Sunday, 31 August 2025

जिरह बाकी है

(जिरह बाकी है)
ऐ मेरी मोहब्बते जज---------
इतनी जल्दि कोई फैसला न दो,,,,,,,,,,
अभी दिल की अदालत मे-------
मेरी बेगुनाही का जिरह बाकी है।

यही धारावी

(यही धारावी)
मै रोज थकी मांदी,
काम से लौटती हूं जीने------
यही धारावी।
वे चारपाई पे लेटा है,धुत्त कच्ची पिये
गंदी गालियाँ दे रहा,
अभी जबरदस्ती खीचेगा,
मै अपनी ऊबकाईयां रोके,
बर्दाश्त करुंगी एक बलात्कार,
फिर उठुंगी वे सो जायेगा,
थका मांदा!
मै उल्टीयां कर,
पुरे बदन से अपने एै,रंग-------
छुड़ाऊँगी सारी रात मै यही धारवी।

Saturday, 30 August 2025

इश्क

हमारे इश्क़ के--------------
मस्जिद की अजा़न है वो,
मै शेख हुँ उसकी धड़कनो का,
मेरी साँसो की पठान है वो।
हम जीते है मुकद्दस सरियत,
मै उसका पाकिज़ा फतवा हुँ,
चुमता हुं उसे--------------
मेरी इन आँखो की कुरआन है वो।
इल्में चराग रौशन है उसमें भी,मुझमे भी 
मै उसका आसमानी गुफ्तगू हूँ,
सुनता हु उसे!
एै,रंग------वे महज एक लड़की नही,
मेरी मुकम्मल जुबान है वो।
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo. no----7800824758

Friday, 22 August 2025

लड़कियों के ब्वॉयफ्रेंड हो गए

(लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये)
स्कूल के बस्ते----------------
बढ़ते-बढ़ते बैग हो गये!
खत लिखने वाले देश की संवेदना मर गई,
दिल में रहने वाले लोग------------
सब मोबाइल में टैग हो गये।
माँ यशोदा का आँचल बदला,
वे जिंस और टाप पहन के माम हो गई,
और जितने भी पिता थे वे रफ्ता-रफ्ता डैड हो गये।
दूध-घी खाने-पीने वाले देश ने गिलास रख दिया,
अब उन्ही गिलासो में---------------
बार बालाओ के ढ़ाले पैग हो गये।
अर्द्धनग्न सड़को पे--------------
यौवन उछालती कुछ माडर्न लड़कियाे
के अश्लील और भौड़े कपड़े,
शर्म आती है लिखते,
कि जिस देश में भाई होते थे,
एै,रंग-------आज उसी देश में लड़के,
होटलो के बंद कमरो में--------------
इन लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये।

###इस रचना को तर्क-वितर्क से दुर रख बस पढ़े क्योंकि ये जरुरी नही कि इससे सहमत ही हुआ जाय।

रईस की इमारत में दफन हूं

(रईस की ईमारत में दफ़न हूँ )

मै शहर के——————-
सबसे रईस की इमारत में दफ्ऩ हूँ।
मेरा शौहर कितना चाहता है मुझको,
कि महीनो से बेवा किये है बिस्तर,
मै उसी बिस्तर में दफ्ऩ हूँ।
मै शहर के—————
सबसे रईस की इमारत मे दफ्ऩ हूँ।
कालीन बिछे फर्श और इराने आईना,
वे अरब का चराग!
सब कुछ तो है लेकिन मै टूट गई झुमर सी,
बिखर के खत्म हूँ।
मै शहर के————
सबसे रईस की इमारत मे दफ्ऩ हूँ।
वे शीशमे दराज़ मै खोलती नही,
इतनी खामोश हो गई हु——–
की खुदी से बोलती नही!
वे देखो खिड़की के उस तरफ जैसे—–
अब भी खड़ा है मेरी चाहत का बेगुनाह,
मै बेवफ़ा थी उसकी,
ये आह है उसी की एै,रंग—–मै जो
शहर के सबसे रईस की इमारत में खत्म हूँ।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

Thursday, 21 August 2025

कत्ल होता है

(कत्ल होता है)
मै अपने अंदर---------
ढ़ेरो सच का गला घोट देता हूँ।
क्योकि इससे ऐ,रंग-------------
मेरे मासूम बच्चो की रोटी का-----,
कत्ल होता है।

