Sunday, 30 June 2024

(एक खूबसूरत फिल्म थी)

(एक खूबसूरत फिल्म थी)
मेरी हर एक साँस,मेरे दिल में थी,,,,,,,
वे मेरी आँखो के कैमरे मे थी।
ऐ,रंग----बाद मे जाना कि वे बेवफा---
बस एक खूबसूरत फिल्म थी।

(बड़ा साहित्यकार)

कुछ लोग साहित्य में एक दूसरे को बड़ा कहकर पीठ खुजा रहे हैं,,,खासकर व्यंग्य विधा में यह समस्या कोढ़ में खाज की तरह है,,,कुछ को तो आप पूरा पढ़ डालिए तो पता लगेगा की इसमें व्यंग्य कहा था, बस व्यंग्य की खींची लकीर को पीटना और नवधा प्रयोग से मूंह चुराना और बीच बीच में अपनी खीझ उतारना ही इनका बड़ा बनना रह गया है जबकि "व्यंग्य का प्राण तत्व उसकी रोचकता है इसलिए अब बड़े व्यंग्य को और बड़े लेखक को अपनी कुंठा से बाहर आना पड़ेगा,,,,

Saturday, 29 June 2024

(राग मल्हार सा गाता हूं)

(राग मल्हार सा गाता हूँ)
घीर आते है बादल,बरसात बहुत होती है,,
ऐ,रंग----------------
जब मै उसे,राग मल्हार सा गाता हूँ।

Friday, 28 June 2024

(ज्यादा देवता मिलते है)

(ज्यादा देवता मिलते है)
हाँ!मै तलाशता हूँ------------
अँधेरी रात में आवारा गज़ल,,,,,,,,,,,
क्योकि ऐ,रंग------------
उजाले में ज्यादा देवता मिलते है।

Thursday, 27 June 2024

मारिशस

मारिशस से किताब आया है। सात समुंदर पार वह मारिशस जहां मेरे पूर्वज गिरमिटिया मजदूर के रूप में ले जाए गये थे। जबरदस्ती अथवा मजबुरीवश। अपनो से बिछड़कर कैसे गये होंगे! 
शायद फिर मिलना न हो सकेगा। मैं उन्हें अपने अंतर्मन की आंखों से पढ़ने की कोशिश करता हूं। उनके दुख संताप को समझने की कोशिश करता हूं। 
जाते समय एक आस जरूर रही होगी अपने वतन अपने बंधु बांधवों के पास फिर से लौटने की पर निष्ठुर जालिम अंग्रेजों ने उन्हें अकेला उस विरान धरती पर छोड़कर कैसे चले गए! 
उस विरान अनजान बंजर भूमि पर हमारे पूर्वजों ने कैसे काटी होगी वह कष्टदायक जिंदगी। कितनी मुश्किलों का सामना किया होगा! 
और अंततः अपनी अथक मेहनत के बलपर उस विरान बंजर भूमि को रहने लायक स्वर्ग बना दिया जिसका नाम आज पृथ्वी के मानचित्र पर मारिशस है। नमन है मेरे पूर्वज। नमन है मारिशस। 
मैं जब जब मारिशस को पढ़ता हूं। भावुक हो जाता हूं। पता नहीं क्यों ऐसा लगता है जैसे मेरा उनके साथ गरभनाल का रिश्ता जुड़ा हुआ है। मेरे आंखों पर समुद्र भर पानी हिलोरे मारने लगता है।
आज वही मारिशस से सध् प्रकाशित 'विश्व हिन्दी साहित्य' का 2023 वां अंक आया है जिसे उलाट पुलाट कर अपने पुर्वजों के छुअन को अह्सास कर रहा हूं। मन पुलकित है इस पत्रिका में मेरी भी एक लघुकथा प्रकाशित हुई है 'अब नहीं जाऊंगी मां।' 
धन्यवाद आदरणीय डा. माधुरी रामधारी जी व डा. शुभंकर मिश्र जी । आपको कोटि-कोटि प्रणाम।

(विधवा वीणा हूं)

