Monday, 31 July 2023

(दीवाना रोया है)

(दिवाना रोया है)
ये जो सारी रात------------
शहर मे बरसात हुई है,
कही किसी की याद मे----
कोई दिवाना रोया है।
ये बिजली,ये चमक--------
किसी बंद हवेली के जले चराग से,
लिपट------------------
आखरी लम्हे कोई परवाना रोया है।
कल सहर के बाद--------------
निकल के देखना तुम आलमे बारिश,
एक हमी है जो जानेगे,
कि कल सारी रात तड़प के----
किसी का अफसाना रोया है।
ये जो सारी रात--------------
शहर मे बरसात हुई है,
एै,रंग------किसी की याद मे,
कोई दिवाना रोया है।

Sunday, 30 July 2023

(तलाक था)

देश की इतनी लम्बी आजादी के बाद पहली मर्तबा मुस्लिम बेगुनाह औरतों को एक जिल्लत और दोजख़ की जिन्दगी से निजात मिली है. बधाई🇮🇳🇮🇳🇮🇳✍️🙏

(तलाक़ था)

औरत अगर बगावत न करती,
तो क्या करती----
जिसने अपना सबकुछ दे दिया, तुम्हें,
उसके हिस्से----
केवल सादे कागज़ पे लिखा,
तीन मर्तबा तलाक़ था.
इस्लाम और सरिया की ,
इज्ज़त कब इसने नहीं की,
फिर क्यों ?आखिर ----
केवल मर्दों के चाहे तलाक़ था.
मैं हलाला से गुजरू और 
सोऊँ किसी गैर के पहलू,
फिर मुझे वो छोड़े----
उफ ! मेरे हिस्से में ,
ऐ खुदा ! ----
कितना घिनौना तल़ाक था.
महज मेहर के रकम से कैसे?
गुजारती जिन्दगी,
दो बच्चे मेरे हिस्से देना,
आखिर , मेरे शौहर का ,
ये कैसा इंसाफ़ था.
मैं पुछती हूँ, बताओ--
मस्जिदों और खुदा के आलिम़-हाज़िल,
कि आख़िर-----
मुझ बेगुनाह को छोड़ देना ,
कुरान की किस ----
आयत का तलाक़ था.

रचनाकार -- रंगनाथ द्विवेदी

(भाई के बांधे चीर पर)

(भाई के बांधे चीर पर)
जुये में द्रोपदी को हारकर-------
जब झुक गये पतियो के सर,
गुँगी हो गई सभा-------------
रो उठी फिर द्रोपदी,
अपने इस तकदीर पर।
वे भी जुआ खेल गई आखिरी लम्हे----
अपने कृष्ण जैसे बीर।
दौड़ पड़े नंगे पाँव कृष्ण भी-----
तब बहन की पीर पर।
गर न आते टूट जाती रस्म राखी की,
फिर कोई भाई ना आता मायके से,
ना फक्र करती एक बहन,
दूःख के दिनो में------------
अपने भाई को बांधे चीर पर।

###रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
@@@आप सभी को रक्षाबंधन पर्व की ढ़ेरो बधाई।

(बहन की राखी है)

(बहन की राखी है)
एक तरफ दुश्मन की गोलियां,
एक तरफ-----------------------
आज तेरे फौज वाले भाई की छाती है।
मुआफ करना बहन----------
शायद मै आ न सकुंगा!
मै जानता हु कि तुझसे किया-------
एक अहद एक वचन बाकी है।
गर हो सके तो फक्र करना,
अपने शहीद भाई पे!
सुना है शहीद की मौत पर भी,
हमारे मुल्क की बहन करके दिया,
बीना रोये घंटो आरती गाती है।
एै,रंग----------------------
तु भी देख लहराते तिरंगे की तरफ,
उसी में बंधी---------------------
हर बहन की राखी है।

####आप सभी को रक्षाबंधन पर्व की ढ़ेरो बधाई।

(पंद्रह अगस्त)

(पन्द्रह अगस्त)
अपनो के ही हाथो----
सरसैंया पे पिड़ाओ के तीर से विंधा,
भीष्म सा पड़ा है----
पन्द्रह अगस्त.

सड़को पे द्रोपदी के रेप के दृश्यो ने,
फिर भर दी है आजाद देश के
उन तमाम शहीदो की आँखे,
और उनकी रुह के सामने!
शर्म से खड़ा है----
पन्द्रह अगस्त.

