Saturday, 28 February 2026

बिटिया की आजादी

(बिटियाँ की आजादी अच्छि नही लगती)
बचपन की आजाद चिड़ियाँ को,
बंदिशो मे बांध रहे है!
ऐ,रंग-----आज भी दुनियाँ को देखो----
बिटियाँ की आजादी अच्छि नही लगती।

ताव में डिंपल

(ताव में डिंम्पल)
लगी हुई है जैसे-----------
किसी डुबती नईया के बचाव में डिंम्पल!
तभी तो तुफानी दौरे कर रही-----
अब की चुनाव में डिंम्पल।
चाचा,भतीजा,बबुआ,बुआ तो थे ही,
अब तो मोदी को भी कोश रही-----
एै"रंग"बड़े ताव में डिंम्पल।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

अभिनंदन

( अभिनन्दन होगा)

ग़र तेरी कैद़ मे-----
ऐ पाक़ मेरा अभिनन्दन होगा,
तो क़सम वतन की खाते है,
लाहौर, करांची के हर घर मे-----
फिर भीषण क्रंदन होगा।
रूह कांप उठेगी हर शै़ की,
फिर गिद्ध-सियार ही बोलेंगे,
एक-एक बेटे के हिस्से----
कई-कई गर्दन होगा।
अगली आजादी का तिरंगा,
फहरेगा फिर ग़गन तेरे,
हम पैरो तले कुचल देंगे,
वहां तलक फिर. नक्शे मे ऐ"रंग'----
मेरा ये वतन होगा।
ग़र तेरी कै़द मे-----
ऐ पाक मेरा अभिनन्दन होगा।

Friday, 27 February 2026

भजन की बात

(भजन की बात)
अखिलेश कह रहे------------
मोदी की नोटबंदी और कालेधन की बात!
राहुल कह रहे-------------
ढकोसला और नौटंकी है,
प्रधानमंत्री के रेडियो पे मन की बात।
बंद कमरे की तवायफ़-------------
जब थिरकेगी नंगे बदन,
तो उससे बेमानी है एै"रंग" करना-----
कंठी,माला और भजन की बात।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

Thursday, 26 February 2026

मोहब्बत के फ्लेवर का महीना है

(मोहब्बत के फ्लेवर का महीना है)

यह गुनगुने मिजाज 
और तेवर का महीना है ,
वह देखो सज रही है,
घंटो दर्पण के सामने,
यह उसके पिया के दिए,
जेवर का महीना है.
भाभी टटोलती है 
ननद और देवर को,
ऐ,रंग--
इस देश मे फागुन--
मोहब्ब़त के फ्लेवर का महीना है.

(मिट्टी आ गई)

(मिट्टी आ गई)

फरिश्तों ने जो लिखी थी
वे चिट्ठी आ गई 
चल तेरे खाक में 
मिलने की मिट्टी आ गई.

ना रो दरख्तों पर,
ना शाख पर
यहां सबको टूटना है
बिछड़ना है
यही चलन है.

सभी ने देखा है 
कि खिजा के बाद
उन्ही महबूब 
दरख़्तों की शाख पर 
फिर से,
बहारों की 
नई पत्ती आ गई.

चल तेरे खाक में 
मिलने की मिट्टी आ गई.

Wednesday, 25 February 2026

उर्दू घुट घुट के परदे में रही

(उर्दू घुट-घुट के परदे मे रही)
मरदे तहज़ीब कत्ल करता रहा,
इसी से ऐ,रंग---सालो-साल,
हिन्दी अपनी पिड़ाओ के घुँघट मे,
और उर्दू----------
घुट-घुट के परदे मे रही।

अपनो के दिए गरल से

(अपनो के दिये गरल से)
जिसको कभी हम जानते थे,आड़वाणी और अटल से,
वे गायब हो गये-------------
आज की दोगली राजनीति के पटल से।
हाँ!भाजपा,मोदी,शाह सभी है
बस एक जोशी है,
जो तील-तील मर रहे भीष्म की तरह हर रोज,
एै"रंग"अपनो के दिये गरल से।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

धन्यवाद!आपका निर्मेश के त्यागी भईया,दैनिक वर्तमान अंकुर और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

