Friday, 14 February 2020

लेख---(पाकिस्तान आतंकवाद के एड्स की चपेट में )

पाकिस्तान--(आतंकवाद के एड्स की चपेट में)

आज पूरा पाकिस्तान-"आतंकवाद के एड्स की चपेट में है." ये एड्स समूचे पाकिस्तान मे अब एक महामारी का रूप अख्तियार कर चुका है. ये एड्स पाकिस्तान के लिए नया नहीं है, अपितु इसके प्रारंभ काल से ही है. इन्होंने कभी भी स्वस्थ लोकतंत्र को अपनाया नहीं. अगर अपनाया होता तो, उसे अपने-"आतंकवादियों से अवैध संबंधो का खामियाजा एड्स के तौर पर न भुगतना पड़ता. उसके यहां आतंकवाद का ये एड्स मोहम्मद अली जिन्ना से ,याहिया खान, मुशर्रफ,से लेकर इमरान और बाजवा तक आ पहुंचा है. 

आज इमरान खान-"दोज़ख जैसी अन्तर्राष्ट्रीय बेज्जती से दो-चार है. इसी एड्स ने पूरे विश्व में पाकिस्तान की छवि एक भिखमंगे मुल्क़ की बना रखी है, और उसपे भी चार-चाँद ये है, कि-"भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सर्जिकल स्ट्राईक के बाद अपने दूसरे कार्यकाल के प्रारंभ में ही कश्मीर से धारा 370, artical 35A को हटाकर गृहमंत्री अमित शाह का पाक अधिकृत कश्मीर(pok)को भी अपना बताना उनके आतंकवाद के एड्स का भयावह मुहर्रमी मातम है"

   
 नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को इसी आतंकवाद की एड्स ने लाल कपड़ा दिखाने की गलती की है. ये मोदी और शाह के पलटवार का परिणाम  ही है कि,आज पाकिस्तान पूरी दुनिया में पगलाया फिर रहा. कभी ट्रंप,  शिजिनपिंग, कभी पुतिन सभी इस आतंकवाद के एड्स से पीड़ित पाकिस्तान को नकार रहे है.
 
   जिस तरह मेडिकल लाईन मे एड्स से बचने के सुरक्षित उपाय है, ठीक उसी तरह वैश्विक राजनीति में भी आतंकवाद के इस एड्स से  बचने का सुरक्षित तरीका व इलाज है. लेकिन कभी भी पाकिस्तान ने इस तरीके व एहतियात का पालन नहीं किया, 

     पाकिस्तान ने इस आतंकवाद के एड्स को भारत मे भी फैलाने की पुरी कोशिश की, वे कुछ दिनों तक सफल भी रहा, लेकिन भारत में भाजपा व मोदी की सरकार के बनते ही मोदी के कुशल राजनैतिक तरीकों से कश्मीर से 370 और 35A को हटाकर -" पाकिस्तान के आतंकवादी एड्स का एक और सफल सर्जिकल स्ट्राईक करके करारा जवाब दिया".

 ये लेख पाकिस्तान -" आतंकवाद के एड्स की चपेट में" पूर्ण हुआ----वंदेमातरम.

यह लेख मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है.

लेखक-- रंगनाथ द्विवेदी
जजकालोनी मियाँपुर
जिला-- जौनपुर 222002(U.P.)
Mo.no.7800824758

व्यंग्य---(हमारी लोटा विरादरी )

व्यंग्य-----
             (हमारी लोटा बिरादरी)

वे एक बित्ते की मोटी चुटिया और भर माथे ललाट पे-उगते सूर्य की तरह का चंदन लेप,वे खटर-पटर करता खड़ाऊँ, हष्टपुष्ट शरीर पे सुती जनेऊ, ये मनोहारी आकार-प्रकार किसी और का नही अपितु,हमारी ब्राह्मण बिरादरी का है,जिसे ब्राह्मण के अलावा लोग "लोटा बिरादरी के नाम से भी जानते  है".

हमारे कुलवंश में पैदा हुआ बच्चा हमेशा से ही अपने--"लोटे का मजबूत माना जाता है". इस लोटे की तासीर ही कुछ ऐसी थी कि--"जितना लोग ब्राह्मण के ज्ञान से प्रभावित होते थे,उतने ही प्रभावित वे उसके लोटे से होते थे". कही कथा,प्रसाद,भोजन की बात होती थी तो यजमान मय-परिवार के ब्राह्मण के लोटे या अपने लोटे से उनका अलौकिक चरण-रज धोता था .एक तरह से ब्राह्मण के साथ ही लोटा भी इस संम्मान के आनंद को महसूस करता था.

