Tuesday, 28 January 2025

(कासगंज)

कासगंज के दंगे का एक टिसता दर्द--------------
                     (पुरानी कासगंज हूँ)
मुझे तो सियासत ने जला दिया मेरे बेटो,
ठहरो------------
मै तुम्हारी माँ ,मौसी ,खाला और
वही पुरानी कासगंज हूँ।
मैने अपनी इन आँखो से ईद और होली देखि है,
लेकिन आज चौराहे पे खुशी नही,
बल्कि अपनो की लाश देख दंग हूँ-------
मै वही पुरानी कासगंज हूँ।
मुझे मेरी खुशी लौटा दो,
फेक दो ये असलहे,ये खंजर
खत्म हो जाये शहर और गली का ये सहमापन,
देखो मेरी सिहरन,
और नोच-खसोट के निशान,
मुझे भीख मे दे दो,
और लौटा दो मेरे बेटो मेरी खुशी,
क्योंकि मै सियासत नही----------
तुम्हारी वही वर्षो पुरानी कासगंज हूँ।
मुझे तो सियासत ने जला दिया मेरे बेटो,
ठहरो,
मै तुम्हारी माँ,मौसी,खाला---------
वही पुरानी कासगंज हूँ।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी,
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Monday, 27 January 2025

शबरी और कुबडी में भेद नहीं है,
वाल्मीकि और रैदास 
डुबकी लगा रहे 
तुम भी नहा लो हमें कोई खेद नहीं है
तुम्हें चिढ़ है 
क्योंकि तुम्हारे मन की कंठी 
और कंठ में विश्व का कल्याण हो 
का मंत्र 
वेद नहीं हैं.






Thursday, 23 January 2025

(मुल्क की याद आती हैं)

(मुल्क की याद आती है)
इस गैरे मुल्क में-----------------
बड़ी शिद्दत से मुझे अपने मुल्क की याद आती है।
खोल देता हूं खिड़कियाँ,
और घंटो टहलता हूं कमरे मे-------
जब रात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
तकता हूं चाँद तो बीबी का चेहरा नुमाया होता है,
याद फिर उसकी हर बात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
तारे जैसे हो मेरे मासूम बेटे,
उन तारो से गुफ्तगू करता हूं,
लेकिन उन्हे जब प्यार करने को बढ़ाता हूं हाथ,
तो बस खाली हाथ रहता है,
मेरे हिस्से यही इतनी सी सौगात आती है!
अपने मुल्क की याद आती है।
फिर खिड़की से---------------
अंदर आती है एक झीनी सी रौशनी,
जैसे मेरे अब्बु की दुआ!
फिर हवा की एक ठंडी छुवन मे अम्मी की मोहब्बत,
उफ!ये रोटी,ये दोज़ख की बेबसी
कि सहर होने तलक-------------
अपने घर के हर शख्स की जरुरत,
और बहन के निकाह की-----------
याद बस इमदाद आती है!
इस गैरे मुल्क मे------------
बड़ी शिद्दत से मुझे अपने मुल्क की याद आती है।
## # मुल्क से बाहर कमा रहे एक शख्स के अंतरमन की व्यथा।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

(26 जनवरी है)

(26 जनवरी है)
कीटनाशक पी के-----------
अभी ख़ुदकुशी किये किसान की लाश,
उसके खेत की मेड़ पे पड़ी है-----------
सुना है आज 26 जनवरी है।
एकटक तके जा रही उसकी बिटिया,
अपने बापु की लाश को,
क्या करे बेचारी रो भी तो नही सकती,
अपने भाई और बहनो मे सबसे बड़ी है,
तभी वे अपने जवान सिने से दुपट्टा उतार,
ढ़कती है अपने बापु की लाश,
उसकी पैबन्द लगी सलवार का यू नंगा होना,
साबित करता है कि----------
अभी बहुतो से दुर इस देश मे 26 जनवरी है।
बस कुछ देश लुटने वाले घंटो बोलेंगे भाषण देंगे,
इशारो पे तालियाँ बजाई जायेगी,
इन्ही के अगल- बगल किमती सोफे होगे,
पांव तले मसलने को दरी होगी,
शायद एै "रंग" इतने ही लोगो तलक पहुँची-----
हमारे इस देश की 26 जनवरी है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Wednesday, 22 January 2025