श्रीदेवी मर गई

अलविदा हम और हमारे दौर के कला की बेमिसाल मुरत यानी श्रीदेवी को।
                         (श्रीदेवी मर गई)
श्रीदेवी आज तु----------
लाइट,ऐक्सन,कैमरा यानी सबको तन्हा और,
विरान कर गई।
देखो हमारी भीगी नम आँखे------
हम कोई ऐक्टिंग नही करते,
इसमे आज तेरे निभाये हर किरदार की वे----
हर एक सुरत उतर गई।
तु क्या जाने कि तेरे जाने से,
हमारी मुहब्बत के दरख्त़ो के सारे महबूब पत्तो को,
तु दर-बदर-कर गई।
हो सकता है कि इन दरख़्तो पे लगे फिर नये पत्ते,
फिर पहले सी बहार आये,
लेकिन तु क्या जाने कि किस तरह तेरे जाने से,
हमारे दौरे शाख की बुलबुल,
हमेशा कि खातिर हमारे मुहब्बत के शाख से उड़ गई।
शायद आसमां पे भी खुदा को,
अपनी सिनेमा की खातिर तेरे जैसे किरदार की जरुरत थी,
शायद आज इसी से---------
तु हमसे और हमारे जैसे तमाम चाहने वालो से बिछड़ गई।
सच यकीन नही हो रहा एै "रंग" आज-----
की हमारे दिल और हमारे सिनेमा की श्रीदेवी मर गई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर---222002(u p)।
mo.no.-----7800824758

दो घाव हो गए

(दो घाव हो गए )

जिन उरोजों को ढ़क,
वे मासूम देखती थी,
कभी वात्सल्य का सपना,
ए "रंग "
उसके वही दोनों उरोंज,
गरीबी के चलते-----
दो घाव हो गए.

कुछ पन्ने तो फटे होते

(कुछ पन्ने फटे होते)

सारा दिन
फुटपाथ पर बैठकर
एक भूखा शायर,
अपने लिखें दीवान को बेच नही पाया,

गर यही रात के अंधेरे में 
कोई औरत खड़ी होती,
तो ऐ "रंग"
उसकी जिस्म की दीवान के 
कुछ पन्ने फटे होते

Tuesday, 24 February 2026

बसंत हूं

( बसंत हूं )

मै रोज लद उठती हूँ"
आम के बौर सी,

गुलाबी शर्म ओढ़े!
ऐ,रंग--
मै अपने पिया के कमरे की
"बसंत हूं "

उम्र की किताब

(उम्र की किताब)

पुरे बदन में--
झुरझुरी सी उठ रही,

हे सखी!
बसंत पढ़े छेड़-छेड़,
मेरे उम्र की किताब.

Monday, 23 February 2026

कसाब की बात

(कसाब की बात)
गर्त में शिक्षा और किताब की बात,
चरित्रहीन भी करने लगे अब नकाब की बात!
पुरे साल फूकते रहे जो बागे गुलिस्ताँ-----
वे भी कर रहे अब गुलाब की बात।
थू कितनी गिर गयी है राजनीति,
कि चुनाव जितने के लिये एै"रंग",
करनी पड़ रही अमित शाह को भरे मंच से-
अब बरोजगारो के लिये जाब नही-------
बल्कि अर्थ बदल के एक आतंकी कसाब की बात।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष।

दर्द के हरम में है

(दर्द के हरम मे है)

नहाने दे-
गीरने दे,ये अश्क़े गुलाब जल,
बढ़ेगी इससे तड़प की खूश़बु।
ऐ,रंग-
जानता है,
उसकी याद अब भी,
मेरी दर्द के हरम मे है।

पेट्रोल सी लागे है

(पेट्रोल सी लागे है )

वे धीरे-धीरे मुझको कब्जाती जा रही है,
अपने रूप के जादू से,

ऐ "रंग" मुझे अब वे 
अच्छे दिन के धोखे में--
पेट्रोल सी लागे है.

(आवारा शाम हूं)

(एक आवारा शाम हूं )

धुँधला जाते है,ऐ "रंग"
मेरी आगोश मे चेहरे,मै शरीफ़ो के शहर की,एक आवारा शाम हूं.

पाक से मत हारना

(पाक से मत हारना)

पड़ोसी देश की 
उड़ी हुई खाक से मत हारना,
लड़ना उस हद तक,
जहां जीत हो 
तुम्हें कसम है हम प्रशंसकों की 
कि तुम 
हमारे क्रिकेट की नाक से मत हारना.