"ब्राह्मण का लोटा भी कोई सामान्य लोटा नही होता था,ये पीतल का बना दो से ढाई किलो का होता था". ये लोटा काफी सारगर्भित व ब्राह्मण की ही तरह विद्वान दिखता था. अग्रेंजी मे एक कहावत भी है कि--"फस्ट इम्प्रेशन इज द लास्ट इम्प्रेशन" ऐसा ही कुछ काम काफी हद तक ब्राह्मण का चर्चित ये लोटा कर जाता था.

कई गाँव-गिराव मे आज भी बहुत सारे किस्से ब्राह्मण बिरादरी के इस ऐतिहासिक लोटे को लेकर बतायी व सुनाई जाती है. "जिसे लोग रासो काल के साहित्य की तरह सुनाते है". जिसे सुन मुझे ब्राह्मण होने के गर्व का आभास होता है. ऐसा ही एक किस्सा था-- कि एक ब्राह्मण राज-पुरोहित जो की उस समय ब्राह्मण ही होता था अपने अलौकिक लोटे के साथ मैदान निपटने गये थे,तो अचानक से एक शेर आ गया लेकिन वे इतने हिम्मती व साहसी थे कि उन्होंने--"अपने उसी लोटे से शेर को धराशायी कर दिया था".

ये ब्राह्मण या लोटा बिरादरी केवल दुसरी बिरादरी ही नही अपितु अपनी बिरादरी के कुमार्गी ब्राह्मण को भी "अपने समाज़ के लोटे से वंचित कर देते थे". फिर कोई ब्राह्मण उसके यहा खाना-पीना,आना-जाना तक छोड़ देता था ये सजा और दंड का एक तरीका भी था. आज की पीढ़ी भी लोकतंत्र के चुनाव मे हम ब्राह्मणो से ये जानने को बेचैन दिखती है कि ये--"बिरादरी इस बार अपना लोटा कहा बजायेगी अर्थात किस पार्टी के पक्ष मे मतदान करेगी".लोगो को ये विश्वास है कि "हमारी लोटा बिरादरी जिसके पक्ष मेंं मतदान करती है लगभग सरकार उसी की बनती है".

लेकिन आज हमारी ये लोटा-बिरादरी हासिये पे है,इसके दोषी भी हमारी अपनी लोटा-बिरादरी के ही लोग है,आज बिल्कुल अलग-थलग से हो गये है सच तो ये है कि--"हमने अपने लोटे की कद्र नही की" . गर हमने अपने लोटे का कद्र किया होता तो आज--"हमारी आपकी लोटा-बिरादरी यु विलुप्त-प्राय व नष्ट-प्राय न होती". आईये हम सब सामुहिक शपथ ले कि--"हम अपनी इस लोटा-बिरादरी के पुराने गौरव को फिर से हासिल करेंगे".


यह व्यंग्य लेख मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है.

व्यंग्य---(बाबा जी इज्जत के लिये हानिकारक है )

व्यंग्य---(बाबाओं के आश्रम में जाना इज्ज़त के लिये हानिकारक है)

आजकल हमारे देश मे बड़े-बड़े संतो और बाबाओं ने अपनी घनघोर शारिरीक कामक्रीडा से "रंगीन तबीयत का सारा रिकार्ड तोड़ दिया है" . इनके आश्रम की चपेट में आई पत्नियों के पतियों की हालत "हवस" फिल्म के दौर में देवानंद के ब्लैक एंड ह्वाइट फिल्म "गाइड" की तरह हो गयी है. 

पहले आश्रम और बाबा महिलाओं के लिये सुरक्षित समझे जाते थे,लेकिन अब ऐसा नही है, क्योंकि " इनके मोहब्बत की मारक क्षमता की सुपर सोनिक मिसाइल एक गृहस्थ से दस गुनी ज्यादा खतरनाक है". आश्रम से पकड़े जा रहे बाबाओं की सफल कामुकता की हालत ये है कि---"कुछ युवा व नौजवान चोरी छिपे झंडु केशरी जीवन खा रहे".

"आश्रमो के इन बाबाओं के मोहब्बत का ये उपजाऊपन शादी-शुदा लोगो को अंदर ही अंदर मरुस्थल व बंजर किये दे रहा".बाबाओ का जीवन VMW की तरह हो गया है,और सामान्य गृहस्थ का जीवन बापू के दहेज़ मे मिले कबाड़ वाले कमरे में धूल फांकते चेतक स्कूटर की तरह."काजू,बादाम, खजूर,शीलाजीत के सेवन ने इनके मूँह की कांतियता में चार चाँद लगाये है.

गृहस्थ और आम-नौजवानों के--"मोहब्बत का लगवाग्रस्त भौतिक मूँह देखते ही बन रहा".शादीशुदा तीस प्रतिशत पति शेयर मारकेट मे सारी पूँजी ही जैसे डूब जाने के सदमें मे है. नौजवानों की नई पौध का बेरोजगारी की हालत मे पिता की जेब से झटके पैसे से "पुरुष की ब्यूटीपार्लर से कराया रंग-रोगन,फिजियोथैरेपी सब बेकार जा रहा".