(वंदे मातरम गाए)

(वंदे मातरम गाये)
शहीद की लाश को जब गाँव दफनाये,
तो वंदे मातरम गाये।
ना बीबी तोड़े चुड़ी,ना आँसू बहाये--
माँ भी हँसती हुई सबके सामने आये,
ऐ,रंग--इस शहीद की है आखिरी इच्छा,
सरहद पे मेरा बेटा भी-------
होके लहू-लुहान वंदे मातरम गाये।

(उन्मुक्त होना चाहती हूं)

(उन्मुक्त होना चाहती हू)
मै फिर से बचपन की तरह-------
स्वछंद और उन्मुक्त होना चाहती हू।
जीना चाहती हु मखमली पल,
भरना चाहती हू फिर----------
हिरनी के मेमनें की तरह कुलांचे,
और पियराई सरसो के बीच,
फिर खड़ी होने की चाह,
वे बासंती हवा का श्पर्श,
फिर शर्म की सिहरन से शर्माई आँखे,
अपनी थरथराती--------------
हथेली से ढकना चाहती हू।
मै फिर से बचपन की तरह-------
स्वछंद और उन्मुक्त होना चाहती हू।
इधर-उधर लापरवाह से वे खुले बाल,
वे बीना ओढ़नी----------
खेतो की मेड़ो पे चलना,
बीना किसी डाट,बीना किसी डर के,
एै जिंदगी------------
मै फिर से अपनी साँसो में,
वही बचपन बोना चाहती हू।
मै फिर से बचपन की तरह-------
स्वछंद और उन्मुक्त होना चाहती हू।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Tuesday, 21 January 2025

(प्राण प्रतिष्ठा में नहीं आए)

हे!श्री राम आप विपक्ष को सद्बुद्धि दे!
 
(प्राण प्रतिष्ठा में नही आए!)

हे!राजनीति के असुरों,
तुम,हमारी धर्म और निष्ठा में नहीं आए
प्रभू श्री राम कि
प्राण प्रतिष्ठा में नही आए.

तुम्हें राज चाहिए
तो तुम भूल जाओ 
ऐ हमारी आस्था के औरंगजेबों 
हमे पता है कि, तुम फर्जी 
दलित हित में चीखते हो 
जबकि तुम
इंतजार करती हुई किसी 
राम भक्त शबरी के घर नही आए.

अयोध्या में
भरत के प्रेम के खड़ाऊं 
में राम परिलक्षित थे 
लेकिन तुम
भीतर के अक्रांता
उस खड़ाऊ में
भाई के लिए ,किए गए
एक भाई के सत्ता त्याग को
देख नही पाए.

सरयू के पानी में 
कैकई और कौशल्या के आंसू 
टपके थे,
तुम ऐसी मां की पीड़ित
उस प्रतीक्षा में नही आए.

जाओ! तुम्हें 
अयोध्या शापित करती है,
कि तुम 
सिर्फ मुस्लिमों के यहां
इफ्तार करोगे,
क्योंकि तुम
हमारे प्रभू श्री राम
कि होली, दीवाली की भक्ति 
और उनके किसी इफ्तार में नही आए.

तुम,हमारी धर्म और निष्ठा में नही आए
प्रभू श्री राम कि
प्राण प्रतिष्ठा में नही आए.

