Thursday, 31 August 2023

(जिरह बाकी है)

(जिरह बाकी है)
ऐ मेरी मोहब्बते जज---------
इतनी जल्दि कोई फैसला न दो,,,,,,,,,,
अभी दिल की अदालत मे-------
मेरी बेगुनाही का जिरह बाकी है।

(यही धारावी)

(यही धारावी)
मै रोज थकी मांदी,
काम से लौटती हूं जीने------
यही धारावी।
वे चारपाई पे लेटा है,धुत्त कच्ची पिये
गंदी गालियाँ दे रहा,
अभी जबरदस्ती खीचेगा,
मै अपनी ऊबकाईयां रोके,
बर्दाश्त करुंगी एक बलात्कार,
फिर उठुंगी वे सो जायेगा,
थका मांदा!
मै उल्टीयां कर,
पुरे बदन से अपने एै,रंग-------
छुड़ाऊँगी सारी रात मै यही धारवी।

(अमृता प्रीतम)

(अमृता-प्रीतम)

मेरे इमरोज़--
मै तुम्हारे लिये छोड़े जा रही,
एक तकिया तेरे नाम.

काश ये गिलाफ-
मै तुमपे चढ़ा पाती,
और बिछा पाती
अपनी युवावस्था में--
एक बिस्तर तेरे नाम.

तुम मिले भी तो यु मुझसे,
कि जब जीवन की शाम--
के चंद धुंधलके ही मेरे पास बचे थे!
माफ!करना क्या करु?
बहुत जलाना चाहती हूँ---
तेरे अंदर रौशनी के लिये,
पर बुझ जाऊँगी--
मै बनके दिया एक शाम.

मेरे इमरोज़---
तुम मेरे और पास आओ,
टटोलो मुझको
मैने बहुत कुछ लिखा है,
लेकिन---
इस अमृता प्रीतम का अधुरापन पढ़ो,
पढ़ पाये नही न!
जानती थी नही पढ़ पाओगे,
लो मेरी आखिरी साँस,
और आखिरी हिचकी,
खुद लिखे जा रही
एक आखिरी किताब---
"अमृता प्रीतम और उसका
अधुरा इमरोज़'.

रचयिता--रंगनाथ द्वीवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no-----7800824758

Tuesday, 29 August 2023

(स्मारके मोहब्बत है)

(स्मारके मोहब्बत है)
तुम जीसे कब्र कहते हो ऐ शहर वालो----
वे इस रंग----की स्मारके मोहब्बत है।

(हमारे इश्क की)

हमारे इश्क़ के--------------
मस्जिद की अजा़न है वो,
मै शेख हुँ उसकी धड़कनो का,
मेरी साँसो की पठान है वो।
हम जीते है मुकद्दस सरियत,
मै उसका पाकिज़ा फतवा हुँ,
चुमता हुं उसे--------------
मेरी इन आँखो की कुरआन है वो।
इल्में चराग रौशन है उसमें भी,मुझमे भी 
मै उसका आसमानी गुफ्तगू हूँ,
सुनता हु उसे!
एै,रंग------वे महज एक लड़की नही,
मेरी मुकम्मल जुबान है वो।
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo. no----7800824758

(इतना दर्द ना हो)

(इतना दर्द न हो)
मै गा तो रहा हूँ-----------
लेकिन एै खुदा मेरी तरह,
फिर किसी के गज़ल में-----
इतना दर्द न हो।
ना कोई टूट के बिखरे मेरी तरह,
फिर किसी को अपनी शाखे मुहब्बत से,
यू जुदा होने का एै खुदा----------
इतना न दर्द हो।
चुभे कमरे की खुली खिड़की से,
याद की हवा,
एै खुदा फिर किसी खुली खिड़की का मौसम------
इतना सर्द न हो।
चेहरे की सिलवटे चुभन न छिप सके,
एै खुदा किसी चेहरे पे-------
इतना गर्द न हो।
मेरी तरह न बुझ जाये सहर से पहले,
एै खुदा किसी और चराग को सब का----
इतना दर्द न हो।
मै गा तो रहा हूँ---------
लेकिन एै खुदा मेरी तरह,
फिर किसी के गज़ल में----
इतना दर्द न हो।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

इस रचना मे दो एैसे शब्द है जिनका अर्थ निम्नवत है-----
(1)----सहर----सुबह।
(2) सब----रात।

(ओढनी)

(ओढ़नी)
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।

####एक सयानी होती हुई लड़की के वे तमाम चित्र इस रचना में है!गर सच लिखु तो इस कविता की ओढ़नी वाली वे तेरह साल की लड़की बन मैने--इस कविता को जिवंत लिखने की कोशिश की है,इसपे मै कितना खरा उतरा ये तो आप सभी सुधीजन पाठको पे है।

Monday, 28 August 2023

(दो घड़ी की रात)

(दो घड़ी की रात)
जिंदगी है बस दो घड़ी की रात,
आओ गुज़ार ले लिहाफ में हम,
एक दुजे के संग---
दो घड़ी की रात।
आयेगी धूप कमरे में कल किसी और के लिये,
खुली खिड़की से फिर बाल सँवारेगी कोई दुल्हन,
फिर अँधेरा होगा!
वे भी गुजारेगी इसी तरह अपनी जिंदगी की-------------
ये दो घड़ी की रात।
भुल जायेंगे सभी एक दिन रफ्ता-रफ्ता,
जैसे हम भुले है औरो के जिंदगी की---
दो घड़ी की रात।
एै,रंग-----यहाँ से हमी फना होगे,
बाकी यही रह जायेगी औरो के लिये---
ये दो घड़ी की रात।
हिंदी, साहित्य की उत्कृष्ट और चर्चित मासिक पत्रिकाओं में से एक "पाखी " अगस्त 2021 अंक की लेखकिय प्रति मुझे डाक से आज के ही दिन प्राप्त हुई थी जिसमें मेरी एक लघुकथा "मजदूर की दिहाड़ी" प्रकाशित हुई थी इसके लिए एक बार पुनः समस्त संपादकीय टीम का बहुत--बहुत आभार ✍️✍️✍️✍️

Sunday, 27 August 2023

(दाना मांझी)

(दाना माझी)
दस किलोमीटर----------
अपने कांधे पे पत्नी की लाश लादे,
खुरदरे नंगे पाँव चला दाना माझी।
इस देश में झुठी संवेदना का फर्जिपन,
नंगा हो गया!
सच तेरी ये असीम पिड़ा मेरी कविता को,
बहुत खला दाना माझी।
कुछ दिन अखबारो में,टी बी में
तुमपे बहस और चर्चा होगी,
तुम्हे अपनी पत्नी की लाश लादे हुये दिखाया जायेगा-------------
कई-कई बार दाना माझी।
फिर विस्मृत कर दिया जायेगा हमेशा के लिये--------------
तेरा ये ना भरने वाला घाव दाना माझी।
क्योंकि यही विभत्स सच जीना,
अपनी बिटिया की अँगुलि पकड़े------
तेरी किस्मत है दाना माझी।
###एक भयावह सच जो कही-कही आज भी जिंदा है दाना माझी के रुप में,इस घटना ने हमारी संवेदना के नकली मुखौटे को नोच लिया है।
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।

(इस्लाम और मां)

(इस्लाम और माँ)
ऐ इस्लाम़ के चंद काफ़िरो!
तुम्हारी बेज़ा फतवो से---
इसकी ईज्जत कम नही होती।
क्यूँकि ऐ,रंग--------
मूल्क़ वे मुकद्दस माँ है,
जो कभी मज़हब नही होती।

@@कुछ तथाकथित बेज़ा फतवे के खिलाफ ऐक सच।

(बच्चा पेट भरता है)

(बच्चा पेट भरता है)

तुम जिस अखबार को इंकलाब कहते हो,,,
उसी अखबार पर चंद रोटियाँ रख-----
ऐ,रंग-------------
स्लम ऐरिये का बच्चा पेट भरता है. 