(बिधवा विणा हूँ)
मै पथरीली------------------
कंटक राहो की ब्यथा लिये,
जिये जा रही उस चिड़ियाँ सी,
जिसके निड़ का तिनका-तिनका,
हर आँधी ने नष्ट किया!
है क्षिण हृदय में पीड़ा मेरे,
मै जयशंकर प्रसाद की आँसू हूं।
ना बदली ना सावन आये,
मेरी यौवन के गाँव कभी,
तपती धूप में देह जले
और तड़पे अंतर घट मेरा,
मै तार-तार टूटी नारी,
जो बज न सकु जीवन तट पे----
मै एैसी बिधवा विणा हूँ।

Wednesday, 26 June 2024

(कोई दीवाना रोया है)

(कोई दिवाना रोया है)
ये जो बरसात हुई है,सारी रात शहर में,,,
ऐ,रंग--------------
कही शायद,कोई दिवाना रोया है।

(तलाक पर लेख)

(तलाक)

जब कोई तलाकशुदा औरत अपने मासूम बच्चो को भूख से रोता और सिसकता देखती है,तो उस बच्चे की तलाकशुदा माँ का दर्द--"मुझ जैसे लेखक के कलेजे को भी चाक कर देता है.
               
      और मुझे लगता है कि इस खूबसूरत से मज़हब को कुछ जेहन से बीमार शौहर और मौलवियों ने कहांं से कहां पहुंचा दिया है. इन्हीं की वजह से आज--"इस्लाम और कुरान की पाक आयत भी अपनी अमीना की खुबसूरत आंखों में आंसू देखने को मजबूर है."
सच तो ये है कि इस्लाम मजलूम औरत की आंख का आंसू बन के रह गया है,जिसका हर कतरा जैसे--"कुरान की पाक आयत के सीने पे गिर रहा है,जिसे हर मुसलमान अपना दिन व ईमान मानता है."

तलाक महज एक शब्द भर नही बल्कि एक औरत का इस्लाम की आड़ मे किया गया वे कत्ल है जिसकी सदा इस मरदे मजहब ने कभी अपनी चाहरदिवारी के बाहर नही आने दिया।
उफ!औरत को कितना लिजलिज़ा और कमजोर कर दिया है कुछ लोगो ने कि पुछिये मत----"जिस औरत को उसकी चाहत और मोहब्बत का ईद मिलना था उसे इन चंद इबलिसे मौलवियो ने जबरदस्ती इस्लाम और हदिस का नाम लेकर एक हँसती खेलती औरत की जिंदगी मे तलाक लाकर उसे ताउम्र के लिये न खत्म होने वाले आँसू और गम के मोहर्रम से जोड़ दिया"।
आज तलाक के खिलाफ उठ रही तमाम आवाज़ो से इन लोगो की वे दरो-दिवार व बुनियादे कांपने लगी है सिकन से वे चेहरे तमतमा गये है लेकिन अब शायद ये बगावत न थमेगी आज औरत के वही तमाम दर्द बारुद बन गये है मेरा दावा है कि ये उठा हुआ इंकलाब हमारे हिन्दुस्तान की मुस्लिम औरतो के हक और हुकूक की नज़ीर बनेगा,और फिर बेज़ा तलाक दे रहे हर शौहर की रुह कांप जायेगी।
अब इनके पाक कानो को नमाज़ सुनाई देगी,कुरान की आयत सुनाई देगी लेकिन तलाक और हलाला के वे शरियती फरमान न सुनाई देगे ये बागी इंकलाब ऐसी नीच जहनियत को अपने बदलाव की उस सैलाबे दरिया मे बहा ले जायेगे जिसके बाद मुकद्दस इस्लाम होगा।
औरत के अच्छे दिन आयेगे,इस्लाम के अच्छे दिन आयेंगे,न कत्ल होगा किसी वालिद और अम्मी के दिये हुये उस मेहर का जिसे वे ताजिंदगी अपने शौहर व उसके परिवार के सुपूर्द करती है-------या अल्लाह जल्द मयस्सर हो उन्हें वे कानून जो इस मुल्क मे हर औरत को मयस्सर है यानिं कानून के अच्छे दिन।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U.P.)
mo.no.-----7800824758

यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

(रोटियां)

(रोटियां किस कौम की है)

भरे पेट हिंदू-मुसलमान होना आसान है,,पर ए "रंग" किसी भूखे से पूछ 
कि उसकी रोटियां किस कौम की है✍️✍️

Monday, 24 June 2024

(प्यार का पहला खत लिखने में)

