Saturday, 18 December 2021

(इंतज़ार करके रोयी)
खुद को बाँहो में भरके रोयी,
वे तवायफ थी-------
हर रात सजके रोयी।
थिरके पाँव,टुटे घुँघरु ऐ,रंग-------
वे कितना इंतजार करके रोयी।
(इवीयम से छेड़खानी)
जहाँ जिते वहाँ चाँनी--------------
और जहाँ हारे वहाँ इवीयम से छेड़खानी।
वाह रे! काग्रेंस
और पप्पु से अध्यक्ष हुये राहुल,
फड़फड़ाहट बता रही,
कि गुजरात चुनाव के बाद,
फिर याद आनी है-----------
आपको इटली और अपनी नानी।
आप राजनीति के अपरिपक्व है,
इसे आप स्वीकार नही पा रहे,
अपनी डफली अपना राग गा रहे,
जब तलक गुणवत्ता नही होगी,
याद रखिये आपकी ये सत्ता नही होगी,
बस रोते रहेंगे आप-----------
और हँसते रहेंगे आप पे मोदी,शाह,अडानी।
वापसी गर करनी है,
तो खानदानी शार्टकट से कुछ न मिलेगा,
ये लोकतंत्र है आपको सिखनी पड़ेगी,
दिन रात एक कर,
कि किसके साथ कहाँ राम-राम कहना है----
और कहाँ खाना है लंगर घंटो सुन गुरबानी।
गर न सिख पाओगे तो याद रखना,
तो काग्रेंस के हाथ सत्ता नही आनी,
और ये कह आप ज्यादा रो भी नही सकते,
क्योंकि जनता बेवकूफ नही,
कि आपकी हर हार को समझे-------
एै "रंग" महज़ इवीयम से हुई छेड़खानी।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

आज की मतगणना का परिणाम चाहे जो हो पर अगर मिडिया का सर्वे सच हुआ तो इतना जरुर कहुँगा कि "राहुल जी आपके लिये बड़ी कठिन डगर है इस राजनीति के पनघट की"।

Wednesday, 8 December 2021

(माँ)
दिन भर भूख से बच्चा बिल-बिलाता है,
वे-कोशीश करके हार जाती है,
अँधेरी रात मे वही माँ-
एक कटोरे दूध की खातिर
ऐ रंग-
अपने सारे कपड़े खोल देती है।
(बेटी के ब्याह का लिबास दिखाऊ)
आओ अय्याशियो मे डुबे हुये चौथे स्तंभ,
तुम्हे इस मुल्क मे रेप से इतर,
खेत के मेड़ पे पड़ी बीना कफ़न--------
किसान की लाश दिखाऊ।
बंद कमरे मे बरसता सावन,
तीतर-बीतर कपड़े पैमाने से छलकी शराब,
किसान की आँखो मे सुखा,
उसकी दुपट्टे के फंदे से मरी बेटी,
रुदाली सी बीबी,लंबा सन्नाटा
उसकी जंग खाई पेटी में,
एै,रंग------------
बेटी के ब्याह का लिबास दिखाऊ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Tuesday, 7 December 2021

(ये रात गुजरने दो)
तुम संभलो मुझे गिरने दो-----------
मुझे शराबी लत है,कुछ गहरे उतरने दो।
तुम बधे हो,बधे रहो----------
अपने वक्ते नमाज़ और पूजा से!
मेरे रास्ते मे मंदिर-मस्जिद नही मैकदा पड़ता है,
हाथ धोने दो और मुझे शराब से वजू़ करने दो।
ये महज बोतल नहीं गंगा का पानी आबे जमजम है,
ये हमारी शरिकेहयात़ बीबी का बदन है,
तुम दुर रहो हम काफ़िरो से
और नशे में हम इश्क़े शौहरो की,
एै,रंग-------ये रात गुजरने दो।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
(शहीद)
इस गाँव की औरत कभी बेवा नही होती।
इस गाँव मे कभी भी लाशे नही आती,
तिरंगे मे लिपटे शहीद आते है।
यहाँ की कोई भी बुढी माँ-
काशी या काबे नही जाती।
ऐ रंग-
वे फिर से शहीद बेटे की वर्दी का
धुल साफ कर
सरहद की हिफाजत के लिये-
पोते पालती है।

Monday, 6 December 2021

(पानी)
नही होने देता कभी हिन्दू-मुसलमान
हमे शराब का पानी।
वही छीन लेता है एक हसीन चेहरा,
जब कोई चाहने वाला-फेकता है----
चेहरे पे तेज़ाब का पानी।
हम भटकते गिरते चले जाते है,
जब उतरता है हमारे चेहरे से------
हमारी किरदार का पानी।
हमे जोड़ता है,धर्म और मज़हब से,
कभी दोआब---------
तो कभी हरिद्वार का पानी।
हमे फ़ना भी करता है,
चेन्नई की तरह,रंग--------
देख लो वहाँ तमाम लाशे,
और सैलाब का पानी।
( उत्तर-रेलवे )
उत्तर-रेलवे----------
के एक मुसाफ़िर खाने मे बैठी, 
एक चौबीस-पच्चीस साला पगली,
अपने गंदे बाल खुजला रही थी,
मैने देखा---------
उसके आसपास आठ-नौ आवारा बद्चलन,
पुरुष खड़े--------
अश्लील फब्तियां कस रहे थे,
वे इस सबसे बेखबर-----
अपने गंदे बाल खुजलाये जा रही थी,
तो अचानक मेरी नजर भी,
उनका अनुसरण कर,
पगली की गदराई हुई देहयष्टि से चिपक सी गई.
फिर वे सभी मेरी तरफ मुड़े--------
और खिलखिला के हँस पड़े.
मै झेपा---------
और सोचने लगा कि क्या ?
मेरा चरित्र भी अब गिरने लगा है,
शायद नही,
अगर ये सच है तो फिर.
न जाने कल आने वाली पीढ़ी का---
चरित्र क्या होगा.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (उत्तर-प्रदेश)

Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
( गुनगुनी धूप )
मै टैरेस पे---------
कुर्सी निकाल गुनगुनी धूप मे घंटों बैठी,
वे तुम्हारी चाहत के एहसेसात को-----
अपने भीतर कही हौले-हौले टटोल रही.
लेकिन उस टटोलने मे न जाने कहां,
तुम्हारा श्पर्ष मुझे मिला नही,
सच अब तुम्हारे--------
चाहत का बासीपन अब टीस रहा.
याद है मुझे अच्छे से-------
ठंड की ये गुनगुनी धूप,
जब तुम्हारा छुना और श्पर्श करना,
मेरे प्यार के अंतरतक को गुनगुना जाता,
वे शायद युवापन था------
लेकिन आज जैसे टैरेस की गुनगुनी धूप,
एक सखी सी-------
मेरी युवावस्था से कह रही,
नही ऐसा कुछ नही,
ये जीवन के पलछिन की करवट भर है,
फिर यही टैरेस और कुर्सी के बगल-----
दोनों का गुनगुनी धूप मे बैठे,
काफी पीना होगा.
तभी एक झोका सा हवा का आता है,
और उन्हें मै थका मांदा,
आफिस से बैग लटकाये,
टैरेस पे पड़ी हुई एक खाली सी कुर्सी,
निढ़ाल सा पाती हूं,
तब मै-------
उनकी मजबूरियों की गुनगुनी धूप को,
अपने अंतर मे एक बार फिर महसूस कर पाती हूं.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर pin no.222002
Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Sunday, 5 December 2021

(घूँघरु बांधती थी)
रईसो के दरमियाँ वे सलिके से आती थी,
कभी ठुमरी,कभी दादरा गाती थी।
ऐ,रंग-----------
वे पाक थी कोठे पे सुना है,
कि वे केवल पाँव मे घूँघरु बांधती थी।
(जीवित कामायनी)
इंतजार करती है-----------
अपने कोठे पे बैठ हर शाम कोई ग्राहक।
न आने पे फिर वहीं से खोलती है,
जहा से उसने मोड़ रखा था--------
जय शंकर प्रसाद की कामायनी।
डबडबाई आँख मे मनू और इडा से ज्यादा,
भर आते है आँसू !
ये अथाह पिड़ा के फफोले का फूटना रोज सहती है,
इसी कोठे पे-----------
जब कोई आता दिखता है,
तो टुटी कुंडी वाले दरवाज़े की तरफ बढ़ चलती है,
ग्राहक की जल्दबाजी में------------
बंद करते दरवाज़े की टुटी कुंडी की आवाज़,
का मतलब वे समझ----------------
अपने एक-एक कपड़े को उतारती है,
और चारपाई पे--------------
उसका ग्राहक पैसे सुलता है!
फिर थकी मादी उठती है----------
मरहूम जय शंकर प्रसाद की ये जीवित कामायनी।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Saturday, 4 December 2021

(तस्वीर बनती रही )
मै रोता रहा---------
मेरे आँसुओं से भी तेरी तस्वीर बनती रही.
जलती रही शमां,
लड़खड़ा-लड़खड़ा के रात भर,
मै करवटो को तड़पा-------
और तु मेरी हीर बनती रही.
तेरी यादे थी जो बहला देती थी कुछ पल,
वरना मै ऊब गया था इस शहर से,
खिड़कियां खुली रहने दी हमने,
कि शायद कही से,
लाये हवा तेरा संदेशा,
पर हाय री! बेबसी,
कुछ बनने की,
कि तुमसे दूर रहके-----
मेरी तकदीर बनती रही.
मै रोता रहा---------
मेरी आँसुओं से भी तेरी तस्वीर बनती रही.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेद्वी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Wednesday, 1 December 2021

(लोकतंत्र का गला घोट देता है)
वे किसी को मदिरा,किसी को नोट देता है-
ऐसे प्रत्याशी को भी गाँव वोट देता है।
ऐ,रंग--आओ हम ऐसो को नकार दे---
जो हमारी लोकतंत्र का गला घोट देता है।

ग्राम-प्रधान के चुनाव पे।
(खनकती ये महबूब चुडियां)
मै अक्सर नमाज़ के वक़्त भी घुम जाता हूं,
मस्जिद के बगल से जो गुजरती है------
चंद चुडिहारो की गली!
तकता हु तमाम दुकानो की तरफ,
कि शायद किसी दुकान पे--------
फिर अपनी नर्म नाज़ुक सी कलाई में,
पहनती किसी चुडिहार से चुड़िया--वे दिख जाये,
जैसे दिखी थी अगले जुमें को!
नही दिखी,
शायद वे किसी और शहर से थी,
मै ज्यो घुमा------------
तो नज़र पड़ी वे आ रही थी कुछ सहेलियो के संग,
तभी उसकी चुड़ियो की खनक ने,
जैसे हमें आदाब कर कहा हो,
जनाब मै इसी शहर की हूं!
और इसी शहर की है मेरी कलाईयो मे-----
खनकती ये महबूब चुड़िया।

Saturday, 27 November 2021

(माँ भूख से मर गई)
बेशक तेरी तिजोरी दौलत से भर गई--
पर माँ की------
चुपड़ी रोटी के नमक हराम,
शायद तुम्हे पता नही,,,,,
कि गाँव मे--------
तेरी माँ भूख से मर गई।
(इतवार केवल दिन नहीं मोहब्बत है)
कभी किसी शनिवार वे आते है,
कभी किसी शनिवार मै जाती हू।
ये भागमभाग,ये नौकरी,ये भीड़ 
कि उबन से दुर------------
कभी किसी इतवार वे मुझे पाते है,
कभी किसी इतवार मै उन्हें पाती हू।
फिर अगली सुबह लौटना होता है,
कभी दरवाजे़ पे वे मुझे छोड़ने आते है,
और कभी दरवाजे पे मै उन्हें छोड़ने जाती हू।
इसलिये एै,रंग---अब हमारी जिंदगी मे इतवार महज़ दिन नही,
मोहब्बत है जो हम एक दुसरे से कर पाते है।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

नौकरीपेशा लोगो का वे इतवार जिसका इंतज़ार वे बड़ी शिद्दत से एक दुसरे के लिये अलग-अलग शहरो में पुरे हफ्ते ट्रेन पे न बैठ पाने तलक करते है।
तुम ठंड के मौसम में 
पहाड़ों पर खिली हो,
लेकिन,
मेरे दिल में भी एक जाड़े का मौसम है,
जहां तुम हो और तुम्हारी खूबसूरती, है
आओ--------
मैं तुम्हें भी दिखाऊ
वे अल्हड़ सी  
शर्माइ सकुचाई सी
फूलों के दुपट्टे से
बतियाती,
पहाड़ों की लड़की से
जो कोई और नहीं
बल्कि तुम हो
और तुम हो.

रंगनाथ द्विवेदी
जिला--जौनपुर, mo. no.7800824758

Monday, 22 November 2021

(रोटी)

भूख-
एक टक देखती है,
तवे पे सिंकती हुई,रोटी।
गरीब जानता है-
इसका हुस्न,इसका गंध
ऐ रंग,-
कितनी खुबसुरत लगती है,
तवे पे पलटी हुई,रोटी।

Saturday, 13 November 2021

कविता---(ओढ़नी )

(ओढ़नी)
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।

####एक सयानी होती हुई लड़की के वे तमाम चित्र इस रचना में है!गर सच लिखु तो इस कविता की ओढ़नी वाली वे तेरह साल की लड़की बन मैने--इस कविता को जिवंत लिखने की कोशिश की है,इसपे मै कितना खरा उतरा ये तो आप सभी सुधीजन पाठको पे है।

कविता----(बाल दिवस है )

(बाल दिवस है)
चाय की दुकान पे----------
सुट-बूट वाले साहब के,
अधरो पे सुलगते सिगरेट का कश है,
उस फैले धुँऐ में तेरह साल का बच्चा,
जूठे कप-प्लेट उठाता है,
जरा सा उसके मैले हाथो का श्पर्श
और माँ की गाली!
मासूम गालो पर------
बाल पकड़कर चंद चाटे,
देख रोटी-------
इतनी कम उम्र में इस बच्चे की भूख,
तेरी खातिर कितना विवश है!
इस मासूम को---------
अपनी पिड़ाओ की दुनिया से बाहर,
ये भी पता नही कि---------
कल तमाम देश के बच्चो के चाचा नेहरु का जन्मदिन,
यानी की बाल दिवस है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
(औरत नही देखी)
माथे पे चुहचुहाता पसीना-----
कमर पे खुशी साड़ी-----
और सर पे सीमेंट की भदेली,,,,,,,,,,
श्रम की मादक चाल------
ऐ,रंग----मेरी कविता ने कभी----
इतनी खूबसुरत औरत नही देखी।
छत्तीसगढ़, से प्रकाशित साहित्य की सर्वोत्कृष्ट त्रैमासिक पत्रिका "बहुमत" के 101 अंक में मेरी लघुकथाओ को स्थान देने के लिए संपादक बड़े भैया विनोद मिश्रा जी के इस आशीर्वाद व स्नेह के लिए मेरा कोटिशः प्रणाम🙏🙏. 