बहुत बिरान है मजा़रे कही मेला नही लगता,
ये सच है-----
कि हम शहिदो की शहादत के दगाबाज है,
फिर भी एै,रंग-------------
ये लहराते तिरंगे कह रहे,
कि हमारी तुम्हारी सोच से भी कही ज्यादा,
विशाल और बड़ा है-----
पन्द्रह अगस्त. 

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है. 

रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

(दोस्ती कागज़ के नाव की थी)

कविता-----(दोस्ती कागज के नाव की थी )

उसकी और मेरी दोस्ती
कागज़ के नाव की थी.
आम-अमरुद,बरगद,पीपल और
दरवाजे पे लगे 
नीम के छाँव की थी.

उसकी और मेरी दोस्ती
कागज़ के नाव की थी.

साथ मे घुमना 
और घंटो टहलना,
खेत की पगडंडियो पे चलना,
सच ए शहर--
बीना स्वार्थ और मतलब के 
कितनी पाकिज़ा दोस्ती,
हम दोनो के गाँव की थी.

उसकी और मेरी दोस्ती
कागज़ के नाव की थी.

कितनी डांटे सही,
कितनी शिकायते सुनी,
माँ के चाटे खाये-
फिर भी चोरी से मिलते रहे दोनो,
क्योंकि वे दोस्ती
हम दोनो के बेइंतहा लगाव की थी.

उसकी और मेरी दोस्ती
कागज़ के नाव की थी.

कंचे खेले,
आम के बाग से अंबिया तोड़ी,
साथ पोखर नहाए 
दोस्ती के वे सारे मखमली दिन 
छिन गये,
रोटी की हत्तक मे 
कहाँ से कहाँ चले आए,
ए "रंग" 
याद इसलिए है जेहन को,
क्योंकि वे दोस्ती,
हम दोनो के
दो जिस्म 
मगर एक जान की थी.

उसकी और मेरी दोस्ती
कागज़ के नाव की थी.

यह कविता मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है  

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P )
mo.no.------7800824758

Saturday, 29 July 2023

(रोटी गाती रही)

(रोटी गाती रही)
भूखी माँ सूबह तलक---------
भूख से बिलबिलाती बेटी के लिये,,,,,,,,,
लोरी गाती रही।
पड़ोसियो ने कहा बेटी मर गई-------
ऐ,रंग----वे इस सबसे बेखबर-------
कहके चाँद को रोटी गाती रही।

(रेप के घाव)

(रेप के घाव)
थाने पे--------
एक गरीब की बिटिया,
अपनी सलवार उतारे---------
जगह-जगह हुये रेप के घाव दिखा रही है।
दरोगा----------
बार-बार थप थपाके देख रहा,
दाँत और नाखून चुभे---------
उरोजो को बार-बार।
लड़की सिहर उठी---उसी रेप के छुअन कासा,
ऐहसास हुआ उसे!
वे समझ गई आँख भर-भरा आई उसकी,
कि अब एक रात और चीखेगी थाने पे,
फिर हरे हो जायेंगे---------------
ना भरने के लिये उसकी उरोजो पे ताजिंदगी,
एै,रंग-----------ये रेप के घाव।

(देवता कौन है?)

(देवता कौन है?)
अधर पे गलिज़गी है सबके---------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
खामि अय्यासपन की तकती है जवान लड़की,
आखिर बताओ----------
तुम्हारे घर की जवान लड़की को तकता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके--------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
गरीब क्या जाने,हदीस,तकरीर,मज़हब,
वे रोटी की खातिर--------
मजदूरी मंदिर और मस्जिद दोनो मे कर रहा है,
आखिर इन्हें----------
हिन्दू और मुसलमान कहता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके--------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।
हर दंगे मे जलते है घर तबाह होती है बस्तियाँ,
इन घरो मे तो जिंदा इंसान रहते है,
एै "रंग" बताओ तुम्हें गीता और कुरान की कसम,
कि आखिर-----------
इस मंदिर और मस्जिद मे रहता कौन है?।
अधर पे गलिज़गी है सबके---------
तो फिर इस शहर मे देवता कौन है?।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-------7800824758

(सखी हे!रे बदरवा)

बारिश ने अचानक से रोमांटिक कर दिया😎😎

       (सखी!हे रे बदरवा)

तन मन भिगोए सखी! हे रे बदरवा
करे छेड़खानी मोहे छेड़े बदरवा.