एक शहंशाह का पत्थर

(एक शहंशाह का पत्थर)
तोड़ देती है हमें मुफ़लिसी----
वरना हम भी लाते कही से,
अपनी मूमताज़ का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से---
एक शहंशाह का पत्थर।
संगतराशी देखने ज़मी पे-------
आते खुदा के फरिश्ते,
जब मै लगवाता इश्के़ इमारत में------
अपनी मुहब्बत के अल्लाह का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से---
एक शहंशाह का पत्थर।
शोहरत,नुमाइश,चाँदनी रात यहाँ भी होती,
और शायर भी लिखता अपने तराशे हुये हर्फों से----------
इस कब्रगाह का पत्थर।
तोड़ देती है हमें मूफलिसी-------
वरना हम भी लाते कही से,
अपनी मूमताज़ का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से,
एक शहंशाह का पत्थर।

Tuesday, 19 August 2025

गीत

(गीत)
गीत----------
केवल उर्वशी या शकुंतला नही!
ऐ,रंग----ये उस गरीब की पतीली भी है,
जिसमें कई रोज से-चावल पके नही।

पेट पढ़ना है

(पेट पढ़ना है)

अखबारे पढ़कर सो गया है शहर,
ऐ,"रंग"--
हमें तो अंधेरी रात में,
किसी वेश्या का,
पिचका हुआ पेट पढ़ना है.

खामोशी

मै खामोशी और सन्नाटा चाहता हूं,
ना जाने क्यूं
मेरे अंदर इतना शोर है,
कोलाहल है,
मै कही कुछ देर बैठ
इस भीड़ से सुस्ताना चाहता हूं,
लेकिन कहा? पता नही
अगल बगल
कोई पेड़ नही, कोई चिड़ियां नही
बस चल रहा हूं
लेकिन अपने इस चलने से
कुछ बतियाना चाहता हूं
लेकिन
वे बात करने को तैयार नही,
क्योंकि वे खुद मुझ 
कुढ़ मगज के इस दिमाग के कीड़े से 
वे खुद परेशान सी है
इसकी भी गलती नही,
शुरू शुरू में
इसने कहा तो था,
कि अरे बेवकूफ
चल मैं तेरे साथ चलने को तैयार हूं
इस कंक्रीट के जंगल की घुटन
से दूर,अपने गांव 
लेकिन मैंने ही नही सुना

Monday, 18 August 2025

व्यंग्य

पत्नी का शादी की शुरुआत का संबोधन "अजी सुनिए" और दो बच्चो की मम्मी का संबोधन "आप चुप रहिए",,,यह किसी भी भारतीय पत्नी का क्रमिक विकास है

सड़क की महारानी

(ममता बनर्जी सड़क फिल्म की महारानी है)

एक डॉक्टर 
जो इलाज करती 
वे खुद नृशंस रेप से मर गई !
कुछ 
पशुओं ने उसके स्त्री अंगों को 
नोचा, रौंदा,मसला 
वे तड़पी छटपटाई 
और पिशाच जांघो तले दब गई !
उसकी उस 
योनि से खून बहे 
जिस योनि की प्रसव पीड़ा 
इस पशु के मां को भी हुई होगी. 
शायद !
यह अघोषित 
उसकी खुद की मां की 
योनि से भी एक रेप है.
वहा एक स्तन शुदा स्त्री 
नही! नही! स्त्री नही !
बल्कि मुख्यमंत्री 
क्योंकि वह स्त्री होती 
तो उसके 
खुद के गुप्तांग और स्तन 
डॉक्टर बिटिया की 
रेप की पीड़ा से दुखते,दर्द करते 
आंखे भर आती,
यह डॉक्टर भी 
कोलकाता की निर्भया है .
मोमबत्तियां जलाओ, प्रोस्टेट करो,
इससे तुम्हारे 
माटी मानुष और सोनार बांग्ला 
का मुर्दापन बच जाएगा.
आखिर 
इस घटना पर सदन को भी तो 
थोड़ा बहुत 
घड़ियाली आंसू बहाना है,
कुछ वोट टटोलना है ,
इसके रेप की घावों से,
हिंदू मुसलमान,जाति
नही! नही!
उफ! हे भगवान 
आखिर इस डॉक्टर बिटिया का स्तन
मरने के बाद भी 
इस तरह सदन की सीढ़ियों पर 
उछल क्यूं रहा हैं ? 
शायद उसे अभी भी 
किसी की आंख में 
कुछ पानी दिख जाने की उम्मीद है 
मरने के बाद भी, 
यह डॉक्टर बिटिया कितनी पागल है 
जो नही जानती 
कि राजधानी हो या फिर कोलकाता 
इसके रेप के घाव 
कभी भरेंगे नही ,
क्योंकि उन रेप के घावों वाले अंगो को 
बार–बार दिखाकर 
एक स्त्री
वोट लेगी. 
कोलकाता की डॉक्टर बिटिया 
तुम्हारा रेप 
वहा कि मुख्यमंत्री के ,
खुद का किया रेप है 
वे स्त्री नही
बल्कि वह वहा के 
सड़क फिल्म की महारानी हैं.