■"बहुमत " का 101 वां अंक ■
================================
● लुइस ग्लक की 9 कविताएं ।। अनुवाद--मंगलेश डबराल, लीलाधर मंडलोई, विनोद दास, तिथि दानी,प्रभात रंजन,श्री बिलास सिंह ।।
■ 75वें वर्ष में कवि -राजेश जोशी की तीन कविताएं
● रचना की जरूरत:निर्मल वर्मा
■ कविता का प्रयोजन: राजाराम भादू
●महात्मा गांधी के छत्तीसगढ़ प्रवास की शताब्दी स्मृति: राहुल सिंह का विशेष लेख
■रामनगीना मौर्य और आलोक रंजन की कहानियां
●रोअल्ड डाहल की अंग्रेजी कहानी:खाल (अनुवाद-सुशांत सुप्रिय )
■शानी की कहानी:कफ़न चाहिए

● कविताएं:: लीलाधर जगूड़ी, वेणु गोपाल,रूपम मिश्र, जोशना बैनर्जी आडवाणी, संदीप निर्भय,रवि प्रकाश, सुलोचना वर्मा,विनय सौरभ, हर्ष भारद्वाज,रजत कृष्ण, योगेश ध्यानी,शिवम चौबे, फिरोज खान, उल्लास पाण्डे, अंकिता आनंद,विधान,निधि अग्रवाल, अंकिता शाम्भवी, कुबेर कुमावत, अनामिका चक्रवर्ती,कुंदन सिद्धार्थ, पल्लवी मुखर्जी, वन्दना गुप्ता,अनु चक्रवर्ती,सोनी पाण्डेय,ज्योति रीता,अमृता सिन्हा ।।।।

■लघुकथाएं: सुशांत सुप्रिय, रंगनाथ द्विवेदी
● गज़लें: अनिता सिंह,देववंश दुबे, फूलचंद गुप्ता ।
■पुस्तकें मिली-महेन्द्र मिश्र, अशोक शाह,उषा दशोरा, सुभाष चन्द्र कुशवाहा,राम नगीना मौर्य, रामकुमार तिवारी,गौरव गुप्ता,नीरज नीर, कुबेर सिंह साहू, अरविंद श्रीवास्तव, वन्दना गुप्ता, अजित कुमार राय, राजेश झरपुरे, कुबेर कुमावत ।।

#आवरण: अनिल वशिष्ठ
#रेखांकन: अनुभूति श्रीवास्तव

•संपादक: विनोद मिश्र
•प्रबंध संपादक: अरुण श्रीवास्तव
•परामर्श: राजीव चौबे
               : दिनेश वाजपेयी
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श्री चतुर्भुज मेमोरियल फाउंडेशन, भिलाई-दुर्ग(छत्तीसगढ़) एवं जनसंपर्क विभाग छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग से प्रकाशित
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Monday, 8 November 2021

कविता---(राम वनवास में थे )

न्यायलय में भगवान श्री राम मंदिर के पक्ष में फैसला आने से कुछ पहले लिखी मेरी एक रचना 🌹🌹🙏🙏

(राम वनवास मे थे)

राम अपनी ही अयोध्या में-
जैसे कैदियों की लिबास मे थे.

लंका फतह करके लौटे,
तो फिर सियासत की--
"आजीवन कारावास" में थे.

उफ! मेज दर मेज फाइले उलझी,
कचहरी मे "रावण की आत्मा" अट्हास करती लगी,
सच वे हमारे आस्था की पेशी थी,
जिसे कानून तारीख कहता है,
वरना हमारे राम---
टेंट मे नज़रबंद
और एक असह्य पीडा़ की
संत्रास मे थे.

ये दर्द ,ये तड़प,
ये सरयू के विलाप के आँसू
अब शायद थम जाये,
कुछ घंटे मे बदल जाये ये दृश्य,
क्योंकि आज न्याय के मीलार्ड गगोई,
के हाथो ए "रंग"
निर्णय की घड़ी है,
इस घड़ी के लिये हम,
न जाने कितने वर्षो से
इंतजार मे थे,

आईये हम शपथ ले उस राम की,
और ईट रखे फैसले की----
चाहे वे मस्जिद हो,
या फिर मंदिर हमारे राम की
क्योंकि राम-----
अपने भाई के लिये ही चौदह वर्ष,
वनवास में थे.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी
जिला-जौनपुर.
Mo.no.7800824758

Sunday, 7 November 2021

(मै भी कुम्हार हूँ)

हां मै भी----
अपने गीतो की चाकी पे,
शब्दो की मिट्टी रख,
कुछ गीत----
उसके दिवाली के दीये की तरह बनाता हूँ.

वे भी कुम्हार है मिट्टी के दियले का,
और मै भी कुम्हार हूँ--
अपने गीतो का.

वे उपले की आँच में,
पकाता है दियलो को और मै-
अपने हृदय के उपलो की आँच में,
गीतो के शब्द पकाता हूँ. 
हां मैं भी कुम्हार हूँ. 

रंगनाथ द्विवेदी. 
जज कालोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर, ( उत्तर प्रदेश)
Mo. no. 7800824758

Saturday, 6 November 2021

(गंगा)
कहाँ बता पायी-
कौन हिन्दू,कौन मुसलमान गंगा।
कहीं हर-हर गंगे,
तो कही-
नमाजे वजू का पानी,
आज हमसे मैली हो रही
सुबह-शाम गंगा।
हे!गंगा पुत्र मोदी तुमपे-
कर्ज-ए-बनारस है,
चुकता करो आके,
अपनी कौल,अपनी कसम
ताकि-ऐ रंग,-
अपने ही पानी से
खुद करे स्नान गंगा।

मोदी के द्वारा खुद को गंगा पुत्र कहने पर।
(दर्द के सीने मे जलुंगी)
ऐ दिवाली के दिये-----------
मै भी तेरे संग जलुंगी।
बस फर्क ये होगा कि------
तुम प्रीत की तीलि से जलोगे,,,
और मै विरह के तीलि से जलुंगी।
तुम मुँडेर,घर और दहलिज़ पे जलोगे--
रौशनी के लिये,
मै तो घुटुंगी,क्योकि मै वे दिया हूँ----
जो अपने ही दर्द के सीने मे जलुंगी।
(पूजा का वक्त था या अजान का)

मंदिर और मस्जिद के बीच,
सड़क के किनारे झाड़ियो मे-----
हमने एक औरत की नग्न लाश देखी,

और उसके दोनो स्तनो पे
खुरचने के निशान देखे!

और वे दोनो स्तन----------
मंदिर और मस्जिद की तरफ लटके हुये थे,
कितने असहाय थे बताने में,
उस नग्न औरत के दोनो स्तन ऐ,रंग-----
कि वे पूजा का वक्त था या अजान का.

@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758
(यही धारावी)
मै रोज थकी मांदी,
काम से लौटती हूं जीने------
यही धारावी।
वे चारपाई पे लेटा है,धुत्त कच्ची पिये
गंदी गालियाँ दे रहा,
अभी जबरदस्ती खीचेगा,
मै अपनी ऊबकाईयां रोके,
बर्दाश्त करुंगी एक बलात्कार,
फिर उठुंगी वे सो जायेगा,
थका मांदा!
मै उल्टीयां कर,
पुरे बदन से अपने एै,रंग-------
छुड़ाऊँगी सारी रात मै यही धारवी।

Friday, 29 October 2021

(आईना तोड़ देती है)
पटकती है,बे-रहमी से
सिसकता-
छोड़ देती है।
ऐ रंग,-वे हुस्न-ए-बे-गैरत
हर महीने-
एक आईना तोड़ देती है।
(आदमी हूँ)

तेरे रूप के लावण्य से,
देवता दहके थे,
मै तो आदमी हूँ।
है इसमे पाप-पुण्य कुछ नही,
ये सुरा आचमन है,
ऐ रंग,-
इसमे देवता बहके थे,
मै तो आदमी हूँ.

Monday, 25 October 2021

ठुमरी समाज्ञ्री गिरजा देवी को मेरी भावभिनी श्रद्धांजलि।
                 (ठुमरी को उदास छोड़े जा रही)
मै तो बस अपनी ये साँस तोड़े जा रही---------
एै बनारस मै फिर आऊँगी तेरी घाटो पे लौट रियाज़ करने,
मै इसलिये---------------
एक आखिरी ठुमरी छोड़े जा रही।
अनगिनत साज़-आवाज़ की महफिले,
और दिवान मे गिरजा का जिक्र होगा-------
मै अपनी गायकी का एक रंग छोड़े जा रही।
ना रो मुझे जाने दे एै मेरी सदके मोहब्बत,
तु तो मेरे बचपन की सहेली है,
वे देख कब से खड़ी है ले जाने को आज़,
जाने दे ना रोक सहेली,
देख तेरे नाते वे फरिश्त़े औरत भी गमज़दा है,
उसे भी पता है कि वे गिरज़ा की साँस के साथ------
हमेशा के लिये ठुमरी को उदास छोड़े जा रही।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Sunday, 17 October 2021

(मै दर्दे दरख्त़ हूँ)
मै वे दर्दे दरख्त़ हूँ--------
जो चोट पे भी चुप रहती है शाख-शाख।
सब छोड़ जाते है--------
कुछ लम्हों के बाद मुझको,
मै सिसकती हु तन्हा अक्सर,
अपनी ही साँस-साँस।
मेरे बदन की ये लिबासे पत्तियां,
कर देती है खिज़ा में-------
बेपर्दा बदन मेरा!
मै जीती हूं किस तरह-------
शर्म को अपनी पलको से टांक-टांक।
मै वे दर्दे दरख्त़ हूँ-------
जो चोट पे भी चुप रहती है शाख-शाख।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
(एल.आई.सी की तरह करता है)
मै तंग आ गई हूँ उसकी किस्त से,,,,,,,,
ऐ,रंग----मेरा शौहर-----
मुझसे मोहब्बत भी---------
एल.आई.सी की तरह करता है।
(गुलेल नीलोफर)
छुट रहे-
गुड्डे और गुडियो के,
खेल नीलोफर।
अब कैसे होगा,
तेरा अपनी सखियो से-
मेल नीलोफर।
रो रहा,रंग,-
अमिया को तोड़ने वाला,
तेरा छज्जे पे रखा-
गुलेल नीलोफर।

Thursday, 14 October 2021

( काबुलीवाला)

मैं रोज देखती हूं------
 खुली खिड़की से
 घंटों सड़क की तरफ, ए 'रंग '
 इस उम्मीद में कि शायद, 
 कभी दिख जाए, 
 वे मेरी बचपन का----
"काबुलीवाला "

@@रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जौनपुर, उत्तर-प्रदेश 
Mo.no.7800824758
(जवान नीलोफर)
चहकती थी,फुदकती थी,हर कमरे
दालान नीलोफर।
आज विदा हो रही-
अपने बाबुल के गाँव से
उफ!बह रहे आँशू-
मेरे भी कलम के,
ऐ रंग,-
क्यों?इतनी जल्दी हो गयी
जवान नीलोफर।

एक सिल-सिलेवार एक नज्म नीलोफर।
(गुंजा का गाँव)
है,आज भी नदिया का पानी
है,आज भी पीपल की छाँव।
आज भी-
उतरे है,चन्दा पूरे आँगन
है,आज भी ऐ रंग,-
वही चन्दन
और है,वही उसकी-
गुंजा का गाँव।

Monday, 11 October 2021

(रुह के सिज़दे मे रहुँगा)
ऐ मौत आओ--------
मेरे कमरे से अपना जिस्म़ ले जाओ,,,,,,
क्युकि अब मै ता उम्र-----
रुह़ के सिज़दे मे रहुँगा।
(एक जिंदा दिया हूँ)
ताउम्र अपनी मै जल-जल के जिया हूं,
मै आदमी नही-----------
एक जिंदा दिया हूँ।
तमाम खराशे है,है तमाम सिलवटे
उधड़ा रहा मै----------
किसी मुफ़लिस के बिछौने सा,
हर जख्म जिंदगी का-------
मै खुद से सिया हूं।
मै आदमी नही--------
एक जिंदा दिया हूँ।
हु मै एक एैसा सजायाफ्ता,
जो रो नही सकता!
खौलते है आँसू मेरे दिल के अंदर,
मै कभी बहार में नही-------
खिजा़ में जिया हूं।
मै आदमी नही------
एक जिंदा दिया हूँ।

Friday, 8 October 2021

(दहलीज का चराग)
तेरे लौटने का आज भी
करता है,इंतजार-
मेरी दहलीज का चराग।
ऐ रंग,-
तड़पता है,सिसकता है,
तेरी ना-उम्मिदी के डर से,
मेरी दहलीज का चराग।
(अपनी उर्वशी पे)
वे अपना सबकुछ वार देती है,
मेरी एक खुशी पे।
इसलिए,ऐ रंग,-मै
रोज कुछ न कुछ लिखता हूँ,
अपनी उर्वशी पे।

Sunday, 3 October 2021

(किसानो के अच्छे दिन आ गये)
लात-घूँसा और पुलिस के बर्बरता की,
लाठी तलक खा गये----------
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
डीजल--पेट्रोल महगा होता गया,
बड़ी मुश्किल से इस मर्तबा खेत जोता गया,
इनके बिकास का सारा पैसा--------
नीरव मोदी और माल्या खा गये,
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
पिछली सरकार दस साल रही,
क्या किया उसने ?
हा इतना जरुर किया की हमारे जख्मों पे---
हमसे भी ज्यादा रोने आ गये,
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
हर सरकार इन किसानों पे सांडर्स की तरह,
जलियांवाला बाग सा दर्द देती है,
ये ऐसे ही कभी मौसम,
तो कभी हुकूमत से लड़ते--लड़ते हार गये,
ये तब बागी हुये जब सह न सके,
तभी तो ऐ दिल्ली तेरी दहलीज पे आके,
तेरे अच्छे दिन को नकार गये-----
किसानों के अच्छे दिन आ गये।
लेकिन राजनीति अब भी कह रही,
कि विपक्ष को ईधन चाहिये था चुनाव का,
और अब भी पक्ष का वही दावा,
कि किसानों का पहले से कही ज्यादा-----
हमारी सरकार मे अच्छे दिन आ गये।
(वृद्धा के है।राम)
सबकी भक्ति,
सबकी श्रद्धा के है।राम
कौन कहता है?
कि केवल अयोध्या के है।राम
ऐ रंग,-
जुठे बेर,जाति की छोटी
शबरी जैसी वृद्धा के है।राम
जय श्री राम।
(आवारा छोड़ दिया)
उसके शहर को--------
नजदीक से देखने की खातिर,,,,,,,,
ऐ,रंग----हमने-------
खुद को आवारा छोड़ दिया।

Thursday, 30 September 2021

(सीता का पिंड़दान)
कितनी विविधता समेटे है-----
अपना ये हिंन्दुस्तान,,,,,,,,,,,,
कौन भूल सकता है आखिर ऐ,रंग-----
वे रेत के गोले से दशरथ व उनके पितरो को---------
अर्पित सीता का पिंडदान।
पितरो को हमारी श्रद्धा के चंद पुष्प।

Sunday, 26 September 2021

आज, रश्मि प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशित वरिष्ठ कहानीकार राम नगीना मौर्य का साहित्यिक अनाउंसमेंट  मुझे जैसे जनपद जौनपुर के साहित्यकार के कान से होते हुए दिल तक पहुंची. 

आइए हम आप आज की जिंदगी और उसकी कहानियों के  "चारबाग स्टेशन" से उस साहित्यिक अनाउंसमेंट को सुने जहां से ये कहानियां कह रही है------

"यात्रीगण कृपया ध्यान दे ".

धन्यवाद, बड़े भैया आज आपका ये बेशक़ीमती कहानियों का शाहकार प्राप्त हुआ.

