देखने की ये बेचैनी, 
ये चाहत, 
किसी ड्रग्स से कम नही, 

तु इतने इल्जामों के बाद भी, 
एक-----
दिलरुबा सिगरेट है. 

@@@रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जौनपुर mo.no.7800824758

Saturday, 21 September 2024

(बेवा की जमीन)

(Bewa ki jmin)
hai bda muskil siyast pe ykin,
ye aise sanp hai , jin pe kar aamd,
nhi koi bin ,
ae "Rang" ye din me kat,te hai chek ,
aur raato ko hdpte hai ,
bewa ki jmin.

(टूटी हुई गुड़िया)

(टुटी हुई गुड़िया)
गौर से देखती है,वे अक्सर बंद कमरे मे--
ऐ,रंग-------
वे टुटा हुआ गुड्डा और टुटी हुई गुड़िया।

(दो घाव हो गए)

( दो घाव हो गए)

जीन उरोजों को ढ़क, 
वे मासूम देखती थी, 
कभी वात्सल्य का सपना, 
 ए "रंग"-------

उसके वही दोनों उरोज, 
गरीबी के चलते, 
दो घाव हो गए. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी, 
जट कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर उत्तर प्रदेश
मोबाइल नंबर--7800824758

Friday, 20 September 2024

(मोबाइल के नेटवर्क में है)

(मोबाइल के नेटवर्क में)

ऑन लाइन कपड़े उतारने वाली पीढ़ी 
इश्क क्या जाने?
कि किस तरह एक लड़की 
घंटो अकेले में 
अपने महबूब से मिलकर 
वह बिल्कुल महफूज़ 
अपने लौट आती थी .
आज तो सीने का दुपट्टा भी 
उतार देती है 
एक पूरी बेहयाई 
मोबाइल के नेटवर्क में है.

इस रचना का आसय किसी को ठेस पहुंचाना नहीं है.

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियाँपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

(पिता बो नही पाए)

(पिता बो नही पाए)

मैं तेरे वंश को चलाने के लिए
एक बार फिर 
अपनी कोख में कुछ बो नही सकती.

दो बार बोया तो बेटियां हुई 
मासूम,चंचल,कोमल 
इन्हें प्यार दो 
ये भी वंश है 
हा अगर तुम नही माने 
और तुम्हारी मां जिद पर अड़ी रही 
तो अब तुम भी 
मेरे स्त्रीत्व को बरगलाकर 
मेरी कोख में 
कुछ नया बो नही सकते.

सब कमी दोष मुझी में था 
तुम पुरूष हो 
तुम्हें दंभ हैं 
अपने पुरूष होने के शुक्राणुओं पर 
सच तो यह है 
कि सारी कमी तुममे है 
क्योंकि तुम 
अभी तक अपने मन में 
एक पिता बो नही पाए.

✍️✍️यह स्वरचित और अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियाँपुर 
जिला--222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

(बूढ़े पिता का कंपकपाता हाथ)

(बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ)
कल शहीद की चीता जला रहा बाप---
रो रहा था!
तभी किसी ने कंधे पे रंखा हाथ,
तो वे चीख पड़ा-----------
कि रहने दो कंधे पे मत रंखो,
इस देश के ये नपुंसक हाथ!
जरुरत नही,
इतनी ही सहानुभूति है मेरे शहीद बेटे से,
तो कहो देश की सियासत से,
कि ला दे-------------
उस हाफिज़ सईद का कटा हाथ,
नही ला सकता ना जानता हूं,
इसी जगह फिर सजेगी,
कुछ फौजी बजायेंगे मातमी धुन,
और अपने शहीद बेटे की चीता को,
आग देगा--------------
किसी बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ।

@@@उरी के तमाम शहीदो को मेरा सलाम।

Tuesday, 17 September 2024

(ताज का पत्थर)

(taj ka patthar)
gaur se dekho siskta hai,
             taj ka patthar.
dard ki had hoti hai, chitkta hai,
             taj ka patthar.
shahanshahe hind pe, ek katl hai aayd,
               tbhi to kbra pe bnke aanshu ,
       ae "rang" tpkta hai ,
        taj ka patthar.