प्यार का पहला खत लिखने में वक़्त तो लगता है।
नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है। 

जिस्म की बात नहीं थीं उनके दिल तक जाना था
लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है। 

(भूख ने अपना बदन बेचा है)

(भूख ने अपना बदन बेचा है)
स्याह अँधेरी रात में सन्नाटे को चीरती,,,,,
पुल के उस तरफ की चीख,,,,,,,,,,,,,
उफ!शायद ऐ,रंग----फिर भूख ने किसी को----------------
अपना बदन बेचा है।

Sunday, 23 June 2024

(रेलनामा)

साझा संग्रह "रेलनामा" मे अपनी खुद की "रेलयात्रा" के संस्मरण के लुत्फ उठाने की एक पुरानी तस्वीर ✍️✍️✍️✍️

(अखबार भी धंधे की तरह है)

(अखबार भी धंधे की तरह है)
सच लिखने की कुबत न रही,,,,,,,,,,,,,
अब इस मूल्क में ऐ,रंग---------
अखबार भी धंधे की तरह है।

(एक बांझ औरत)

(एक बाँझ औरत)
एक बाँझ औरत---------------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।
क्या करती----------
सास,ससुर,शौहर की उम्मीदे उसपे तलाक का डर,
वे भीगी आँख------------
इस दर पे अपना घर बचाने आ गई।
एक बाँझ औरत--------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।
औरत को तो ये भी हक नही कि वे कह सके,
कि बाँझ वे नही!
एै! पीर उठ और जग इस मज़ार से,
और देख एक औरत----------
अपने शौहर का मज़हब बचाने आ गई।
एक बाँझ औरत--------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(गिरिराज विकली)

"हिमांचल-प्रदेश" के राज पंजीकरण से प्रकाशित "साप्ताहिक गिरिराज" में "कहानी" प्रकाशित होना और लेखकीय प्रति प्राप्त होना दोनो ही मेरे लिए प्रसन्नता और गर्व की बात हैं 💐💐

(मोहब्बत को विज्ञान मान ले)

(मोहब्बत को विज्ञान मान ले)

ए दुनिया 
मोहब्बत को विज्ञान मान ले,

क्योंकि चाहने वाले
ख्व़ाहिशो की लैब में,,,
ए,"रंग"--
खुद को मिटा कर के
प्रैक्टिकल देते हैं.✍️✍️

Saturday, 22 June 2024

(हम पे हंसे है बदरवा सखी)

(हमपे हँसे है बदरवा सखी)
अँखिया मे लोरन के पानी बहे-----
ढुढ़े मीले ना कजरवा सखी,,,,,,,,,,
ड़से है मनवा के पोर-पोर हमरा----
हमपे हँसे है,बदरवा सखी।
नीक ना लागे घर अँगनईया------
सौतन लगे है ओसरवा सखी।
ऐ,रंग-----
हियरा के आह लग जातई,,,,,,,,,,,,
बस पीके कोठरियाँ सलामत रहत--
बाकी जरी जातई पुरा शहरवा सखी।
ड़से है मनवा के पोर-पोर हमरा----
हमपे हँसे है बदरवा सखी।

###हमारे यहा की स्थानिय भाषा की एक रचना।

Monday, 17 June 2024

(पतझड़ की तरह रोई)

(पतझड़ की तरह रोई)
बहुत खूबसूरत थी मै लेकिन--------
रोशनी में तन्हा घर की तरह रोई।
कोई ना पढ़ सका कभी मेरा दर्द------
मै लहरो में अपने ही,समंदर की तरह रोई।
सब ठहरते गये----------------
अपनी अपनी मील के पत्थर तलक,
मै पीछे छुटते गये सफर की तरह रोई।
लोग सावन में भीग रहे थे,
ऐै "रंग"----मै अकेली अभागन थी
जो सावन में पतझड़ की तरह रोई।

@ रंगनाथ द्विवेदी
# 7800824758

(मनोज मुन्नतसीर)

(मुंतशिर और डॉक्टर राही मासूम रज़ा)

अदब एक तमीज 
एक सलीके का नाम है
मुंतशिर .
काश ! तुमने
डॉक्टर "राही मासूम रज़ा" को पढ़ा होता
तो आज 
"आदि पुरुष" का कद भी
"महाभारत" से बड़ा होता.