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है बिना अनुमति के मेरी इस रचना को शेयर ना करे.

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Saturday, 16 August 2025

व्यंग्य

✍️एक महाशय को हमारे यहां की पुलिस ने छेड़खानी की आशंका में उन्हें 1घंटे तक चौकी पर बैठा लिया.तभी से उनकी पत्नी भी उनसे काफी डरी हुई है कि,कहीं यह उसके साथ भी कोई छेड़खानी ना कर दे😀

Tuesday, 12 August 2025

गोरखपुर

गोरखपुर के उन बह रहे तमाम आँसुओ को समर्पित एक पीड़ा-------
                                  (गोरखपुर)
चालीस बच्चो की मौत पे भी सीकन नही-------
बड़ी मोटी है तेरी सियासी खाल गोरखपुर।
आॅक्सीजन की सप्लाई रुक गई,
अभी तलक आजाद है सी.ऐम.ओ.(C.M.O.),
मुझे तो शक है कि,
इन बच्चो की मौत के है---------
यही दलाल गोरखपुर।
योगी यही के है इसी से मिट्टी डल रही है,
लेकिन जल गई है धुनी------
अब आयेंगे काग्रेंस,सपा,बसपा के लोग,
और बजायेंगे कुछ दिन नकली संवेदना लिये-----
अपने-अपने सियासी गाल गोरखपुर।
लेकिन वे आँखे भरी रहेंगी जिन आँखो में अभी तलक,
अपने बच्चे के खेलने,
और कानो को सुनने की किलकारियाँ थी,
शायद कभी नही भरेंगे,
उन बच्चो के खोने के ये घाव,
रुह कांप जायेगी इनकी ता उम्र,
और हमेशा इनकी जेहन मे रहेगा------
एक दर्द बनके तेरा अस्पताल गोरखपुर।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Monday, 11 August 2025

कोई मेले लगे

(कोई मेले लगे)
पन्द्रह अगस्त की आँखो से------
आँसू बहने लगे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,.
क्योकि शहिदो की मज़ार पे ऐ,रंग-----
न तो चराग जला---------
और न ही कोई मेले लगे।

अशफाक लिखा था

(अशफ़ाक लिखा है)
हमने गीता और कुरआन से भी ज्यादा,
ऐ मादरे वतन-----------
तेरी मिट्टी को पाक लिखा है।
जो जला है उसे राम प्रसाद बिस्मिल,
और जो दफ़न है-------
उसको अशफ़ाक लिखा है।
###पन्द्रह अगस्त तक मै राष्ट्र को समर्पित रचनाओ और उनकी शहादत के संम्मान में अपनी भाव संवेदनाओ की श्रद्धांजलि के साथ मै मुसलसल इस फेसबुक पे आपके साथ एक सफर करता रहुंगा----जय हिन्द।

मां

(माँ)
तेरा हर बेटा मुल्क की खातिर-------
यूं शहीद और कुर्बान हो माँ!
ना बटने दे किसी को मजहब के नाम पे,
समय से पूजा समय से अजा़न हो माँ।
फक्र हो तुम्हे अपने आँचल और दूध पे,
तेरी लोरी में राष्ट्र हो और राष्ट्रगान हो माँ।
ना पंजाब,ना गुजरात,ना महाराष्ट्र निकले,
आखिरी लम्हें गर लब भी फड़फड़ाये,
तो लब पे तुम और हिन्दुस्तान हो माँ।
गर सुपुर्द-ऐ-खाक होने लगू,
तो मुट्ठी में मुल्क की मिट्टी-------
और डालने वाले के होंठो पे मुस्कान हो माँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
###आप सभी को हमारे मुल्क की ये आजाद सुबह मुबारक हो।