(घुंघरू बांधती थी)

(घूँघरु बांधती थी)
रईसो के दरमियाँ वे सलिके से आती थी,
कभी ठुमरी,कभी दादरा गाती थी।
ऐ,रंग-----------
वे पाक थी कोठे पे सुना है,
कि वे केवल पाँव मे घूँघरु बांधती थी।

(तवायफ की कब्र है)

(तवायफ़ की कब्र है)

यहाँ चराग नही जलते,
कोई चादर नही चढ़ती!
ये शहर की मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है.

आज भी करती है,ये रुहें मूज़रा,
फिर फूट के रोती है.

ऐ,रंग---
बस आ जाते है खिज़ा में,
दरख्त़ो के चंद पत्ते------
आवारगी करने।
ये शहर की मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी 
जज कालोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (U P)
Mo. no. 7800824758

Monday, 16 September 2024

(तीज हूं मैं)

(तीज हूँ मै)
तेरी खुशियो के लिये-------
कभी बांदी,तो कभी कनीज़ हूँ मै।
खड़ी हूँ तेरे घर लौट आने तलक-----
तेरी चौखट,तो कभी दहलीज़ हूँ मै।
मालिक भी हूँ,तेरे दिल की ऐ पी मेरे,,,,,,,,,
तेरी खातिर--------
कभी करवा चौथ,तो कभी तीज हूँ मै।

Sunday, 15 September 2024

(चुपके से बचपना)

(chupke se bchpna)
tera alhadpan,chidiyo sa fudakna,
ye kya?
jhuki nazar , angudhe se mitti kurchna
ae "rang" nikl gya kitne chupke se bchpna.

(बुद्ध की जमीन)

(buddh ki jmin)
chhal, fareb, dhokha teri rgo me hai,
tu dhundhta hai ab bhi yuddh ki jmin.
mehman nwaji ham aaj bhi krte hai,
rasiya ho ya chin,
aana to mohbbat se chumna ae "rang" 
hai pak utni ab bhi , buddh ki jmin.

chini rastrapti ke aagmn par.

(नीलकमल)

(नील-कमल)
तड़पता है,सिसकता है,बुलाता है कोई नील-कमल-----
सदियो चुनी दिवाल से,गाता है कोई नील-कमल।
एै "रंग" किसी यूग में------------
कोई पाता है कहाँ नील-कमल।

(पत्थरों का घर)

(parindo ka ghar)
masini ho gya shahari basindo ka ghar,
nikl aata hu , kafi dur mai tnha ,
aur dekhta hu "rang" bnte parindo ka ghar.

Saturday, 14 September 2024

(हिंदी में लोरी थी)

(हिन्दी मे लोरी थी)
कभी श्याम थी,कभी गोरी थी,,,,,,,,,,,
हिन्दी ब्रज की छोरी थी।
माँ लल्ला को अपने-------
जो कभी थपकी दे गाती थी,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----वे हिन्दी मे लोरी थी।

Friday, 13 September 2024

(इतिहास चुप है)

(itihas chup hai)
sonaganchhi ki tawayaf pe,
itihas chup hai.
we galij thi, ujale ki,
shahar bha me,
wrna usne khanjar se ,
firngi ko cheer dala.
kya kare aakhir pani ka kunwa,
"rang" rahiso ke ghar ka gilas chup hai.

(नेपाल की लड़की)

(nepal ki ladki)
surmai aankho , aur khule baal ki ladki,
sayar hu pasand hai, mujhko,
sham pahado ki,
aur baaho me nepal ki ladki.

Thursday, 12 September 2024

(तेरी लोरिया होती)

(loriyan hoti)
bachpan hota ,bachpan ki choriyan hoti,
maa mai sukun se sota -
is patthar ke sahar me , agar tu hoti
aur teri loriyan hoti.

(तलाक ना दो)

( talak n do)
rkh lo tum mehr pr sak n do,
khushi n de sk to khak n do.
main g longi ta umr tnha,
meri pakija mohbbat ko , 
u talak n do.