Saturday, 11 September 2021

(अच्छे दिन आ गये)
चचा---------
साठ की उम्र में
तीस वाली को पटा गये,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----नौजवानो से ज्यादा----
तो बुज़ूर्गो के अच्छे दिन आ गये।

Wednesday, 8 September 2021

(तेरे शहर में)
तेरे शहर में--------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।
ले लेना तुम हमारी गज़ल का जर्रा-जर्रा,
कोई बंदिश नही----------
यहाँ जाफ़रान की खुशबू है हर शख्स़ की खातिर,
यहाँ न कोई कौम न मज़हब और----------
ना ही सरियत है।
तुम्हारें शहर में--------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।
आहिस्ता-आहिस्ता उतरेगा जे़हन मे तेरे,
इन लफ्ज़ो का गुलाबीपन,
मै याद आऊँगा तुम्हारें शहर को,
यहाँ से जाने के बाद भी,
क्योंकि मोहब्बत ही एै "रंग"--------
इस अदब के दिवान की नियत है।
तुम्हारें शहर में------------
हमारे मोहब्बत की एक शाम वसीयत है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

Tuesday, 7 September 2021

तुम बेरोजगारी को,
समझ नही सकते
क्योंकि तुम्हारें सदन में शिवा
झूठे आकड़ो के
है क्या?


Thursday, 2 September 2021

(मै लिखता हूँ कोई गीत)
जब बेचैन कर देता है------------
मेरे अंदर का मरुस्थल मुझको,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
शब्द के होंठ पे चुभती है कोई नागफनी,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब पथ की रेत पे-----------
चलता जाता हूँ दूर पथिक सा
और फूट जाते है पाँव के छाले,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
बहुत सन्नाटा मेरे भीतर का,
उधेड़ता है मुझको---------
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
बोता हूँ रेत पे कुछ शब्द,
पर कटिले वृक्ष के विरवे ही पनपते है,
उन्ही वृक्षो की------------
खरोंच जब आ जाती है बन के पीर,
तब मै लिखता हूँ कोई गीत।

Wednesday, 1 September 2021

(एक जिंदा दिया हूँ)
ताउम्र अपनी मै जल-जल के जिया हूं,
मै आदमी नही-----------
एक जिंदा दिया हूँ।
तमाम खराशे है,है तमाम सिलवटे
उधड़ा रहा मै----------
किसी मुफ़लिस के बिछौने सा,
हर जख्म जिंदगी का-------
मै खुद से सिया हूं।
मै आदमी नही--------
एक जिंदा दिया हूँ।
हु मै एक एैसा सजायाफ्ता,
जो रो नही सकता!
खौलते है आँसू मेरे दिल के अंदर,
मै कभी बहार में नही-------
खिजा़ में जिया हूं।
मै आदमी नही------
एक जिंदा दिया हूँ।
(दिवाली नही आई)
भरपेट भोजन की थाली नही आई,
कुछ एैसे भी घर है----------
जहां दिवाली नही आई।
रो रही घर में---------
तक-तक के दरवाजे को भूखी बेटिया,
उन्हे अपनी माँ की बुलाती आवाज़,
प्यार भरी थपकी,
छोटी बिटिया के खुशीयो की------
वे ताली नही आई!
अभी तलक----------
लौट कर इस घर की दिवाली नही आई।
सुबह के धुधलके में--------
दो पुलिसिये चादर में लपेटकर,
लाये थे नग्न लाश!
बेटिया डर गई,
एकटक देखा कि कौन है?
फिर माँ कह झिंझोडा--------
लेकिन उसकी माँ की खुली आँखो ने तका नही,
पहली बार-उसकी माँ के चेहरे पे
कोई लाली नही आई।
ये बेटिया क्या जाने?
कि करोड़ो के पटाखो में दब गई,
इनके माँ की सिसकिया!
देख लो आज तुम भी मेरी कविता,
इसके बदन पे हवस के निशान-----
ये आज भी अपने घर खाली नही आई,
ये और बात है कि----------
इसके घर कोई दिवाली नही आई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

----शायद कुछ एैसे वंचित घर है जहां दिवाली नही आती,फिर भी ईश्वर हर घर को रौशनी दे।
(एकलौता दीया सरहद पर रख दिया है)
और घर रौशन हो---------------
इस खातिर माँ ने अपना एकलौता दीया,
सरहद पे रख दिया है।
वे दिवाली की रात छत पे खड़ी है,
बहु रखे जा रही मुंडेर पर दीये,
माँ जानती है कि बहु ने भी तो,
अपने अमर-सुहाग का दीया------
सरहद पे रख दिया है।
और घर रौशन हो---------
इस खातिर माँ ने अपना एकलौता दीया,
सरहद पे रख दिया है।
पोते भी बस दिखाने को खुश है,
पटाखे और रौशनी के धुँये को माँ तक रही,
जानती है कि उसके मासूम पोतो ने,
अपने पापा के प्यार का दीया-----------
सरहद पे रख दिया है।
और घर रौशन हो-----------
इस खातिर माँ ने अपना एकलौता दीया,
सरहद पे रख दिया है।

@@@उन तमाम सरहद के दीयो को मेरी लेखनी का प्रणाम जो हमारी और मुल्क की रौशनी के लिये सरहद पे खड़े है।----वंदे मातरम।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
(मेरी किस्मत मे ये जागना आया)

उन्हे कहा, 
कभी हमे चाहना आया.
मेरी ख्व़ाहिशो को रौदा, 
बस उनकी समझ मे, 
वासना आया.

मै घुटी बंद कमरे मे,
वे चैन से सोये, 
ऐ,रंग--
मेरी किस्मत मे ये जागना आया. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी
 जिला---जौनपुर, ( उत्तर प्रदेश)

Sunday, 29 August 2021

(स्मारके मोहब्बत है)
तुम जीसे कब्र कहते हो ऐ शहर वालो----
वे इस रंग----की  स्मारके मोहब्बत है।

यह कविता 2019 में "अहा!जिंदगी " और 2021 में सुरभि में प्रकाशित है (सौतन बांसुरी )


यह कविता 2019 में "अहा!जिंदगी " और 2021 में सुरभि में प्रकाशित है (सौतन बांसुरी )

रहती है, हर पल अधर पे,
हम गोपियों की------
सौतन बांसुरी.

रह-रह के हँसती है,
जब भी हमारे दर्द पे,
तो हमें लगती है,
सौतन बांसुरी.

उफ! उन पर भी गुस्सा आ रहा,
पर क्या करें हम गोपियाँ??
हमें भुलकर,
कितने मजे से छू रहे है खुद,
हम गोपियों के-----
नारायण बांसुरी.

काश! मिलती तो इसे हम तोड़ देती,
पर ये लगता है,संभव नही,
बड़ी बेहया,बड़ी निर्लज्ज है,
ये सौतन बांसुरी.

अधर तो अधर था,
कमर मे लटक के भी उनके,
हमारे जी को जलाती है 
ये सौतन बांसुरी.

रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

(शहीद की बहन)
सीने मे गोली लगी है,चंद साँस बाकी है।
ऐ मौत के फरिश्तो जरा ठहरो------
मै बहन से बात कर लु-----
क्यूकि आज राखी है।

कविता---(इतना दर्द न हो )

(इतना दर्द न हो)
मै गा तो रहा हूँ-----------
लेकिन एै खुदा मेरी तरह,
फिर किसी के गज़ल में-----
इतना दर्द न हो।
ना कोई टूट के बिखरे मेरी तरह,
फिर किसी को अपनी शाखे मुहब्बत से,
यू जुदा होने का एै खुदा----------
इतना न दर्द हो।
चुभे कमरे की खुली खिड़की से,
याद की हवा,
एै खुदा फिर किसी खुली खिड़की का मौसम------
इतना सर्द न हो।
चेहरे की सिलवटे चुभन न छिप सके,
एै खुदा किसी चेहरे पे-------
इतना गर्द न हो।
मेरी तरह न बुझ जाये सहर से पहले,
एै खुदा किसी और चराग को सब का----
इतना दर्द न हो।
मै गा तो रहा हूँ---------
लेकिन एै खुदा मेरी तरह,
फिर किसी के गज़ल में----
इतना दर्द न हो।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

इस रचना मे दो एैसे शब्द है जिनका अर्थ निम्नवत है-----
(1)----सहर----सुबह।
(2) सब----रात।

Saturday, 28 August 2021

कविता---(दो घड़ी की रात )

(दो घड़ी की रात)
जिंदगी है बस दो घड़ी की रात,
आओ गुज़ार ले लिहाफ में हम,
एक दुजे के संग---
दो घड़ी की रात।
आयेगी धूप कमरे में कल किसी और के लिये,
खुली खिड़की से फिर बाल सँवारेगी कोई दुल्हन,
फिर अँधेरा होगा!
वे भी गुजारेगी इसी तरह अपनी जिंदगी की-------------
ये दो घड़ी की रात।
भुल जायेंगे सभी एक दिन रफ्ता-रफ्ता,
जैसे हम भुले है औरो के जिंदगी की---
दो घड़ी की रात।
एै,रंग-----यहाँ से हमी फना होगे,
बाकी यही रह जायेगी औरो के लिये---
ये दो घड़ी की रात।

Friday, 27 August 2021

(बच्चा पेट भरता है)

तुम जिस अखबार को इंकलाब कहते हो,,,
उसी अखबार पर चंद रोटियाँ रख-----
ऐ,रंग-------------
स्लम ऐरिये का बच्चा पेट भरता है. 

### रंगनाथ द्विवेदी
 जिला जौनपुर उत्तर प्रदेश.

Saturday, 21 August 2021

(एक शहंशाह का पत्थर )

(एक शहंशाह का पत्थर)
तोड़ देती है हमें मुफ़लिसी----
वरना हम भी लाते कही से,
अपनी मूमताज़ का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से---
एक शहंशाह का पत्थर।
संगतराशी देखने ज़मी पे-------
आते खुदा के फरिश्ते,
जब मै लगवाता इश्के़ इमारत में------
अपनी मुहब्बत के अल्लाह का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से---
एक शहंशाह का पत्थर।
शोहरत,नुमाइश,चाँदनी रात यहाँ भी होती,
और शायर भी लिखता अपने तराशे हुये हर्फों से----------
इस कब्रगाह का पत्थर।
तोड़ देती है हमें मूफलिसी-------
वरना हम भी लाते कही से,
अपनी मूमताज़ का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से,
एक शहंशाह का पत्थर।

Wednesday, 11 August 2021

(अशफ़ाक लिखा है)
हमने गीता और कुरआन से भी ज्यादा,
ऐ मादरे वतन-----------
तेरी मिट्टी को पाक लिखा है।
जो जला है उसे राम प्रसाद बिस्मिल,
और जो दफ़न है-------
उसको अशफ़ाक लिखा है।
###पन्द्रह अगस्त तक मै राष्ट्र को समर्पित रचनाओ और उनकी शहादत के संम्मान में अपनी भाव संवेदनाओ की श्रद्धांजलि के साथ मै मुसलसल इस फेसबुक पे आपके साथ एक सफर करता रहुंगा----जय हिन्द।
(कोई मेले लगे)
पन्द्रह अगस्त की आँखो से------
आँसू बहने लगे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,.
क्योकि शहिदो की मज़ार पे ऐ,रंग-----
न तो चराग जला---------
और न ही कोई मेले लगे।

कविता---(हमारे देश का परचम है )

( हमारे देश का परचम है )
यूँँहि नही फहर रहा आज लाल-किले से-----
हमारे देश का परचम है.
पुरे बदन पे कोड़े के निशान,टूटती और थमती साँसे
और उसपे भी आँसू नही इंकलाब जिंदाबाद------
तमाम-तमाम अग्रेजों के जुल्मों-सितम है.
यूँही नही फहर रहा आज लाल किले से------
हमारे देश का परचम है.
जेल मे आखिरी मर्तबा--------
अपने बेटे से मिलने आई भगत सिंह की माँ है,
जिसके होठ पे एक आजादी की हँसी है-------
और दिल मे इस शहीद बेटे के खोने का गम है.
यूँही नही फहर रहा आज लाल-किले से-----
हमारे देश का परचम है.
वे सामने है बाग जलियां का----
जहा बम,गोली,बारुद और लाशें है,
वे लाशों का बदला ले रहा कोई और नही "रंग"-----
भारत माँ का ऊधम है.
यूँही नही फहर रहा आज लाल-किले से-----
हमारे देश का परचम है.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर.
जिला---जौनपुर, pin.no.---222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.---7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

कविता---(माँ )

(माँ)
तेरा हर बेटा मुल्क की खातिर-------
यूं शहीद और कुर्बान हो माँ!
ना बटने दे किसी को मजहब के नाम पे,
समय से पूजा समय से अजा़न हो माँ।
फक्र हो तुम्हे अपने आँचल और दूध पे,
तेरी लोरी में राष्ट्र हो और राष्ट्रगान हो माँ।
ना पंजाब,ना गुजरात,ना महाराष्ट्र निकले,
आखिरी लम्हें गर लब भी फड़फड़ाये,
तो लब पे तुम और हिन्दुस्तान हो माँ।
गर सुपुर्द-ऐ-खाक होने लगू,
तो मुट्ठी में मुल्क की मिट्टी-------
और डालने वाले के होंठो पे मुस्कान हो माँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
###आप सभी को हमारे मुल्क की ये आजाद सुबह मुबारक हो।

कविता--(टूट गया )

(टूट गया)
दर्पण देखा टूट गया,सपना देखा टूट गया
जबसे आया धरती पे------------------
जीतना भी देखा टूट गया।
जिस गहने से ईश़्क किया,
ता उम्र ज़मी की औरत ने,
साँस जो टूटी उस औरत की,
सारा गहना टूट गया।
मशहूर इमारत के मालिक ने,
हर नक्काशी करवाली!
जब खाली हाथ मशान चला,
तो उसका उसी इमारत में फिर------
ठाट से रहना टूट गया।
मंदिर,मंस्जिद,गुरुद्वार,गिरजाघर सब यही रहे,
आये ब्राह्मन,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई
राम,अल्लाह हो अकबर,वाहे गुरु,और जिसस--------------
यहाँ ये भी कहना टूट गया।
एै,रंग-----ये देखो ताजमहल,
और कब्रे गड़ी मोहब्बत की,
यहाँ बस इतना ही चलना था,
इतनी ही दुरी तय करने में सबका-----
चलना टूट गया।

Sunday, 8 August 2021

(भरपेट दूध मिलेगा)
झोपड़ी से-नरगिस के सिसकने की----
आवाज आ रही है!
ऐ,रंग--आज शायद उसके भूखे बेटे को-
भरपेट दूध मिलेगा।
(नीला आसमा सो गया है)
वक्त के सानो पे सर रख नही पाई,
ऐै ",रंग "-------------
इस रेखा की चाहत और ख्व़ाहिशो का भी ,
नीला आसमा सो गया है।

Wednesday, 4 August 2021

(शामे अज़ान हूँ)
मै शब्दो का हिन्दू,तो हर्फो का मूसलमान हूँ,,
मेरी कौम अलग है,मै बट नही सकता---
कवि हूँ तो सुबहे आरती,गर शायर हूँ तो-
ऐ,रंग----मै शामे अज़ान हूँ।

Tuesday, 3 August 2021

यह लघुकथा मासिक पत्रिका "पाखी" के अगस्त 2021 अंक में प्रकाशित है----( मजदूर की दिहाड़ी )


लघुकथा---
              (मजदूर की दिहाड़ी)


आज रामलाल को लगातार तीन दिनों से कोई दिहाड़ी नहीं मिली थी. वे मजदूरों के बैठने वाले अड्डे पर बिना नागा किए जाता और कोई काम ना मिलने के तनाव में 2 - 3 बीड़ियां पीता और अपने घर लौट आता.उसका 3 दिनों से लगातार बिना दिहाड़ी या मजदूरी  के घर लौटना कितना असह्य था, यह वही जानता था. जब उसकी पत्नी बिना कुछ बोले बस रामलाल को देख कर चुपचाप घर में लौट जाती थी और उसकी जवान बिटिया जब अपने बापू को पीने के लिए पानी वाला लोटा पकड़ाती तो, उस लोटे को पकड़ जब रामलाल पानी पीता तो वे पानी रामलाल के गले में कांटे की तरह चुभता था. 