टिप्पणी

✍️✍️जब 18 से 30 वर्ष की उम्र के लड़के किसी माफिया या बाहुबली के जन्मदिन या फिर उनकी मैरिज एनिवर्सरी के बधाई देने की फोटो अपने फेसबुक पर सगर्व लगाने लगे तो समझ जाइए कि ऐसे लड़के के भविष्य का सत्यानाश तय है,,,,,,😢😢

Sunday, 10 August 2025

आ गया पंद्रह अगस्त

(आ गया पन्द्रह अगस्त)
इस साल भी---------------
बेरोजगार युवाओ का लिये कष्ट,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
देखो जितने मे सीमेंट उतने मे ही बालू ,
कहां जाये मजूरा,
वे खाली पेट कैसे गायेगा विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
सच पुछिये तो सारी नीतियो से----------
देश का आखिरी व्यक्ति है पस्त,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
सब्जियां आसमान छु रही टमाटर लग रहे अँग्रेज़ से,
जीयसटी भी केवल कागज़ी इंकलाब बन के रह गया,
कालाधन भी शिगुफे की तरह आया और चला गया,
और गढ्ढा युक्त सड़को से गुजरती प्रभात फेरी,
यानि---------------
वही पुराने हालात और पुराना वक़्त,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
एै "रंग" कुछ नही बदलेगा,
क्योंकि हमारी नैतिकता हर रोज मरती है,
हम गुँगे हो जाते है जातियो मे बट,
तो कहां हो पायेगा दुर इस देश से,
शिक्षा,स्वास्थ्य,सुरक्षा जैसी महामारियो का कष्ट,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
जरा सोचो-----------
उसी पुराने रुटीन की तरह फिर फहरेगा तिरंगा,
और फहरायेगा कौन----------
किसी विभाग का कोई मंत्री या उसी विभाग का,
कोई उससे बड़ा भ्रष्ट---------
आ गया पन्द्रह अगस्त।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.--------7800824758

Saturday, 9 August 2025

असफाक लिखा है

(अश़फाक लिखा है)
हमने गीता और कूर्आन से भी ज्यादा--
ऐ मादरे वतन----------
तेरी मिट्टी को पाक लिखा है।
जो जला है उसे राम प्रसाद बिस्मील़---
और जो दफ्ऩ है उसको अशफ़ाक लिखा है।

Friday, 8 August 2025

भरपेट दूध मिलेगा

(भरपेट दूध मिलेगा)
झोपड़ी से-नरगिस के सिसकने की----
आवाज आ रही है!
ऐ,रंग--आज शायद उसके भूखे बेटे को-
भरपेट दूध मिलेगा।

नीला आसमा सो गया है

(नीला आसमा सो गया है)
वक्त के सानो पे सर रख नही पाई,
ऐै ",रंग "-------------
इस रेखा की चाहत और ख्व़ाहिशो का भी ,
नीला आसमा सो गया है।

वंदे मातरम गाए

(वंदे मातरम गाये)

शहीद की लाश को जब गाँव दफनाये, 
तो वंदे मातरम गाये.

ना बीबी तोड़े चुड़ी,ना आँसू बहाये, 
माँ भी हँसती हुई सबके,सामने आये, 
ऐ,"रंग"--
इस शहीद की है आखिरी इच्छा,,
कि सरहद पे मेरा बेटा भी, 
होके लहू-लूहान---
वंदे मातरम गाये.

वंदेमातरम वंदेमातरम।

ब्रा नहीं देखा

बांग्लादेश के आंदोलन की सबसे घृणित तस्वीर--
(ब्रा नही देखा)

कैसे मान लूं कि इसने 
छत पर सूखता हुआ 
अपनी बहन 
या मां का ब्रा नही देखा.

कैसे मान लूं कि, इस इंकलाबी ने 
कभी बंद दरवाजे की झिर्री से 
अपने अब्बू के हाथों 
अम्मी का खोलकर 
इधर–उधर फेकते 
ब्रा नही देखा.