Tuesday, 10 September 2024

(उमराव जान)

(umrao jaan)
wahi chhat , wahi chhajje, wahi daalan
lacknow mai ab gar nhi to kewl-
ruswa ki umrao jaan.

(शमा गाएगी)

(शमा गायेगी)
तेरे निकाह की रात में--------
शमा गायेगी।
आँखे रोयेंगी मेरी,बीना आँसू 
अंदर एक ताजमहल टुटेगा-----
और शमा गायेगी।
तु अगर सोयेगा भी--------
अपनी सेजे मोहब्बत!
तो तेरी शरिके हयात की हर चुड़ी से---
शमा गायेगी।
तु तड़पेगा मेरी सदा से भागने वाले,
कभी बच न सकेगा!
क्योंकि इस कायनात के हर जर्रे से----
शमा गायेगी।

अनुभूति गुप्ता

मेरी साहित्यिक मित्र डॉक्टर अनुभूति गुप्ता जो कि,आज किसी परिचय की मोहताज नही,उनके खुद का अपना "उदीप्त प्रकाशन" नाम से एक प्रकाशन संस्था है.उन्होने कुछ बेहतरीन साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन भी किया है, इसके साथ ही वह देश की बहुचर्चित चित्रकार, साहित्यकार,जिनके बनाए चित्र हंस से लेकर वागर्थ,आजकल, साहित्य अमृत, पाखी आदि पत्रिकाओं की कहानियों, कविताओं और लेखो में जान डालते रहे है और इतना ही नही उनके बनाएं हुए विभिन्न चित्रों के लिए देश की प्रमुख संस्थाओं ने सम्मानित व पुरस्कृत भी किया है.ऐसे में मेरी इस रचना के रेखांकन के लिए मैं अपने इस ऑल इन वन मित्र को अपना बहुत-बहुत धन्यवाद प्रेषित करता हूं ✍️✍️🙏🙏

Sunday, 8 September 2024

(मेरी रूह कैद है)

(मेरी रुह कैद है)
ऐ बेवफ़ा मुझे आजाद कर दे,,,,,,,,
क्यूकि तेरे शहर मे---------
अब तलक मेरी रुह कैद है।

(तेरे शहर में)

(तेरे शहर में)
तेरे शहर में--------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।
ले लेना तुम हमारी गज़ल का जर्रा-जर्रा,
कोई बंदिश नही----------
यहाँ जाफ़रान की खुशबू है हर शख्स़ की खातिर,
यहाँ न कोई कौम न मज़हब और----------
ना ही सरियत है।
तुम्हारें शहर में--------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।
आहिस्ता-आहिस्ता उतरेगा जे़हन मे तेरे,
इन लफ्ज़ो का गुलाबीपन,
मै याद आऊँगा तुम्हारें शहर को,
यहाँ से जाने के बाद भी,
क्योंकि मोहब्बत ही एै "रंग"--------
इस अदब के दिवान की नियत है।
तुम्हारें शहर में------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

Saturday, 7 September 2024

(छत पर परिंदे नही आते)

(छत पे परिंदे नही आते)
हमने अपनी माँ का कहा नही माना,,,
ऐ,रंग----अब इसी से शायद----
हमारे छत पे परिंदे नही आते।

Friday, 6 September 2024

(मंदिर मस्जिद मकान सा लगता है)

(मंदिर और मस्जिद मकान सा लगता है)
हमने देखी है---------
दंगे मे अल्लाह और राम की लाशे,
ऐ,रंग----तब से हमे-----
ये मंदिर और मस्जिद एक मकान सा लगता है।

(मिट्टी से जुदा मत करना)

(मिट्टी से जुदा मत करना)
बेटे मै बुढ़ि हो गई हूँ-------------
मुझे इस उम्र में अपने अब्बु से जुदा मत करना।
ना बेचना किसी को-------------
दरवाज़े पे जो उन्होनें लगाया है दरख्त़,
मै उसी से बतियाती हूँ अक्सर,
मुझे दर्द होगा------------
जब कोई काटेगा टंगारे से तेरी अब्बु की याद को।
बेटा बेशक तु मुझे हज़ ना कराना,
पर लेने देना मुझे आखिरी साँस इस मकान में,
मर जाऊँ तो तेरा हक है इस पर,
पर जीते जी मेरे बेटे,
अपनी इस अम्मी को अपने अब्बु के-----
इस मुकद्दस मिट्टी से जुदा मत करना।