चौथे दिन भी रामलाल मजदूरों  के बैठने वाले अड्डे पर गया. जबकि आज उसका पूरा शरीर बुखार से तप रहा था. ज्यों - ज्यों धूप चढ़ता रहा,  त्यों - त्यों रामलाल के शरीर का बुखार बढ़ता रहा. बढ़ते - बढ़ते जब उसके शरीर से ज्यादा उसके मन का बुखार बढ़ा, तो उसने अपने कपकपाते हाथ से अपने कुर्ते की जेब को टटोला तो उसे अपनी जेब में से एक आखरी बची हुई टूटी बीड़ी मिलती है जिसे निकालकर वेे उसे किसी तरह जलाता है और उसे जलाकर वह बीड़ी को अपनी होंठ सेे लगाकर ढेर सारा धुआँ अपनी नाक से निकालता है और जैसे ही रामलाल दूसरी बार बीड़ी को अपने होठों सेे खींचता है तो उसी के साथ ही उसकी जिंदगी की साँस भी, उसकी टूटी हुई बीड़ी  की तरह टूट जाती है. और वे बिना किसी दिहाड़ी या मजदूरी के मर जाता है. 

जब काफ़ी सारा दिन चढ़ आया तो उस अड्डे के अन्य मजदूर जिन्हें की रामलाल की ही  तरह दिहाड़ी नहीं मिली थी उन सभी नेे साथ में घर से लाया हुआ खाना खाने के लिए रामलाल को आवाज दी, तो रामलाल ने कोई भी  जवाब नहीं दिया. फिर उसके मजदूर साथियोंं ने उसे बुलाया तो भी कोई जवाब नहीं. तो एक शंका  बस उसके मजदूर साथियों ने रामलाल के पास जाकर देखा तो रामलाल भयंकर चिलचिलाती धूप में एक तरफ होंठ से लगी सुलगती बीड़ी सहित बिना किसी हरकत के पड़ा हुआ था. उसके सभी साथियों ने उसेे जोर सेेे झिझोड़ा तो उन सभी को पता चला कि रामलाल तो मर गया.

तो उसके सभी मजदूर साथियों ने रामलाल की लाश को अपने कंधे पर लाादकर उसके घर पहुंचे, तो दरवाजे पर खड़ी उसकी पत्नी आज दिहाड़ी में लौटे अपने पति की लाश को बस यूं ही चुपचाप तकती रही. जवान बिटिया भी लोटे में पानी लेकर अपने बापू के सिरहाने खड़ी रही. फिर कुछ देर बाद उसकी पत्नी और उसकी बिटिया चीख-चीख कर कुछ इस तरह रोने लगी कि पूरी बस्ती की  आँख  गीली हो गई. सच तो यह है कि यह  लाश केवल इस गांव या बस्ती के आखिरी रामलाल की लाश नहीं,बल्कि बिना किसी  दिहाड़ी या मजदूरी के खाली हाथ अपने घर लौटे हर गांव व बस्ती के रामलाल की लाश है. 


यह लघुकथा अगस्त 2021 के "पाखी" पत्रिका में प्रकाशित है.

लेखक -- रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (उत्तर प्रदेश)
222002
Mo. No. -- 7800824758

कविता---(जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है )

(जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है)
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है,
जिसे मोड़कर कई दिनो से यूँही रख दिया है,
कि समय मिलते ही फिर उस पृष्ठ को खोल पढ़ुगा,
अपने जीवन के हूबहू घटनाओ की वे तमाम बाते,
यानी की गतांक से आगे---------------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
तमाम उठा-पटक झंझावतो का जीवन,
कही कोई विदेशी रोमांटनिजम नही,
एक विछोह,एक दर्द,
हर पृष्ठ के कथनांक के आगे--------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
इसी मोटी सी किताब को,
कुछ लोग लुगदी साहित्य कह,
यू छिटक जाते है जैसे मंटो की भूखी नायिका,
अपने से ज्यादा नंगो को देखती है,
अपनी काली सलवार और कपकंपाती टाँग के आगे-----
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
कुछ पन्ने और बचे है पढ़ने को,
कल खत्म कर लुंगा इसे भी,
और बिना मोड़े रख दुंगा,
फिर इच्छा ही नही बचेगी इसके पढ़ने की,
क्योंकि पता चल जायेगा कि क्या कुछ लिखा है,
एै"रंग" इस नावेल मे गतांक से आगे-------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

कविता---(इतवार जीते है )

(इतवार जीते है)
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है,
वे उस शहर,हम इस शहर
दूर रहके भी-------------
हम इतना प्यार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
वे गीले बाल उनका कमरे में आना,
उतने ही पानी से हम--------------
तड़प के सावन की फुहार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
छः दिन गुजारते है हम नागफनी के,
फिर लौटते है लेके उन्हे केवड़े का गजरा,
ऐ,रंग---------------
हम इतनी ही खुशी का त्यौहार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।

कविता---(गीतों का सर्कस )

( गोपालदास नीरज के गीतो का सर्कस) 
नीरज ने मेरा नाम जोकर लिखा था, 
लोग आते रहे, लोग जाते रहे
अँधेरा--उजाला होता रहा, 
ये सर्कस सा जीवन--------
कभी इस शहर, कभी उस शहर चलता रहा. 
कोई बसा, कोई ठहरा कुछ ही दिन, 
फिर चल पड़ा ,
सर्कस ही सर्कस चारो तरफ, शहर दर शहर 
वे सिनेमा का सर्कस 
ये जीवन का सर्कस, जोकर के आँसू भी 
एक तमाशा, 
वे जोकर थे नीरज जो हँसे और रोये,
कभी खाली तो कभी भरी पेट सोये,
फिर थिएटर भरा और तमाशा हुआ, 
खाली हुआ फिर एक दिन-------
वे देखो चला दुनिया को छोड़े कोई नीरज नही,
गीतो का अपने वे राजू जोकर. 

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी. 
जज कालोनी, मियाँपुर 
जिला---जौनपुर पिन नं. --222002 (उत्तर-प्रदेश)
मो. नं. --7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है. 
महा-गीत पुरूष को हमारा प्रणाम ।

कविता---(दीवाना रोया है )

(दिवाना रोया है)
ये जो सारी रात------------
शहर मे बरसात हुई है,
कही किसी की याद मे----
कोई दिवाना रोया है।
ये बिजली,ये चमक--------
किसी बंद हवेली के जले चराग से,
लिपट------------------
आखरी लम्हे कोई परवाना रोया है।
कल सहर के बाद--------------
निकल के देखना तुम आलमे बारिश,
एक हमी है जो जानेगे,
कि कल सारी रात तड़प के----
किसी का अफसाना रोया है।
ये जो सारी रात--------------
शहर मे बरसात हुई है,
एै,रंग------किसी की याद मे,
कोई दिवाना रोया है।

Monday, 2 August 2021

कविता---(दोस्ती )

फ्रेंड डे की बधाई के साथ इस रिश्ते पे लिखी एक कविता----
       
(दोस्ती कागज़ के नाव की थी)

उसकी और मेरी दोस्ती कागज़ के नाव की थी.
आम-अमरुद,बरगद,पीपल और
दरवाजे पे लगे नीम के छाँव की थी-----
उसकी और मेरी दोस्ती कागज़ के नाव की थी.

साथ मे घुमना और घंटो टहलना,
खेत की पगडंडियो पे चलना,
सच एै शहर-------------
बीना स्वार्थ और मतलब के कितनी पाकिज़ा दोस्ती,
हम दोनो के गाँव की थी-----
उसकी और मेरी दोस्ती कागज़ के नाव की थी.

कितनी डांटे सही,कितनी शिकायते सुनी,
माँ के चाटे खाये-----------
फिर भी चोरी से मिलते रहे दोनो,
क्योंकि वे दोस्ती हम दोनो के बेइंतहा लगाव की थी-----
उसकी और मेरी दोस्ती कागज़ के नाव की थी.

कंचे खेले,आम के बाग से अंबिया तोड़ी,
साथ पोखर नहाये,
दोस्ती के वे सारे मखमली दिन छिन गये,
रोटी की हत्तक मे कहाँ से कहाँ चले आये,
एै"रंग" याद इसलिये है जेहन को,
क्योंकि वे दोस्ती,
हम दोनो के दो जिस्म मगर एक जान की थी-----
उसकी और मेरी दोस्ती कागज़ के नाव की थी.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

दैनिक अमर उजाला के साप्ताहिक मनोरंजन पृष्ठ के हास्यरंजनी में दिनांक 1,8,2021 को प्रकाशित मेरा व्यंग्य--(बाबू की महिमा )

दैनिक अमर उजाला के साप्ताहिक मनोरंजन पृष्ठ के हास्यरंजनी में दिनांक 1,8,2021 को प्रकाशित मेरा व्यंग्य---( बाबू की महिमा )

चापलूसी करना काफी टिपिकल और शास्त्रीय कला है.यह कला ज्यादातर सरकारी विभागों के बाबुओ या क्लर्को में सर्वाधिक पाई जाती है.जब भी इनके विभाग में किसी नवागांतुक साहब का आगमन होता है तो यह उस विभाग के सारे कर्मचारियों से बहुत पहले साहब के स्वभाव की सारी ए बी सी डी जान लेते है और फिर यह साहब के स्वभाव के हिसाब से ही उनके साथ अपना रजिस्टर्ड वातानुकूलित व्यवहार करना शुरू कर देते है.

क्लर्क या बाबू किसी भी विभाग में काम करने वाले व्यक्ति या मनुष्य की गिरगिट प्रजाति है.अगर वास्तव गिरगिटो में जरा सी भी मनुष्यगत बुद्धि होती तो यह सच जानिए की इस देश के समस्त गिरगिट मिलकर इनके खिलाफ इस आशय का एक मुकदमा दर्ज़ करते कि साहब यह मनुष्य हमारे रंग बदलने की हुनर को अपने रंग बदलने की हरकतों से बदनाम कर रहा है.अतः हमारे इस प्राकृतिक स्वभाव की रक्षा की जाए.


जैसे ही कोई व्यक्ति ऑफ़िस में अपना काम करवाने के लिए प्रवेश करता है, तो उसे सबसे पहले अपनी डिजिटल मुस्कुराहट बाबू या क्लर्क की तरफ सरकानी पड़ती है. इस मुस्कुराहट का गुरुत्वाकर्षण बल तभी ठीक तरिके से काम करता है जब आप बाबू को अर्थ रूपी आइंस्टीन के नियम से संतुष्ट कर लेते है.नही तो वह आपको अपनी एक मीठी सी रसमलाई टाईप की  मुस्कुराहट के साथ काम ना हों पाने के तमाम गलत-सलत सॉफ्टवेयर आपकी बुद्धि की मोबाईल में चढ़ा देगा, फिर आप भी यही समझेंगे कि आपके काम में ही कही वायरस है.


अतः उस विभाग में आपका आवश्यक कार्य कही से हैंग ना हों इसके लिए अगर आप उस विभाग का चरित्र सही ढंग से नही समझ पा रहें है तो इसके लिए उस विभाग के आस-पास टहल रहें किसी प्राइवेट विद्वान का सहारा लें,जो कि इन बाबुओ या क्लर्को के ही इसारे पर काम करने वाले इनके चचेरे भाई है.


अतः बाबू या क्लर्क के संबंध को आप मेडिकल की भाषा में भी समझ सकते है, अर्थात जो अंदर है वे डिग्री धारी है और जो आफ़िस के बाहर है वे शुद्ध रूप से झोलाछाप है.जो कि आपका केश बहुत बिगड गया है,को समझाते हुए इतना डरा देगे कि आप तुरंत ही कही से पैसे का जुगाड़ कर एक बार फिर लौट के "बुद्धू घर को आए, " के बुद्धू की तरह एक बार फिर अपनी बत्तीसी चियारे बाबू या क्लर्क के पास पहुंच जाएंगे.


और बाबू आपको देखते ही एक बार फिर अपनी होलमार्क मुस्कुराहट का प्रदर्शन आपके सामने करेगा और जैसे ही आप पैसा देंगे वैसे ही आपके काम के अवरोध का सारा प्रदूषण नष्ट हो जाएगा.कहावत है कि बाबू या क्लर्क कि भाषा का व्याकरण किसी भी हिंदी साहित्य कि किताब में लिखा नही जा सका. हां! यह शायद कभी किसी कालखंड में हों सकता है कि कोई बाबू या क्लर्क कि भाषा के व्याकरण पर कुछ लिख सकने वाला कोई हरिशंकर परसाई पैदा हों.


यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.


लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जौनपुर 222002 (U P )
mo. no.7800824758

Sunday, 1 August 2021

कविता---(सावन में मिली थीं )

(वे हमे सावन मे मिली थी)
पहली मर्तबा हमे-वे सावन मे मिली थी,,
मै तर-ब-तर भीगा था,वे तर-ब-तर भीगी थी।
पहली मर्तबा हमे वे सावन मे मिली थी।
उफ!वे बरगद का पेड़ आज भी,,,,,,,,
मेरी ज़ेहन मे ज्यो का त्यो है-------
क्योकि मै भी वही खड़ा था और वे भी वही खड़ी थी।
पहली मर्तबा हमे वे सावन मे मिली थी।
मै खामोश न रहा,मेरे सामने गज़ल थी,,,,.
वे शर्म से सिमटी रही------
और मै बेधड़क कहता रहा,,,,,,,,,,,,,,,,,,
शायद मेरी ज़ूबां मे ही-----------
उसको अपनी ज़ूबा मिली थी।
पहली मर्तबा हमे वे सावन मे मिली थी।
ऐ,रंग------फिर थमी बारिश़--------
फिर अगले सावन मे हमे--------
वे पत्नी बन मिली थी।
पहली मर्तबा हमे वे सावन मे मिली थी।

कविता---(पायल )

(पायल------एक दर्द)
अपने माँ-बाप के दुलार से बनाई गई पायल,
सुना है कि-----------
ससुराल मे जलाई गई पायल।
माँ दहाड़े मारे रो रही और बाप गुँगा हो गया,
न जाने कैसे उन पापियो का कलेजा नही कांपा,
एक माँ को आखिरी बार----------
उसके मरती हुई बिटिया की ना सुनाई गई पायल।
सोचा था भेजेगी इसके बापु को लाने,
लेकिन हाय रे! निष्ठुर समय---------
कि एक माँ तड़प रही मछली की तरह,
उसके आँख के पानी के एक-एक बुँद की तरह-----
तोड़े गये घुँघरू और पुरे कमरे मे घुँघरू दर घुँघरू,
बहुत तड़पाई गई पायल।
जिससे ब्याहा था खुशी-खुशी वे भी था शामिल,
उन कातिलो में,
हे! भगवान तु भी चुप था बिटिया तड़प रही थी,
उसकी तड़प मे चीख़ रही थी-----------
पती के हाथो पहनाई गई पायल।
सास का कलेजा क्यू  कांपा नही,
क्यू पथरा गई, क्यू डायन हो गई,
आखिर इसकी बिटिया का कसूर क्या था?
जबकि हर काम की खातिर एक पैर पे------
पुरे घर मे दौड़ाई गई पायल।
एक माँ-बाप का श्राप है,
कि उतना तुम सब भी रोओगे-तड़पोगे,
जितना तुम्हारे घर में------
हमारी रुलाई गई पायल।
माँ-बाप के  दुलार से बनाई गई पायल,
सुना कि----------
ससुराल में जलाई गई पायल।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

शायद हम आप प्रयास करे तो कुछ पायल घर के मंदिर मे किसी सुमधुर संगीत की तरह बजती और खिलखिलाती रहे।

कविता---(बकरा )

सभी को बकरईद की बहुत-बहुत बधाई. 
एक बकरे का अथाह दर्द-------

(बकरा)

पालने वाले मालिक से खरीदकर,
जब कसाई------
जबरदस्ती पकड़े ले चलेगा बकरे को
उस गाँव,उस गली से
जहां वे इतने दिन पला बढ़ा है,
तो में में में कर रोता जायेगा वे रास्ते भर।
गर रास्ते में कही देखेगा वे बकरी का मेंमना,
तो सोचेगा---
कि देखो कितना उछल कुद रहा,
गले में घंटी और घुँघरू पहने,
अपने अंजाम से बेखबर,
कितना खुश है ये मेंमना!
यही जब बड़ा हो जायेगा तो इसको भी खरीदने,
फिर इसी गाँव और गली में आयेगा एक कसाई!
ले जायेगा फिर में में में करते हुये बकरे को,
फिर कसाई उसे तमाम बकरो में खड़ा कर,
खू से तरबतर -----------
जब इसको भी काटने की तरफ बढ़ेगा,
तो एक मर्तबा फिर बकरे को----------
वे गाँव,वे गली,वे मालिक याद आयेगा।
फिर कसाई------------
गले को बेरहमी से काटेगा रेतेगा,
और में में में में कर तड़पड़ा के,
अपने ही खून में कुछ देर के बाद,
हमेशा के लिये शांत हो जायेगा बकरा।

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

Friday, 23 July 2021

(चूल्हा नही जलता)

तुम तो-----
बात-बात मे शहर जलाना जानते हो.

तुम्हारे पास---
तो कौमो को जलाने का ईधन है.

पर यहाँ फाकाकश़ी सोने नही देती, 
पेट तो जलता है ऐ,रंग------
पर इस बस्ती में अक्सर चूल्हा नही जलता. 

रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर.

Wednesday, 21 July 2021

(शीकारे वाली लड़की)
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की!
डलझील की मदमस्त लहरो को,
वे उसका एकटक देखना,
फिर जादुई हँसी,
हाय!जाने कहाँ खो गई,
वे अदभुत नजारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
वे उसका तिलिस्मी बदन,
और उसके जुड़े से निकलती वे गुलाब की खुशबू,
अब कही नही मिलती सुघने को,
और कही नही दिखती मुझे,
वे लश्कारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
पहाड़ो की वे ढ़लती शाम,
वे संगीतमय आवाजे,वे बाँसुरी के स्वर
कही कुछ नही!
बस तन्हाई मे यादो की चंद तस्बीर,
जो हवाओ के झोके से फड़फड़ाती है,
और मै निकल आता हु यादो से उसकी,
बस रह जाती है याद जेहन में,
वे शीकारे वाली लड़की।

###न जाने कब घाटियो मे अब अमन के दिन लौटेगे,न जाने फिर कब डलझील में दिखेगी हम शायरो और कवियो की वे शीकारे वाली लड़की।

Tuesday, 20 July 2021

यह लघुकथा देश के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले दैनिक राजस्थान पत्रिका के परिवार पृष्ठ में प्रकाशित है---( फ्रॉक )


लघुकथा----( फ्रॉक )

आज रविवार, छुट्टी का दिन होने की वजह से सारिका घर के तमाम कपड़े धुलने के लिए निकाल रही थी, तभी उसने अपनी मुन्नी की फ्रॉक को भी धुलने  के लिए  निकाला, तो उसे अपनी मुन्नी की फ्रॉक को  देखकर अपने बचपन के दिनों की याद हो आई.


वह भी तो अपनी प्यारी मुन्नी की तरह ही कभी फ्रॉक पहने, पूरे घर में धमाचौकड़ी मचाई करती थी, कभी-कभी तो उसकी मां सारिका उसकी इस धमाचौकड़ी से इतनी परेशान हो जाया करती थी कि, उसे गुस्से में लाल पीली होते हुए कहती थी.हे राम! आखिर तू कब सुधरेगी, इतनी बड़ी तो हो गई, अब तु बच्ची थोड़ी ही  लगी है.


इतना ही नहीं सारिका को यह कहकर भी उसकी मां उसे इस धमाचौकड़ी से रोकने के लिए कहती थी की आने दे आज तेरे पापा को मैं शिकायत करती हूं कि तू मुझे कितना परेशान करती है मैं मां के इस कथन से थोड़ी देर के लिए चुप हो जाया करती थी. लेकिन फिर उसके बाद वही शरारत वही धमाचौकड़ी. करने लगती थी.


और जैसे ही पापा आफ़िस से लौटते मैं उन्हें पापा पापा कहते हुए दौड़ पड़ती और पापा मुझे अपनी गोद में उठा लेते और प्यार से मेरी पीठ थपकने लगते थे. वह यह भी नहीं देखते थे कि दिनभर खेलने की वजह से मेरी फ्रॉक कितनी गंदी हो गई है.मै पापा की गोद में बैठी हुई अपनी मां को चिढ़ाने वाले अंदाज में देखती थी, जैसे उनसे चिढ़ाने वाले अंदाज में कह रही हो कि  अब करो तुम पापा से मेरी शिकायत, मां उन दिनों मुस्कुरा कर रह जाया करती थी.

सारिका अपने इन्ही ख़्यालो में  खोई हुई जब मुन्नी की फ्रॉक को अपने सीने से लगाती है, तो उसे ऐसा लगता है कि जैसे उसने फिर से अपने बचपन वाली वही फ्रॉक एक बार फिर से पहन ली हो.तभी सारिका को उसकी मुन्नी उसे मम्मी-मम्मी कहकर बुलाती है और सारिका अपने बचपन की यादों से बाहर निकल आती है, और सारे कपड़े को धुलने के लिए बाथरूम की तरफ चल पड़ती है.


यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.
परिवार ( राजस्थान पत्रिका )21/7/21


लेखक---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P )
Mo. no.7800824758

Sunday, 18 July 2021

(मिट्टी मेरी मईयत के साथ रख देना)
हो सकता है एक पल ही सही---------
छत पे आये बेवफ़ा,
उसकी सड़क पे--------
कुछ देर मेरी लाश रख देना।
हो सकता है मै उसे मरके भी तकु,
मेरी लाश को वहा कुछ पल-------
खुली आँख रख देना।
उठा लेना थोड़ी सी उसके गली की मिट्टी,
और जब दफ्ऩ होने लगू,
तो एै,रंग---------यही मिट्टी 
मेरी मईयत के साथ रख देना।

Saturday, 17 July 2021

कहानी--(गोदावरी मर गई )


कहानी--(गोदावरी मर गई )

लखनपुर गांव से थोड़ी दूर पर पड़ने वाले नदी की  पूल के पास पूरे गांव के लोग भीड़ की शक्ल में एकत्रित थे,उस भीड़ में बड़े, बुढ़े,जवान,बच्चे और गांव की महिलाऐ  भी शामिल थी.वह सब मारे कौतुहल के नदी के पूल के इर्द-गिर्द उचक के यह देख रहें थे की बढ़ी हुई नदी के पानी में जाल डालकर आखिर गांव के चार पांच आदमियों से वहां उपस्थित दो पुलिस वाले किस महिला या लड़की कि लाश निकलवा रहें थे,लेकिन जिस तरह जाल से लाश बाहर निकालने के लिए उन सभी आदमियों को मसक्क़त करनी पड़ रही थी इससे यह साफ पता चल रहा था कि यह लाश कम से कम आज की तो नही थी.

जब लाश किसी तरह से नदी के पानी से बाहर निकली तो लोगों ने देखा कि वह एक 18या 20 वर्ष की किसी जवान लड़की की लाश थी. जो कि नदी के पानी में कूदकर या डुबकर मरने की वजह से काफी फुल चुकी थी. तभी उन दोनों पुलिस वालों में से एक ने थोड़ी पुलीसिया रौब के साथ कहा कि, रमुआ! जो कि उन्हीं पांचो में से एक का नाम था वह हाथ जोड़े हुए और थर-थर कापते हुए बोला कि, जी हुजूर!जरा इस लड़की की  लाश को पीठ की बजाए मुँह की तरफ करके लिटा तो,शायद इनमें से कोई इस लड़की का चेहरा देख करके इसे पहचान लें.वैसे मुझे देखने से लग रहा है कि यह ससुरी यही कही आस-पास की है.

तभी दूसरा पुलिस वाला जो कि काफी गौर से उस लड़की की लाश को देख रहा था.वह बोला, अरे! यह तो जैसे पांच-छ: महिने के पेट से भी है.उसका साथी पुलिस वाला बोला, अरे! इस तरफ तो मेरा ध्यान भी नही गया इतना ही नही यार इसकी शादी भी नही हुई है. अरे! भाई अर्जुन क्यू इतने झटके दे रहा है भाई?  यह तुझे कैसे पता चला जरा मैं भी तो जानू मेरे जेम्सबांड, वह मजाक में बोलकर जब हंसा तो उसकी निकली हुई पेट भी उसके साथ करीब दो-तीन मिनट हिलती रही,जैसे की उसकी वह निकली हुई पेट उसके साथ ही हँसने की अभ्यस्त हों.


तो उसका साथी अपने दूसरे पुलिस वाले साथी जिसका की पेट निकला हुआ था, उसको उसने रामदरस कहकर सम्बोधित किया था,इससे यह स्पष्ट हो गया कि उस पेट निकले हुए पुलिस वाले का नाम राम दरस था. वह फिर इसके बाद आगे बोला कि यह लड़की अगर शादी शुदा होती तो इसकी उस मांग से पता चल जाता जहां कि औरते शादी होनें के बाद सिंदूर पहनती है,राम दरस खुश होकर बोला कि--जिओ मेरे शेर! तब तो उस लिहाज से तो यह ससुरी पुरी छिनाल हुई. अरे रमुआ! जल्दी  पलट यार मुझसे बर्दाश्त नही हों रहा, मैं अब इस लड़की की  सुंदर सुरत तुरंत देखना चाहता हूं. तभी रमुआ ने अपने चारो सहयोगियों कि मद्त से उसने लड़की की लाश का मुँह अपनी और वहां मौजुद भीड़ के सामने कर दिया.

और जब उस भीड़ में मौजुद सभी स्त्री पुरुषों ने उस लड़की की लाश को देखा तो सभी लोगों के  मुँह से एक साथ निकल पड़ा अरे! यह तो संतोष की बिटिया गोदावरी की लाश है. इसी के साथ वहां मौजूद सभी आदमी और औरतो ने एक दूसरे की कान के पास अपना मुँह ले जाकर आपस में फुसफुसा कर बात करना शुरू कर दिया.जब आठ-दस मिनट वह सभी आपस में केवल फुस-फुसाते रहें और कोई कुछ भी नही बोला.

तो उन्हीं दोनों पुलिस वाले में से एक ने जब बहुत जोर से माँ बहन की  गाली के साथ डाटा तो सारे लोगों के फुसफुसाने की आवाज़ जैसे किसी जादू के जोर से थम गई हो.उसने उसी भीड़ में से दो आदमी और दो औरतों को अपने पास बुलाया तो वह सब थर-थर कापते हुए अपने दोनों हाथों को जोड़कर उन दोनों पुलिस वालों से थोड़ी सी दुरी पर खड़े हों गए. इतना ही नही बल्कि पेट निकाले हुए राम दरस ने उन्हीं में से एक को अपने सामने बुलाकर उसकी गाल पर एक जोरदार तमाचा रसीद कर दिया और दुसरे को बुलाकर हाथ में पकड़ी हुई अपनी पुलीसिया लाठी से दो लाठी उसके पिछवाड़े पर रसीद कर दिया. फिर उसने पुछा, बताओ! सालो तुम दोनों का नाम क्या है?  एक बोला अलगू साहब! साले जोर से बता सुबह से कुछ खाया पिया नही है क्या?  उसने इस बार थोड़ा जोर से कहा अलगू साहब!

और तू  बता बे  तेरा नाम क्या है?  उसने अलगू की हालत पहले ही देख ली थी इसलिए उसने एक बार में ही हिम्मत कर कहा जी पांचू साहब!  फिर इससे खाली हों वह औरतों की तरफ घुमा दोनों औरतों की हालत तो पहले से ही पतली थी. उस पर राम दरस जब लाठी सहित कड़क आवाज़ में बोला,साली चुड़ैल उसने चुड़ैल कुछ इस तरह कहा की  उसके बगल वाली खड़ी औरत यह सुनकर हिलते-डुलते बस किसी तरह खड़ी थी. लग तो ऐसा रहा था कि अगर कोई उसे हल्का सा भी छू दे तो वह मारे डर के जमीन पर ऐसी गिरेगी कि, फिर वह कभी जिंदगी में दोबारा उठ नही पाएगी.


राम दरस एक बार फिर पूरी पुलीसिया रूआब के साथ बोला साली चुड़ैल अपना नाम बता तो वह लड़खड़ाती हुई जुबान में बोली साहब म म मेरा नाम
सुगनी है. हूं कहकर उसने ढ़ेर सारी सांस अपनी नाक से छोड़ी फिर दुसरी औरत से बोला और तू बता तेरा क्या नाम है? स स साहब मेरा नाम बुधमतिया है.अच्छा. फिर इतना कहने के बाद उसने अर्जुन से कहा लाश इनसे बंधवाकर इन तीनो को इस लड़की गोदावरी की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार कर लो जब इन सबको जेल और फाँसी होंगी तब पता चलेगा कि किसी की हत्या क्या होती है?

फिर वह चारो,दोनों पुलिस वालों यानी कि अर्जुन और राम दरस के पैरो पर गिरकर जोर-जोर से रोने लगे. साहब! हमने कोई हत्या नही की. साहब! चाहे तो आप हमार पति और बच्चों का कसम खिला लो साहब. हालांकि यह बात राम दरस और अर्जुन को भी अच्छे से पता थी कि इन चारो ने गोदावरी की हत्या नही की थी.यह तो उन दोनों ने एक पुलीसिया तरीका अपनाया था,ताकि गोदावरी की मौत का कारण पता चल सके.