तुम लफंडूस हो,चोर हो
दो कौड़ी के छिछोर हो
तुमने
मर्यादा लांघी है लिखने की 
तुम भूल गए
की राम 
इस देश के मर्यादा पुरुषोत्तम है.

तुम इस देश के 
सनातनी नही 
सनातनी तो डॉक्टर "राही मासूम रजा" थे
जो कृष्ण लिखकर
हमारे दिलो के किरदार हो गए,
वे रसखान थे
तुम हिंदू होकर भी
नाली के कीड़े
और नाबदान हो गए.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758

Sunday, 16 June 2024

(सावन में भीगी हुई लड़की)

(सावन में भीगी हुई लड़की)

मैं आज भी भीग जाता हूं
तर-बतर बिना सावन के 
क्योंकि ए "रंग"
मेरी शरीके हयात बन गई है
सावन में भीगी हुई लड़की.

(अमीर खुसरो)

जब तुम्हे अपनी मां और उसकी लोरी की बहुत याद आए ✍️✍️ तब अपनी यादों के कागज पर तुम "अमीर खुसरो" लिख देना🙏🙏

Friday, 14 June 2024

(पुजारी आ गए)

(पुजारी आ गये)
कुछ पंडे कुछ पुजारी आ गये,
चुनाव लड़ने कुछ मौलाना कुछ बुखारी आ गये।
ठाकुर साहब टहलते रहे,
उन्ही के विधानसभा से तिवारी आ गये,
कुछ पंडे कुछ पुजारी आ गये।
वे नारी भरे मंच से ललकारती रही,
उससे लड़ने पुरुष नही,
लखनऊ से एक ब्रह्मचारी आ गये,
कुछ पंड़े कुछ पुजारी आ गये।
बिकास,नौकरी,बिजली वादो की झड़ी,
स्वर्ग बना देंगे!
ऐ,रंग----------इस प्रदेश मे फिर
कुछ महिनो के चमत्कारी आ गये,
कुछ पंड़े कुछ पुजारी आ गये।

###चुनावी चक्कलस।

(पगली बना दो)

(पगली बना दो)
नन्हे-नन्हे पाँव----------
छोटी-छोटी अँगूली बना दो,
ऐ,खुदा----------
मुझे फिर से बचपन की तितली बना दो।
मै तैरु गाँव के पोखर,
और तोडू फिर बाग से अंम्बिया,
मुझे माँ की डाँट-------
और बापू के दुलार की पगली बना दो।

लघुकथा पुरस्कार

कभी लघुकथा प्रतियोगिता के विजेताओं में हमने अपना नाम भी बड़ी मोहब्बत से पढ़ा था.

(गृहलक्ष्मी)

देश की बहुचर्चित व स्वनाम धन्य कहानीकार प्रियंका पाठक दी ने मुझे (पटना), बिहार से स्नेह स्वरूप महिलाओं की बहुचर्चित मासिक पत्रिका "गृहलक्ष्मी" में प्रकाशित मेरी कहानी "ठंड की स्वेटर" की प्रति भेजी जिसके लिए उन्हें मेरा सादर धन्यवाद✍️✍️🙏🙏

Wednesday, 12 June 2024

(माया खूबसूरत है)

(माया खूबसूरत है)
सदियो से सुनता आया हूं कि माया खूबसूरत है,
इसने तोड़ दी तपस्या विश्वामित्र की,
देवता भी सिहर गये,
कभी अहिल्या,कभी मेनका,कभी रंभा,कभी उर्वशी-----
हर युग मे इसकी काया खूबसूरत है,
सदियो से सुनता आया हूं कि माया खूबसूरत है।
शंतनु पागल हुये----------
नदी के इस तरफ़ और उस तरफ भटकने लगा मन,
हर युग के मत्स्यगंधा की जिसपे भी पड़ जाये------
वे साया खूबसूरत है,
सदियो से सुनता आया हूं कि माया खूबसूरत है।
इसके रमणीयपन का इलाज नही कोई,
फंसना ही फंसना है,
इसकी मुस्कान और नयन में,
ये संम्मोहन है जो सदियो से बीना टूटे------
सब पे चल आया खूबसूरत है,
सदियो से सुनता आया हूं कि माया खूबसूरत है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Tuesday, 11 June 2024

(किसान दूत)

कभी छत्तीसगढ़,रायपुर से प्रकाशित साप्ताहिक समाचारपत्र "किसान दूत" मे हमने किसान नाम की कविता के द्वारा उनकी व्यथा वर्णित की थी,पढ़ें "किसान".