Wednesday, 4 September 2024

(शिक्षक दिवस है)

(शिक्षक दिवश है)
ना पहले सी किर्ति,ना पहले सा यश है---
सरकारी तरिके से शिक्षक विवश है।
स्कूलो मे जिसने कदम भी न रंखा-----
उसी के लिये,रंग---शिक्षक दिवश है।

(चूड़ियां तीज कहती है)

(चुड़ियाँ तीज की)
पहली बार आपने ही तो पहनाई थी,
मेरी कलाई में ये चुड़ियाँ तीज की।
तब से अब तलक मेरी कलाई के साजन,
आपको ही बुलाती है सब के बीच से,
चुपके से----------------
खनक के ये चुड़ियाँ तीज की।
आप भी उठ आते है कर बहाना,
चुपके से पकड़ने हमें किसी तरह,
मै शर्मा जाती हूँ!
तो उस शर्म की घड़ी में,
बोलती है आपसे---------
ये चुड़ियाँ तीज की।
है मेरी इच्छा,है मेरी पूजा 
कि सलामत रहे आप मै सुहागन रहुं,
आप पहनाते रहे इस कलाई मे मेरे,
मै पहनती रहुं आपसे उम्र भर------
ये चुड़ियाँ तीज की।

(तंज)

✍️✍️हिंदी साहित्य को अपने ही देश के  शेक्सपियर ने मार दिया😢😢

Tuesday, 3 September 2024

(चूड़ियों की भाषा)

(चुड़ियो की भाषा)
हाँ मै औरतो के चुड़ियो की भाषा जानता हूँ----------
क्यूकि एक लय है दर्द का,,
और एक लय है खुशी की-------!
लाख छिपाये कोई चुड़ियाँ अपनी,,,
मै फिर भी----------
बीना उसके खनके ही जान जाता हूँ।
हाँ!मै औरतो के चुड़ियो की भाषा जानता हूँ।

(तीन मर्तबा तलाक)

(तीन मर्तबा तिलाक)
एक औरत---------
किसी सरिया के नाम पे
कैसे हो सकती है मजाक।
कैसे-----------
लिख सकता है कोई शौहर,
अपनी अँगुलियो से इतनी दुर रहके,
मोबाइल के वाट्सप पे----------
तीन मर्तबा तिलाक।
नही अब औरत को भी----------
उसके हिस्से की इस्लामिक ताकत बख्श़ो,
उसे भी हक दो!
कि वे ले सके एैसे मर्द से एै,रंग--------
तीन मर्तबा तिलाक।
@@@रचयिता-------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।

(बेवफा माचिस)

( बेवफा माचिस)

जल गया-------
मोहब्बत के धोखे में, 
जब सुशांत ने छुआ, 
ये रीया माचिस. 

अपने रूप और यौवन की, 
तीली से--- 
इसने ऐसा जलाया
कि मोहब्बत के चारों तरफ
दिखने लगा, 
सुशांत को अपनी खुदकुशी का, 
ये दिलफ़रेब---
और धुंआ माचिस. 

आओ बचे, 
कहीं ऐसा ना हो कि 
शहर दर शहर, 
जान लेती फिरे ए "रंग "
ये बेवफा माचिस. 