### रंगनाथ द्विवेदी
 जिला जौनपुर उत्तर प्रदेश.

Saturday, 26 August 2023

(देह व्यापार करती है)

(देह ब्यापार करती है)
मजबुरी उसकी-----------
उसको तार-तार करती है।
कोई उसे औरत नही कहता,,,,,,,,,,,,,
क्यूकि ऐ,रंग----वे शहर मे-----
देह ब्यापार करती है।

(गीत)

(गीत)
गीत----------
केवल उर्वशी या शकुंतला नही!
ऐ,रंग----ये उस गरीब की पतीली भी है,
जिसमें कई रोज से-चावल पके नही।

(घर की पैंजनी रोती है)

(घर की पैंजनी रोती है)

बद्चलन-----
रातो की आगोश मे सो तो लिया!
पर कभी सोचना ऐ,रंग-------
कि तुम्हारे इंतज़ार मे सारी रात,
घर की पैंजनी रोती है. 

@@@ रंगनाथ द्विवेदी, 
 जिला जौनपुर, उत्तर प्रदेश

Friday, 25 August 2023

(प्यार का हक)

(मेरे प्यार का हक है)
चाँदनी रात मे भी हमे तेरी--रुह के दिदार का हक है।
ऐ मूमताज़ गर खुदा के घर भी-------
मै कैद हो जाऊँ,,,,,,,,,,,,,,,,,
तो पत्थर-ऐ-संगेमरमर को सदियो तलक तकना---------
ये मेरे प्यार का हक है।

(बाबा बढ़ रहें)

(राम-रहीम से बलात्कारी बाबा बढ़ रहे)
बाबाओ को गदराई दैहिकता ललचा रही-----------
औरत इन्हें भी हमारी तरह भा रही।
सारे प्रवचन भुल रहे,
बिस्तर पर हर रात एक यौवन का सेवन,
तन्दुरुस्ती एैसी कि एक जवान से ज्यादा-------
औरत की जिस्म पे बाबा जी झूल रहे।
कामोत्तेजना के तमाम आसन कोई इनसे पुछे,
दाँतो तले पहरे पे खड़े सेवक अपनी अँगूली दबा रहे,
साठ के बाबा जी के क्या कहने कि बीना शिलाजीत खाये,
इनके कमरे की हर ईट से जैसे कामसूत्र चीखे।
सभी बाबा एक-एक कर फँस रहे,
जेल मे आशाराम बापू आह भर रहे,
सीडी किंग नित्यानंद,
जेल मे चोरी-चोरी अश्लील किताब मंगा,
अपना अंग विशेष पकड़े-----------
बड़ी समाधिस्त अवस्था मे मस्तराम को पढ़ रहे,
फिर भी इन चरित्रहीनो के भक्त है,
कि मानते नही,
पुलिस,पैरामिलट्री,कर्फ्यू तक लगाना पड़ रहा,
लेकिन वाह रे इन गलिजो के भक्त,
इतनी निकृष्ट गुरुता का अंधापन,
कि पंजाब और हरियाणा के बलात्कारी को बचाने के लिये,
अपने ही राज्य के बेटे लड़ रहे,
शायद इसी से एै "रंग",
अब हमारे देश मे राम-रहीम से----------
बलात्कारी बाबा बढ़ रहे।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

तुम धन्य हो इस देश के तथाकथित बलात्कारी बाबाओ जो इतना इस देश की आस्था का श्री वर्द्धनकर आप चार चाँद लगा रहे।

Thursday, 24 August 2023

(उन्नीसवीं खुदकुशी है)

(उन्नीसवी खूदकुशी है)
कोई रोको उसे-------------
वे इस कदर दिल तोड़ने मे जुटी है,,,,,,,,
कि ऐ,रंग-------------
ये हमारे शहर की उन्नीसवी खूदकुशी है।

(करवा चौथ और तीज हू मै)

(करवा चौथ,तीज हूँ मै)
तेरी खुशियो के लिये---------
कभी बांदी,तो कभी कनीज़ हूँ मै।
खड़ी हूँ तेरे घर लौट आने तलक------
तेरी चौखट तो कभी दहलिज़ हूँ मै।
मालिक भी हूँ,तेरे दिल की ऐ पी मेरे,,,,,,,,,,
तेरी खातिर---------
कभी करवा चौथ तो कभी तीज हूँ मै।

आप सभी महिलाओ को तीज व्रत की ढ़ेर सारी बधाई।

(तलाक था)

(तलाक़ था)

औरत अगर बगावत न करती,
तो क्या करती,
जिसने अपना सबकुछ दे दिया, तुम्हें,
उसके हिस्से,
केवल सादे कागज़ पे लिखा,
तीन मर्तबा तलाक़ था.

इस्लाम और सरिया की ,
इज्ज़त कब इसने नहीं की,
फिर क्यों ?आखिर ----
केवल मर्दों के चाहे तलाक़ था.

मैं हलाला से गुजरू और 
सोऊँ किसी गैर के पहलू,
फिर मुझे वो छोड़े--
उफ ! मेरे हिस्से में ,
ऐ खुदा ! 
कितना घिनौना तल़ाक था.

महज मेहर के रकम से कैसे?
गुजारती जिन्दगी,
दो बच्चे मेरे हिस्से देना,
आखिर,मेरे शौहर का ,
ये कैसा इंसाफ़ था.

मैं पुछती हूँ, बताओ--
मस्जिदों और खुदा के आलिम़-हाज़िल,
कि आख़िर-
मुझ बेगुनाह को छोड़ देना ,
कुरान की किस ---
आयत का तलाक़ था.