Monday, 10 June 2024

(उफ! जरा नही करते)

(उफ!जरा नही करते)
मोहब्ब़त करने वाले मशवरा नही करते,,,,
ये अईसी आग है-जो लगी तो बस लगी-
ऐ,रंग--गर इसमें मौत भी आये------
तो उफ!जरा नही करते।

(पूजा का वक्त था या अजान का)

(पूजा का वक्त था या अजान का)
मंदिर और मस्जिद के बीच,
सड़क के किनारे झाड़ियो मे-------
हमने एक औरत की नग्न लाश देखी।
और उसके दोनो स्तनो पे
खुरचने के निशान देखे!
और वे दोनो स्तन----------
मंदिर और मस्जिद की तरफ लटके हुये थे,
कितने असहाय थे बताने में,
उस नग्न औरत के दोनो स्तन ऐ,रंग-----
कि वे पूजा का वक्त था या अजान का।

###मेरी इस रचना को वलगेरेटी के लिहाज से न पढ़े,इस तरह की एक लाश शायद डेढ़ वर्ष पहले देखी थी ये उसी से प्रेरित है,फिर भी गर कही से भूलवश कोई आहत होता हो तो हम उससे माफी मागते है-----धन्यवाद।

Sunday, 9 June 2024

(बेवफा की तरह आती है)

(बेवफ़ा की तरह आती है)
तोड़ देती है दिल और चली जाती है,,,,,,,,,,
ऐ,रंग--हमारे शहर में बिजली------
बेवफ़ा की तरह आती है।

(लव जिहाद नही)

(लव जिहाद नहीं )

जिस 
लड़के और लड़की को
अपने वालिदो की मोहब्बत याद नही,
वे हवस है
लव जिहाद नही.

ये महज दो जिस्मों की,
इजाजत-ए-हम बिस्तरी है 
इसी से इस रिश्ते की,
कोई उम्र या कोई मयाद नही,
ये हवस है
लव जिहाद नही .

ये कत्ल
ये लाश के टुकड़े
इबलिश-ए-ख्वाहिश के अंजाम है 
इसमें,
किसी रिश्ते की मुहर नही
ये एक आह! है
मैय्यत है,मातम है
बेरहमी है
यहा, कोई फरियाद नही
ये हवस है
लव जिहाद नही.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758

Saturday, 8 June 2024

(आखिरी रात लिखी उसने)

(आखिरी रात लिखी,उसनें)

जला के चराग़---
आखिरी रात लिखी, उसनें.

हर्फ-दर-हर्फ,तड़पी कागज़ पे,
जब---
आखिरी बात लिखी, उसनें.

उफ!! जोर से लड़खड़ाई,
कलम छूट गई,

ऐ "रंग"-अपने ही,
खुदकुशी की---
आखिरी रात लिखी, उसनें.

@@ रंगनाथ द्विवेदी
## 7800824758

(जोक)

✍️✍️ एक मोहतरमा दिनभर अपनी फेसबुक पर मोहब्बत की इतनी कविताएं लिखती है💘♥️कि मैं सोचता हूं कि हे!भगवान अगर फेसबुक ना होता तो बेचारे उनके पति के दिल की क्या हालत होती😀😀

Friday, 7 June 2024

(पेन किलर है)

(पेन किलर है)
हाँ!मेरी तबियत पहले से कही बेहतर है,,,,
क्योकि ऐ,रंग-----मेरे रुबरु-------
मेरे दिल की पेन किलर है।

(गुरुत्वाकर्षण है)

(गुरुत्वाकर्षण है)

उसकी खुबसुरती को
एक टक देखना,
मेरी बद्चलनी नही,
बल्कि ये
उसके तराशे हुये बदन का,
एै,रंग---
गुरुत्वाकर्षण है!