✍️✍️ यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियापुर
जिला-जौनपुर (U P)

हरिभूमि

आज दिनांक 21/1/24 को दैनिक हरिभूमि के साहित्य पृष्ठ "रविवार भारती" में प्रकाशित मेरी लघुकथा के प्रकाशित होने की जानकारी देने के लिए देश के वरिष्ठ और बहुचर्चित लेखक और साहित्यकार बड़े भैया शिखर चंद जैन और रेखा शाह आर बी जी का बहुत बहुत धन्यवाद ✍️✍️🙏🙏

Friday, 17 January 2025

(आवारा लत है)

(आवारा लत है)
तड़प-तड़प के,---------
मर जाऊँगा बेशक मै,,
पर नही छोड़ पाऊँगा तुझको------
तु मेरी आवारा लत है।

(पत्नी पतंजलि की मिल गई)

(मुझे पत्नी पतंजलि की मिल गई)
सुबह होते ही-----------
कपाल भाति और अनुलोम-विलोम कर गई,
हाय!राम---------
मुझे पत्नी पतंजलि की मिल गई।
एलोवेरा और आँवले के गुण बता रही,
मुझे तो अपने जवानी की चिंता सता रही,
हे! बाबा रामदेव----------
आपने मेरी खटिया खड़ी कर दी,
सारे रोमांस का नशा काफुर हो गया,
ससुरी पति के प्यार का आसन छोड़-----
आपके योगासन मे पिल गई।
हाय!राम-----------
मुझे पत्नी पतंजलि की मिल गई।
रोज च्यवनप्राश और दूध का सेवन,
पचासो दंड बैठक,
मै निरुपाय तक रहा उसका रुप लावण्य,
तीन दिन हो गये हाथ न लगी,
डर है कि ये दिन कही तीस न हो जाये,
उफ!ये दूरी-----------
यही सोच के मेरी बुद्धि हिल गई।
हाय!राम------------
मुझे पत्नी पतंजलि की मिल गई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Thursday, 16 January 2025

(चूड़ीदार हो जाऊ)

(चुडिहार हो जाऊँ)
तेरी चाहत में-
सारी हदो से पार हो जाऊँ।
तुम्हे देखने की खातिर,टहलु तेरी गली,
बेशक ऐ,रंग मै-
ब्राह्मन से चुडिहार हो जाऊँ।

(पुराना खत)

(पुराना खत)
बड़ा संभाल के रंखा है,
तेरी याद की दराज़ में------
हमने पुराना ख़त।
तु बिछड़ी,जुदा हुई हमसे,
फिर भी ये शकु था कि,हमसे ना मांगा--
तुमने पुराना ख़त।
है ये ख्व़ाहिश कि गर----
आखिरी हिंचकी भी आये,
तो मेरी तकिये के नीचे से----
निकले पुराना ख़त।
ऐ,रंग----वे लाश-ए-दफ्ऩ पे भी,
नही आयेगी,
उसे उसकी मजबुरियाँ रोकेंगी,
पर गम नही,
बस मेरे कब्र-ए-सिरहाने कोई चराग नही,
जलाना पुराना ख़त।

प्रेम का उत्प्लावन बल

♥️♥️ प्रेम के उत्प्लावन बल की परिभाषा ✍️✍️जब किसी पचास वर्ष के पुरुष को 🤠🤠कोई पैंतालीस वर्ष की महिला अपनी विशेष नजरों से देखने के बाद हल्के से मुस्कुरा दे 💃💃 तो उस समय पचास वर्ष के पुरुष के दिल की टोटल धड़कन,,किसी युवा लड़के के दिल की टोटल धड़कन के समकक्ष धड़कने लगे 🫄🫄 तो उस धड़कन को हम प्रेम के विज्ञान का उत्प्लावन बल कहते हैं 🤱🤱🫄🫄

Wednesday, 15 January 2025

जोक्स

😥मूंह बांध के खरीदारी कर रही पत्नी को ना पहचान पाने की वजह से,,,,पति ने उस पर डोरे डालने की कोशिश की🥸तब से बेचारे वे पति अपनी पत्नी के कपड़े धुलकर,, सूखने के लिए छत पर डाल रहे हैं 💔

Tuesday, 14 January 2025

पतंग वाले चाचा

आज दिनांक 14/1/2024 को कोलकाता से प्रकाशित दैनिक वर्तमान के साप्ताहिक पृष्ठ पर प्रकाशित मेरी कहानी "पतंग वाले चाचा" को स्थान देने के लिए धन्यवाद संपादक सर का✍️✍️🙏🙏