सिहर-सिहर जाऊँ शरमाऊँ इत-उत,
मोहे पिया की तरह सखी!घेरे बदरवा.

तन-मन भिगोए सखी! हे रे बदरवा.

चुंबन पर चुंबन की है झड़ी,
बूंद-बूंद चुंबन सखी!ले रे बदरवा.

तन-मन भिगोए सखी!हे रे बदरवा.

अंखियों को खोलू अंखियों को मूंदु
जैसे मेरी अंखियों में कुछ सखी! ढुढ़े बदरवा.

तन-मन भिगोए सखी! हे रे बदरवा.

मेरी यौवन का आंचल छत पर गिरा,
मेरी रुप का पढ़े मेघदुतम सखी! हे रे बदरवा.

तन-मन भिगोए सखी हे रे बदरवा.

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)

Friday, 28 July 2023

(पहली सी दिवाली ना रही)

( पहली सी दिवाली न रही )
वे पोखर न रहा, वे चाकी न रही
अब मेरे गाँव मे--------
पहली सी दिवाली न रही.
वे अगले जन्म घर के मासूम बच्चो को छछुंदर होने से, 
बचाने के लिये,
घर मे एक बड़े से दियले मे--------
काजल पालने वाली काकी न रही.
वे उल्लास, वे पटाखे, थोड़े मे खुश हो जाना,
कितना सोंधापन था,
आज चाईनीज़ टिमटिमाते झालर जल रहे,
लेकिन उनमें---------
वे प्यार व छुअन कही बाकी न रही.
अब तो बस पथरायापन ही खुरचना है,
क्योंकि माँ के साथ बैठ,
कमरे मे एक-एक दिये मे तेल रखती,
हमारें गाँव की-----
रुपाली न रही.
वे पोखर न रहा,वे चाकी न रही
अब मेरे गाँव मे------
पहली सी दिवाली न रही.

@@@रचनाकार----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Thursday, 27 July 2023

(सावन अठारह साल की लड़की है)

( सावन अट्ठारह साल की लड़की है)
सावन-----------
सीधे-साधे गाँव की,
एक अट्ठारह साल की लड़की है.
भाभी की चुहल और शरारत,
बाँहों मे भरके कसना-छोड़ना,
एक सिहरन से भर उठी-------
वे सुर्ख से गाल की लड़की है.
सावन--------
सीधे-साधे गाँव की,
एक अट्ठारह साल की लड़की है.
वे उसका धान की खेतों से तर-बतर,
बारिश मे भीगते हुये,
घर की तरफ लौटना,
और उस लौटने मे उसके,
पाँव की सकुचाहट,
उफ! गाँव मे सावन--------
बहुत ही मादक और कमाल की लड़की है.
सावन---------
सीधे-साधे गाँव की,
एक अट्ठारह साल की लड़की है.
न शायर,न कवि, न नज़्म, न कविता
वे उर्दू और हिन्दी दोनो से कही ऊपर,
किसी देवता,फरिश्ते के हाथ से छुटी,
इस जमीं पे उनके--------
खयाल की लड़की है.
सावन----------
सीधे-साधे गाँव की,
एक अट्ठारह साल की लड़की है.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला---जौनपुर--222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.-----7800824758.

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Tuesday, 25 July 2023

(ब्राह्मण और तुर्क)

(ब्राह्मन और तुर्क)
लड़ गये थे-----------------
ज़मीने हिंद की खातिर,
कभी इस कबीले के बुज़ुर्ग।
बटे नही एक थाली थी खाने की,
साथ बैठे थे ब्राह्मन और तुर्क।
वे बुत और सुखा दरख्त,
एक किस्सा है!
चादर पोशी करो लगाओ तिलक,
ये मिट्टी शहीदो के लहू से---------
हुई थी सुर्ख।
ये नज्म़ नही------------
हर हर्फ है मेरा ऐहसासे बिस्मिल,
जगा रहा हु फिर कबीले को,
कि ना लड़े,ना जलाये कोई घर
ब्राह्मन की हिफ़ाज़त मे हो नमाज़,
और नौरात्र मे गले से मिले तुर्क।
लड़ गये थे-----------------
जमीने हिंद की खातिर एै,रंग
कभी इस कबीले के बुज़ुर्ग।

(रोमांटिक कविता)