रचनाकार -- रंगनाथ द्विवेदी
जजकालोनी ,मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002(U.P.)
mo.no.7800824758

Wednesday, 23 August 2023

(बेवफा के पास रहा है)

(बेवफ़ा के पास रहा है)
इस शहर में एक संगतराश--------
सालो से एक बुत तराश रहा है।
सुना है कि वे जान डालेगा अपने साँसो की,
वे अपने ही फन में-----------
कोई खामि तलाश रहा है।
कई दिन,कई राते बीत गई जगी आँखो--
और बढ़े बालो से बेखबर अपनी ही----
मोहब्बत में जाग रहा है।
एक सुबह की भीड़ से जाना कि उस संगतराश ने-------
मुकम्मल कर अपने शाहकार को,
छोड़ दी दुनिया!
एै,रंग-----वे बुते लड़की तो नही आई,
लेकिन ये मर के भी------------
उसी बेवफ़ा के पास रहा है।

Tuesday, 22 August 2023

(रईस की इमारत में दफ़न हूं)

(रईस की ईमारत में दफ़न हूँ )

मै शहर के——————-
सबसे रईस की इमारत में दफ्ऩ हूँ।
मेरा शौहर कितना चाहता है मुझको,
कि महीनो से बेवा किये है बिस्तर,
मै उसी बिस्तर में दफ्ऩ हूँ।
मै शहर के—————
सबसे रईस की इमारत मे दफ्ऩ हूँ।
कालीन बिछे फर्श और इराने आईना,
वे अरब का चराग!
सब कुछ तो है लेकिन मै टूट गई झुमर सी,
बिखर के खत्म हूँ।
मै शहर के————
सबसे रईस की इमारत मे दफ्ऩ हूँ।
वे शीशमे दराज़ मै खोलती नही,
इतनी खामोश हो गई हु——–
की खुदी से बोलती नही!
वे देखो खिड़की के उस तरफ जैसे—–
अब भी खड़ा है मेरी चाहत का बेगुनाह,
मै बेवफ़ा थी उसकी,
ये आह है उसी की एै,रंग—–मै जो
शहर के सबसे रईस की इमारत में खत्म हूँ।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

(रविवार लिखा)

मई मे प्रकाशित ये रचना रचना कल हरिप्रसाद भाई ने भेजी,उसके लिये उनका,धन्यवाद.

(रविवार लिखा)

तुमने ही तो---------
मेरी दिल की डायरी में रविवार लिखा.
तुमने ही इसे फाड़ा,इसे ठुकराया
और--------
किसी गैर की डायरी में रविवार लिखा.
मेरे ख्वाब की आँख में रेत भर आई,
मै किसी------
मछली सा तडपता हूं,
ये छुट्टी नही,
मेरी दर्द का दिन है,
फाड़ देता हूं इस दिन मै,
अपने घर का कैलेंडर भी----
जहां पढ़ता हूं रविवार लिखा.
अब तो इतनी सी दुआ है रब,
कि मेरी तरह ना तड़पे कोई,
और किसी की जिंदगी में न आये,
फिर इस तरह------
डायरी में रविवार लिखा.

@@@रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U.P.)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
आज ही के दिन झारखंड देवघर से प्रकाशित मासिक पत्रिका "शहर परिक्रमा" की तीन लेखकीय प्रतियां एक साथ डाक से प्राप्त हुई थी ✍️✍️✍️✍️

(ब्वाय फ्रेंड हो गए)

(लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये)
स्कूल के बस्ते----------------
बढ़ते-बढ़ते बैग हो गये!
खत लिखने वाले देश की संवेदना मर गई,
दिल में रहने वाले लोग------------
सब मोबाइल में टैग हो गये।
माँ यशोदा का आँचल बदला,
वे जिंस और टाप पहन के माम हो गई,
और जितने भी पिता थे वे रफ्ता-रफ्ता डैड हो गये।
दूध-घी खाने-पीने वाले देश ने गिलास रख दिया,
अब उन्ही गिलासो में---------------
बार बालाओ के ढ़ाले पैग हो गये।
अर्द्धनग्न सड़को पे--------------
यौवन उछालती कुछ माडर्न लड़कियाे
के अश्लील और भौड़े कपड़े,
शर्म आती है लिखते,
कि जिस देश में भाई होते थे,
एै,रंग-------आज उसी देश में लड़के,
होटलो के बंद कमरो में--------------
इन लड़कियो के ब्वायफ्रेंन्ड हो गये।

###इस रचना को तर्क-वितर्क से दुर रख बस पढ़े क्योंकि ये जरुरी नही कि इससे सहमत ही हुआ जाय।

Monday, 21 August 2023

(कत्ल होता है)

(कत्ल होता है)
मै अपने अंदर---------
ढ़ेरो सच का गला घोट देता हूँ।
क्योकि इससे ऐ,रंग-------------
मेरे मासूम बच्चो की रोटी का-----,
कत्ल होता है।

(एक शहंशाह का पत्थर)

(एक शहंशाह का पत्थर)
तोड़ देती है हमें मुफ़लिसी----
वरना हम भी लाते कही से,
अपनी मूमताज़ का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से---
एक शहंशाह का पत्थर।
संगतराशी देखने ज़मी पे-------
आते खुदा के फरिश्ते,
जब मै लगवाता इश्के़ इमारत में------
अपनी मुहब्बत के अल्लाह का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से---
एक शहंशाह का पत्थर।
शोहरत,नुमाइश,चाँदनी रात यहाँ भी होती,
और शायर भी लिखता अपने तराशे हुये हर्फों से----------
इस कब्रगाह का पत्थर।
तोड़ देती है हमें मूफलिसी-------
वरना हम भी लाते कही से,
अपनी मूमताज़ का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से,
एक शहंशाह का पत्थर।

(होमवर्क करवाते हैं)

(होमवर्क करवाते है)
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है-------
जब थक जाती हूं तो मुझको गोदी ले,
मेरे बाल सहलाते है,
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है।
कैसे वे भी पढ़ते थे जब मेरी तरह वे बच्चे थे,
डाट पड़ी थी उनको भी अपने मैथ के टीचर से,
मजे और चटखारे ले वे सारी बात बताते है-----
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है।
मेरी खातिर रखते है वे चाॅकलेट के डब्बे,
डेली मुझको दो देते है,
दो खुद मेरे साथ मे खाते है-----------
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है।
फिर शाम को साथ मुझे ले करते है खरीदारी,
मेरे नन्हे पाँव थके तो कहते है,
बिटिया तुम ये सहना सीखो,
फिर रस्ते मे पंचतंत्र की एक कहानी सुना,
मुझे समझाते है---------------
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है।
घर आते ही ट्यूशन वाले सर की बाईक देखी,
हाथ मुँह धूल बैठ गई फिर पढ़ने,
जैसे ही छुटी ट्यूशन से फिर भागी दादा जी के कमरे मे,
दादा मेरे उठा रिमोट फिर टीबी पे,
मेरी फेवरेट कार्टून डोरेमाॅन लगाते है------
बहुत क्यूट है दादा मेरे--होमवर्क करवाते है।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर--222002(उत्तर-प्रदेश)।

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
मासिक बाल पत्रिका मे प्रकाशनार्थ भेजी हुई मेरी बाल कविता।

(बिस्मिल्लाह भाई)

( बिस्मिल्लाह भाई )

आज भी गूंज रही है 
मोहब्बत के चबूतरे पे,
ए विस्मिल्ला खाँ 
तेरी शहनाई.

नही भुले है 
"बनारस" के सभी घाट,
तेरे पान से रंगे होंठ पे 
वे तेरा अक्खड़पन भाई.

देखो "दशहरे" की आँख नम है,
उदास है "नाटी इमली!"
और गमगीन है
 "मोहर्रम"भाई.

लौट आओ फिर से,
हम हिन्दुओं के "राम-राम"
और मुसलमानो के 
"विस्मिल्लाह भाई".

