Sunday, 29 August 2021

(स्मारके मोहब्बत है)
तुम जीसे कब्र कहते हो ऐ शहर वालो----
वे इस रंग----की  स्मारके मोहब्बत है।

यह कविता 2019 में "अहा!जिंदगी " और 2021 में सुरभि में प्रकाशित है (सौतन बांसुरी )


यह कविता 2019 में "अहा!जिंदगी " और 2021 में सुरभि में प्रकाशित है (सौतन बांसुरी )

रहती है, हर पल अधर पे,
हम गोपियों की------
सौतन बांसुरी.

रह-रह के हँसती है,
जब भी हमारे दर्द पे,
तो हमें लगती है,
सौतन बांसुरी.

उफ! उन पर भी गुस्सा आ रहा,
पर क्या करें हम गोपियाँ??
हमें भुलकर,
कितने मजे से छू रहे है खुद,
हम गोपियों के-----
नारायण बांसुरी.

काश! मिलती तो इसे हम तोड़ देती,
पर ये लगता है,संभव नही,
बड़ी बेहया,बड़ी निर्लज्ज है,
ये सौतन बांसुरी.

अधर तो अधर था,
कमर मे लटक के भी उनके,
हमारे जी को जलाती है 
ये सौतन बांसुरी.

रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

(शहीद की बहन)
सीने मे गोली लगी है,चंद साँस बाकी है।
ऐ मौत के फरिश्तो जरा ठहरो------
मै बहन से बात कर लु-----
क्यूकि आज राखी है।

कविता---(इतना दर्द न हो )

(इतना दर्द न हो)
मै गा तो रहा हूँ-----------
लेकिन एै खुदा मेरी तरह,
फिर किसी के गज़ल में-----
इतना दर्द न हो।
ना कोई टूट के बिखरे मेरी तरह,
फिर किसी को अपनी शाखे मुहब्बत से,
यू जुदा होने का एै खुदा----------
इतना न दर्द हो।
चुभे कमरे की खुली खिड़की से,
याद की हवा,
एै खुदा फिर किसी खुली खिड़की का मौसम------
इतना सर्द न हो।
चेहरे की सिलवटे चुभन न छिप सके,
एै खुदा किसी चेहरे पे-------
इतना गर्द न हो।
मेरी तरह न बुझ जाये सहर से पहले,
एै खुदा किसी और चराग को सब का----
इतना दर्द न हो।
मै गा तो रहा हूँ---------
लेकिन एै खुदा मेरी तरह,
फिर किसी के गज़ल में----
इतना दर्द न हो।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

इस रचना मे दो एैसे शब्द है जिनका अर्थ निम्नवत है-----
(1)----सहर----सुबह।
(2) सब----रात।

Saturday, 28 August 2021

कविता---(दो घड़ी की रात )

(दो घड़ी की रात)
जिंदगी है बस दो घड़ी की रात,
आओ गुज़ार ले लिहाफ में हम,
एक दुजे के संग---
दो घड़ी की रात।
आयेगी धूप कमरे में कल किसी और के लिये,
खुली खिड़की से फिर बाल सँवारेगी कोई दुल्हन,
फिर अँधेरा होगा!
वे भी गुजारेगी इसी तरह अपनी जिंदगी की-------------
ये दो घड़ी की रात।
भुल जायेंगे सभी एक दिन रफ्ता-रफ्ता,
जैसे हम भुले है औरो के जिंदगी की---
दो घड़ी की रात।
एै,रंग-----यहाँ से हमी फना होगे,
बाकी यही रह जायेगी औरो के लिये---
ये दो घड़ी की रात।

Friday, 27 August 2021

(बच्चा पेट भरता है)

तुम जिस अखबार को इंकलाब कहते हो,,,
उसी अखबार पर चंद रोटियाँ रख-----
ऐ,रंग-------------
स्लम ऐरिये का बच्चा पेट भरता है. 