एक रोमांटिक कविता----------
                        (मछेरन)
मै नदी के किनारे बैठा-------------
एकटक उस साँवली सी मछेरन को तक रहा था,
जो डुबते हुये सूरज की लालिमा मे,
अपनी कसी हुई देहयष्टि के कमर तक साड़ी खोसे,
एक खम और लोच के साथ,
अपनी मछली पकड़ने वाले जाल को खिच रही थी,
मुझे यूँ लगा कि जैसे--------
उसकी जाल की फँसी मछलियों मे से,
एक फँसी हुई मछली सा मेरा मन भी है.
वे इससें बेखबर,
एक-एक मछली निकाल-------
अपने पास रंखे पानी से भरे डिब्बे,
मे डालती रही.
बस इतना उसने इतनी देर मे जरुर किया,
कि अपने माथे पे गिर आये,
बाल को पीछे कर,
उसने कुछ और बची मछलियाँ,
उस डिब्बे मे रख,
गीले जाल और डिब्बे को पकड़,
ज्यो घुटनों भर पानी से निकली,
तो यूँ लगा कि जैसे--------
वे साँवली मछेरन,
विश्व कैनवास की सबसे खूबसूरत औरत हो.

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेद्वी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर.
पीन न.---222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.----7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

(मां)

(माँ)
तेरा हर बेटा मुल्क की खातिर-------
यूं शहीद और कुर्बान हो माँ!
ना बटने दे किसी को मजहब के नाम पे,
समय से पूजा समय से अजा़न हो माँ।
फक्र हो तुम्हे अपने आँचल और दूध पे,
तेरी लोरी में राष्ट्र हो और राष्ट्रगान हो माँ।
ना पंजाब,ना गुजरात,ना महाराष्ट्र निकले,
आखिरी लम्हें गर लब भी फड़फड़ाये,
तो लब पे तुम और हिन्दुस्तान हो माँ।
गर सुपुर्द-ऐ-खाक होने लगू,
तो मुट्ठी में मुल्क की मिट्टी-------
और डालने वाले के होंठो पे मुस्कान हो माँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
###आप सभी को हमारे मुल्क की ये आजाद सुबह मुबारक हो।

Sunday, 23 July 2023

(वे गूंगी नही)

(वे गुँगी नही)
तुम जीसे कहते हो गुँगी----------
वे अक्सर मेरी गज़लो मे ढ़लती है,,,,,,,,,,,
वे थिरकती है जब पाँव में बाँध के घूँघरु-
तो कितना बोलती है,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग---वे गुँगी नही------------
एक मासूम लड़की है।

Saturday, 22 July 2023

(चूल्हा नही जलता)

(चूल्हा नही जलता)
तुम तो बात-बात मे शहर जलाना जानते हो------------------
तुम्हारे पास तो कौमो को जलाने का ईधन है।
पर यहाँ फाकाकश़ी सोने नही देती---
पेट तो जलता है ऐ,रंग--------
पर इस बस्ती में अक्सर चूल्हा नही जलता।

Friday, 21 July 2023

(धान की यौवन शिखर पर)

(धान की फसले)
मैने इतनी खूबसूरती नही देखी------
ऐ,रंग------इससे पहले,,,,,,,,,,,,,,,
वे बलखाती हुई------------
रोप रही थी-धान की फसले।

(शिकारे वाली लड़की)

(शीकारे वाली लड़की)
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की!
डलझील की मदमस्त लहरो को,
वे उसका एकटक देखना,
फिर जादुई हँसी,
हाय!जाने कहाँ खो गई,
वे अदभुत नजारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
वे उसका तिलिस्मी बदन,
और उसके जुड़े से निकलती वे गुलाब की खुशबू,
अब कही नही मिलती सुघने को,
और कही नही दिखती मुझे,
वे लश्कारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
पहाड़ो की वे ढ़लती शाम,
वे संगीतमय आवाजे,वे बाँसुरी के स्वर
कही कुछ नही!
बस तन्हाई मे यादो की चंद तस्बीर,
जो हवाओ के झोके से फड़फड़ाती है,
और मै निकल आता हु यादो से उसकी,
बस रह जाती है याद जेहन में,
वे शीकारे वाली लड़की।

###न जाने कब घाटियो मे अब अमन के दिन लौटेगे,न जाने फिर कब डलझील में दिखेगी हम शायरो और कवियो की वे शीकारे वाली लड़की।

(लिंग काट लेती है)