(दिल की बात)

✍️✍️🌹🌹 तुम आज भी मेरी यादों में प्रतिध्वनित होती हो,,मैं तुम्हें आज भी अपनी कविता की प्रेयसी और प्रेमिका लिखता हूं,,क्योंकि मेरे प्रेम के चलन में बेवफा लिखने की कोई रस्म ही नहीं है 😢😢

Thursday, 6 June 2024

(हम शकु से नही सोए)

(हम शुकू से नही सोये)
तड़पे सारी रात,हम चाँदनी मे रोये,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----जबसे टुटा दिल------
हम शुकू से नही सोये।

(सखी हे रे बदरवा)

बारिश ने अचानक से रोमांटिक कर दिया----------
                     (सखी हे रे बदरवा)
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा,
करे छेड़खानी मोहे छेड़े बदरवा।
सिहर-सिहर जाऊँ शरमाऊँ इत-उत,
मोहे पिया की तरह सखी घेरे बदरवा----
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।
चुंबन पे चुंबन की है झड़ी,
बूँद-बूँद चुंबन सखी ले रे बदरवा-----
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।
अँखियो को खोलु,अँखियो को मुदू,
जैसे मेरी अँखियो मे कुछ सखी ढुढ़े बदरवा----
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।
मेरी यौवन का आँचल छत पर गिरा,
मेरी रुप का पढ़े मेघदुतम सखी हे रे बदरवा-----
तन-मन भिगोये सखी हे रे बदरवा।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758

(जोक)

विदेशों में जितना लोग पढ़ लिखकर ज्ञानी होते हैं,उतने बड़े ज्ञानी तो आपको हमारे देश के किसी भी देशी के ठीए पर मिल जाएंगे,,इसलिए अपने ज्ञान का घमंड ना करे बल्कि अंतिम ज्ञान के लिए देशी पिए😀

Wednesday, 5 June 2024

(भूख जिंदा है)

(भूख जिंदा है)
पेट तो भर गया लेकिन भूख जिंदा है,
ऐ तरक्की---------------------
तेरी आड़ में हर झूठ जिंदा है।
हरिया की लाश आज भी है लहूलुहान,
कातिलो के हाथ में बंदूक जिंदा है।
लुट रही है आबरु हर एक स्याह रात,
पुरे बदन पे अबला के ये जूठ जिंदा है।
ख़ुदकुशी कर ली कल किसान ने,
ऐ,रंग-----आज अखबार में
उसकी कर्ज माफी और छुट जिंदा है।
पेट तो भर गया लेकिन भूख जिंदा है।

###इस रचना को पुरा पढ़े ये अनुरोध है।

(जवान बेटी काट रहे है)

विश्व पर्यावरण दिवस पे कुछ लाइन-----

      (जवान बेटी काट रहे है)

अपने ही हाथ से हम वृक्ष नही, 
बल्कि कुल्हाड़ी से--
एक जवान बेटी काट रहे है!

जिसे हमने इतने वर्षो--
अपना प्यार,
वात्सल्य और दुलार दिया,
आज उसी
बिटिया की अपने हम 
एक-एक अँगुली काट रहे है!

रो रही है,सिसक रही है,
देख के 
जैसे कह रही हो,कि
तुम इतना पथरा गये बापु,
आखिर क्यू?
आप यू मुझको दुत्कार रहे है, 
एक जवान बेटी काट रहे है!

रहने दो,
हँसने और जिने दो,
अपनी इस बिटिया की
डाल और शाख को,
पत्ती-पत्ती रो रही,
देखो,सुनो बापु गौर से
जैसे कह रही हो कि,
क्यू आखिर?
अपनी इस बिटिया को--
अपने ही दरवाजे से
उजाड़ रहे है!

कुल्हाड़ी से-
एक जवान बेटी काट रहे है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758

(वृक्ष को बेटियों की तरह पाले)

(वृक्ष को बेटियों की तरह पाले)

प्यार,दुलार और स्नेह की खाद चलो डाले,,
ऐ,रंग-आओ हम वृक्ष को 
बेटियो की तरह पाले.

(शकुनी)

(शकुनी मामा उर्फ गुफी पेंटल)

महाभारत
के किरदार का शकुनी 
बेशक वक्त और समय के पासे से हार गया.
लेकिन 
उसके भांजे कहने की वे स्टाइल 
वह अदा
जेहन में जिंदा है.