### रंगनाथ द्विवेदी
 जिला जौनपुर उत्तर प्रदेश.

Saturday, 21 August 2021

(एक शहंशाह का पत्थर )

(एक शहंशाह का पत्थर)
तोड़ देती है हमें मुफ़लिसी----
वरना हम भी लाते कही से,
अपनी मूमताज़ का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से---
एक शहंशाह का पत्थर।
संगतराशी देखने ज़मी पे-------
आते खुदा के फरिश्ते,
जब मै लगवाता इश्के़ इमारत में------
अपनी मुहब्बत के अल्लाह का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से---
एक शहंशाह का पत्थर।
शोहरत,नुमाइश,चाँदनी रात यहाँ भी होती,
और शायर भी लिखता अपने तराशे हुये हर्फों से----------
इस कब्रगाह का पत्थर।
तोड़ देती है हमें मूफलिसी-------
वरना हम भी लाते कही से,
अपनी मूमताज़ का पत्थर।
और फिका कर देते हम अपनी चाह से,
एक शहंशाह का पत्थर।

Wednesday, 11 August 2021

(अशफ़ाक लिखा है)
हमने गीता और कुरआन से भी ज्यादा,
ऐ मादरे वतन-----------
तेरी मिट्टी को पाक लिखा है।
जो जला है उसे राम प्रसाद बिस्मिल,
और जो दफ़न है-------
उसको अशफ़ाक लिखा है।
###पन्द्रह अगस्त तक मै राष्ट्र को समर्पित रचनाओ और उनकी शहादत के संम्मान में अपनी भाव संवेदनाओ की श्रद्धांजलि के साथ मै मुसलसल इस फेसबुक पे आपके साथ एक सफर करता रहुंगा----जय हिन्द।
(कोई मेले लगे)
पन्द्रह अगस्त की आँखो से------
आँसू बहने लगे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,.
क्योकि शहिदो की मज़ार पे ऐ,रंग-----
न तो चराग जला---------
और न ही कोई मेले लगे।

कविता---(हमारे देश का परचम है )

( हमारे देश का परचम है )
यूँँहि नही फहर रहा आज लाल-किले से-----
हमारे देश का परचम है.
पुरे बदन पे कोड़े के निशान,टूटती और थमती साँसे
और उसपे भी आँसू नही इंकलाब जिंदाबाद------
तमाम-तमाम अग्रेजों के जुल्मों-सितम है.
यूँही नही फहर रहा आज लाल किले से------
हमारे देश का परचम है.
जेल मे आखिरी मर्तबा--------
अपने बेटे से मिलने आई भगत सिंह की माँ है,
जिसके होठ पे एक आजादी की हँसी है-------
और दिल मे इस शहीद बेटे के खोने का गम है.
यूँही नही फहर रहा आज लाल-किले से-----
हमारे देश का परचम है.
वे सामने है बाग जलियां का----
जहा बम,गोली,बारुद और लाशें है,
वे लाशों का बदला ले रहा कोई और नही "रंग"-----
भारत माँ का ऊधम है.
यूँही नही फहर रहा आज लाल-किले से-----
हमारे देश का परचम है.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर.
जिला---जौनपुर, pin.no.---222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.---7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

कविता---(माँ )

(माँ)
तेरा हर बेटा मुल्क की खातिर-------
यूं शहीद और कुर्बान हो माँ!
ना बटने दे किसी को मजहब के नाम पे,
समय से पूजा समय से अजा़न हो माँ।
फक्र हो तुम्हे अपने आँचल और दूध पे,
तेरी लोरी में राष्ट्र हो और राष्ट्रगान हो माँ।
ना पंजाब,ना गुजरात,ना महाराष्ट्र निकले,
आखिरी लम्हें गर लब भी फड़फड़ाये,
तो लब पे तुम और हिन्दुस्तान हो माँ।
गर सुपुर्द-ऐ-खाक होने लगू,
तो मुट्ठी में मुल्क की मिट्टी-------
और डालने वाले के होंठो पे मुस्कान हो माँ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
###आप सभी को हमारे मुल्क की ये आजाद सुबह मुबारक हो।

कविता--(टूट गया )