(लिंग काट लेती है)
आज घर मे अकेला पा--------------
उसका पिता ही उससे जबरदस्ती कर,
उसकी अस्मत लुट,
बीना किसी पछतावे के करवट ले-----
यूँही नंगा लेटा रहता है,
बिटिया मौन ओढ़े उठती है,
और उठाती है यहाँ-वहाँ पिता के हाथो फटे,
बिखरे अपने अधोवस्त्र और लिबास,
फिर जाने क्यू ?
उन वस्त्रो को फेक देती है घिन से,
क्या करती? आखिर क्यू पहनती?
और क्यू ढकती?
उस पिता से अपने अंग,
जिसने पुरे शरीर को अपने नाखूनो से खरोंचा,
और दाँतो से बेरहमी से काटा,
उन स्तनो को------------
जो नारी की सर्वोच्च सुंदरता और,
उसके वात्सल्य की प्रतिमूर्ति है।
वे पुन: अपने कामांध पिता को तक,
एक गहरी साँस लेती है,
और यूँही नंगी बढ़ चलती है किचन की तरफ,
वहाँ से चाकू उठा,
आँख मुदे अपने आनंदातिरेक में नंगे सोये पिता का,
सुसुप्तावस्था मे एक तरफ ढ़लके----------
लिंग को काट लेती है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

मेरी एकाध रचना आपको बिचलित कर सकती है लेकिन इस तरह कि रचना मे एक आंशिक सत्यता भी आप अपने ही सभ्य समाज के किसी न किसी कोने मे पा जायेंगे------ये इसी तरह की एक सत्य घटना का प्रारुप भर है।

(अयोध्या आंख में आंसू लिए खड़ी थी)

आज, के ही दिन बाबरी मस्जिद के पैरोकार जनाब हाशिम अंसारी इंतकाल फरमा हुए थे 🌹🌹🙏🙏

(अयोध्या आँख में आँसू लिये खड़ी थी)

कल बड़ी मनहूस घड़ी थी,
पुरी अयोध्या 
आँख में आँसू लिये खड़ी थी.

ना राम मंदिर ,ना बाबरी मस्जिद,
सभी शरीक थे उस हूजुम में,
जैसे किसी छत पे---
माँ सीता भी,
हाशिम के लिये खड़ी थी.

रामनवमी और दशहरे की रामलीला,
का किरदार था उनमें,
वे बस वादी थे---
वरना उनमें सरयू का वज़ु था,
ता उम्र उन्होनें,
अपने ज़ुम्मे की नमाज़ ए,"रंग"
मुल्क की तरक्की,अमन 
और मोहब्बत के लिये पढ़ी थी.

कल बड़ी मनहूस घड़ी थी---
पुरी अयोध्या
आँख में आँसू लिये खड़ी थी.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जौनपुर.
Mo.no.7800824758

Wednesday, 19 July 2023

(गुरु शिष्य का मान बढ़ा देता है)

(गुरु शिष्य का मान बढ़ा देता है)
कौन कहता है?
कि एकलब्य यु ही अपने गुरु को--
काट अँगूठा देता है।
अरे तासीर तो देखो-------
कि वे बुत से भी अपने शिष्य को,
कितना ज्ञान अनुठा देता है।
एक जुलाहा,कालीन का बुनकर 
गुरु की चाह में सो जाता है सीढ़ियो पर,
वही कबीर बन गुरु को दर्जा---------
मंदिर के भगवान से भी ऊँचा देता है।
देश के संकट की घड़ी में भी,
गुरु गोबिंद सिंह--------------
मुगलियाँ सल्तनत के सवा लाखो से,
अपने एक-एक बेटो को लड़ा देता है,
यु ही नही झुकाते हम सर गुरु पुर्णिमा को,
एै,रंग-----गुरु वे है जो देश और
शिष्य का मान बढ़ा देता है।

###इस रचना को पुरा पढ़ हमारे देश की इस महान परंम्परा पर गर्व करे।
आप सभी को गुरु पूर्णिमा की बधाई।
कृपया----पुर्णिमा को संशोधित कर पूर्णिमा पढ़े।

(आंखो में इज्जत का दौर था)

(आँखो मे ईज्ज़त का दौर था)
जब तलक खत का दौर था-------
तभी तलक मोहब्ब़त का दौर था,,,,,,,,,
ऐ,रंग-जिस्म़ को तकते नही थे हम--
वे आँखो मे ईज्ज़त का दौर था।

Monday, 17 July 2023

(बांहों में भर नही पाए)