हारने को क्रिकेट में और भी देश है 
हम कुबूल लेंगे 
लेकिन तुम
चढ़ना तो फिर चढ़ते चले जाना 
तुम सूरज हो 
उनके धोखे की 
डूबती चांद से मत हारना 
तुम्हें कसम है
पाक से मत हारना.

✍️✍️आखिरकार भारत नहीं हारा 🇮🇳🇮🇳🙏🙏

@@रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियाँपुर 
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Saturday, 21 February 2026

दैहिक रसखान

(दैहिक रसखान हो)
हे गायत्री प्रजापति-----------
तुम सच मे महान हो,
इस चुनाव के तुम श्रेष्ठ आइकॉन हो!
मोदी क्या? कहेंगे तुम्हे कुछ,
उन्हे मालूम नही कि तुम---------
उस रेप वाली महिला के दैहिक रसखान हो।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

आवारा शाम हूं

(एक आवारा शाम हूं )
धुँधला जाते है एै "रंग"----------
मेरी आगोश मे चेहरे,
मै शरीफ़ो के शहर की----
एक आवारा शाम हूं ।

आवाज रख दे

ऐ वक्त––
अपनी शहनाई
और साज रख दे!

माथे पे इसके 
तू अपना हाथ रख दे !

इस रेडियो के "जफर" ने 
ताजिंदगी आवाज दी है
इसके सिरहाने
"गीतमाला" ना सही 
तो तू 
किसी के सिसकने कि
आवाज रख दे .

अलविदा अमीन सयानी 😢😢🙏🙏

Friday, 20 February 2026

गोद लिए बेटे

(दो गोद लिये बेटे)
एै सत्ता तेरी खातिर-----------
किसी ने अपनाया तो किसी ने छोड़ दिये बेटे!
देख लो दशरथ और कैकेयी के इस प्रदेश को,
कि एै"रंग" कह रहे है कि बदल देंगे,
खुशहाली से इसकी शक्लो-सुरत--------
गुजरात से दो गोद लिये बेटे।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और आज के हमारे चुनावी कटाक्ष का।

जुड़े का गुलाब

(जूड़े का गुलाब)👌👌💐
अब भी रखा है,हमनें अपने कमरे में,
उनके जूड़े का गुलाब।
वही ख़ुशबू, वही सुगंध, वही चाहत,
ऐ"रंग"हमसे गुफ़्तगू करता है,-------
उनके जूड़े का ग़ुलाब।।👸👨😍😍💟🌹🌹🌹🌹

हर साल खिलती है

(हर साल खिलती है।)💐💐
जो लगाई थी तुमने ------
कह के अपने मोहब्बत की निशानी,
वे गुलदावदी---------
तुम्हारी तरह हर साल खिलती है।।।🌺🌻💐🌸😍😍💟💟

दर्द की मीना कुमारी

(औरत दर्द की मीना कुमारी है)

औरत प्यार मे
इस कदर डुब जाती है,
कि वार देती है खुद को,
फरेब की बाँहो मे।
फिर रोती बहुत है--
तन्हाई-घुटन जीती है,
बनके सुलगती है गीली लकड़ी,
ऐ,रंग--
औरत दर्द की मीना कुमारी है।

रेखा हूं

(रेखा हूं)

मैं---
मुख्यमंत्री नहीं
अपनी पार्टी की निर्णय रेखा हूं .
 
मैं ––
तेज और अध्यात्म में जहां 
स्वामी विवेकानंद हूं 
तो वहीं 
राजनीति हुंकार में
मैं राम राज्य की प्रत्यंचा हूं .

लड़ना जानती हूं 
छात्र जीवन से, 
मुझे छेड़ना मत 
मैं गिनना जानती हूं सिंहों के दांत 
मैं––
इस भगवा बाने में
भारत में जन्मी स्त्री भरत के 
ललाट की रेखा हूं.

मैं ––
मोड़ दूंगी घोड़े का रुख 
कुचल दूंगी 
दिल्ली के दुश्मनों की छाती 
मैं भी 
राष्ट्र की खातिर 
अपने वात्सल्य को
पीठ पर बांध सकती हूं .

मैं ––
लांघ सकती हूं 
दिल्ली के हित के लिए सारी सीमाएं 
मैं लक्ष्मीबाई का प्रतिरूप 
तो 'सुषमा स्वराज' सी मेधा हूं. 

मैं ––
मुख्यमंत्री नहीं
अपनी पार्टी की निर्णय रेखा हूं.