रचना-रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर 
mo.no.7800824758

Sunday, 20 August 2023

(मेरी किस्मत में ये जागना आया)

(मेरी किस्मत मे ये जागना आया)
उन्हे कहा कभी हमे चाहना आया-----
मेरी ख्व़ाहिशो को रौदा-------
बस उनकी समझ मे वासना आया।
मै घुटी बंद कमरे मे,वे चैन से सोये----
ऐ,रंग--मेरी किस्मत मे ये जागना आया।

(मैं तेरा खत पढ़ता हूं)

(मै तेरा खत पढ़ता हूँ)
मै आज भी-------------------
तुम्हे उतनी ही मुहब्बत करता हूँ!
अक्सर रातो को जलाके चराग,
मै तेरा खत पढ़ता हूँ।
अजीब दिवाना हु मै---------
रात गुजर जाती है बैठे-बैठे,
कभी कहां------------
मै खत को पढ़के मुकम्मल करता हूँ।
मै आज भी-----------------
तुम्हे उतनी ही मुहब्बत करता हूँ!
अक्सर रातो को जला के चराग,
मै तेरा खत पढ़ता हूँ।
मै बेशक------------
छोड़ आया तेरा शहर फिर भी,
मै तेरे खत में सारी रात--------
तेरी गली और तेरा छत पढ़ता हूँ।
मैै आज भी-------------
तुम्हें उतनी ही मुहब्बत करता हूँ!
अक्सर रातो को जलाके चराग----
मै तेरा खत पढ़ता हूँ।

Saturday, 19 August 2023

(खामोशी द नो साउंड)


(खामोशी द नो साउंड)

मै खामोशी और सन्नाटा चाहता हूं,
ना जाने क्यूं
मेरे अंदर इतना शोर है,
कोलाहल है,
मै कही कुछ देर बैठ
इस भीड़ से सुस्ताना चाहता हूं,
लेकिन कहा? पता नही
अगल बगल
कोई पेड़ नही, कोई चिड़ियां नही
बस चल रहा हूं
लेकिन अपने इस चलने से
कुछ बतियाना चाहता हूं
लेकिन
वे बात करने को तैयार नही,
क्योंकि वे खुद मुझ 
कुढ़ मगज के इस दिमाग के कीड़े से 
वे खुद परेशान सी है
इसकी भी गलती नही,
शुरू शुरू में
इसने कहा तो था,
कि अरे बेवकूफ
चल मैं तेरे साथ चलने को तैयार हूं
इस कंक्रीट के जंगल की घुटन
से दूर,अपने गांव 
लेकिन मैंने ही नही सुना

(सौतन बांसुरी)

दैनिक भास्कर के "अहा! जिंदगी" के एक पुराने अंक में प्रकाशित मेरी कविता "सौतन बांसुरी".

(सौतन बांसुरी )

रहती है, हर पल अधर पे,
हम गोपियों की------
सौतन बांसुरी.

रह-रह के हँसती है,
हमारे दर्द पे,
तो लगती है,
हमको---
सौतन बांसुरी.

उफ!
उन पर भी गुस्सा आ रहा,
पर क्या करें 
हम बेचारी गोपियाँ??
हमें भुलकर,
कितने मजे से छू रहे है 
खुद,
हम गोपियों के-----
नारायण बांसुरी.

काश! मिलती तो 
इसे हम तोड़ देती,
पर ये लगता है,
कि संभव ही नही,
बड़ी बेहया,
बड़ी निर्लज्ज है,
ये सौतन बांसुरी.

अधर तो अधर था,
कमर मे लटक के भी उनके,
हमारे जी को 
जलाती है 
ये सौतन बांसुरी.

रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

(गीत)

(गीत)
गीत----------
केवल उर्वशी या शकुंतला नही!
ऐ,रंग----ये उस गरीब की पतीली भी है,
जिसमें कई रोज से-चावल पके नही।

Friday, 18 August 2023

(हिन्दू और मुसलमान बनके)

(हिन्दू और मूसलमां बनके)
मंदिर और मस्ज़िद दोनो को रौशनी दी---
ऐ,रंग----------
चराग कभी नही ज़ला----------
हिन्दू और मूसलमां बनके।

Wednesday, 16 August 2023

(पूजा या अजान से ढकती है)

(पूजा या अजा़न से ढ़कती है)
मुझे उस मजबूर औरत की----------
टूटी चुड़ियो की आवाज़ ईधन की लगती है,
वे अपने ग्राहक की गर्म साँसो पे,
अपनी मजबूरीयो का-------------
कई दिनो से पड़ा हुआ ठंडा तवा रखती है।
उसकी चीख और पीड़ा में,
उसके भूखे बच्चो के खाली पेट भरने वाली रोटी-----------------
की खुशी दिखती है।
वे अपने कपड़े समेट ब्लाउज पहन,
जब अपनी उरोजो में ये रुपये रखती है,
तभी उसकी नज़र उसी कमरे मे--------
टंगे हुये एक माँ के नंंगे उरोज वाले,
कैलेंडर पर पड़ती है,
जो अपने मासूम बच्चे का पेट इसी उरोज से भरती है।
वे एक मर्तबा फिर-------------
इस कमरे मे से निकलने से पहले,
अपने बंद ब्लाउज में--------------
रंखे पैसो को अपने जख्मी उरोजो के बीच टटोलती है।
न जाने क्यू उसके वे दोनो उरोज,
हमारे दो किरदार से लगते है!
एै,रंग-----मुआफ करना
मैले हो जाते है फिर भी कभी-कभी ,
कुछ औरतो के यही उरोज,
चाहे वे इसे पूजा के आँचल या-------
किसी मस्जिद के अजान से ढ़कती है।

Monday, 14 August 2023

(शहीदों का गांव)

(शहीदों का गांव)

इस गांव की औरत 
कभी विधवा नहीं होती,

इस गांव में कभी 
लाशे नहीं आती 
तिरंगे मे लिपटे शहीद आते है.

यहां की कोई भी बूढ़ी मां,
काशी या काबे नही जाती,
ए,"रंग"--
वे फिर से शहीद बेटे की,
वर्दी का धूल साफ कर,
सरहद की हिफाजत के लिये
पोते पालती है.

इस गांव की औरत,
कभी विधवा नही होती.

(जलिया वाला बाग)

(जलिया वाला बाग)
सुलग उठी थी जीस घटना से------
सुखदेव,भगत सिंह,राजगुरु
के दिल मे आजादी की आग!
आओ देखे हम सब अबकी-----
वे जलिया वाला बाग।
कांप गया सांडर्स और हिली ब्रिटिश हुकूमत,
तीन शहीदो ने बिगुल फुक दी आजादी की,
बम फेक सीने मे गोली दाग।
आओ देखे हम सब अबकी-----
वे जलिया वाला बाग।
आओ हम महसुस करे---------
जहां पे बच्चो बुढ़ो का कत्ल हुआ,
लहू बहा!
और चीखा उनके दर्द से पुरा जलिया वाला बाग।
आओ देखे हम सब अबकी------
वे जलिया वाला बाग।
एै,रंग------तुम्हे कसम है
पुरे अगस्त पन्ने पे लिखना,
देशभक्त लोगो की फाँसी और जलिया वाला बाग।

Sunday, 13 August 2023

(पंद्रह अगस्त)