यह मेरा स्वरचित रचना है. 
@@@ रंगनाथ द्विवेदी
 जज कॉलोनी, मियापुर
 जिला जौनपुर( उत्तर प्रदेश)
 मोबाइल नंबर---7800824758

Monday, 2 September 2024

(मर्सिया लिखना है)

(मरसिया लिखना है)
अभी तो बस यादो के चराग जले है---
ऐ,रंग----अभी तो हमे सारी रात------
उस बेवफा पे मरसिया लिखना है।

(मैं लिखता हूं कोई गीत)

(मै लिखता हूँ कोई गीत)
जब बेचैन कर देता है------------
मेरे अंदर का मरुस्थल मुझको,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
शब्द के होंठ पे चुभती है कोई नागफनी,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब पथ की रेत पे-----------
चलता जाता हूँ दूर पथिक सा
और फूट जाते है पाँव के छाले,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
बहुत सन्नाटा मेरे भीतर का,
उधेड़ता है मुझको---------
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
बोता हूँ रेत पे कुछ शब्द,
पर कटिले वृक्ष के विरवे ही पनपते है,
उन्ही वृक्षो की------------
खरोंच जब आ जाती है बन के पीर,
तब मै लिखता हूँ कोई गीत।

Sunday, 1 September 2024

(दिवाली नही आई)

(दिवाली नही आई)
भरपेट भोजन की थाली नही आई,
कुछ एैसे भी घर है----------
जहां दिवाली नही आई।
रो रही घर में---------
तक-तक के दरवाजे को भूखी बेटिया,
उन्हे अपनी माँ की बुलाती आवाज़,
प्यार भरी थपकी,
छोटी बिटिया के खुशीयो की------
वे ताली नही आई!
अभी तलक----------
लौट कर इस घर की दिवाली नही आई।
सुबह के धुधलके में--------
दो पुलिसिये चादर में लपेटकर,
लाये थे नग्न लाश!
बेटिया डर गई,
एकटक देखा कि कौन है?
फिर माँ कह झिंझोडा--------
लेकिन उसकी माँ की खुली आँखो ने तका नही,
पहली बार-उसकी माँ के चेहरे पे
कोई लाली नही आई।
ये बेटिया क्या जाने?
कि करोड़ो के पटाखो में दब गई,
इनके माँ की सिसकिया!
देख लो आज तुम भी मेरी कविता,
इसके बदन पे हवस के निशान-----
ये आज भी अपने घर खाली नही आई,
ये और बात है कि----------
इसके घर कोई दिवाली नही आई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

----शायद कुछ एैसे वंचित घर है जहां दिवाली नही आती,फिर भी ईश्वर हर घर को रौशनी दे।

(राम एक कलाकार में खंडित हो गए)

(राम एक कलाकार में खंडित हो गये)
इंतज़ार कर रही है करके मेकप,
किसी ग्राहक का!
पत्थर की नहीं------------
अपने भूखे पापी पेट की अहिल्या।
आज गुलज़ार भी तो है,
कोठे वाली गली!
क्योंकि आज------------
दशहरे के राम और रावण की झांकी निकलनी है,
उसे याद है,
कि अगले बीते वर्ष भी वे इसी तरह,
मेकप किये अपने कोठे के छज्जे पे खड़ी थी,
तो राम बने कलाकार ने किस तरह काम उन्मुक्त नजरो से,
उसके उन स्तनो को तका था!
पहली बार दशहरे की---------------
उसकी वे पिड़ा असह्य थी!
क्योंकि इस कोठे वाली अहिल्या ने,
जिस राम को अब तलक सुना था,
वे राम जैसे-------------
इस कलाकार में खुद खंडित खड़े थे।

(बेगुनाह रावण जल रहा है)

(बेगुनाह रावण जल रहा है)
अब रावण का चरित्र---------
रामलीला में खल रहा है!
बेचारा------------
एक सीता के नाते प्रतिवर्ष जल रहा है।
एै दिल्ली--------------
जबकि तु लंका से गई बीती है,
क्योंकि रेप और बलात्कार,
तेरी सड़को पे चल रहा है,
और बेवजह---------
दशहरे में रावण जल रहा है।
अब वक्त आ गया है कि,
तेरी सदन में---------
रावण की समिक्षा होनी चाहिये!
क्योंकि अपनी सीता को,
अब रावण से कही ज्यादा,
उसका राम छल रहा है,
और दशहरे में एै,रंग------
बेगुनाह रावण जल रहा है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.---7800824758
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
आप सभी को नौरात्र और दशहरे की ढ़ेर सारी बधाई।