उनका यह निशाना काफी सटीक बैठा था इसीलिए राम दरस के गुस्से को थोड़ा ठंडा करने की गरज से अर्जुन बोला हालांकि यह भी उनका एक नाटक ही था. कि यार! आखिर  इनकी बात एक बार सुन लेने में बुराई ही क्या है? राम दरस कहता है कि चल ठीक है. अगर तू  कहता है तो मैं तेरी बात मान लेता हूं, लेकिन याद रखना अगर इन लोगों ने झूठ बोला तो थाने में लें जाकर इनकी ऐसी धुलाई करूंगा कि इन ससुरो को अपनी अम्मा याद आ जाएगी.राम दरस ने एक बार अपनी थोड़ी बड़ी और लाल आँखों से उन्हें देखा फिर एक सिगरेट जलाकर कुछ इस तरह वह धुँआ फेकने लगा कि वह और भी डर गए.


अर्जुन जानता था कि राम दरस की  ऐसी आँखें ऐसे मौको पे बड़ा काम करती थी.वह एक बार फिर उन चारो से मुख़ातिब हुआ और बोला मैं तुम लोगों को अपनी जान बचाने का एक आखिरी मौका देता हूं. अगर तुम सबने सब कुछ सच सच मुझे बता दिया तो मैं दावा करता हूं कि मैं तुम्हें कोई भी सजा नही होनें दूंगा. अगर जरा सा भी झूठ बोले तो समझ लो तुम्हारी सजा और फाँसी दोनों ही कंफर्म है. वे सभी एक सुर से बोले नही साहब! हम सभी सच-सच बोलेंगे.


दरअसल संतोष की बिटिया गोदावरी हम सभी गांव वालो कि बहुत प्यारी और दुलारी बिटिया थी. अगर हम सभी दिन में उसे एकाध बार देख नही लेते थे, तो उस दिन हमारा मन बहुत खाली सा लगता, जबकि उसका बाप संतोष नीरा पियकक्ड़ और शराबी था. जिसकी वजह से गोदावरी की माँ बीमार और दुःखी रहा करती थी. कभी-कभी तो उसके बाप के साथ के पियक्कड़ उसके बापू को ज्यादा शराब का नशा हो जाने पर वह उसके घर भी छोड़ने रात-बिरात आ जाया करते थे.

ऐसा नही कि वह सारे पियक्कड़ गोदावरी के बापू को किसी त्याग या सेवा भाव कि वजह से घर छोड़ने आते थे साहब.दरअसल गोदावरी 18 वर्ष की बहुत ही सुंदर लड़की थी,जिसको वे सारे पियककड़ अंधेरी रात में उसके बापू को छोड़ने के बहाने कभी-कभी अपनी कामुक नजरों से उसके शरीर के उस अंग विशेष को देखते जिसे की वह बेचारी अपने फटे दुपट्टे से ढ़के रहती थी. उसके बापू को संभालने के बहाने जान बूझकर वह लोग उसके उस अंग को या तो छू लेते थे या जोर से जानबूझकर चिकोट लेते थे.जिसकी वजह से किसी-किसी दिन वह चीख उठती थी.

ऐसे ही एक दिन जब किसी ने उसके युवा स्तन को चीकोटा तो वह चीख उठी. माँ गोदावरी ने झट पास आकर उससे पुछा क्या हुआ बेटी! जब कहा तो गोदावरी माँ के सीने से लगकर रोने लगी. उसका इस तरह से रोने का कारण गोदावरी की माँ अच्छे से समझ गई. आखिर थी तो वह भी एक औरत ही.उस दिन गोदावरी की माँ ने गोदावरी के बापू से खुब झगड़ा किया, लेकिन गोदावरी के शराबी बाप ने उसकी माँ को पांच छ: तमाचे मारे गाली दी इतना ही नही उसने नशे में गोदावरी से कहा हरामजादी तू  खुद छिनाल है और दूसरो पर इल्जाम लगाती है.


उस दिन गोदावरी पूरी रात रोती रही साहब! फिर आठ-दस दिन तक सब सामान्य रहा हालांकि इस बीच तब भी गोदावरी का बापू शराब पिता रहा.लेकिन एक दिन रात को जब पूरा गांव सोया हुआ था साहब तो दुसरे गांव के मुखिया का दबंग बेटा बब्बन उसके बापू को अपने दो अन्य साथियो के साथ घर छोड़ने आए थे उस दिन तो गोदावरी का बापू अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत ही ज्यादा पीए हुए था.सच तो यह है साहब की उस रात शाम से ही मूसलाधार बरसात हों रही थी, जिसकी वजह से उस रात गांव वाले अन्य रात की अपेक्षा जल्दी  सो गए थे.


इसलिए उस रात जानबूझकर उन लोगों ने गोदावरी के बापू संतोष को बहुत ज्यादा शराब पीला दी थी, फिर उसे घर पहुंचाया. घर क्या पहुंचाया साहब! जब उसे कुछ होश ही नही था तो उसके लिए क्या घर, क्या बाहर. उसे लाकर उन लोगों ने एक तरफ टूटी चारपाई पर लेटा दिया. तभी उस कमरें में उन सभी ने गोदावरी को देखा तो उनकी कामुकता चरम पर पहुंच गई. क्योंकि बब्बन बहुत पहले से इसी मौके की ताक में था. उसके एक साथी ने कमरें को अंदर से बंद कर दिया इतना ही नही उन्होंने गोदावरी की माँ के भी कमरें की कुण्डी लगा दी.

फिर बब्बन ने जबरदस्ती उस रात अपने दोनों साथियो के साथ गोदावरी को दो-दो, तीन-तीन बार बुरी तरीके से बलात्कार किया.गोदावरी की माँ अंदर से दरवाजा पीटती रही, रोती रही,गाली देती रही. और इधर गोदावरी चीख चिल्ला, गिड़गिड़ा रही थी.उसके होंठ से खून निकल रहा था, पूरे शरीर को तीनो लोग जानवरो से भी ज्यादा बेरहमी से नोच-खसोट रहें थे और गोदावरी का बापू संतोष इससे बेखबर टूटी चारपाई पर पूरे खर्राटे के साथ सोता रहा.फिर गोदावरी बहुत जोर से किसी हलाल होते बकरे की तरह चिखी और बेहोश हों गई.

दूसरे दिन जब सुबह हुई तो कराहते हुए गोदावरी ने जब अपनी आँखें खोली तो एक बार फिर उसकी आँखों के सामने रात का सारा मंजर ताज़ा हों गया और फिर इसके बाद जब गोदावरी ने उठने का प्रयास किया तो उसका पूरा शरीर किसी पके हुए फोड़े कि तरह दर्द कर उठा अर्थात उससे अपनी जगह से उठा नही गया.तभी उसकी नज़र अपने टांगो से नीचे उतरी  हुए सलवार की तरफ गई तो वह बिल्कुल नंगी थी उसके आस-पास खून बहकर सुख चुका था.


जब गोदावरी ने अपने बापू के पास खड़ी अपनी माँ के सुख चुके आंसू भरी आँखों की तरफ देखा तो वह माँ से बोली.माँ! आज तो बापू को दिन में भी खुब शराब पीनी चाहिए है कि नही, माँ! आखिर आज तो पीने में इन्हें और भी मजा आना चाहिए क्योंकि इनके बिटिया का शराब पीकर कुछ इनके साथियो ने बलात्कार किया है. तुमको भी थोड़ा-बहुत बलात्कार करने का मन है क्या बापू? करना देखो ना आखिर आपको बहुत मेहनत भी नही करनी पड़ेगी क्योंकि आपके पीने वाले साथियो ने मेरी सलवार पहले से ही उतार रखी है. फिर माँ जोर-जोर रोते हुए गोदावरी के पास बैठ गई और बोली बस कर बेटी.

फिर इसके बाद साहब गोदावरी का बापू घर से निकला और आज तलक नही लौटा. फिर पंद्रह बीस दिन तक गोदावरी अपने घर से नही निकली साहब. वह घर में ही अपना इलाज करती रही. उसकी माँ उसे गरम हल्दी और दूध का काढ़ा देती रही.जब उसने गांव में निकलना भी शुरू किया साहब, तो वह पहले वाली गोदावरी की तरह ना थी. बिल्कुल बदल चुकी थी.अब वह किसी से गांव में उतना बात भी नही करती थी.इसी तरह चार महीने बाद एक दिन उसे उल्टी हुई और वह गांव के सामने वाले नल के पास गिर पड़ी.

गांव की औरतों ने उसके चेहरे पर पानी के छींटे भी मारे जब उसे होश आ गया तो गांव की बड़ी-बूढ़ी औरतों ने कानाफूसी करते हुए कहा कि पता नही की  इसके पेट में किसका पाप है. देख तो छिनाल को जैसे कोई शरम ही नही आ रही.वह इतना सुनते ही रोते हुए वहां से चली गई. फिर उसके तीन-चार दिन बाद उसकी लाश नदी में मिल रही है साहब. इतना कहते ही वह औरत जोर-जोर से रोते हुए बोली,साहब! इसके मारने वाले को छोड़ना मत साहब.अब वह औरत बिल्कुल ही नही डर रही थी.

अब राम दरस और अर्जुन दोनों ने पूछा तुम्हें यह सब आखिर कैसे पता. दरअसल साहब! मुझे गोदावरी भाभी की तरह नही बल्कि अपने बड़ी बहन की  तरह चाहती थी.इसलिए साहब मुझे गांव की औरतों की बातो का जरा सा भी विश्वास नही हुआ और मैं चोरी से उस दिन गोदावरी के घर गई तो उसने मुझसे रोते हुए सारी बात बता दी. उसके बाद से ही गोदावरी से फिर मैं मिल नही पाई और मुझे गोदावरी मिली भी तो ऐसे हाल में कि मैं उससे कुछ बात भी नही कर सकती.


फिर इसके बाद राम दरस और अर्जुन ने कहा ठीक है अब तुम सभी मेरी नज़र में बेगुनाह हों दरअसल हम भी क्या करे हमारे पास भी कोई जादू की छड़ी नही होती की हाथ बढ़ाकर मुजरिम या कि उसके गुनहगार को पकड़ लें. इसलिए ऐसा करना हमारी मजबूरी है, लेकिन हां!  उन हत्यारो के साथ आप सभी भी दोषी है. जब ऐसी लड़कियो के  मद्त की  जरुरत समाज़ में सबसे ज्यादा होती है. तभी यह समाज़ बिना कुछ सोचे समझे सारा दोष लड़कियो पर ही मढ़ देता है जबकि आप सभी गांव वाले जानते थे कि गोदावरी ऐसी नही फिर आप सभी ने उसे गाली दी.


जिसकी वजह से उसे इस नदी में कूदकर अपनी जान देनी पड़ी. यही आप सभी अगर सामूहिक रूप से इसे यानी की  अपने गांव की गोदावरी के लिए उस मुखिया के बेटे और उसके साथियो को सजा दिलाते तो हर गांव की गोदावरी मजबूत होती. राम दरस की  इतनी बात सुनकर यूँ  लगा कि जैसे उन सबकी अपनी बेटी गोदावरी आज नदी में कुदकर मर गई हों.




यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.


लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
mo. no.7800824758











Friday, 16 July 2021

व्यंग्य---(गधा )


व्यंग्य---(गधा )

कही सादे कागज़ पर आप बड़े मन से गधा लिख दीजिए फिर आपको घंटो व्यंग्य लिखने की जहमत नही उठानी पड़ेगी क्योंकि गधा शब्द व्यंग्य विधा के प्रयोग में आने वाली शब्दों की समस्त बिरादरी में से एक ऐसा शब्द है जिसे हम व्यंग्य के शब्दों का पारिवारिक सदस्य भी कह सकते है. वैसे भी गधे केवल जानवरो में ही नही पाए जाते बल्कि अब तो उससे भी कही ज्यादा गधे तो आजकल हमारे मनुष्य बिरादरी में पाए जा रहें.

सच तो यह है कि अगर हम चौबीस घंटे में से दो-चार बार किसी आदमी को अगर ठीक ढंग से गधा ना कह लें तो ऐसा लगता है कि सामने वाले आदमी से कही ज्यादा बड़े गधे तो हम खुद ही है. कभी-कभी तो गधा कहने कि तलब इतनी ज्यादा बढ़ जाती है कि किसी और के ना मिलने पर हम अपने बेटे को ही गधा कहकर काम चला लेते है. वैसे भी बेटे को गधा कहने से पूरे परिवार को गधा कहने का सुख मिल जाता है.


वैसे इस धरती पर किसी को पहली बार गधा कहने का कोई भी प्रमाणिक व ऐतिहासिक साक्ष्य नही मिलता फिर भी मुझे जहां तक लगता है कि जिस किसी भी व्यक्ति ने किसी को पहली बार गधा कहा होगा वह व्यक्ति निश्चित ही व्यंग्य का कोई बहुत बड़ा पहुंचा हुआ प्रकांड विद्वान रहा होगा.क्योंकि इस शब्द का पूरा चरित्र व्यंग्य से मिलता जुलता है.वैसे बताने वाले बताते है कि इन्हें बैसाख नंदन भी कहा जाता है, मनुष्यों में भी ज्यादातर ये बैसाख नंदन टाईप के गधे सर्वाधिक राजनीति में मिलते है.


वैसे भी नेता और किसी गधे के बोलने में काफी समानता है वे बोलते है तो पूरी घास को अकेले चर जाने की खुशी में बोलते है जबकि नेता अपने बिधानसभा से अकेले ही चुनाव जीत जाने की खुशी में बोलता है. यह दोनों भ्रम ही इन्हें एक दूसरे से ज्यादा श्रेष्ठ गधा साबित करते है वैसे दोनों के ही बोलने में हास्य अलंकार की प्रधानता है.इसलिए हम यह भी कह सकते है कि जब शायद चार-छ: गधे एक साथ देश में मरते है तो अगले जन्म में इन्ही मरे हुए गधो की सहानुभूति के तहत भगवान इन्हें  नेता टाईप के श्रेष्ठ गधे के रूप में धरती पर भेज देता है.

हमारे देश में अब गधो को सम्मान देने की परम्परा शुरू कर देनी चाहिए और इस गधे कि परम्परा का प्रथम पुरस्कार या सम्मान व्यंग्य लिखने वाले किसी ऐसे व्यक्ति को दिया जाए जिसने अपनी पूरी जिंदगी में ज्यादातर व्यंग्य गधो पर ही लिखा हों, किसी और विषय पर नही. ठीक इसी तरह का कोई गधा राजनीति से या अन्य क्षेत्रों से भी लिया जाए और सारी पुरस्कृत गधो को, किसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की तरह सुविधाएं दी जाए.इससे सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि पूरे देश में वर्षभर गधा होनें की होड़ मची रहेगी. 