(बाँहो मे भर नही पाये)
हमने साँस-साँस भर लिया उन्हे-----
वे इतने के बाद भी,मेरे हो नही पाये।
मै आँख में बसा के उन्हे देखती रही,
वे अपनी आँखो में हमे,
कभी भर नही पाये।
मै आयते कुरान की तरह,पढ़ती रही उन्हे
वे एक लफ्ज़ भी वफा़ का,
मेरी पढ़ नही पाये।
मै उतर गई उनमें कर शौहरे यकीन,
वे एक रात भी हमे हमारी हक से,
एै,रंग----अपनी बाँहो में भर नही पाये।

Saturday, 15 July 2023

(फिर घिरे आज बादल)

(फिर घिरे आज बादल)
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।
है तेरी हुस्न के ये बादल भी मारे,
ये जाना सनम--------------
जब तुम्हे चुमने की हसरत लिये,
आपस मे ही खुद भिड़े आज बादल।
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।
मांगा सभी ने पानी मगर,
ना सुनी बादलो ने-------
किसी की दुआ!
वे तो तुम थी हमारे शहर में सनम,
जो बूँद बनकर ज़मी पे गिरे आज बादल।
सारे शहर में फिरे आज बादल,
तुम्हे देखकर फिर घिरे आज बादल।

###हमारे शहर में आज लगातार बादल घेरे हुये है अब बरसात कितनी होती है ये बात की बात है।

(शराब नही लेकिन)

(शराब नही लेकिन)
तेरी सरिया मे शराब नहीं लेकिन-----------
हम पीने वालो के लिये खराब नही लेकिन।
हम बाँट लेते है अक्सर नशे मे जूठन भी-----
यहाँ के पंडित और मियाँ का जवाब नही लेकिन,
तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन।
ना वे गीता जानता है और न मै कुरान की आयत,
जबकि उसका घर मंदिर की तरफ है,
और मेरा घर मस्जिद की तरफ है,
हमारे लिये जुम़ा और मंगलवार एक सा है,
हम पीते है,किसी दिन का हमारे पास एै"रंग"-----
कोई हिसाब नही लेकिन।
तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन,
हम पीने वालो के लिये खराब नही लेकिन----
तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Friday, 14 July 2023

(आशनाई का इल्जाम था)

(आशनाई का इल्ज़ाम था)
आज कल तो वे भी विधायक हो गई है,,
ऐ,रंग--जिसपे कभी,मंत्री जी के साथ-
आशनाई का इल्ज़ाम था।

(पैजनी की धुन)

(पैजनी की धुन)
संगीत से बेहतर है--------
सीधे दिल मे उतर जाती है,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----इतनी क्लासिकल है-----
उसके पैजनी की धुन।

Thursday, 13 July 2023

(कश्मीर)

(कश्मीर)

वे बागां दी बुलबुल, वे डल झील,
वे शिकारें,
हमारी मिट्टी-ऐ-मोहब्बत कश्मीर,
हमें ख्वाबों में पुकारे.

ये सियासत, ये साजिश-ऐ-अलगाव,
कि हम कश्मीरी पंडित पड़े हैं,
खानाबदोशों से बदतर ऐ दिल्ली,
तेरी सड़कों के किनारे.

वे गुल, वे केशर ,
वे सेब के बगीचे,
उफ!! नहीं आती वे खुशबू
ना आती है, वैसी ---
यहां तक हवा रे.

ये लाश-ऐ-मईयत ,
ये रूह-ऐ-तड़प है,
ऐ "रंग"---
हम कैसे होगें, जन्नतनशीं ,
ऐ कश्मीर ----
तेरी पाक़ मिट्टी के बिना रे.

रचनकार -- रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी मियाँपुर 
जिला-जौनपुर 222002(U.P.)
Mo.N.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
देश,के तमाम प्रसिद्ध साहित्यकारों के बीच मैं जनपद जौनपुर से साहित्य की सर्वोत्कृष्ट पत्रिकाओं में से एक पटना, बिहार से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका "साहित्य-यात्रा " के "फणीश्वरनाथ रेणु " विशेषांक में अपनी लेख के साथ उपस्थिति दर्ज़ करा पाया ये मुझ जैसे एक छोटे से लेखक के लिए बड़ी खुशी है.