✍️✍️"दिल्ली के फैसले को दिल से बधाई"🙏🙏

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियाँपुर 
जौनपुर-222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Wednesday, 18 February 2026

तुम कोई

तुम कोई कविता नहीं लिख सकते 
शेर नहीं लिख सकते 
गजल नहीं लिख सकते 
कोई बात नहीं 
बस कागज पर 
तुम मोहब्बत से 
जिसे चाहते हो उसी का नाम लिख दो

रोटियों के जलने के निशान

(रोटियो के से जलने के निशान मिलते है)
अँधेरी रात वे औरत है--------
जो सिसकती है फूटपाथ पे होंठ कुचलकर!
इसे पति की छुअन नही मिलती,
इसके पुरे बदन पे ऐ,रंग---------
बस रोटियो के से जलने के निशान मिलते है।

सावधान समाने चुनाव है

(सावधान!सामने चुनाव है)
सावधान!
सामने चुनाव है।
आपको अपना बताना------
इनका राजनीतिक दाव है!
सावधान !
सामने चुनाव है।
इतने दिन याद नही आये,
अब कहते है----------
ये इनके पुरखो का गाँव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
मुसहर बस्ती की दशा ज्यो की त्यो,
भूखो मरा बुनकर,
उसकी बेवा के सामने घड़ियाली आँसू,
कुछ करने के वादे--------
चेहरे पे ताव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
झोपड़ी की रोटी-चटनी छक रहे,
खाट पे बैठे हँस रहे-------
बढ़ा काका और काकी से इनका लगाव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
इनका चरित्र समझ से परे,
एै,रंग----ये लोकतंत्र की आड़ है,
वरना कोयल की कुक में-----
ये कौवो की काँव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002
mo.no.7800824758

धन्यवाद!दैनिक भारत संवाद के संपादक बड़े भईया अशोक सत्यवीर जी का जिन्होने आज के साहित्यिक परिशिष्ट मे मेरी कविता"सावधान!सामने चुनाव है"को अपना बहुमूल्य स्नेह दिया।

सपेरे की बिटिया

(सपेरे की बिटिया)
कभी पढ़ने आती थी हमारे स्कूल में,
सपेरो की बस्ती से---------------
एक सपेरे की बिटिया।
वे तमाम किस्से सुनाती थी साँपो के अक्सर,
वे खुद भी साँपो से खेलना जानती थी,
पर वे मासुम नही जानती थी,
इंसानी साँपो का जहर,
एक दिन-----------
उसी मासूम की नग्न लाश,
उसकी बस्ती से पहले--------
पड़ने वाले एक झुरमुट में पाई गई,
मै सिहर गया!
उस नग्न मासूम की लाश देख,
मै अब भी इतने सालो बाद भी-----
अपनी उस मासूम छात्रा को भूल नही पाता,
हर नाग पंचमी को वे मेरी जेहन मे
उभर आती है,
और पुछती है मुझसे कि बताईये न सर,
कि कैसे चुक गई,
अपने पुरे बदन पे रेंगे हुये नाखूनि साँपो से,
एक सपेरे की बिटिया।
@@@आप सभी को नाग पंचमी की बधाई।
## # रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।

सुलगती सिगरेट

लगाये बैठा है—————-
होंठो पे अपनी वे सुलगती सिगरेट!
बगल में अनगिनत टुकड़े गिरे है,
धुआँ है!
उस कमरे में जिस कमरे में कभी तुम,
छिन के फेक दिया करती थी,
उसकी अधजली सिगरेट।
अब होंठ पे लगा भुल जाता है,
वे तो सुलगते-सुलगते,
जब होंठ के आखिरी सिरे पे पहुँचती है,
तो वे चौकता है!
फिर जला होंठो पे रख लेता है,
वे अपने एक नई सिगरेट।
और तकने लगता है दरवाजे की तरफ,
कि शायद तुम लौट के आओ,
छिन के फेकने इसके होंठो से,
अधजली सिगरेट।
एक सुबह———-
दरवाज़ा खुला था लोगो की भिड़ थी,
शायद कुछ देर पहले ही मरा है,
क्योंकि—————-
अभी भी उसकी होंठो पे एै,रंग
धीरे-धीरे आगे बढ़ रही बुझने के लिये,
बिल्कुल इसके जीवन की तरह——-
ये सुलगती सिगरेट।