Monday, 13 January 2025

(चैन से सोने नहीं देगी)

(चैन से सोने नही देगी)
मेरा कत्ल-
तेरी जिंदगी का आखिरी होगा।
तडपोगे,ऐ रंग-जब मेरी चीख,
तुम्हे चैन से सोने नही देगी।

(तेरी कोख मां)

(तेरी कोख़ माँ)
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ,
लड़ खड़ी हो ज़माने से,
तु भी है एक बेटी ये सोच माँ।
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ।
दे प्यार,लोरियाँ गा,मेरा हक दे,
उठा!एक बेटे की तरह,
मुझको भी ले अपनी गोद माँ।
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ।
उगने दे ये चाँद,उतरने दे अपने आँगन,
मै यकीन दिलाती हूँ-----
कि तुम अपने बेटे से भी ज्यादा करोगी----
एक दिन इस बेटी पे नाज़ माँ।
कौन जाँचेगा तेरी कोख़ माँ।

सेब द चाइल्ड।

(कटाक्ष)

चुनावी कटाक्ष------शुक्रवार
(बेचैन एक शुपनखा हो गई)
जब से साथ में डिंपल और प्रियंका हो गई,
तब से और खूबसूरत-----------
ये चुनाव की लंका हो गई।
एै "रंग" साँप लोट रहा सीने पे-----
इनके मिलने से बेचैन एक शुपनखा हो गई।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान-अंकुर,निर्मेश के त्यागी भइया और धन्यवाद चुनावी कटाक्ष के उस कालम का जहाँ मुझे अनवरत प्रकाशन के साथ नित नये कटाक्ष की अभिव्यक्ति को व्यक्त करने का सुअवसर मिल रहा है।

(कथ्य)

✍️✍️जिस देश के समस्त दैनिक समाचार पत्र महज विज्ञापन के लिए अपने समाचार पत्रों से😥😥 "साहित्य पृष्ठ काट देते हो उस देश में हम साहित्य के जीवित रहने की परिकल्पना नही कर सकतें"🙏🙏

Saturday, 11 January 2025

(बाहों में गीत रोए)

(बाँहो मे गीत रोये)
गज़ल की बाँहो मे गीत रोये,
रोये शहनाई तेरी याद की,
तो बाँसुरी भी लबो से भीग रोये।
गज़ल की बाँहो मे गीत रोये।
एक तरफ तेरे इंतज़ार की श़मा,
तो दुसरी तरफ विरह के दीप रोये।
गज़ल की बाँहो मे गीत रोये।
लौट आ ऐ,रंग----फिर से मेरी दुनिया मे,
कि तेरी प्रीत रोये।
गज़ल की बाँहो मे गीत रोये।

(रेप से जैनब मरी है)

उफ! मासूम जैनब
                     (रेप से जैनब मरी है)
ये जो रेप से जैनब मरी है,
किसी वालिद की बिटिया,
किसी की जीऩत,किसी की परी है-------
ये जो रेप से जैनब मरी है।
जिस्मानी भूख और हवस की हद है,
वे मासूम कितनी चीख़ी होगी,
या अल्लाह! वे कौन? नमाज़ी था,
कि मरने के बाद भी लग रहा की,
जैसे जैनब बहुत डरी है---------
ये जो रेप से जैनब मरी है।
इंसाफ़ मांगे किससे,
खामोश है पाक मे तहरिक-ए-इंसाफ़,
गोलियां मिली शायद यही किस्मत है,
हर मुल्क के जैनब की,
लेकिन जैनब सी किसी मासूम की लाश,
शर्मिंदगी से सर झुका देती है,
क्योंकि किसी भी मुल्क की जैनब,
हमारे मज़हब और मज़हबी किताब से कही बड़ी है,
ये जो रेप से जैनब मरी है।