वे सच मे
एक पूरी दौर का मामा था 
जिसने महाभारत में
अपने भांजो के हक में 
द्रोपदी को जुए में जितने 
के सारे पासे,फेके.

वह सिसकती फ़रियाद करती द्रोपदी
वे चीर खींचते दुशासन
वे मामा के होठों की तिर्यक मुस्कान
ओर भांजे कहने के 
दृश्य सामने आ गए .

लेकिन समय के साथ 
उसके भांजों के लिए फेके पासे 
मनहूस हो गए 
वे नाटक था
किरदार था,झूठ था उसका 
लेकिन गुफी पेंटल,
केवल गुफी पेंटल नही
वे हम भांजों की जूए फड़ का
उस्ताद था.

लेकिन उसकी जिंदगी के पासे  
को इस मर्तबा
ईश्वर के दूतो ने
उसकी फड़ के बाहर फेक दिया,
तुम्हे आखिरी विदाई
हम सभी के महबूब गुफी पेंटल.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर,222002 (U P)
mo.no.7800824758

Tuesday, 4 June 2024

(बेगम अख्तर ना हुई)

(बेगम अख्तर ना हुई)

ऐसा नहीं कि गजल फिर 
दुनिया को मयस्सर ना हुई,
पर कोई भी गाने वाली खातून 
ऐ,रंग----
बेगम अख्तर ना हुई.

Monday, 3 June 2024

(हां मैं भी बुनकर हूं)

(हाँ!मै भी बुनकर हूँ)
हाँ!मै भी बुनकर हूँ------------
तुम तिनका-तिनका कालीन बुनते हो,,,,,,
और मै शब्द-शब्द गीत बुनता हूँ।
हाँ!मै भी बुनकर हूँ।

(मैं कुछ नहीं लिखता)

(मै कुछ नही लिखता)
वे तो उसकी यादो के कुछ गुलाब है,जो लिखते है------
मै कुछ नही लिखता।
वे तो सामने जल रहे उसकी यादो के चराग है,जो लिखते है----
मै कुछ नही लिखता।
वे सामने की दराज़ मे रंखे कालेज के जमाने के,
कुछ किताब है,जो लिखते है----------
मै कुछ नही लिखता।
वे सामने रंखे छिप-छिपा के आने वाले उसके कुछ नकाब है,
जो लिखते है-----------
मै कुछ नही लिखता।
वे खिड़की के रास्ते कमरे मे छन के आती रौशनी,
और उस रौशनी मे उसकी रुप का चाँद है,जो लिखते है-----
मै कुछ नही लिखता।
मेरे इर्द-गिर्द चारो तरफ़ उसकी रुह अफ़जा़ खुशबू है,
जो लिखते है--------------
एै"रंग" मै कुछ नही लिखता।
 

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758

लेखन का एक अलग टेस्ट जो मेरा एक प्रयोग मात्र है।

(समीम रहती थी)

शमीम रहती थी

कभी सामने नीम के———
एक घर था,
जिसमें मेंरी शमीम रहती थी।
वे महज़———
एक खूबसुरत लड़की नही,
मेंरी चाहत थी।
बढ़ते-बढ़ते ये मुहल्ला हो गया,
फिर काॅलोनी बन गई,
हाय!री कंक्रिट——–
तेरी खातिर नीम कटा,
वे घर ढ़हा——–
जिसमें मेरी शमीम रहती थी।
अब तो बीमार सा बस,
डब-डबाई आँखो से तकने की खातिर,
यहाँ आता हूँ!
शुकून मिल जाता है इतने से भी,
ऐ,रंग———–
कि यहाँ कभी,
मेरे दिल की हकिम रहती थी!
कभी सामने नीम के——–
एक घर था,
जिसमें मेरी शमीम रहती थी।

(बिना शौहर की हो गई)

( बीना शौहर की हो गई)

मै जबसे----
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
मेंरे सूख गये अरमान
मैं पत्थर की हो गई.

क्या-क्या नही छोड़ा
खातिर उसके,
वालिद का दिल तोड़ा!
और अम्मी का यकीन

मैं कहां बसने आई थी---
भागकर घर से, 
देख लो आज मैं 
बिना घर की हो गई.

मै जबसे---
उस बेवफा सितमगर की हो गई.