केंडिल नाइट

बहुत उदास है—————
आज हमारे तुम्हारे मोहब्बत की,
कैंडिल नाईट।
मै वही बैठी हूँ ठिक सामने,
बस वे जगह खाली है-
जहां तुम बैठते थे,
आज बहुत उदास है मेरे अंदर जिंदगी,
मै टुट रही हूँ!
मेरे संग बीत रही है,
बस तुम्हारे खूबसूरत यादो की—–
कैंडिल नाईट।
शायद कही चुक गये हम,
इसी से हमारे रिश्ते में गलतफ़हमी बढ़ती गई!
तुम अलग हो गये मै अलग हो गई,
अब तो अक्सर————–
डिनर मेज पे ही रह जाता है,
और मै कुर्सी पे बैठी यु ही,
गुजार देती हू————-
अपनी कैंडिल नाईट।
गर गुंजाइश हो तो लौट आओ,
एक मर्तबा ही सही मुआफ करने,
क्योंकि ऐ,रंग—–कही ऐसा न हो,
कि तेरा इंतजार करते-करते,
हमेशा के लिये बुझ जाये,
मेरी ये कैंडिल नाईट।

मुसलमान में बांटकर

(मुसलमान मे बांटकर)
मडरा रहे है------------
हमारी खुशियो के आसमान पर,
देखो गिद्ध से चुनावी हेलिकॉप्टर!
ये जितेंगे,हारेंगे तभी एै"रंग"------
जब ये हमारे शहर से उड़ेंगे,
हमें हिन्दू और आपको मुसलमान में बांटकर।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और आज के मेरे चुनावी कटाक्ष का।

(पूजा या अजान से ढकती है)

(पूजा या अजा़न से ढ़कती है)
मुझे उस मजबूर औरत की----------
टूटी चुड़ियो की आवाज़ ईधन की लगती है,
वे अपने ग्राहक की गर्म साँसो पे,
अपनी मजबूरीयो का-------------
कई दिनो से पड़ा हुआ ठंडा तवा रखती है।
उसकी चीख और पीड़ा में,
उसके भूखे बच्चो के खाली पेट भरने वाली रोटी-----------------
की खुशी दिखती है।
वे अपने कपड़े समेट ब्लाउज पहन,
जब अपनी उरोजो में ये रुपये रखती है,
तभी उसकी नज़र उसी कमरे मे--------
टंगे हुये एक माँ के नंंगे उरोज वाले,
कैलेंडर पर पड़ती है,
जो अपने मासूम बच्चे का पेट इसी उरोज से भरती है।
वे एक मर्तबा फिर-------------
इस कमरे मे से निकलने से पहले,
अपने बंद ब्लाउज में--------------
रंखे पैसो को अपने जख्मी उरोजो के बीच टटोलती है।
न जाने क्यू उसके वे दोनो उरोज,
हमारे दो किरदार से लगते है!
एै,रंग-----मुआफ करना
मैले हो जाते है फिर भी कभी-कभी ,
कुछ औरतो के यही उरोज,
चाहे वे इसे पूजा के आँचल या-------
किसी मस्जिद के अजान से ढ़कती है।

ओढ़नी

ओढ़नी
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।
### # एक सयानी होती हुई लड़की के वे तमाम चित्र इस रचना में है!गर सच लिखु तो इस कविता की ओढ़नी वाली वे तेरह साल की लड़की बन मैने--इस कविता को जिवंत लिखने की कोशिश की है,इसपे मै कितना खरा उतरा ये तो आप सभी सुधीजन पाठको पे।

(औरत के अंग)

(औरत के अंग)

हा मै औरत हू-----------
इसलिए तो तुम्हारे उन अंग विशेष,
को मै तकने भर से जान जाती हू,
कि तुम्हारी मंशा मेरे उन अंगो के-----
बस नोचने-खसोटने और मसलने से है।
जबकि एक औरत के वही अंग विशेष,
अपने पती के प्यार पाने के वक़्त भी,
शर्म ओढ़े रहते है,
क्योंकि उसमें किसी तरह की नोच-खसोट नही,
बल्कि एक-दुसरे के परम विश्वास का देव श्पर्श है।
हा!शायद तुम्हारा पुरुषपन अंदर से सध नही पाता,
किसी एक समर्पित अंग से बध नही पाता,
वरना तकते तो तुम्हें भी अपनी पत्नी का वे अंग,
उतना ही आकर्षित करता------------
जीतना की पर स्त्री या औरत का।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Tuesday, 17 February 2026