Tuesday, 13 July 2021

(पैजनी की धुन)
संगीत से बेहतर है--------
सीधे दिल मे उतर जाती है,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----इतनी क्लासिकल है-----
उसके पैजनी की धुन।
(सुकरात को भी ज़हर दे दो)
गर सच की ज़ुबां को खामोश़ करना है,
तो ऐ,रंग---------------
इस कलम के सुकरात को भी ज़हर दे दो।

Thursday, 8 July 2021

(सावन चला गया)
झूले चले गये,कज़री चली गई------
मेहमान तो आते रहे गाँव मे लेकिन,,,,,,,
पर पहले जो आता था--------
वे पाहून चला गया।
ऐै "रंग"----धीरे-धीरे ये हादसा हुआ,,,,,,,,
बारिश तो हुई लेकिन--------
गाँव से मेरे सावन चला गया।
(ताज़ महल)
ताज़ महल----------
मूहब्ब़त की पाकीज़गी है,
यहाँ मूमताज़ लेटी है।
मत करो इन पत्थरो पे,तुम सियासी वार-
ये आबरु-ए-हिन्द है-------
ना कि मूसलमान।
ऐ,रंग----यहाँ मोहब्ब़त------
आज भी साँस लेती है।

Wednesday, 7 July 2021

(राम कहेंगे)
ये चुनावी सीजन है,सावधान हो जाओ!
क्योंकि अब खद्दर पहने लोग--------
आयेंगे अयोध्या।
फिर सहम उठेगा सरयू का पानी,
एै "रंग"---ये मुस्लिम बस्तियो में अल्लाह हू!
और हिन्दू बस्तियो में राम कहेंगे।
(मौते बड़ी विरान होती है) 

बेशक----
सारे शहर का हुज़ूम उमड़ता है, 
शख्शे शोह़रत के जनाज़े मे.

पर ऐ,रंग----
ऐसी मौते बड़ी विरान होती है।

Tuesday, 6 July 2021

कहानी---(मसखरा )


कहानी---(मसखरा)

अजय शहर की कॉलोनी-कॉलोनी घूम-घूमकर मसखरे के गेटप में लोगों को खुब हँसाता,जब वह हँसा कर खाली होता तो कॉलोनी के कुछ एक लोग उसकी मसखरी से खुश होकर दो-चार रूपए उसकी मासूम हथेली पर रख देते, जिसे वह अपनी एक फटी हुई जेब की बगल वाली जर्जर जेब में रखकर अगली कॉलोनी की तरफ अपने मसखरे बाजी के करतब दिखाने के लिए चल पड़ता.

हालांकि 15 वर्षीय अजय कोई जन्मजात मसखरा नही था, लेकिन उसके घर की परिस्थितियों और हालात ने उसे एक स्कूल में पढ़ने वाले किसी छात्र की उम्र में ही शहर की इस कॉलोनी से उस कॉलोनी का मसखरा बनाकर रख दिया. आज वह अपनी बीमार माँ की दवा और अपनी छोटी बहन का पेट अपने इसी मसखरेपन के तमाशे से वह भर रहा है.


कॉलोनी के लोग तो उसके इस मसखरेपन की करतब से हंस लेते है, लेकिन अजय खुद कभी नही हंस पाता, क्योंकि उसे अपनी खुद की जिंदगी ही किसी मसखरे की तरह मिली है. जहाँ  उसके मासूम होठों पर कोई हंसी नही बस आंसू है, जो अब उसकी आँखों से इसलिए नही बहते कि कही उसके मसखरेपन का किया हुआ उसका मेकप ना छूट जाए,जिसे देखकर ही लोग हंसते है.

वह सारा दिन जी तोड़ इस कॉलोनी से उस कॉलोनी जब अपने मसखरेपन के करतब को दिखाकर खाली होता है, तो वह इस करतब और धंधे से मिलें सारे सिक्के और नोटों को निकालकर गिनती करता है. उस गिनती में जब दस-बीस रूपए दवा और खाने के कम पड़ते है तो वह एकाध और कॉलोनी में बेमन से अपने मसखरेपन के करतब दिखाकर उन पैसो को इकट्ठा कर जब अपने झोपड़े की तरफ लौटता है तो उसके नन्हें पैरो में एक असीम थकन और पीड़ा होती है.

एक शाम ऐसे ही अपने मसखरेपन के धंधे से जब अजय खाली होकर अपनी झोपड़ी के दरवाज़े के पास पहुंचा तो उसने देखा कि उसके उस झोपड़े रूपी घर के आस-पास उसके अगल-बगल की दो-तीन औरते  उसकी  छोटी बहन जो कि काफी जोर-जोर से और हिचक-हिचक कर रो रही थी, उसको वह औरते  किसी तरह चुप कराने और ढाढ़स बधाने का प्रयास कर रही थी. अजय यह सब देखकर चौक गया और उसके मन में किसी अनहोनी की आशंका उत्पन्न हुई.अतः उसने बिना किसी से कुछ पूछें या अपनी बहन को देखें वह सीधे झोपड़ी के अंदर चला गया और उसने अपनी माँ को टूटी हुई चारपाई पर हमेशा की तरह लेटे हुए देखा.


लेकिन उसने एक फर्क अवश्य देखा कि उसकी माँ के और दिनों के लेटने में और आज के लेटने में काफी फर्क था. पहले जब अजय शाम को अपने घर की झोपड़ी में लौटता तो उसकी माँ दो-तीन बार जोर से खांसती फिर खुद को सामान्य कर अजय से पुछती कि तुम आ गए अजय बेटा! लेकिन आज अजय की  माँ ने ना तो खांसा और ना ही उसने अजय से यह पुछा कि तुम आ गए अजय बेटा.

अजय समझ गया कि आज उसकी माँ भी उसके शराबी बाप की तरह उसे और उसकी छोटी बहन को हमेशा के लिए छोड़ के इस दुनिया से चली गई. दरअसल अजय का बाप एक भयंकर शराबी था. अतः वह सारा दिन जो कुछ भी कमाता था उसे वह अपने शराब की लत में उड़ा देता था. इतना ही नही कभी-कभी जब जरूरत से ज्यादा पीकर आता तो वह बेतहासा ना सिर्फ माँ को मारता पीटता था बल्कि वह उसकी माँ को ढ़ेर सारी गंदी-गंदी माँ बहन गालियां भी देता,जिसकी वजह से अजय की माँ सारी रात रोती रहती थी.

जब अजय से अपनी माँ का रोना नही देखा जाता था तो वह अपनी नन्ही-नन्ही हथेलियों से अपनी माँ के आंसू पोछता और उसे किसी तरह चुप कराने कि कोशिश करता रहता. माँ तब कभी-कभी मुझे जोर से अपने सीने से लगाकर भींच लेती और थोड़ी देर रो लेने के बाद कहती कि बेटे! मैं तेरी कितनी अभागी माँ हूं कि  मैं तुम लोगो को कोई खुशी नही दे सकती सिवा आंसू के. पर क्या करु बेटा ? मुझे शादी से पहले तेरे बापू के बारे में यह सब पता नही था.

फिर एक दिन अजय को पता चला कि उसका शराबी बाप अतिसय शराब के नशे में घर लौट रहा था तो एक तेज रफ़्तार ट्रक ने उसे बुरी तरह  कुचल दिया जिसकी वजह से उसकी मौके पर ही मौत हो गई थी.उस दिन उसकी माँ बहुत रोई थी और अजय ने भी अपनी माँ को चुप कराने कि कोई कोशिश नही की  थी. बल्कि एक तरह से अजय मन ही मन यह सोचकर खुश था कि चलो! अब कम से कम उसकी माँ को उसका शराबी बाप मारेगा तो नही.

लेकिन माँ को अपने पति की मौत का तगड़ा सदमा लगा था और लगता भी क्यों ना क्योंकि उसका बापू चाहे जैसा भी था, लेकिन था तो उसकी माँ का सुहाग ही. अतः इसके बाद से उसकी माँ अक्सर बीमार रहने लगी दो-चार दिन किसी तरह बीत गए लेकिन माँ के बीमार होनें से वह आय भी बंद हो गई जो उसकी माँ दो-चार बड़े घर के लोगों के यहां बर्तन, झाड़ू और कपड़े की साफ सफाई करके पा जाती थी. लेकिन अगर ईश्वर ने पेट दिया है तो उसके साथ ही उसने रोटी की भूख भी दी है.

इसी भूख और रोटी के लिए अजय हफ्तों इधर-उधर भटकता रहा और अपने लिए किसी काम कि तलाश करता रहा. लेकिन कहते है कि बिना किसी परिचय या पहचान के यहां काम भी नही मिलता. यही हाल अजय का भी हुआ. लेकिन उसने हिम्मत नही हारी फिर भी वह काम तलाशता रहा ऐसे ही एकदिन वह एक चाय-नाश्ते की दुकान पर गया और बड़े ही कातर भाव से उसने दुकानदार से कहा कि मुझे कोई काम दे दो सेठ!


लेकिन जैसे दुकानदार ने अजय कि कोई बात ही ना सुनी हो अतः उसने एक बार फिर किसी तरह अपनी हिम्मत जुटाकर  दुकानदार से कहा कि मुझे कोई काम दे दो. सेठ!लेकिन इस बार शायद उस दुकानदार ने अजय की बात सुन ली हो.वह बोला कौन हो? कहाँ  के रहने वाले हो? तुम्हारा यहां कोई अपना जान पहचान का है? अजय बोला नही सेठ! तो फिर यहां क्या करने आए हो. चलो हटो! दुकान के सामने से धंधे का टाइम है. खोटी मत करो, लेकिन फिर भी अजय कुछ देर और दुकान पे यह सोचकर खड़ा रहा कि शायद सेठ को दया आ जाए और वह उसे कोई काम दे दे.


लेकिन ऐसा नही हुआ बल्कि उसने अजय को देखा और जोर से कहा अभी गया नही तू! सूरज,छोटू उसने उस दुकान में काम कर रहें अपने दो हट्टे-कट्टे नौकरो को बुलाया और कहा अरे इसे जल्दी  यहां से मार के भगावों.पता नही कहाँ -कहाँ  से चले आते है. साले! उसके दोनों नौकर तेजी से अजय की तरफ बढ़े और बेमुरौवत उसकी कमजोर और मासूम बांहो को पकड़कर उसे जोर से सड़क की तरफ ढ़केल दिया.


उनके ढ़केलने की वजह से उसके दोनों हाथों और पैरो के मासूम घुटने छिल गए वह सुबकता हुआ उठा और वही पास में सड़क के उस तरफ नाली के किनारे रखे हुए एक पत्थर पर बैठ गया, अभी उस पत्थर पर अजय को बैठे बमुश्किल दस मिनट भी नही हुआ था कि उसे लगा कि कोई उसके पास आकर खड़ा हुआ हो उसने अपना सर उठाकर जब देखा तो वाकई उसके पास पचास साल का एक अधपके बालों वाला व्यक्ति लुंगी और शर्ट पहने खड़ा था जिसने अपने कंधे पर एक बड़ा सा तमाशा दिखाने वाला झोला भी टांग रखा था.

उसने अजय से कहा बेटा! जब तुम उस सेठ की  दुकान पर काम मांग रहें थे.उस समय मैं उस दुकान पर बैठा चाय पी रहा था.मेरे तुम तक पहुंचने से पहले उसके दोनों नौकरो ने तुम्हें सड़क पर जोर से धक्का दे दिया था. फिर तुम्हें सड़क के इस तरफ पत्थर पर यूँ  उदास बैठा हुआ देखकर मैं खुद को तुमसे मिलने से नही रोक पाया.उसके इतना कहते ही मेंरे आंसू झर-झर आँखों से बहने लगे और ना जाने किस भावना के तहत अजय ने अपने पास खड़े उस अजनबी से अपनी सारी मजबूरी बता दी.

फिर कुछ देर बाद उस अजनबी ने कहा, बेटे मैं तुम्हें काम दे सकता हूं अगर तुम करना चाहो तो. हां! बहुत ज्यादा तो नही कमा पाओगे लेकिन इससे तुम और तुम्हारे परिवार को दो वक़्त की रोटी अवश्य मिल जाएगी.अजय ने भी आव देखा ना ताव झट उसने अपने सामने खड़े अजनबी से हां कह दिया. फिर उसके बाद उसने कहा कि लगता है कि तुमने सुबह से लेकर अभी तक कुछ खाया नही है. आओ! पहले तुम कुछ खालो अतः उसने सामने चाय और समोसे की दुकान पर ले जाकर उसे तीन समोसे खिलाने के साथ एक कप चाय पिलाया.


फिर इससे निवृत होनें के बाद उसके मददगार ने उसे बताया कि उसका नाम राम आसरे है और वह शहर की कचहरी में मजमा व तमाशा दिखाकर लोगों को उनके अच्छे किस्मत की अंगूठी बेचता है. इतना बताने के बाद उसने कहा, अब कल से तुम डेली मुझसे ठीक नौ बजे यही मिलना फिर हम दोनों साथ कचहरी चलेंगे. दुसरे दिन से मैं भी कचहरी उनके साथ जाने लगा उसने इस बीच मुझे अपने तमाशे का जमुरा बनने की पुरी ट्रेनिंग दे दी. मेरे जमुरा बनने के बाद उनकी  भी कमाई काफी बढ़ गई थी.


फिर एक दिन राम आसरे ने अजय से खुद कहा, बेटे! मैंने तुम्हें अपने सगे बेटे की तरह प्यार दिया है, इसलिए मैं आज तुमसे कुछ कहना चाहता हूं.देखो बेटे! तुम्हारें पास अपनी बीमार माँ के अलावा तुम्हारी एक  छोटी सी बहन भी है जिसकी सारी जिम्मेदारी तुम्हारें कमजोर कंधो पर है. इसलिए मैं नही चाहता कि तुम मेरे साथ कचहरी में तमाशे या मजमें करो मैं तुम्हें यह बहुत पहले ही बता देता लेकिन मैं चाहता था कि तुम्हारें अंदर की वह सारी झिझक दुर हो जाए जिससे  तुम इस कठोर और पत्थर दुनिया का बहादुरी के साथ सामना और मुकाबला कर सको.


मेरे इस कुछ पैसे से तुम्हारा कुछ भी भला नही होगा लेकिन चाचा इस बीच उनके अपनत्व और लगाव ने कब मुझे उनसे चाचा और भतीजे के रिश्ते से जोड़ दिया इसका मुझे कुछ पता नही चला.लेकिन मैंने कहा कि मुझे तो इस आपके मजमें और तमाशे के सिवा कुछ नही आता. मेरे इतना कहते ही वे खिलखिला कर हंसते हुए बोले,अजय जब तुमने मुझे अपना चाचा कह ही दिया है तो तुम चिंता क्यों करते हो. मैं हूं ना.
दरअसल मेरे बाबा के बारे में आज भी बताने वाले बताते है कि उनके जैसा मसखरे का तमाशा दिखाने वाला आज तक इस शहर में कोई दुसरा पैदा नही हुआ.


उन्होने मुझे बचपन में अपना यह हुनर सिखाया था. लेकिन मेरा मन कभी भी मसखरे के धंधे में नही लगा दरअसल इस धंधे की एक शर्त है कि जो भी मसखरा, मसखरे का धंधा करेगा उसे अपने खुद के दर्द को चेहरे पर कभी भी व्यक्त नही होनें देना है. अब इस बात में मेरे बापू के कितनी सच्चाई थी मैं बता नही सकता अजय क्योंकि  मैंने यह धंधा कभी किया नही.
लेकिन मैं इसे तुम्हें सिखाऊंगा ताकि तुम अपनी बीमार माँ और अपनी छोटी बहन की परवरिश अच्छे से कर सको.


मुझे एक महिने के अंदर ही चाचा ने मसखरे के धंधे की सारी खूबियां बहुत अच्छे से सीखा दी. सिखने के बाद उस दिन जब मैं उन्हें छोड़कर आने लगा तो वह मुझे अपने बेटे की तरह गले से लगाकर फुट-फुटकर रोने लगे और जब मैं भी जोर-जोर से रोने लगा तो अचानक उन्होंने मुझे अपने कंधे से झटकर एक तमाचा बड़ी जोर से मेरे मासूम गाल पर मारा मैं आवाक रह गया. कुछ देर मानो समय थम सा गया हो.