(पन्द्रह अगस्त)
अपनो के ही हाथो---------
सरसैंया पे पिड़ाओ के तीर से विंधा,
भीष्म सा पड़ा है------पन्द्रह अगस्त।
सड़को पे द्रोपदी के रेप के दृश्यो ने,
फिर भर दी है आजाद देश के
उन तमाम शहीदो की आँखे,
और उनकी रुह के सामने!
शर्म से खड़ा है----पन्द्रह अगस्त।
बहुत बिरान है मजा़रे कही मेला नही लगता,
ये सच है-------------------
कि हम शहिदो की शहादत के दगाबाज है,
फिर भी एै,रंग-------------
ये लहराते तिरंगे कह रहे,
कि हमारी तुम्हारी सोच से भी कही ज्यादा,
विशाल और बड़ा है-----पन्द्रह अगस्त।

(फांसी पर झूल गए)

(फाँसी पे झूल गये)
आजादी मिलते ही हम जिनको भूल गये,,,,
ऐ,रंग----वे आजादी की खातिर-----
बिजयी बिश्व़ तिरंगा गाके-------
फाँसी पे झूल गये।

Saturday, 12 August 2023

(वंदे मातरम् गाए)

(वंदे मातरम गाये)
शहीद की लाश को जब गाँव दफनाये----
तो वंदे मातरम गाये।
ना बीबी तोड़े चुड़ी,ना आँसू बहाये,,,,,,,,,,,,
माँ भी हँसती हुई सबके,सामने आये---
ऐ,रंग--इस शहीद की है आखिरी इच्छा,,
कि सरहद मेरा बेटा भी होके लहू-लूहान-
वंदे मातरम गाये।

(गोरखपुर)

गोरखपुर के उन बह रहे तमाम आँसुओ को समर्पित एक पीड़ा-------
                                  (गोरखपुर)
चालीस बच्चो की मौत पे भी सीकन नही-------
बड़ी मोटी है तेरी सियासी खाल गोरखपुर।
आॅक्सीजन की सप्लाई रुक गई,
अभी तलक आजाद है सी.ऐम.ओ.(C.M.O.),
मुझे तो शक है कि,
इन बच्चो की मौत के है---------
यही दलाल गोरखपुर।
योगी यही के है इसी से मिट्टी डल रही है,
लेकिन जल गई है धुनी------
अब आयेंगे काग्रेंस,सपा,बसपा के लोग,
और बजायेंगे कुछ दिन नकली संवेदना लिये-----
अपने-अपने सियासी गाल गोरखपुर।
लेकिन वे आँखे भरी रहेंगी जिन आँखो में अभी तलक,
अपने बच्चे के खेलने,
और कानो को सुनने की किलकारियाँ थी,
शायद कभी नही भरेंगे,
उन बच्चो के खोने के ये घाव,
रुह कांप जायेगी इनकी ता उम्र,
और हमेशा इनकी जेहन मे रहेगा------
एक दर्द बनके तेरा अस्पताल गोरखपुर।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Friday, 11 August 2023

(कोई मेले लगे)

(कोई मेले लगे)
पन्द्रह अगस्त की आँखो से------
आँसू बहने लगे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,.
क्योकि शहिदो की मज़ार पे ऐ,रंग-----
न तो चराग जला---------
और न ही कोई मेले लगे।

(हमारे देश का परचम)

( हमारे देश का परचम है )
यूँँहि नही फहर रहा आज लाल-किले से-----
हमारे देश का परचम है.
पुरे बदन पे कोड़े के निशान,टूटती और थमती साँसे
और उसपे भी आँसू नही इंकलाब जिंदाबाद------
तमाम-तमाम अग्रेजों के जुल्मों-सितम है.
यूँही नही फहर रहा आज लाल किले से------
हमारे देश का परचम है.
जेल मे आखिरी मर्तबा--------
अपने बेटे से मिलने आई भगत सिंह की माँ है,
जिसके होठ पे एक आजादी की हँसी है-------
और दिल मे इस शहीद बेटे के खोने का गम है.
यूँही नही फहर रहा आज लाल-किले से-----
हमारे देश का परचम है.
वे सामने है बाग जलियां का----
जहा बम,गोली,बारुद और लाशें है,
वे लाशों का बदला ले रहा कोई और नही "रंग"-----
भारत माँ का ऊधम है.
यूँही नही फहर रहा आज लाल-किले से-----
हमारे देश का परचम है.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर.
जिला---जौनपुर, pin.no.---222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.---7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

(मां)

(माँ)
तेरा हर बेटा मुल्क की खातिर-------
यूं शहीद और कुर्बान हो माँ!
ना बटने दे किसी को मजहब के नाम पे,
समय से पूजा समय से अजा़न हो माँ।
फक्र हो तुम्हे अपने आँचल और दूध पे,
तेरी लोरी में राष्ट्र हो और राष्ट्रगान हो माँ।
ना पंजाब,ना गुजरात,ना महाराष्ट्र निकले,
आखिरी लम्हें गर लब भी फड़फड़ाये,
तो लब पे तुम और हिन्दुस्तान हो माँ।
गर सुपुर्द-ऐ-खाक होने लगू,
तो मुट्ठी में मुल्क की मिट्टी-------
और डालने वाले के होंठो पे मुस्कान हो माँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
###आप सभी को हमारे मुल्क की ये आजाद सुबह मुबारक हो।

(सौतन बांसुरी)

राष्ट्रीय समाचारपत्र "दैनिक भास्कर" के साप्ताहिक पत्रिका "अहा !जिंदगी " के एक पुराने अंक में प्रकाशित कविता "सौतन बांसुरी". 

(सौतन बाँसुरी)

रहती है, हर पल अधर पे,
हम गोपियों की------
सौतन बाँसुरी.

रह-रह के हँसती है,
हमारे दर्द पे जब,
तो हम गोपियों को लगती है,
सौतन बाँसुरी.

उफ! उनपे भी गुस्सा आ रहा,
पर क्या करें हम गोपियाँ??
हमें भुलकर,
कितने मजे से छू रहे है खुद,
हम गोपियों के-----
नारायन बाँसुरी.

काश! मिलती तो इसे हम तोड़ देती,
पर ये लग रहा, संभव नही,
बड़ी बेहया,निर्लज्ज है,
अधर तो अधर था,
कमर मे भी खुस के उनके,
हाय! कितनी खुश हैं,
ऐ "रंग" ---
ये डायन बाँसुरी.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

@@@रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

Thursday, 10 August 2023

(उल्लू और गधे में अंतर)

('उल्लू' और 'गधे' में अंतर )

कल मुझे स्वप्न में हरिशंकर परसाई जी ने,
'उल्लू' और 'गधे' में क्या फर्क है
को बकायदा----
उदाहरण सहित समझाया 
उन्होंने कहा की बेटे
जब आप किसी नेता को वोट देते है
तब आप 'उल्लू' हैं
और उनके जितने के बाद
अगर आप किसी कार्य के लिए जाते है
तब आप 'गधे' है.
😀😀😀😀

नोट--यह कटाक्ष 2022 के प्रदेश में होनें वाले बिधानसभा चुनाव के वोटरों के लिए नही है, इसलिए आप असमय अपने आप को "उल्लू" या "गधा " ना समझे 😀😀😀😀😀😀🙏🙏

रंगनाथ द्विवेदी, उवाच 🌹🌹🙏🙏

(टूट गया)