आज,डाक से इसकी लेखकिय प्रति मिली इसके लिए मैं "साहित्य यात्रा " के संपादक प्रो. कलानाथ मिश्र जी को धन्यवाद देता हूं 🌹🌹🙏🙏

(सुकरात को भी जहर दे दो)

(सुकरात को भी ज़हर दे दो)

गर सच की ज़ुबां को 
खामोश़ करना है,
तो ए,"रंग"

इस कलम के 
"सुकरात" को भी---
ज़हर दे दो

Wednesday, 12 July 2023

(खत नही था)

(खत नही था)
जो दी थी उसने कभी लरज़ते हाथ से,
वे खत नही था।
थी उसके धड़कनो की गज़ल,
हर हर्फ में वे थी मेरे रुबरु,
पुरी रात जैसे थी रुबाई की,
चराग जल रहा था----------
उस रौशनी में मोहब्बत थी,
कोई खत नही था।
एक खुशबू थी भीनी सी हर साँस मे,
ये आँख ठहरी रह गई,
सहर होने तलक एै,रंग-------
मेरी अँगुलियो मे वे थी,
कोई खत नही था।
###सहर होने तलक--सुबह होने तलक।

(गजलों का बदन बेच दिया)

(गज़लो का बदन बेच दिया)

एक गरीब शायर को-
भूख ने कुछ इस कदर तोड़ा,
कि ए "रंग"

उसने रोटी के लिये,
एक रईस को---
अपनी गज़लो का बदन बेच दिया.

Monday, 10 July 2023

(हमपे हंसे है बदरवा सखी)

(हमपे हँसे है बदरवा सखी)
अँखिया मे लोरन के पानी बहे-----
ढुढ़े मीले ना कजरवा सखी,,,,,,,,,,
ड़से है मनवा के पोर-पोर हमरा----
हमपे हँसे है,बदरवा सखी।
नीक ना लागे घर अँगनईया------
सौतन लगे है ओसरवा सखी।
ऐ,रंग-----
हियरा के आह लग जातई,,,,,,,,,,,,
बस पीके कोठरियाँ सलामत रहत--
बाकी जरी जातई पुरा शहरवा सखी।
ड़से है मनवा के पोर-पोर हमरा----
हमपे हँसे है बदरवा सखी।

(मदिरा तेरा सेवन किया है)

(मदिरा तेरा सेवन किया है)
जब भी मेरा मन किया है------
ऐ मदिरा हमने तेरा सेवन किया है।
ये काफिरी है-मुझ ब्राह्मण की,,,,,,,,,,,,
कि लोग मंदिरो मे-------
चरणामृत का पान करते रहे,,,,,,,,,,
और हमने तेरा आचमन किया है.

Saturday, 8 July 2023

(कबीर तरह करना)

(कबीर की तरह करना)
ना किसी हिंन्दू,ना मूसलमां की तरह करना,,,,,,,,,,,,,,,,,,
ना काशी,ना काबा की तरह करना---
हाँ मेरी भी इच्छा है-मगहर की,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----अगर संम्भव हो-------
तो मेरा अंतिम संस्कार भी,,,,,,,,,,,,,,
कबीर की तरह करना।

(सावन चला गया)

(सावन चला गया)
झूले चले गये,कज़री चली गई------
मेहमान तो आते रहे गाँव मे लेकिन,,,,,,,
पर पहले जो आता था--------
वे पाहून चला गया।
ऐ,रंग----धीरे-धीरे ये हादसा हुआ,,,,,,,,
बारिश तो हुई लेकिन--------
गाँव से मेरे सावन चला गया।

(धान की यौवन शिखर पर)

(धान की यौवन शिखर पर)

इस बार की बरसात का पानी गिरा है,
धान की फसलो के यौवन शिखर पर।

वे देखो-------------
खेत में सिहरी खड़ी है एक बाला गाँव की,
उसका भीगा आँचल गिर गया है खेत में,
वे उठा के रख रही है जिस लोच से,
बरबस नयन थम जा रहे------------
धान की यौवन शिखर पर।

धान की ये बालियाँ खुद चाहती है,
कि खेत में आये पिया-------------
वे भी सुहागिन हो उठे बरसात में!

आँख मुँदे,साँस फूले,धान भीगे
दे बालियाँ!न्योता खुदी आँचल गिरा,
कि हे बादलो तुम खुब बरसो--------
अब मेरी यौवन शिखर पर।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला-जौनपुर 222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Friday, 7 July 2023

(राम कहेंगे)

(राम कहेंगे)
ये चुनावी सीजन है,सावधान हो जाओ!
क्योंकि अब खद्दर पहने लोग--------
आयेंगे अयोध्या।
फिर सहम उठेगा सरयू का पानी,
एै "रंग"---ये मुस्लिम बस्तियो में अल्लाह हू!
और हिन्दू बस्तियो में राम कहेंगे।

(मौते बड़ी विरान होती है)

(मौते बड़ी विरान होती है) 

बेशक----
सारे शहर का हुज़ूम उमड़ता है, 
शख्शे शोह़रत के जनाज़े मे.