कैसे मान लूं कि, 
दूसरो की बहनों के दोनों वे 
कैसे कसे है ब्रा में
ये खोलने 
पर कैसे दिखेंगे 
लार बहाता रहा 
लेकिन 
कभी खुद की बहन का
ब्रा से कसा हुआ वे 
कितना है छोटा  
या बड़ा नही देखा .

इसकी 
जम्हूरियत वहा से भाग आई 
लेकिन
हमारे यहां की दोगली सियासत 
इसके साथ है 
जबकि किसी आंदोलन में 
कभी मैंने 
किसी युवा को 
अपनी देश की औरतों के सीने का 
यूं बेहूदगी से लहराते हुए 
ब्रा नही देखा.

कितनी गूंगी हो गई है
स्त्री विमर्श की 
स्त्रियां 
जो बात–बात पर बड़ी स्वच्छंदता से 
इसे बांधती खोलती 
और इसके लिए लड़ती है
शायद! इन्होंने 
अभी किसी कहानी के लिहाज से 
इसके दोनों हाथों में
अपने खुद का 
ब्रा नही देखा.

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रचना--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियांपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)

Thursday, 7 August 2025

(सावन )

( सावन ! अट्ठारह साल की लड़की है) 

सावन-----------
सीधे-साधे गाँव की,
एक अट्ठारह साल की लड़की है.
भाभी की चुहल और शरारत,
बाँहों मे भरके कसना-छोड़ना,
एक सिहरन से भर उठी-------
वे सुर्ख से गाल की लड़की है.
सावन--------
सीधे-साधे गाँव की,
एक अट्ठारह साल की लड़की है.

वे उसका धान की खेतों से तर-बतर,
बारिश मे भीगते हुये,
घर की तरफ लौटना,
और उस लौटने मे उसके,
पाँव की सकुचाहट,
उफ! गाँव मे सावन--------
बहुत ही मादक और कमाल की लड़की है.
सावन---------
सीधे-साधे गाँव की,
एक अट्ठारह साल की लड़की है.

न शायर,न कवि, न नज़्म, न कविता
वे उर्दू और हिन्दी दोनो से कही ऊपर,
किसी देवता,फरिश्ते के हाथ से छुटी,
इस जमीं पे उनके--------
खयाल की लड़की है.
सावन----------
सीधे-साधे गाँव की,
एक अट्ठारह साल की लड़की है.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला---जौनपुर--222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.-----7800824758.

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

जुगनू बहुत रोए

(जुगनू बहुत रोए)
शहर की आमद में 
जब पीपल कटा 
तो ऐ,"रंग"--मेरे गाँव के जुगनू बहुत रोए.

बांग्लादेश के हालात पर एक रचना

बांग्लादेश के वर्तमान हालात पर लिखी एक रचना-------(मोहब्बत लिखूं)

मैं बांग्लादेश के 
किस जलती हुई लाश पर मोहब्बत लिखूं?
मेरे भारत के गूंगे लोग,, 
बोलो !
"जम्हूरियत वहां से जान बचा के आई है."
उसके खून के आंसू 
कैसे सूखेंगे ?
कौन सुनेगा वहा 
मैं किसकी "अरदास पर मोहब्बत लिखूं ?"
मैं मानता हूं कि –
यह मौत धर्म या मजहब की नहीं  
इंसान की है 
लेकिन मैं वहां किसकी 
"आखरी सांस पर मोहब्बत लिखूं ?"
एक मुल्क की 
जम्हूरियत 
सवालों के घेरे में है 
वहा दीन,ईमान,मस्जिद
सब पर 
एक डर काबिज है
आखिर मैं किस चोट 
"और किस खराश पर मोहब्बत लिखूं ?"

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है बिना अनुमति के इस रचना को कही शेयर ना करे.

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियांपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)

टिप्पणी

✍️✍️अमेरिका के सामने अब राजनीति को अटल और इंदिरा होने की जरूरत है यह मेरा व्यक्तिगत मानना है 🙏🙏

Monday, 4 August 2025

व्यंग्य

✍️✍️कुछ लोग तो इतना ज्यादा ऑन लाइन साहित्य सम्मान पा चुके है कि उनसे ज्यादा साहित्य सम्मान तो हिंदी के किसी पाठ्यक्रम में शामिल शायद ही किसी हिंदी लेखक को मिला हो🥸🥸