सरकार करती है

(सरकार करती है)
जो सिनेमा में-------------
पैसे लेकर हर व्यभिचार करती है,
वही नायिका-----------
हमारे शहर में चुनाव प्रचार करती है!
शायद किरदार-किरदार का फरक है,
वरना एै"रंग"-----------
वही काम हमारे यहाँ सरकार करती है।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

जींस और टी शर्ट

(जींस और टी-शर्ट वालि औरते)
मुझे ये जींस और टी-शर्ट पहनी औरतो से,
ज्यादा खूबसूरत लगती है--------------
घर की गृहस्थ साड़ी पहनी औरते।
जिम्मेदारियो की इनके लोच और खम की रोमांटिकता,
मेरे अंदर एक सिहरन भर देती है,
उसके बालो का इधर-उधर का बिखरापन,
फिर उसकन लिये,
जूठे पड़े घर के बरतनो का माजना,
और उसपे हल्की-हल्की चुड़ियो की आवाज का संगीत,
ये संगीत क्या जाने?
क्लब मे भौंडे म्यूजिक पे थिरकती------
ये जींस और टी-शर्ट वाली औरते।
सेक्स अपील की विद्रुपता और अश्लील फिगर से,
कही ज्यादा खूबसूरत लगती है,
अपनी साड़ी खोसे,
उस गृहस्थ औरत का थकी-मादी उठ,
टाॅवल ले बाथरुम में,
शाॅवर के नीचे नहाना,
उसके नहाने की शालिनता का ये शास्त्रियपन,
को क्या जाने?
स्विमिंग-पुलो मे अर्धनग्न नहाती-------
ये जींस और टी-शर्ट वाली औरते।

@@@इस रचना का आशय किसी माडर्न या आधुनिक औरत को आहत करना कतई नही है ये महज़ एक रचना मात्र है।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Monday, 16 February 2026

एक्सीडेंट वाला फुटपाथ दिया है

(एैक्सीडेंट वाला फुटपाथ दिया है)
अखिलेश कह रहे है कि हमने-----------
सौ,एक सौ दो और एक सौ आठ दिया है,
यानि की विकास मे सबका साथ दिया है!
देख लिजिये यमुना ऐक्सप्रेस वे,
लेकिन जनता तो ये भी पुछेगी मेरे सीयम(CM),
कि आपके चचा ने पुरे प्रदेश को हर कही खुदी सड़क---------
और ऐक्सीडेंट वाला फुटपाथ दिया है।
@@@रचयिता-------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और आज के मेरे चुनावी कटाक्ष का।

Saturday, 14 February 2026

चुनावी कटाक्ष--(चांदी का आकाश देंगे)

(चाँदी का आकाश देंगे)
हर गरीब को-----------------
एक नल,एक आवास देंगे!
विधवा को पेंशन,नंगे को लिबास देंगे,
गाँव मे बुनकर के फिर अच्छे दिन आयेंगे,
ये एैसा विश्वास देंगे।
यही तो नेता कि खूबी है एै"रंग"
कि ये चुनाव तलक अपने मुँह से-----
सबको सोने की धरती और चाँदी का आकाश देंगे।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
धन्यवाद!निर्मेश के त्यागी भईया,दैनिक वर्तमान अंकुर और हमेशा की तरह मेरे चुनावी कटाक्ष का।

कारगिल रह गया

(करगिल रह गया)

सरहद से नही लौटा,
एक नई दुल्हन का वही दिल रह गया.
सीने पर थे, गोलियो के निशान,
उसकी खुली आँखो मे,
लहराता तिरंगा और करगिल रह गया.

माँ भुलती नही जार-जार रोती है,
उसे गम नही,
अपने एकलौते बेटे की शहादत का,
उसे गम है कि सरहद के उस तरफ,
तमाम साँप--
और उन साँपो का बील रह गया.

राखी के दिन बहन उसकी---
बंद कमरे मे सुनती है राष्ट्रगान,
और फक्र करती है 
अपने उस भाई पर 
ऐ "रंग"----
जिसकी वजह से 
हिंद के नक्शे में करगिल रह गया.

😢😢पुलवामा अटैक---पहले मुल्क शहिद उनकी शहादत फिर चौदह फरवरी यानि "मां तुझे सलाम"🙏🙏 

यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित हैं.