(टूट गया)
दर्पण देखा टूट गया,सपना देखा टूट गया
जबसे आया धरती पे------------------
जीतना भी देखा टूट गया।
जिस गहने से ईश़्क किया,
ता उम्र ज़मी की औरत ने,
साँस जो टूटी उस औरत की,
सारा गहना टूट गया।
मशहूर इमारत के मालिक ने,
हर नक्काशी करवाली!
जब खाली हाथ मशान चला,
तो उसका उसी इमारत में फिर------
ठाट से रहना टूट गया।
मंदिर,मंस्जिद,गुरुद्वार,गिरजाघर सब यही रहे,
आये ब्राह्मन,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई
राम,अल्लाह हो अकबर,वाहे गुरु,और जिसस--------------
यहाँ ये भी कहना टूट गया।
एै,रंग-----ये देखो ताजमहल,
और कब्रे गड़ी मोहब्बत की,
यहाँ बस इतना ही चलना था,
इतनी ही दुरी तय करने में सबका-----
चलना टूट गया।

Sunday, 8 August 2021

(भरपेट दूध मिलेगा)
झोपड़ी से-नरगिस के सिसकने की----
आवाज आ रही है!
ऐ,रंग--आज शायद उसके भूखे बेटे को-
भरपेट दूध मिलेगा।
(नीला आसमा सो गया है)
वक्त के सानो पे सर रख नही पाई,
ऐै ",रंग "-------------
इस रेखा की चाहत और ख्व़ाहिशो का भी ,
नीला आसमा सो गया है।

Wednesday, 4 August 2021

(शामे अज़ान हूँ)
मै शब्दो का हिन्दू,तो हर्फो का मूसलमान हूँ,,
मेरी कौम अलग है,मै बट नही सकता---
कवि हूँ तो सुबहे आरती,गर शायर हूँ तो-
ऐ,रंग----मै शामे अज़ान हूँ।

Tuesday, 3 August 2021

यह लघुकथा मासिक पत्रिका "पाखी" के अगस्त 2021 अंक में प्रकाशित है----( मजदूर की दिहाड़ी )


लघुकथा---
              (मजदूर की दिहाड़ी)


आज रामलाल को लगातार तीन दिनों से कोई दिहाड़ी नहीं मिली थी. वे मजदूरों के बैठने वाले अड्डे पर बिना नागा किए जाता और कोई काम ना मिलने के तनाव में 2 - 3 बीड़ियां पीता और अपने घर लौट आता.उसका 3 दिनों से लगातार बिना दिहाड़ी या मजदूरी  के घर लौटना कितना असह्य था, यह वही जानता था. जब उसकी पत्नी बिना कुछ बोले बस रामलाल को देख कर चुपचाप घर में लौट जाती थी और उसकी जवान बिटिया जब अपने बापू को पीने के लिए पानी वाला लोटा पकड़ाती तो, उस लोटे को पकड़ जब रामलाल पानी पीता तो वे पानी रामलाल के गले में कांटे की तरह चुभता था. 

चौथे दिन भी रामलाल मजदूरों  के बैठने वाले अड्डे पर गया. जबकि आज उसका पूरा शरीर बुखार से तप रहा था. ज्यों - ज्यों धूप चढ़ता रहा,  त्यों - त्यों रामलाल के शरीर का बुखार बढ़ता रहा. बढ़ते - बढ़ते जब उसके शरीर से ज्यादा उसके मन का बुखार बढ़ा, तो उसने अपने कपकपाते हाथ से अपने कुर्ते की जेब को टटोला तो उसे अपनी जेब में से एक आखरी बची हुई टूटी बीड़ी मिलती है जिसे निकालकर वेे उसे किसी तरह जलाता है और उसे जलाकर वह बीड़ी को अपनी होंठ सेे लगाकर ढेर सारा धुआँ अपनी नाक से निकालता है और जैसे ही रामलाल दूसरी बार बीड़ी को अपने होठों सेे खींचता है तो उसी के साथ ही उसकी जिंदगी की साँस भी, उसकी टूटी हुई बीड़ी  की तरह टूट जाती है. और वे बिना किसी दिहाड़ी या मजदूरी के मर जाता है. 