पर ऐ,रंग----
ऐसी मौते बड़ी विरान होती है।

Wednesday, 5 July 2023

(वेदना की पगडंडी हूं)

(वेदना की पगडंडी हूँ)
हाँ मै उसके जाने----------
और लौटने का दर्द जानती हूँ,,,,,,,
तुम उसे बस एक वेश्या जानते हो--
मै उसे एक औरत जानती हूँ।
ऐ,रंग----मै उसके घर की तरफ जाती हूई,
उसकी वेदना की पगडंडी हूँ।

Tuesday, 4 July 2023

(पति पत्नी कहा होते है)

(पति पत्नी कहां होते है)
हम कमरे में----------------
अब पति पत्नी कहां होते है?
बिस्तर तो वही है,
पर एैसा लगता है जैसे--------
अब उसपे दो अज़नबी सोते है।
टटोलना मुमकिन नही भीतर का सन्नाटा,
बस काम से लौटते थके कदम,
ही अब हमारे भीतर होते है।
फिर खिड़की से बाहर महानगर के,
न थमने वाली चुभती चिखती आवजे,
और हमारी शादी की सालगिरह पे,
वे गमले में लगाई,
बिल्कुल अपने जीवन की तरह,
कि नागफनी को एकटक देखते है,
फिर उदास टावल को उठा,
हम हाथ मुँह धोते है।
अब तो ये भी याद नही,
कि कब हम एक साथ बैठकर चाय पिये थे,
और किस बात पर हम साथ खिलखिलाये थे,
अब तो सामने है बस एक तन्हा खालि कप,
जिससे अब केवल होंठ भिगोते है,
और लेते है एक थकी साँस,
अब तो रिश्ते को जीते नही बस ढ़ोते है।
हम कमरे में------------
अब पति पत्नी कहां होते है?।

###एक जिवंत रिश्ते के निरस हो जाने का आधुनिक दर्द।

(मंदिर मस्जिद और चिड़िया)

(मंदिर-मस्जिद और चिड़िया) 
मै देख रहा था---------
अभी जो चिड़िया मंदिर के मुँडेर पे बैठी थी, 
वही कुछ देर पहले--------
मस्जिद के मुँडेर पे बैठी थी.
वहाँ भी ये अपने पर फड़फड़ाये उतरी थी,
चंद दाने चुगे थे, 
यहाँ भी अपने पंख फड़फड़ाये उतरी, 
और चंद दाने चुग, 
फिर मंदिर की मुँडेर पे बैठ गई. 
फिर जाने क्यूँ एक शोर उठा, 
मंदिर और मस्जिद में अचानक से लोग जुटने लगे, 
और वे चिड़िया सहम गई. 
शायद चिड़िया को मालूम न था कि वे, 
जिन मंदिर-मस्जिद के मिनारो पे, 
अभी चंद दाने चुग, 
अपने पंख फड़फड़ाये बैठी थी, 
उसमे हिन्दू और मुसलमान नाम की कौमे आती है, 
जहा से हर शहर और गाँव के जलने की शुरुआत होती है, 
और हुआ भी वही, 
फिर उस चिड़िया ने अपने पर फड़फड़ाये मिनार से उड़ी, 
और फिर कभी मैने उस चिड़िया को, 
शहर के दंगो के बाद, 
दाना चुग पर फड़फड़ा,
किसी मंदिर या मस्जिद की मिनार पे बैठे नही पाया ,
शायद वे चिड़िया एै "रंग "-----------
हम इंसानो से कही ज्यादा सेकुलर निकली.

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी ।
जज कालोनी, मियाँपुर
जौनपुर----222002 (उत्तर-प्रदेश) 
no.no.------7800824758.

 यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है ।

(बुखार में सोया है)

(पुरी रात बुखार मे सोया है)
ऐ अमीरी कहाँ तेरी तरह---------
वे किसी तीज या त्योहार मे सोया है।
अपने मासूम बच्चो के दोज़ख के लिये,,,,
ऐ रंग----एक गरीब----------
पुरी रात बुखार मे सोया है।