सुर्ख जोड़े,हिना,आईना सिसके
अज़ीब निकाह किया मैंने 
कुबूल कर भी ऐ,"रंग"--
मै बीना "शौहर की हो गई".

(जोक)

✍️✍️वैसे आप अपनी पत्नि के बेलन को रूस का आण्विक हथियार ना समझे,,बस आप उसके गुस्से को युक्रेन के जेलेस्की की तरह भड़काने की कोशिश ना करे 😀😀

(उड़ीसा के आंसुओं वाली ट्रेन)

(उड़ीसा के आंसुओं वाली ट्रेन)

ऐ उड़ीसा--
तेरी यह आंसुओं वाली ट्रेन 
हमे याद रहेगी,
ना भूलूंगा क्योंकि
इस हादसे की मरसिया 
नीरज की तरह 
अब हमारे पास रहेगी.

मैं जानता हूं कि
तेरी फाइलों में गुम हो जाएगा यह दर्द 
तू सरकारी महकमा है,
पर जीना है उन घरों को यह हादसा
उनके दिलों में आंसू रहेगा और
ता-उम्र चेहल्लुम की यह रात रहेगी.

ऐ उड़ीसा-
तेरी पटरियों से होकर फिर गुजरेगी ट्रेन
फिर उतरेंगे चढ़ेंगे मुसाफिर
तेरी कानों में
हर रोज एक नई आवाज रहेगी.

ऐ उड़ीसा--
तेरी यह आंसुओं वाली ट्रेन
हमें याद रहेगी.

✍️✍️वैसे इस भाव श्रद्धांजलि में एक जगह मैंने मरसिया शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ "शोक गीत" से है.
😢😢😢😢😢😢

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758

Sunday, 2 June 2024

(गीत गुम है)

(गीत गुम है)
भीड़ है लाखो की लेकिन प्रीत गुम है----
हम नही रह पायेगे ऐसे शहर मे,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग---------------
जहाँ होठ तो लाखो है,लेकिन गीत गुम है।

(पोयम ने छीन लिया)

(पोयम ने छिन लिया)
हिन्दी की कविता की संवेदना को-------
अंग्रेज़ी के पोयम ने छिन लिया।
दूध-कटोरी,माँ की लोरी,आँचल और गाँव को--
इस कंकरीट की सीटी ने छिन लिया।
पति और पत्नी के रिश्ते गुम हो गये,
क्योंकि सारा प्यार नंगे बदन लौटती----
उसकी नाइट ड्यूटी ने छिन लिया।
बच्चो का खेलना-कुदना,धमाचौकड़ी को,
नौ साल की उम्र से ही कान्वेंट,ट्यूशन और-----
मोटी-मोटी फिजिक्स,कमेस्ट्री ने छिन लिया।
गाँव मे बुढ़े और गरीब माँ-बाप ने कर्ज ले पढ़ाया था,
उनकी उस पीड़ा को वाइफ के माम-डैड और------
उसकी छोटी सिस्टर स्विटी ने छिन लिया।
हिन्दी की कविता की संवेदना को-------
अंग्रेज़ी के पोयम ने छिन लिया।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.----7800824758

(मुमताज सोई है)

(मुमताज़ सोई है)

ढक दो आज उसे--
एै मेरी गज़लो के हर्फ,
वे कोई और नही मेरी महबूब है--
जो बेलिबास सोई है.

रख दो कुछ मिट्टी उसके सिरहाने,
एै मेरी गज़लो के हर्फ,
वे कोई और नही 
मुझ गरीब और मुफलिस की---
मुमताज़ सोई है।

(मुसलमान है साहब)

(मुसलमान है, साहब)

ना ही पूजा 
ना ही किसी मस्जिद की ,
अजान है, साहब.!

ये लड़की ,
इस दौर-ए-ग़ालिब की,
दीवान है , साहब!

बड़़े सलीके और 
तमीज़ से ,
लिखा है कई रात ,

ये एक रात हिन्दू
तो एक रात मेरी ,
गज़लों की ----
मुसलमान है , साहब!

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758

(चीखती निर्भया है)

(चिखती निर्भया है)

इसकी आँखो मे ना कोई पानी,
और ना कोई हया है,
ए "रंग "---
"दिल्ली" वे बे-हया है.

जहाँ मिटती है श़कूर बस्ती,
और सड़को पे
चिखती निर्भया है.