जब काफ़ी सारा दिन चढ़ आया तो उस अड्डे के अन्य मजदूर जिन्हें की रामलाल की ही  तरह दिहाड़ी नहीं मिली थी उन सभी नेे साथ में घर से लाया हुआ खाना खाने के लिए रामलाल को आवाज दी, तो रामलाल ने कोई भी  जवाब नहीं दिया. फिर उसके मजदूर साथियोंं ने उसे बुलाया तो भी कोई जवाब नहीं. तो एक शंका  बस उसके मजदूर साथियों ने रामलाल के पास जाकर देखा तो रामलाल भयंकर चिलचिलाती धूप में एक तरफ होंठ से लगी सुलगती बीड़ी सहित बिना किसी हरकत के पड़ा हुआ था. उसके सभी साथियों ने उसेे जोर सेेे झिझोड़ा तो उन सभी को पता चला कि रामलाल तो मर गया.

तो उसके सभी मजदूर साथियों ने रामलाल की लाश को अपने कंधे पर लाादकर उसके घर पहुंचे, तो दरवाजे पर खड़ी उसकी पत्नी आज दिहाड़ी में लौटे अपने पति की लाश को बस यूं ही चुपचाप तकती रही. जवान बिटिया भी लोटे में पानी लेकर अपने बापू के सिरहाने खड़ी रही. फिर कुछ देर बाद उसकी पत्नी और उसकी बिटिया चीख-चीख कर कुछ इस तरह रोने लगी कि पूरी बस्ती की  आँख  गीली हो गई. सच तो यह है कि यह  लाश केवल इस गांव या बस्ती के आखिरी रामलाल की लाश नहीं,बल्कि बिना किसी  दिहाड़ी या मजदूरी के खाली हाथ अपने घर लौटे हर गांव व बस्ती के रामलाल की लाश है. 


यह लघुकथा अगस्त 2021 के "पाखी" पत्रिका में प्रकाशित है.

लेखक -- रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (उत्तर प्रदेश)
222002
Mo. No. -- 7800824758

कविता---(जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है )

(जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है)
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है,
जिसे मोड़कर कई दिनो से यूँही रख दिया है,
कि समय मिलते ही फिर उस पृष्ठ को खोल पढ़ुगा,
अपने जीवन के हूबहू घटनाओ की वे तमाम बाते,
यानी की गतांक से आगे---------------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
तमाम उठा-पटक झंझावतो का जीवन,
कही कोई विदेशी रोमांटनिजम नही,
एक विछोह,एक दर्द,
हर पृष्ठ के कथनांक के आगे--------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
इसी मोटी सी किताब को,
कुछ लोग लुगदी साहित्य कह,
यू छिटक जाते है जैसे मंटो की भूखी नायिका,
अपने से ज्यादा नंगो को देखती है,
अपनी काली सलवार और कपकंपाती टाँग के आगे-----
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।
कुछ पन्ने और बचे है पढ़ने को,
कल खत्म कर लुंगा इसे भी,
और बिना मोड़े रख दुंगा,
फिर इच्छा ही नही बचेगी इसके पढ़ने की,
क्योंकि पता चल जायेगा कि क्या कुछ लिखा है,
एै"रंग" इस नावेल मे गतांक से आगे-------
जिंदगी मेरी नावेल सी हो गई है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

कविता---(इतवार जीते है )

(इतवार जीते है)
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है,
वे उस शहर,हम इस शहर
दूर रहके भी-------------
हम इतना प्यार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
वे गीले बाल उनका कमरे में आना,
उतने ही पानी से हम--------------
तड़प के सावन की फुहार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।
छः दिन गुजारते है हम नागफनी के,
फिर लौटते है लेके उन्हे केवड़े का गजरा,
ऐ,रंग---------------
हम इतनी ही खुशी का त्यौहार जीते है।
हम नौकरीपेशा इतवार जीते है।

कविता---(गीतों का सर्कस )