@@@पाकिस्तान मे एक मासूम जैनब को मेरी श्रद्धांजलि।

Friday, 10 January 2025

(मां की लोरी रह जाती है)

(माँ की लोरी रह जाती है)
माँ--------
मै ढ़ेरो खाता हूँ,
पर तेरी चुपड़ी रोटी की भुख रह जाती है।
आज सब कुछ है,,,,,,
स्लीपवेल के गद्दे एसी कमरे----
पर नींद घंटो नही आती है।
ऐ,रंग----यादो में----
माँ की गोद---------
और लोरी रह जा है।

(लडकपन)

(लड़कपन अक्षम्य इतने बड़े प्रदेश मे है)
बीना सेनापति के सारे काग्रेंसी बड़े पेशोपेश में है,
इनके राहुल गाँधी विदेश में है।
उफ!लुटिया डुबो देगे ये बची-खुची भी,
क्योंकि एै"रंग"------------
ये लड़कपन अक्षम्य इतने बड़े प्रदेश में है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
धन्यवाद!आज के दैनिक समाचारपत्र वर्तमान-अंकुर का,निर्मेश के त्यागी भइया का और धन्यवाद मेरे स्नेहवत चालु किये गये उत्तर-प्रदेश के चुनाव तलक का कालम चुनावी कटाक्ष का।
24 मिनट · गोपनीयता: सार्वज

Thursday, 9 January 2025

(होंठों की कैद में है)

(होंठो की कैद मे है)
उसने पेंच दर पेंच पहना दी हथकड़ी हमको,
हम अब उनकी मस्त सी जूल्फों की कैद मे है।
जी भी नही करता कि वे रिहा कर दे,
डाल दे कोठरी मे वे सज़ा दे----------
हम तो उनकी आँखो की कैद मे है।
ये सुखन-ऐ-किस्मत है मेरी---------
कि मेरा ये बदन उनकी बाँहो की कैद मे है।
मेरी प्यासे तड़प बुझ जाती है रोज,
क्योंकि इंतजार के सहरा के उस तरफ़,
वे पिलाती है हमें झील का पानी,
जो केवल उसकी---------
दो खूबसूरत सी होंठो की कैद मे है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

Wednesday, 8 January 2025

(मेरी रूह कैद है)

(मेरी रुह कैद है)
ऐ बेवफ़ा--------
मुझे आजाद कर दे,
क्यूकि तेरे शहर में-----
अब तलक मेंरी रुह कैद है।

Tuesday, 7 January 2025

(कुरान सी लगती हैं)

(कुर्आन सी लगती है)
हाँ!ये काफ़िरी है--------
मै कुब़ूल करता हूँ,,
कि ऐ,रंग-------मुझे-------
गरीब की बिटियाँ कुर्आन सी लगती है।

(रूह बोलेगी)

(रुह बोलेगी)
मेरा कत्ल इतना आसान नही,
मै सच का मुहाफिज़ हूँ।
ऐ,रंग-
गर दफ्ऩ भी हुआ,
तो मेरी रुह बोलेगी।

Friday, 3 January 2025

(संविधान फाड़ेंगे)

महाराष्ट्र के दलितो के साथ हुये अन्याय पे कुछ लाइन--------
                         (संविधान को फाड़ेंगे)
अच्छे दिन को---------
इस मुल्क के कैनवस पे कैसे उतारेंगे,
गर कुछ लोग जाति के नाम पे--------
दलितो को मारेंगे।
आखिर इन्हें कौन देता है मुहलते-----
ये आग लगाने की!
क्यों इन्हें डर या खौफ़ नही कानून का,
यदि यही हाल रहा तो एक दिन,
दलित कह---------
कुछ लोग अंबेडकर के संविधान को फाड़ेंगे।

जोक

✍️✍️गिद्ध की तरह हमारे देश से "नाड़े वाले पजामे विलुप्त हो रहे हैं",,आईए इसके संरक्षण के लिए हम सभी बाजार से जींस की बजाए 😜😜"कुछ नाड़े वाले पजामे खरीदे"🥸🥸