(टूट गया)
दर्पण देखा टूट गया,सपना देखा टूट गया
जबसे आया धरती पे------------------
जीतना भी देखा टूट गया।
जिस गहने से ईश़्क किया,
ता उम्र ज़मी की औरत ने,
साँस जो टूटी उस औरत की,
सारा गहना टूट गया।
मशहूर इमारत के मालिक ने,
हर नक्काशी करवाली!
जब खाली हाथ मशान चला,
तो उसका उसी इमारत में फिर------
ठाट से रहना टूट गया।
मंदिर,मंस्जिद,गुरुद्वार,गिरजाघर सब यही रहे,
आये ब्राह्मन,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई
राम,अल्लाह हो अकबर,वाहे गुरु,और जिसस--------------
यहाँ ये भी कहना टूट गया।
एै,रंग-----ये देखो ताजमहल,
और कब्रे गड़ी मोहब्बत की,
यहाँ बस इतना ही चलना था,
इतनी ही दुरी तय करने में सबका-----
चलना टूट गया।

(आ गया पन्द्रह अगस्त)

(आ गया पन्द्रह अगस्त)
इस साल भी---------------
बेरोजगार युवाओ का लिये कष्ट,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
देखो जितने मे सीमेंट उतने मे ही बालू ,
कहां जाये मजूरा,
वे खाली पेट कैसे गायेगा विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
सच पुछिये तो सारी नीतियो से----------
देश का आखिरी व्यक्ति है पस्त,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
सब्जियां आसमान छु रही टमाटर लग रहे अँग्रेज़ से,
जीयसटी भी केवल कागज़ी इंकलाब बन के रह गया,
कालाधन भी शिगुफे की तरह आया और चला गया,
और गढ्ढा युक्त सड़को से गुजरती प्रभात फेरी,
यानि---------------
वही पुराने हालात और पुराना वक़्त,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
एै "रंग" कुछ नही बदलेगा,
क्योंकि हमारी नैतिकता हर रोज मरती है,
हम गुँगे हो जाते है जातियो मे बट,
तो कहां हो पायेगा दुर इस देश से,
शिक्षा,स्वास्थ्य,सुरक्षा जैसी महामारियो का कष्ट,
आ गया पन्द्रह अगस्त।
जरा सोचो-----------
उसी पुराने रुटीन की तरह फिर फहरेगा तिरंगा,
और फहरायेगा कौन----------
किसी विभाग का कोई मंत्री या उसी विभाग का,
कोई उससे बड़ा भ्रष्ट---------
आ गया पन्द्रह अगस्त।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.--------7800824758

(उसके हिस्से का भारत है)

(उसके हिस्से का भारत है)
फूटपाथ पे अधनंगा------
वे मासूम सुबह से ही बेच रहा-----
आजादी का तिरंगा,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----उसके पेट का पिचकापन ही--
उसके हिस्से का भारत है।

Wednesday, 9 August 2023

(चोटी काटने वाले से दुःखी हूं)

औरतो की कट रही चोटी पे एक लेखकीय सहानुभूति 
                      (चोटी काटने वाले से दुखी हूँ)
कुछ औरतो के चोटी कटने की खबर सुन------
मेरी लुगाई भी सदमे मे है।
वे सोये मे भी उठ जा रही बार-बार,
फिर चोटी टटोल सो जा रही,
अभी कल ही तो उसने-------
एक तांत्रिक के बताये कुछ सामान मंगवा के,
अपनी पुरी चोटी का तीन चक्कर लगा,
घर मे सुलगाई अंगीठी मे,
काला तील,लोबान,कपुर सब डाल कर,
आँख मुद अपनी चोटी के रक्षार्थ,
उस काले-कलुटे तांत्रिक के बताये,
उट-पटांग सा श्लोक पढ़,
फिर अपनी चोटी मे-------
15 से 20 मिनट तक नींबू और हरी मिर्च टांग,
अनमने मन से एक कप चाय लाती है।
उसके इस हाल पे हँसी और तरस दोनो आ रहा,
क्या करु पति हूँ--------------
इसलिये मै उस चोटी काटने वाले से दुःखी हूँ।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(अशफाक लिखा है)

(अश़फाक लिखा है)
हमने गीता और कूर्आन से भी ज्यादा--
ऐ मादरे वतन----------
तेरी मिट्टी को पाक लिखा है।
जो जला है उसे राम प्रसाद बिस्मील़---
और जो दफ्ऩ है उसको अशफ़ाक लिखा है।

(राजनीति के सांप)

बिहार पर एक त्वरित राजनितिक टिप्पणी 😎😎😎😎

(राजनीति के सांप)

कभी उलट गए,
कभी पलट गए

फिर डसा 
और चल पड़े
किसी नए बील की तरफ

ये राजनीति के सांप ✍️✍️

(शहीदों का गांव)

(शहीदो का गाँव)
इस गाँव की औरत कभी बेवा नही होती--
इस गाँव मे कभी लाशे नही आती-----
तिरंगे मे लिपटे शहीद आते है।
यहा की कोई भी बुढ़ी माँ-------
काशी या काबे नही जाती,,,,,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----वे फिर से शहीद बेटे की----
वर्दी का धूल साफ कर--------
सरहद की हिफाजत के लिये------
पोते पालती है।

जय हिंद जय भारत

Monday, 7 August 2023

(धर्म है या पोर्न मूवी)

(धर्म है या पोर्न मूवी)
खाने को स्वर्ण भस्म-----------
और हर रात बीस्तर पे एक नई रुबी,,,,,,,,
पहले तो केवल बापु थे--------
अब सजी-धजी माँ आ गई----------
ऐ,रंग---ये धर्म है या पोर्न मूवी।

(सपेरे की बिटिया)

(सपेरे की बिटिया)
कभी पढ़ने आती थी हमारे स्कूल में,
सपेरो की बस्ती से---------------
एक सपेरे की बिटिया।
वे तमाम किस्से सुनाती थी साँपो के अक्सर,
वे खुद भी साँपो से खेलना जानती थी,
पर वे मासुम नही जानती थी,
इंसानी साँपो का जहर,
एक दिन-----------
उसी मासूम की नग्न लाश,
उसकी बस्ती से पहले--------
पड़ने वाले एक झुरमुट में पाई गई,
मै सिहर गया!
उस नग्न मासूम की लाश देख,
मै अब भी इतने सालो बाद भी-----
अपनी उस मासूम छात्रा को भूल नही पाता,
हर नाग पंचमी को वे मेरी जेहन मे
उभर आती है,
और पुछती है मुझसे कि बताईये न सर,
कि कैसे चुक गई,
अपने पुरे बदन पे रेंगे हुये नाखूनि साँपो से,
एक सपेरे की बिटिया।
@@@आप सभी को नाग पंचमी की बधाई।
###रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।

Sunday, 6 August 2023

(जुगनू बहुत रोए)

(जुगनू बहुत रोये)
शहर की आमद मे,जब पीपल कटा,,,,,,,,,,,,,
तो ऐ,रंग------------
मेरे गाँव के जुगनू बहुत रोये।

Saturday, 5 August 2023

चंद्रयान-3 
चांद की कक्षा में सफलता पूर्वक पहुंच चुका है!!
#ISRO  #बधाई 🙏💐

(चांद को हुई क्या)

(चाँद को हुई क्या?)
चाँद तो हमेसा से बद्चलन है------
वे कभी किसी एक की हुई क्या?
पुरी उम्र----------
उसे ही तक के रोता रहा चकोर,,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----ऐसी ही चाह की पीड़ा-----
कभी चाँद को हुई क्या?।