( गोपालदास नीरज के गीतो का सर्कस) 
नीरज ने मेरा नाम जोकर लिखा था, 
लोग आते रहे, लोग जाते रहे
अँधेरा--उजाला होता रहा, 
ये सर्कस सा जीवन--------
कभी इस शहर, कभी उस शहर चलता रहा. 
कोई बसा, कोई ठहरा कुछ ही दिन, 
फिर चल पड़ा ,
सर्कस ही सर्कस चारो तरफ, शहर दर शहर 
वे सिनेमा का सर्कस 
ये जीवन का सर्कस, जोकर के आँसू भी 
एक तमाशा, 
वे जोकर थे नीरज जो हँसे और रोये,
कभी खाली तो कभी भरी पेट सोये,
फिर थिएटर भरा और तमाशा हुआ, 
खाली हुआ फिर एक दिन-------
वे देखो चला दुनिया को छोड़े कोई नीरज नही,
गीतो का अपने वे राजू जोकर. 

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी. 
जज कालोनी, मियाँपुर 
जिला---जौनपुर पिन नं. --222002 (उत्तर-प्रदेश)
मो. नं. --7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है. 
महा-गीत पुरूष को हमारा प्रणाम ।

कविता---(दीवाना रोया है )

(दिवाना रोया है)
ये जो सारी रात------------
शहर मे बरसात हुई है,
कही किसी की याद मे----
कोई दिवाना रोया है।
ये बिजली,ये चमक--------
किसी बंद हवेली के जले चराग से,
लिपट------------------
आखरी लम्हे कोई परवाना रोया है।
कल सहर के बाद--------------
निकल के देखना तुम आलमे बारिश,
एक हमी है जो जानेगे,
कि कल सारी रात तड़प के----
किसी का अफसाना रोया है।
ये जो सारी रात--------------
शहर मे बरसात हुई है,
एै,रंग------किसी की याद मे,
कोई दिवाना रोया है।

Monday, 2 August 2021

कविता---(दोस्ती )

फ्रेंड डे की बधाई के साथ इस रिश्ते पे लिखी एक कविता----
       
(दोस्ती कागज़ के नाव की थी)

उसकी और मेरी दोस्ती कागज़ के नाव की थी.
आम-अमरुद,बरगद,पीपल और
दरवाजे पे लगे नीम के छाँव की थी-----
उसकी और मेरी दोस्ती कागज़ के नाव की थी.

साथ मे घुमना और घंटो टहलना,
खेत की पगडंडियो पे चलना,
सच एै शहर-------------
बीना स्वार्थ और मतलब के कितनी पाकिज़ा दोस्ती,
हम दोनो के गाँव की थी-----
उसकी और मेरी दोस्ती कागज़ के नाव की थी.

कितनी डांटे सही,कितनी शिकायते सुनी,
माँ के चाटे खाये-----------
फिर भी चोरी से मिलते रहे दोनो,
क्योंकि वे दोस्ती हम दोनो के बेइंतहा लगाव की थी-----
उसकी और मेरी दोस्ती कागज़ के नाव की थी.

कंचे खेले,आम के बाग से अंबिया तोड़ी,
साथ पोखर नहाये,
दोस्ती के वे सारे मखमली दिन छिन गये,
रोटी की हत्तक मे कहाँ से कहाँ चले आये,
एै"रंग" याद इसलिये है जेहन को,
क्योंकि वे दोस्ती,
हम दोनो के दो जिस्म मगर एक जान की थी-----
उसकी और मेरी दोस्ती कागज़ के नाव की थी.

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

दैनिक अमर उजाला के साप्ताहिक मनोरंजन पृष्ठ के हास्यरंजनी में दिनांक 1,8,2021 को प्रकाशित मेरा व्यंग्य--(बाबू की महिमा )

दैनिक अमर उजाला के साप्ताहिक मनोरंजन पृष्ठ के हास्यरंजनी में दिनांक 1,8,2021 को प्रकाशित मेरा व्यंग्य---( बाबू की महिमा )

चापलूसी करना काफी टिपिकल और शास्त्रीय कला है.यह कला ज्यादातर सरकारी विभागों के बाबुओ या क्लर्को में सर्वाधिक पाई जाती है.जब भी इनके विभाग में किसी नवागांतुक साहब का आगमन होता है तो यह उस विभाग के सारे कर्मचारियों से बहुत पहले साहब के स्वभाव की सारी ए बी सी डी जान लेते है और फिर यह साहब के स्वभाव के हिसाब से ही उनके साथ अपना रजिस्टर्ड वातानुकूलित व्यवहार करना शुरू कर देते है.