फिर उन्होंने ही कहा मैं जान-बूझकर तुम्हें अपने  गले से लगाकर रोने का नाटक कर रहा था. मैं यह देखना चाहता था कि तुम्हें इस मसखरे के धंधे की ट्रेनिंग देने में मेरे कही कोई कमी तो नही रह गई. आज तुम्हारें उसी दी हुई ट्रेनिंग कि परीक्षा थी और मेरी तुम्हें इस तमाचे के रूप में एक आखिरी सीख भी. कि एक मसखरा चाहे जो भी हो जैसे भी हालात हो चाहे उसके अपने खुद का ही दर्द क्यों ना हो पर वह कभी रो नही सकता.

फिर अजय इस मसखरे के धंधे को करने लगा हालांकि यह धंधा इतना आसान नही. इस धंधे में जाने से पहलें घंटो अजीबो गरीब मेकप की एक मोटी पर्त चेहरे पर चढ़ानी होती है.अजय अब पुरी तरह से एक मसखरा हो चुका था. आज उसने अपने मसखरे होनें की एक और परीक्षा पास कर ली थी. दरअसल आज वह अपनी माँ की लाश के पास चुपचाप बिना रोए खड़ा रहा, फिर वह झोपड़ी से बाहर निकल अपनी छोटी बहन को डाटकर चुप कराने लगा.

अगल-बगल खड़ी उन तीन औरतों में से किसी ने कानाफूसी के लहजे में कहा! देख तो माँ मर गई लेकिन जैसे मुए को कोई फर्क ही नही.कैसे कसाई की  तरह अपनी मासूम बहन को डाट रहा.लेकिन अजय पर इन सारी बातो का कोई फर्क नही पड़ा क्योंकि अजय तो एक मसखरा था. अतः किसी तरह बस्ती में रहने वाले लोगो ने ही आपस में चंदा जुटाकर उसकी माँ का अंतिम संस्कार किया. कुछ दिनों के बाद फिर सबकुछ पहले की तरह ही सामान्य हो गया.

हां, अब अजय भी अपने मसखरे के धंधे के लिए कॉलोनी-कॉलोनी जाने लगा लगा था.अब अजय और उसकी छोटी बहन भी बड़ी होनें लगी थी. अतः अजय अपनी छोटी बहन का एडमिशन शहर के एक महंगे बोर्डिंग स्कूल में करा दिया और उसकी पढ़ाई के लिए अब उसे और भी ज्यादा पैसे कि आवश्यकता महसूस होनें लगी. इसके लिए वह अब कभी इस शहर, कभी उस शहर अपने मसखरे का धंधा दिखाने लगा.

अब उसकी कमाई भी काफी पर्याप्त होनें लगी थी. इसी बीच कभी-कभार उसकी छोटी बहन भी अपने भाई से मिलने उस झोपड़ी में आ जाती थी . फिर धीरे-धीरे वक़्त का पहिया घूमता रहा. इस बीच ना जाने कब अजय के आधे से अधिक बाल पक गए और आँखों पे उसके पावर का चश्मा लग गया. और उसकी छोटी बहन अंजली अब पढ़ लिखकर डॉक्टर बन चुकी थी.


एक दिन अजय जब अपने मसखरे के धंधे से खाली होकर घर लौटा तो उसने अंजली को एक खुबसूरत लड़के के साथ कार से उतरते हुए देखा तो अजय अंदर ही अंदर चौक गया. क्योंकि अंजली ने सुर्ख साड़ी के साथ ही अपनी मांग में सिंदूर भी पहन रखा था. दोनों अजय के पास आए और आकर उन्होंने अजय का पैर छुवा, पैर छूने के बाद अंजली बोली भैया मैंने और महेश ने आज अपनी रजामंदी से कोर्ट में जाकर शादी कर ली.

महेश भी मेरे साथ एक ही कॉलेज में पढ़ता था. इसने भी डॉक्टरी की है. हम दोनों साथ में ही अपना एक अस्पताल खोलना चाहते है.इतना सुनते ही जैसे अजय के अंदर कोई चीज़ बहुत जोर से टूटी हो. लेकिन उसने अपने अंदर की पीड़ा को बाहर नही आने दिया और आने भी कैसे देता आखिर वे एक मसखरा था. जिसका कभी अपना कोई दर्द नही होता.अतः उसने उन दोनों को सदा खुश रहने का आशीर्वाद दिया.

अंजली ने उससे आशीर्वाद ले लेने के बाद यह भी नही सोचा कि आखिर बेशक उसका भाई एक मसखरा है लेकिन उसके अंदर भी एक दिल है. क्या उसका यह मसखरा भाई इस काबिल भी नही था कि एक बार शादी करने से पहले उसकी बहन उससे यह पुछ सके  कि भैया मैं महेश से अपनी शादी करना चाहती हूं?  लेकिन नही उसने उससे पूछा तलक नही बल्कि आशीर्वाद लेकर वह पुनः उसी कार में बैठकर जिस तेजी से और अचानक मेरे पास आई थी उसी तेजी के साथ वह कार में महेश के साथ बैठकर चली गई.

अजय समझ गया कि यहां अंजली केवल आशीर्वाद लेने ही नहि बल्कि अपने मसखरे भाई से शायद यह अघोषित रूप से बताने आई थी कि भैया तुम मसखरे हो तुमने अपना खुद का जीवन तो बर्बाद कर लिया है लेकिन मैं अपने जीवन में अब कभी तुम्हारें मसखरेपन कि परछाई भी  नही पड़ने देना चाहती. इसलिए अगर हो सके तो तुम अपनी इस बहन को भूल जाना.
अजय के आँखों से जब अंजली कि कार ओझल हो गई तो अजय कि इच्छा हुई कि वह बहुत जोर-जोर से और खुब फुट-फुटकर रोए. लेकिन तभी अजय को लगा कि जैसे उसके उस्ताद ने एक और चाटा खींचकर अजय कि गाल पर यह कहते हुए मारा हो  कि तुम्हें मैंने पहले ही बता दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए लेकिन एक धंधा करने वाले मसखरे को रोने का कोई अधिकार नही. फिर इसके कुछ ही देर बाद अजय खुब खिलखिलाकर हंसता रहा और हंसते-हंसते अचानक से वह वही गिरा और गिरते ही उस मसखरे ने हमेशा के लिए अपनी आँखें इस दुनिया से मूंद ली.


यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.


लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P )
mo.no.7800824758

Monday, 5 July 2021

(वेदना की पगडंडी हूँ)
हाँ मै उसके जाने----------
और लौटने का दर्द जानती हूँ,,,,,,,
तुम उसे बस एक वेश्या जानते हो--
मै उसे एक औरत जानती हूँ।
ऐ,रंग----मै उसके घर की तरफ जाती हूई,
उसकी वेदना की पगडंडी हूँ।

Monday, 28 June 2021

(ज्यादा देवता मिलते है)
हाँ!मै तलाशता हूँ------------
अँधेरी रात में आवारा गज़ल,,,,,,,,,,,
क्योकि ऐ,रंग------------
उजाले में ज्यादा देवता मिलते है।
(इश्क़ करके)

ना पढ़ सकी कोई किताब, 
मै इश्क़ करके.

मै औरत सुफि हो गई 
इश्क़ करके.

मौलाना और तकरीरे मस्जिद, 
तुम्हे मुबारक!
मै खुद हो गई----
मुकम्मल मुसलमान 
इश्क़ करके.

ये हिज़ाब,ये परदे,ये चारदीवारी 
कैद है औरत की,

तुम क्या निकालोगे इस कैद से मुझको,
मै खुद ही छोड़े जा रही,
अपने जिस्म का मकान, 
ऐ,रंग-
इश्क़ करके. 

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (उत्तर-प्रदेश ).

Sunday, 27 June 2021

(रोटी किस कौम की है)

भरे पेट हिंदू- मुसलमान होना आसान है, 

पर ऐ, "रंग"
किसी भूखे से पुछ------

कि उसकी रोटियाँ किस कौम की है.
(गालिब न लिखे)
भूख के सिरहाने,मै सिसकुँगा सारी रात,,,
ऐ,रंग-----
भले मेरे दौर के लोग,मुझे गालिब न लिखे।
(बिधवा विणा हूँ)
मै पथरीली------------------
कंटक राहो की ब्यथा लिये,
जिये जा रही उस चिड़ियाँ सी,
जिसके निड़ का तिनका-तिनका,
हर आँधी ने नष्ट किया!
है क्षिण हृदय में पीड़ा मेरे,
मै जयशंकर प्रसाद की आँसू हूं।
ना बदली ना सावन आये,
मेरी यौवन के गाँव कभी,
तपती धूप में देह जले
और तड़पे अंतर घट मेरा,
मै तार-तार टूटी नारी,
जो बज न सकु जीवन तट पे----
मै एैसी बिधवा विणा हूँ।

Friday, 25 June 2021

(जूल्फों में बांध लेती है)
उतरते है,घिरते है उसकी जूल्फों की तरफ बादल,
और वे इन बादलो को-------------
अपनी जूल्फों में बांध लेती है।
वे हुस्ऩ-ए-ज़ीनत है शहर की,
लोग तकते है उसके छत की तरफ,
वे उम्मीद-ए-बरसात है,
जो एक अदा से------------
अपनी जूल्फ़ो में सावन बांध लेती है।
है तैरने भर का पानी उसकी आँखो में,
ऐ,रंग-------------------
वे हम शायरो का सागर भी,
अपनी जूल्फ़ो में बांध लेती है।
(रोटी किस कौम की है)
भरे पेट हिंन्दू-मूसलमां होना आसान है,,,,,
पर ऐ,रंग---किसी भूखे से पुछ------
कि उसकी रोटियाँ किस कौम की है।

Thursday, 24 June 2021

(हमपे हँसे है बदरवा सखी)
अँखिया मे लोरन के पानी बहे-----
ढुढ़े मीले ना कजरवा सखी,,,,,,,,,,
ड़से है मनवा के पोर-पोर हमरा----
हमपे हँसे है,बदरवा सखी।
नीक ना लागे घर अँगनईया------
सौतन लगे है ओसरवा सखी।
ऐ,रंग-----
हियरा के आह लग जातई,,,,,,,,,,,,
बस पीके कोठरियाँ सलामत रहत--
बाकी जरी जातई पुरा शहरवा सखी।
ड़से है मनवा के पोर-पोर हमरा----
हमपे हँसे है बदरवा सखी।

###हमारे यहा की स्थानिय भाषा की एक रचना।
आज! दिल्ली के प्रखर गूँज प्रकाशन की "रेलनामा" प्राप्त हुई, जिसमें मेरा लिखा यात्रा-वृत्तांत "पहली रेलयात्रा" भी शामिल है,धन्यवाद संपादक डॉक्टर अलका जैन "अराधना जी" व नीलू सिन्हा जी का।
(भूख ने अपना बदन बेचा है)
स्याह अँधेरी रात में सन्नाटे को चीरती,,,,,
पुल के उस तरफ की चीख,,,,,,,,,,,,,
उफ!शायद ऐ,रंग----फिर भूख ने किसी को----------------
अपना बदन बेचा है।

Wednesday, 23 June 2021

(अखबार भी धंधे की तरह है)
सच लिखने की कुबत न रही,,,,,,,,,,,,,
अब इस मूल्क में ऐ,रंग---------
अखबार भी धंधे की तरह है।
(केरल से लौट आई है)
शायद जल्द ही घिर जाये,,,,,,,,,,,,
हमारे शहर में-मानसून के बादल-----
क्योकि ऐ,रंग--हमने सुना है,,,,,,,,,,,,,
कि मेरी मोहब्बत-------
केरल से लौट आई है।
(एक बाँझ औरत)
एक बाँझ औरत---------------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।
क्या करती----------
सास,ससुर,शौहर की उम्मीदे उसपे तलाक का डर,
वे भीगी आँख------------
इस दर पे अपना घर बचाने आ गई।
एक बाँझ औरत--------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।
औरत को तो ये भी हक नही कि वे कह सके,
कि बाँझ वे नही!
एै! पीर उठ और जग इस मज़ार से,
और देख एक औरत----------
अपने शौहर का मज़हब बचाने आ गई।
एक बाँझ औरत--------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Saturday, 19 June 2021

(प्रेटिकल देते है)
ऐ दुनियाँ मोहब्ब़त को विज्ञान मान ले,,,,,,,
क्योकि,चाहने वाले ख्व़ाहिशो की लैब में,,,
ऐ,रंग------------------
खुद को मिटा करके प्रेटिकल देते है।
(तमाशे करता रहा)
मै--
अपने ही चेहरे पे तमाँचे करता रहा,,,,,,,
ऐ,भूख मै तेरी खातीर----------
पुरे शहर में तमाशे करता रहा।
(सावन के अंधो को बहार लगती हो)
हे!प्रिये------तुम मेकप में
सौन्दर्य प्रसाधन का------
इश्तहार लगती हो।
मै न्यूज चैनल सा लगता हूं------
और तुम चित्रहार लगती हो।
जब तुम्हे देखता है कोई गैर,
तो मै सलगता हु--------------
मजूरे की बीड़ी की तरह अंदर-अंदर,
मै उन्हें मोहर्रम का दर्द लगता हू,
और तुम उन्हे ईद का त्योहार लगती हो।
हे!प्रिये----------------
मेरे अच्छे दिन गये,
मै पतझड़ का पत्ता----------
तुम सावन के अंधो को बहार लगती हो।

Monday, 14 June 2021

कौन कहता है कि ये सिर्फ 
सीजनल मुसलमान है,
गौर से देखिए हुजूर
ये हमारे भारत के,
ओरिजनल मुसलमान है,









(बेजा तलाक न दो)
ख्वा़हिशो को खाक न दो!
एै मेरे शौहर-----------
सरिया के नाम पे,
मुझे बेजा तलाक न दो।
बख्श दो---------
कहा जाऊँगी ले मासुम बच्चे,
मुझ बेगुनाह को-------
इतना भी शाॅक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न उड़ेलो कान में पिघले हुये शीशे,
मुझ बांदी को सजा तुम--------
इतनी खौफ़नाक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न छिनो छत,न लिबास
खुदा के वास्ते रहने दो,
मेरी बेगुनाही झुलस जाये-------
मुझे वे तेजाब न दो,
बेजा तलाक न दो।
सी लुंगी लब,रह लुंगी लाशे जिंदा,
लाके रहना तुम दु जी निकाहे औरत,
मै उफ न करुंगी!
बस मेरे बच्चो की खुशीयो को कोई बेजा,
इस्लामी हलाक न दो-------
बेजा तलाक न दो।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
____तलाक एक दर्द है जो इसे भुगत रही कोई औरत ही समझ सकती है!अगर संभव है तो मेरी इस रचना के पढ़ने वालो से मेरी कलम अनुरोध करती है प्लीज कभी किसी भी औरत से बेजा तलाक न ले,शुक्रिया।

@@@शुक्रिया!साप्ताहिक समाचारपत्र अकोदिया सम्राट(म.प्र.)मेरी इस कविता को अपना बेशकिमती स्नेह देने के लिये।