रचनाकार--- रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियापुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Wednesday, 11 February 2026

(घिनौने अतीत रहे हैं)

(घिनौने और घृणित अतीत रहे है)
मथुरा के----------------
एक प्रत्याशी महिला को पीट रहे है!
निर्लज्जता उसपे भी-----------
कि वे चुनाव अत्यधिक मतो से जीत रहे है।
वाह!रे पार्टियो के चरित्र-----------
कि तुम्हारी पार्टियो से अब टिकट भी वही पा रहे,
जिनके जितने घिनौने और घृणित अतीत रहे है।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!डेली वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे चुनावी कटाक्ष का।

Monday, 9 February 2026

पत्रकारों पर एक टिप्पणी

✍️✍️हमारे समय के कुछ पत्रकार कॉलगर्ल सरीखे हो गए हैं जो अखबारों के बदन पर अपने पत्रकारिता की वेश्यावृत्ति लिख रहे हैं 😢😢

Saturday, 7 February 2026

अपनी घमंड का चुनाव

(अपनी घमंड का चुनाव)
झूठ,छल,फरेब और पाखंड का चुनाव
सभी इसी तरह लड़ रहे है-------------
उत्तर-प्रदेश और उत्तराखंड का चुनाव!
कुछ लोग कई मर्तबा जीते है,
उन्हे लग रहा कि अब नही हारेंगे,
अपने विधानसभा से-------------
एै"रंग" अपनी घमंड का चुनाव।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान-अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और मेरे इस चुनावी कटाक्ष का।

व्यंग्य

😃😄जो लड़का आपके घर में सर्वाधिक झूठ बोले,,उसका मुंह बीच-बीच में मीठा कराते रहे,,क्योंकि वह भविष्य में विधायक या मंत्री हो सकता है😃😄

नूतन

(साड़ी के आंचल को, दांतों से काटती है )

थोड़ी डरती,थोड़ी कांपती थी,
जब हमारी प्रेमिका 
कबूतर के गले में खत बांधती थी.

वह नूतन थी 
हमारे मोहब्बत की ,
जो बोलने से पहले 
शरमाती 
अपनी अंगूलियों से 
दुपट्टे को
लपेटती, छोड़ती 
और दांतों से काटती थी .

हमने शादी की है 
अपनी उसी नूतन से 
जो शादी के 
इतने सालों के बाद भी 
नहीं बदली ,
वह अब भी 
मेरी रोमांटिक बातों पर 
अपनी दांतों से दुपट्टे तो नही
लेकिन हां !
अब वह हौले-हौले 
अपनी साड़ी के आंचल को 
लपेटती, छोड़ती 
और दांतों से काटती है.♥️♥️

"आई लव यू मेरी नूतन" चित्र गुगल से साभार 

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियाँपुर 
जौनपुर--222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

Friday, 6 February 2026

बेवकूफ मुसलमान नही

(बेवकूफ मुसलमान नही है)
सपा,बसपा किसी कि भी राह आसान नही है,
अपनी जीत पक्की बताओ लेकिन गौर करो-------
तो तुम्हारी चीख मे वे जान नही है!
बस मुसलमान-मुसलमान तुम सब रट रहे,
शायद अबकी उत्तर-प्रदेश,
तुम्हारी नज़र मे हिन्दुस्तान नही है!
एै"रंग" सारा मुलम्मा तेरे धोखे का उतर जायेगा------
क्योंकि इतना भी बेवकूफ मुसलमान नही है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान-अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और हमारे चुनावी कटाक्ष का।

Thursday, 5 February 2026

खाली पोटली का बजट है

(खाली पोटली का बजट है)
कौन कह रहा----------
कि ये महज अरुण जेटली का बजट है!
अरे सच तो ये है कि---------------
ये एक चायवाले पीयम(P.M.),
की खौलती हुई केतली का बजट है।
किसी की जीभ जल रही,
तो कोई ले रहा मजा चुस्कियो के संग,
और बेचारे राहुल जी कह रहे,
कि एै"रंग" ये महज चुनाव की खातिर-----
एक खाली पोटली का बजट है।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-------7800824758