क्लर्क या बाबू किसी भी विभाग में काम करने वाले व्यक्ति या मनुष्य की गिरगिट प्रजाति है.अगर वास्तव गिरगिटो में जरा सी भी मनुष्यगत बुद्धि होती तो यह सच जानिए की इस देश के समस्त गिरगिट मिलकर इनके खिलाफ इस आशय का एक मुकदमा दर्ज़ करते कि साहब यह मनुष्य हमारे रंग बदलने की हुनर को अपने रंग बदलने की हरकतों से बदनाम कर रहा है.अतः हमारे इस प्राकृतिक स्वभाव की रक्षा की जाए.


जैसे ही कोई व्यक्ति ऑफ़िस में अपना काम करवाने के लिए प्रवेश करता है, तो उसे सबसे पहले अपनी डिजिटल मुस्कुराहट बाबू या क्लर्क की तरफ सरकानी पड़ती है. इस मुस्कुराहट का गुरुत्वाकर्षण बल तभी ठीक तरिके से काम करता है जब आप बाबू को अर्थ रूपी आइंस्टीन के नियम से संतुष्ट कर लेते है.नही तो वह आपको अपनी एक मीठी सी रसमलाई टाईप की  मुस्कुराहट के साथ काम ना हों पाने के तमाम गलत-सलत सॉफ्टवेयर आपकी बुद्धि की मोबाईल में चढ़ा देगा, फिर आप भी यही समझेंगे कि आपके काम में ही कही वायरस है.


अतः उस विभाग में आपका आवश्यक कार्य कही से हैंग ना हों इसके लिए अगर आप उस विभाग का चरित्र सही ढंग से नही समझ पा रहें है तो इसके लिए उस विभाग के आस-पास टहल रहें किसी प्राइवेट विद्वान का सहारा लें,जो कि इन बाबुओ या क्लर्को के ही इसारे पर काम करने वाले इनके चचेरे भाई है.


अतः बाबू या क्लर्क के संबंध को आप मेडिकल की भाषा में भी समझ सकते है, अर्थात जो अंदर है वे डिग्री धारी है और जो आफ़िस के बाहर है वे शुद्ध रूप से झोलाछाप है.जो कि आपका केश बहुत बिगड गया है,को समझाते हुए इतना डरा देगे कि आप तुरंत ही कही से पैसे का जुगाड़ कर एक बार फिर लौट के "बुद्धू घर को आए, " के बुद्धू की तरह एक बार फिर अपनी बत्तीसी चियारे बाबू या क्लर्क के पास पहुंच जाएंगे.


और बाबू आपको देखते ही एक बार फिर अपनी होलमार्क मुस्कुराहट का प्रदर्शन आपके सामने करेगा और जैसे ही आप पैसा देंगे वैसे ही आपके काम के अवरोध का सारा प्रदूषण नष्ट हो जाएगा.कहावत है कि बाबू या क्लर्क कि भाषा का व्याकरण किसी भी हिंदी साहित्य कि किताब में लिखा नही जा सका. हां! यह शायद कभी किसी कालखंड में हों सकता है कि कोई बाबू या क्लर्क कि भाषा के व्याकरण पर कुछ लिख सकने वाला कोई हरिशंकर परसाई पैदा हों.


यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.


लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जौनपुर 222002 (U P )
mo. no.7800824758

Sunday, 1 August 2021

कविता---(सावन में मिली थीं )

(वे हमे सावन मे मिली थी)
पहली मर्तबा हमे-वे सावन मे मिली थी,,
मै तर-ब-तर भीगा था,वे तर-ब-तर भीगी थी।
पहली मर्तबा हमे वे सावन मे मिली थी।
उफ!वे बरगद का पेड़ आज भी,,,,,,,,
मेरी ज़ेहन मे ज्यो का त्यो है-------
क्योकि मै भी वही खड़ा था और वे भी वही खड़ी थी।
पहली मर्तबा हमे वे सावन मे मिली थी।
मै खामोश न रहा,मेरे सामने गज़ल थी,,,,.
वे शर्म से सिमटी रही------
और मै बेधड़क कहता रहा,,,,,,,,,,,,,,,,,,
शायद मेरी ज़ूबां मे ही-----------
उसको अपनी ज़ूबा मिली थी।
पहली मर्तबा हमे वे सावन मे मिली थी।
ऐ,रंग------फिर थमी बारिश़--------
फिर अगले सावन मे हमे--------
वे पत्नी बन मिली थी।
पहली मर्तबा हमे वे सावन मे मिली थी।

कविता---(पायल )

(पायल------एक दर्द)
अपने माँ-बाप के दुलार से बनाई गई पायल,
सुना है कि-----------
ससुराल मे जलाई गई पायल।
माँ दहाड़े मारे रो रही और बाप गुँगा हो गया,
न जाने कैसे उन पापियो का कलेजा नही कांपा,
एक माँ को आखिरी बार----------
उसके मरती हुई बिटिया की ना सुनाई गई पायल।
सोचा था भेजेगी इसके बापु को लाने,
लेकिन हाय रे! निष्ठुर समय---------
कि एक माँ तड़प रही मछली की तरह,
उसके आँख के पानी के एक-एक बुँद की तरह-----
तोड़े गये घुँघरू और पुरे कमरे मे घुँघरू दर घुँघरू,
बहुत तड़पाई गई पायल।
जिससे ब्याहा था खुशी-खुशी वे भी था शामिल,
उन कातिलो में,
हे! भगवान तु भी चुप था बिटिया तड़प रही थी,
उसकी तड़प मे चीख़ रही थी-----------
पती के हाथो पहनाई गई पायल।
सास का कलेजा क्यू  कांपा नही,
क्यू पथरा गई, क्यू डायन हो गई,
आखिर इसकी बिटिया का कसूर क्या था?
जबकि हर काम की खातिर एक पैर पे------
पुरे घर मे दौड़ाई गई पायल।
एक माँ-बाप का श्राप है,
कि उतना तुम सब भी रोओगे-तड़पोगे,
जितना तुम्हारे घर में------
हमारी रुलाई गई पायल।
माँ-बाप के  दुलार से बनाई गई पायल,
सुना कि----------
ससुराल में जलाई गई पायल।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

शायद हम आप प्रयास करे तो कुछ पायल घर के मंदिर मे किसी सुमधुर संगीत की तरह बजती और खिलखिलाती रहे।

कविता---(बकरा )

सभी को बकरईद की बहुत-बहुत बधाई. 
एक बकरे का अथाह दर्द-------

(बकरा)

पालने वाले मालिक से खरीदकर,
जब कसाई------
जबरदस्ती पकड़े ले चलेगा बकरे को
उस गाँव,उस गली से
जहां वे इतने दिन पला बढ़ा है,
तो में में में कर रोता जायेगा वे रास्ते भर।
गर रास्ते में कही देखेगा वे बकरी का मेंमना,
तो सोचेगा---
कि देखो कितना उछल कुद रहा,
गले में घंटी और घुँघरू पहने,
अपने अंजाम से बेखबर,
कितना खुश है ये मेंमना!
यही जब बड़ा हो जायेगा तो इसको भी खरीदने,
फिर इसी गाँव और गली में आयेगा एक कसाई!
ले जायेगा फिर में में में करते हुये बकरे को,
फिर कसाई उसे तमाम बकरो में खड़ा कर,
खू से तरबतर -----------
जब इसको भी काटने की तरफ बढ़ेगा,
तो एक मर्तबा फिर बकरे को----------
वे गाँव,वे गली,वे मालिक याद आयेगा।
फिर कसाई------------
गले को बेरहमी से काटेगा रेतेगा,
और में में में में कर तड़पड़ा के,
अपने ही खून में कुछ देर के बाद,
हमेशा के लिये शांत हो जायेगा बकरा।

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758