Friday, 4 August 2023

( राग-प्रधानमंत्री)
आज देश व राज्य की समस्त राजनैतिक पार्टियाँ--"अपने-अपने गले में स्वार्थ का फटा ढोल टांगें, 'राग-प्रधानमंत्री' गाने मे मशगूल है". जबकि सच्चाई ये है कि--"ये सभी बेसुरे जिस सुर को साधने मे लगे है वे सुर इनसे सध पायेगा ये बड़ा मुश्किल है क्योंकि इनके इन फटे ढोलों मे ना कोई राग है और न ही कोई शास्त्रियता". ये बस बिना किसी सुर लय के फकत फटे ढोल पीट रहे है,सच तो ये है कि इनका ये फटा ढोल एक प्रतीक मात्र है बाकी ये सभी "राग-प्रधानमंत्री" गाने के चक्कर मे--"ढोल कम और अंदर से अपनी-अपनी छाती ज्यादा पीट रहे है".
इन्हें भी ये भान है कि अब "राग-प्रधानमंत्री" बनने की सिद्धहस्त किताब--नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के हाथ लग गई है. ये किताब कभी पीढ़ियों से एक ही परिवार के हाथ मे रही--" वे स्वर्ण परिवार काग्रेंस का था इस स्वर्ण परिवार के अयोग्य धुरंधर राहुल गाँधी इस सिद्ध किताब को सहेज नही पाये". किताब छिन जाने के बाद जब इनको थोड़ा बहुत होश भी आया कि फिर से ये खानदानी किताब इनके पास आ जाये--"तब तक ये "राग-प्रधानमंत्री' की किताब इनसे छिने अमित शाह और नरेन्द्र मोदी जैसे घाघ के हाथ लग गयीं और इन दोनो ने मिल के इन्हें अघोषित तरिके से एक अंतरराष्ट्रीय पप्पू साबित कर दिया'. इसमें ये दोनो ही इतने सफल हुये कि अब तो लगता है जैसे राहुल गाँधी इनके इस बिछाये हुये जाल मे इतने गहरे तक उलझ गये है कि इनका इससे निकलना मुश्किल दिख रहा. यही कारण है कि उनकी कुछ हरकतें उनके फ्रस्ट्रेशनग्रस्त होने की गवाही भी दे रहे.
आज काग्रेंस के हालात इतने बद से बदतर हो गये है कि,छोटी से छोटी पार्टियाँँ भी उसे मुँह लगाने को तैयार नही,सच तो ये है कि--" ये पार्टियाँँ 
भी एक शापित राजकुमार के साये से डरती दिख रही है". जबकि कभी ये " राग-प्रधानमंत्री" जब---"काग्रेंस के राज-दरबार मे गाये जाते थे तब चाटूकारिता के इन कलाकारों से ये हूनर और ढोल वही रखवा लिये जाते थे". कभी अगर किसी ने इस राग का अन्यंत्र रियाज भी करना चाहा या ये ढोल बजानी चाही तो इसका खामियाजा इन्हें भरपूर भुगतना पड़ा.
लेकिन आज हर पार्टी के लोग ये जानते है कि एकबार ये सुअवसर फिर आया है कि ढोल और "राग-प्रधानमंत्री" शायद इनके हाथ लग जाये लेकिन ये महागठबंधन की बिषबेलरी बस पानी के बुलबुले के सिवा तो हमें कुछ न लग रहा.ये सभी चुनाव के इस स्वयंबर मे भाग तो लेंगे इस स्वयंबर मे भाग लेने का इन्हें लोकतांत्रिक अधिकार भी प्राप्त है,ये सभी अपनी-अपनी सफलता का "राग-प्रधानमंत्री" इन्हीं फटे ढोलो से पीट-पीटकर गायेंगे लेकिन वे इसमें सफल होंंगे ये शक है क्योंकि अब वे "राग-प्रधानमंत्री' की किताब व वे ढोल दो महा घाघो यानि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के सुर ,लय, ताल के कब्जे मे है.अब तो बस यही है कि पीटो ढोल बजाओ छाती क्योंकि 2019 के चुनाव की बाजी का सेहरा भी जहां तक मुझे अंदेशा है एक मर्तबा फिर--" इन्हीं दोनो "राग-प्रधानमंत्री" के महाशातिरो नरेन्द्र मोदी;अमित शाह यानि सफलता के तानसेन और बैजु-बावरा के हाथ आनी है".

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin.no. 222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.---7800824758.

यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.

(अजान हूं)

(शामे अज़ान हूँ)
मै शब्दो का हिन्दू,तो हर्फो का मूसलमान हूँ,,
मेरी कौम अलग है,मै बट नही सकता---
कवि हूँ तो सुबहे आरती,गर शायर हूँ तो-
ऐ,रंग----मै शामे अज़ान हूँ।

(रईस की इमारत में दफ़न हूं)

रईस की इमारत में दफ्ऩ हूँ


मै शहर के——————-
सबसे रईस की इमारत में दफ्ऩ हूँ।
मेरा शौहर कितना चाहता है मुझको,
कि महीनो से बेवा किये है बिस्तर,
मै उसी बिस्तर में दफ्ऩ हूँ।
मै शहर के—————
सबसे रईस की इमारत मे दफ्ऩ हूँ।
कालीन बिछे फर्श और इराने आईना,
वे अरब का चराग!
सब कुछ तो है लेकिन मै टूट गई झुमर सी,
बिखर के खत्म हूँ।
मै शहर के————
सबसे रईस की इमारत मे दफ्ऩ हूँ।
वे शीशमे दराज़ मै खोलती नही,
इतनी खामोश हो गई हु——–
की खुदी से बोलती नही!
वे देखो खिड़की के उस तरफ जैसे—–
अब भी खड़ा है मेरी चाहत का बेगुनाह,
मै बेवफ़ा थी उसकी,
ये आह है उसी की एै,रंग—–मै जो
शहर के सबसे रईस की इमारत में खत्म हूँ।

###सच का हौसला दैनिक समाचारपत्र मे एक मर्तबा फिर मेरी रचना को प्रकाशित कर स्नेह देने के लिये वंदना दी का ढ़ेरो धन्यवाद।

(मील का सायरन)

( मील का सायरन)
 
मील का सायरन बजा है,
शायद आज फिर किसी 
मील के मजदूर को, 
घर पे भूखे बच्चो की रोटी, 
और बीमार बीबी की दवा ने, 
असमय ही इसे मार दिया है. 
रोज लौटता था थका-मांदा,
फिर उसके लौटने के थोड़ी देर बाद, 
घर से--
ईधन के जलने का धुआँ उठता था, 
वे धुआँ --
जो उसकी बीमार बीबी के साँसो मे घुसते ही, 
उसके न थमने वाली खाँसी मे बदल जाती. 

आज न लौटेगा--
देखते--देखते जब इनकी आँखें थक जायेंगी, 
तो इस मजदूरे की बीमार बीबी, 
किसी बच्चे को भेजेगी,
अपने बापू का पता करने, 

फिर कुछ मील के मजदूर 
मिलके उसकी लाश लायेंगें, 
रोना-पीटना होगा 
कुलबुलाते खाली पेट. 
फिर अल-सुबह रोज की तरह बजेगा----
मील का सायरन.