धन्यवाद!निर्मेश के त्यागी भईया,दैनिक वर्तमान अंकुर और मेरे इस चुनावी कटाक्ष का।

मंदिर और मस्जिद की बगल से

एक दिवाने की मईयत व लाश के कुछ चंद ख्व़ाहिसात-------------
     (मंदिर या मस्जिद के बगल से न ले जाना)
दोस्तो एक गुजारिश है कि,मेरी मईयत या लाश को-------
किसी भी मंदिर या मस्जिद के बगल से न ले जाना।
मै दिवाना हूँ,काफ़िर हूँ सुन लुंगा,
पर भगवान या अल्लाह के दर दोनो मे सर झुकाया है,
मुझे हिन्दू या मुसलमां बनके नही,
एै दोस्त आखिरी ख्व़ाहिश है,
कि मेरी मईयत को खुले मे रख देना,
चील,कौवे खायेंगे गम नही,
मगर एै दोस्त मेरी इस लाश को--------
एैसी किसी भी बस्ती से न ले जाना।
दोस्तोएक गुजारिश है कि मेरी मईयत या लाश को---
किसी भी मंदिर या मस्जिद के बगल से न ले जाना।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Wednesday, 4 February 2026

टिप्पणी

✍️✍️कुछ कवित्रियां जाने अनजाने कवि सम्मेलनों की सिल्क स्मिता बन गई है,,उनके दो अर्थी काव्य पाठ और चुटकुले ऐसे हैं कि जिनसे श्रोताओं को बी ग्रेड की अश्लील फिल्मों का सारा आनंद मिल रहा😢😢

Tuesday, 3 February 2026

व्यंग्य

हंसने और जबरदस्ती खीस निपोरने में बहुत अंतर है🥸हंसने से आप लंबे समय तक स्वस्थ्य रह सकती हैं और जबरदस्ती खीस निपोरने से आपके खूबसूरत गालों की मांसपेशियों में खिंचाव आ सकता है♥️✍️

चुनावी कटाक्ष

(बाढ़ के मेढक)
टर-टरा रहे है------------
हर गाँव,हर गली,हर घर
कुछ चुनावी अषाढ़ के मेढक!
सब पिअराये हुये कुद रहे है जहां-तहां,
रहने दो खुद ही लौट जायेंगे,
एक-एक वोट से हमारे,
फिर हमे ये दिखेंगे एै"रंग" अगले चुनाव में--
ये चुनावी बाढ़ के मेढक।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और हमेशा की तरह चुभने वाले चुनावी कटाक्ष का।

Sunday, 1 February 2026

चुनावी कटाक्ष

चुनावी कटाक्ष----बुधवार
(बनारस की मणकणिका घाट तक लायेंगे)
वाह री!राजनीति---------------
कि अब दो नाजायज़ संबंध,
संगम की घाट पे नहायेंगे!
इस उम्मीद मे कि मोदी और शाह को,
बिहार की तरह पराजित कर,
एै "रंग"उनकी सियासी लाश को उन्ही की--
बनारस के मणकणिका घाट तक लायेंगे।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-------7800824758
धन्यवाद!आपका निर्मेश के त्यागी भईया,दैनिक वर्तमान-अंकुर और मेरे चुभते हुये चुनावी कटाक्ष का।

बीसों बसंत मैं सजी

(बीसों बसंत मैं सजी)

बीसों बसंत मै सजी---
पोर-पोर गदराई खुद को देख-देख,
बीसों बसंत मै सजी.

कोयल हुई बाँवरी-
बागो में कूक-कूक कर,
भँवरा हुआ पागल महुवे को चुमकर,
मेरे अधर कुँवारे,
मै कुँवारी अंग-अंग---
बीसों बसंत मै सजी.

यौवन कलश छलके बूँद-बूँद कर,
आँखे हुई बाँवरी मेरी
 पिया दरस को,
हे!बसंत सखी अब तुम----
कोई ऐसी बान मारो
कि आये बाबुल के गाँव अब,
मेरे पिया की डोली,
और मै बैठ चलूं उसमे 
अपने पिया के गाँव,

फिर मैं छुईमुई सी बैठूं
सुहाग सेज पर 
वे घूंघट मेरी उठाए,
मै शर्म से सिमट जाऊं 
और मूंद जाएं मेरे 
मद भरे नयन 
और उनके छुवन की सिहरन,
से कांपे अधर मेरे,
और मैं 
इस कंपकपी की रात को,
जतन कर सहेजे,
अपने बीसों बसंत जीलूं.
बीसों बसंत मै सजी.

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.
चित्र गुगल से साभार.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर--222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com