इन्हीं मे से कोई निकलेगा 
जाने के लिये, 
क्योकि इनकी जिंदगी है ए "रंग"
यही मौत 
और बजता हुआ मील का सायरन. 

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी. 
जज कालोनी, मियाँपुर 
जिला---जौनपुर 222002 ( उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.----7800824758

Thursday, 3 August 2023

(जिंदगी मेरी नॉवेल सी हो गई है)

(जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है)
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है,
जिसे मोड़कर कई दिनो से यूँही रख दिया है,
कि समय मिलते ही फिर उस पृष्ठ को खोल पढ़ुगा,
अपने जीवन के हूबहू घटनाओ की वे तमाम बाते,
यानी की गतांक से आगे---------------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
तमाम उठा-पटक झंझावतो का जीवन,
कही कोई विदेशी रोमांटनिजम नही,
एक विछोह,एक दर्द,
हर पृष्ठ के कथनांक के आगे--------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
इसी मोटी सी किताब को,
कुछ लोग लुगदी साहित्य कह,
यू छिटक जाते है जैसे मंटो की भूखी नायिका,
अपने से ज्यादा नंगो को देखती है,
अपनी काली सलवार और कपकंपाती टाँग के आगे-----
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
कुछ पन्ने और बचे है पढ़ने को,
कल खत्म कर लुंगा इसे भी,
और बिना मोड़े रख दुंगा,
फिर इच्छा ही नही बचेगी इसके पढ़ने की,
क्योंकि पता चल जायेगा कि क्या कुछ लिखा है,
एै"रंग" इस नावेल मे गतांक से आगे-------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(इतवार)

(इतवार जीते है)
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है,
वे उस शहर,हम इस शहर
दूर रहके भी-------------
हम इतना प्यार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
वे गीले बाल उनका कमरे में आना,
उतने ही पानी से हम--------------
तड़प के सावन की फुहार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
छः दिन गुजारते है हम नागफनी के,
फिर लौटते है लेके उन्हे केवड़े का गजरा,
ऐ,रंग---------------
हम इतनी ही खुशी का त्यौहार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।

(भाई के बांधे चीर पर)

आप सभी भाई और बहनो को रक्षाबंधन की बहुत-बहुत बधाई. 

(भाई के बांधे चीर पर)

जुये में द्रोपदी को हारकर--
जब झुक गये पतियो के सर,
गुँगी हो गई सभा--
रो उठी फिर द्रोपदी,
अपने इस तकदीर पर.
वे भी जुआ खेल गई आखिरी लम्हे----
अपने कृष्ण जैसे बीर.

दौड़ पड़े नंगे पाँव कृष्ण भी---
तब बहन की पीर पर.
गर न आते टूट जाती रस्म राखी की,
फिर कोई भाई ना आता मायके से,
ना फक्र करती एक बहन,
दूःख के दिनो में-----
अपने भाई को बांधे चीर पर.

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर 
जिला--जौनपुर pin.no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

Wednesday, 2 August 2023

(हाइवे पर रेप)

(हाईवे पे रेप)
हमारे यहां---------------
रेप के बाद भी एक रेप होता है।
हाईवे से-----------------
एक नई निर्भया चिखती है!
हमारे यहां--------------
रेप के बाद भी एक रेप होता है।
बार-बार बिधान सभा का सत्र,
उसकी जननांगो के घावो का जिक्र करता है,
तो इस पुरे प्रदेश की औरत को-------
कितना क्षेप होता है।
हमारे यहां--------------
रेप के बाद भी एक रेप होता है।
टूटी चुड़ियाँ,टूटे बटन
भूखे भेड़ियो से नुचे स्तन,
उफ!न्याय माँग रही---------
एक और नग्न निर्भया की लाश!
एै,रंग------न्याय तो नही लेकिन,
कुछ महीनो के बाद,
फिर एक नये हाईवे पे इसी तरह,
किसी औरत या निर्भया का------
रेप होता है।
हमारे यहां--------------
रेप के बाद भी एक रेप होता है।

###हाईवे पे हुआ रेप किसी पे ठिकरा फोड़ राजनीति तो की जा सकती है,पर हमे अपने पशुवत चरित्र का भी कही न कही आकलन करना है,फिलहाल जो भी है इससे हमारे मर्म और हृदय को एक मर्मांतक पिड़ा हुई है,ये हादसा कही भी और किसी के साथ हो सकता है ईश्वर ऐसे घृणित पापियो को सदबुद्धि दे।

Tuesday, 1 August 2023

(पायल--एक दर्द)

(पायल------एक दर्द)
अपने माँ-बाप के दुलार से बनाई गई पायल,
सुना है कि-----------
ससुराल मे जलाई गई पायल।
माँ दहाड़े मारे रो रही और बाप गुँगा हो गया,
न जाने कैसे उन पापियो का कलेजा नही कांपा,
एक माँ को आखिरी बार----------
उसके मरती हुई बिटिया की ना सुनाई गई पायल।
सोचा था भेजेगी इसके बापु को लाने,
लेकिन हाय रे! निष्ठुर समय---------
कि एक माँ तड़प रही मछली की तरह,
उसके आँख के पानी के एक-एक बुँद की तरह-----
तोड़े गये घुँघरू और पुरे कमरे मे घुँघरू दर घुँघरू,
बहुत तड़पाई गई पायल।
जिससे ब्याहा था खुशी-खुशी वे भी था शामिल,
उन कातिलो में,
हे! भगवान तु भी चुप था बिटिया तड़प रही थी,
उसकी तड़प मे चीख़ रही थी-----------
पती के हाथो पहनाई गई पायल।
सास का कलेजा क्यू कांपा नही,
क्यू पथरा गई, क्यू डायन हो गई,
आखिर इसकी बिटिया का कसूर क्या था?
जबकि हर काम की खातिर एक पैर पे------
पुरे घर मे दौड़ाई गई पायल।
एक माँ-बाप का श्राप है,
कि उतना तुम सब भी रोओगे-तड़पोगे,
जितना तुम्हारे घर में------
हमारी रुलाई गई पायल।
माँ-बाप के दुलार से बनाई गई पायल,
सुना कि----------
ससुराल में जलाई गई पायल।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

शायद हम आप प्रयास करे तो कुछ पायल घर के मंदिर मे किसी सुमधुर संगीत की तरह बजती और खिलखिलाती रहे।

(बलात्कार के खिलाफ)

सेंगर जैसे विकृत मानसिकता वाले ऐसे किसी भी पार्टी के नेता की मैं घोर निंदा और भर्त्सना करता हूँ।ऐसे ही निकृष्ट लोग हमारे देश के कलंक और नासूर है।कृपया ऐसे किसी भी नेता का हम इस लोकतंत्र में अपना बेसकीमती वोट न दे।

(बलात्कार के ख़िलाफ़)

लड़ना होगा , तुम्हें
अपनी सिसकी और चित्कार के खिलाफ.
विगुल फूंकना होगा,तुम्हें
किसी भी सेंगर और 
किसी भी सरकार के खिलाफ.
उठाना होगा, तुम्हें
खुद ही तलवार,बन के झाँसी,
अपने हो रहे, 
इस बलात्कार के खिलाफ.

@ रंगनाथ द्विवेदी