इन बाबाओ के आकर्षण का गुरुत्वाकर्षण उसपे से इन महिलाओं को इनके इस आश्रम तक लाता है. इनके नाम में भी "एक से एक विशेषण,एक से एक अलंकार कोई जलेबी बाबा,कोई कैंडी बाबा,कोई चुंबन स्वामी".शादीशुदा पति-पत्नी की हालत ये है कि उन्हें एक दुसरे को "मोहब्बत वाले मानसून की नज़र से देखे महिनो गुज़र जाते है". 

अब तो ये आवश्यक हो गया है कि जैसे सरकार ने--"सिगरेट,तंबाकू, गुटखा और शराब पे ये लिखवा दिया है कि इनका सेवन कैंसर व स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है".वैसे ही सरकार को इन बाबाओ के आश्रम के प्रवेश द्वार पर मोटे-मोटे अक्षरो मे ये लिखवा देना चाहिये कि--"शाम पाँच बजे के बाद महिलाओं का आश्रम में जाना उनकी इज्जत के लिये हानिकारक है".

यह लघुव्यंग्य मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है.

Thursday, 13 February 2020

व्यंग्य--(पति-पत्नी और वलेंटाइन-डे )

(पति-पत्नी और वेलेंटाइन-डे )

"मै इनकी कोई साधारण पत्नी नही, बल्कि इनके युवावस्था के कालखंड की ऐसी अद्वितिय वेलेंटाइन-डे प्रकार की पत्नी हूं ,जो इनके इंतजार करते हुये मोहब्बत के दुखी गुलाब को स्वीकार कर अपने पत्नी होने का सारा लोकतंत्र इनपे लागुकर आनंदित व प्रफुल्लित हूं". जिस वेलेंटाइन-डे के दिन इन्होंने अपनी-मोहब्बत की जिस ऊर्जा के साथ मुझे प्रपोजकर आ ई लव यू कहा था, आज मैंने उनकी उसी मोहब्बत की ऊर्जा को-"अपने किचन व गृहस्थ की सौर ऊर्जा मे बदलकर प्रतिदिन मै इनके वेलेंटाइन-डे (14 फरवरी ) वाली मोहब्बत के गुलाबीपन को जी रही हूं". 

मुझे लिखते व व्यक्त करते हुये कही से भी ये झिझक नही हो रही है,कि मैंने--"वेलेंटाइन-डे के की इस भीड़ मे से--किसी ऐसे ऐरे-गैरे, नत्थू खैरे गुलाब पकड़े नकली प्रजाति के प्रेमी रूपी उस पति का चयन नही किया, जो जीवन को कुछ ही दिनों मे अपनी मोहब्बत के नकली गुलाब के कांटों से भर दे". बल्कि मैंने मोहब्बत के उस-"वेलेंटाइन-डे रूपी गुलाब का चयन किया है  जो मेरी हर धड़कन, हर एक सांस का शाहजहां है और मै एक पत्नी के तौरपर उनकी मुमताज़". ये वेलेंटाइन-डे और सुर्ख-गुलाब आज एक डिजिटल पर्व है अतः ये पर्व मनाने से पूर्व ये अवश्य जान ले, कि कही आपको अपने-"मोहब्बत का गुलाब पकड़ा रहा प्रेमी  वेलेंटाइन-डे मेनिया का चाइनीज पेसेंट तो नही" , अगर है तो आप अपनी खूबसूरत सी आँखों में ताउम्र ये दर्द के आँसू गुलाब के कांटो की एक ना ख़त्म होने वाली ख़राश को जीने के लिये तैयार रहे.

 मैंने खुद ये सावधानी बरती है इसलिए मै- खुद को इनके जैसे पति रूपी मोहब्बत के वेलेंटाइन-डे का गुलाब पा धन्य महसूस करती हूं,और मै जब-जब भी कमरे के दर्पण के सामने सजने-सवरने के लिये खड़ी होती हूं, तो जैसे ये अब भी उसी अपनी 14 फरवरी वाली हूबहू अदा के साथ मुझे अपनी मोहब्बत का गुलाब पकड़ा रहे हो.और मै छुईमुई सी शर्मा उठती हूं-फिर मै एक-एक कर वे सारे मेकप करती हूं जो एक पत्नी अपने पति के मोहब्बत  लिये प्रतिदिन करती है, जो उनकी चाहत का व उनके अधिकार की दुनिया का वास्तविक वेलेंटाइन-डे है , सिंदूर, बिन्दया,अपनी मछली सी खूबसूरत आँखों में काजल और खासकर मेरे गुलाबी होठों की वे लिपस्टिअप्रकाशित अप्रकाशित अप्रकाशितक जिसे देखकर वे आज भी मुझे वेलेंटाइन-डे या अपनी मोहब्बत का 14 फरवरी कहते है. 


ये वेलेंटाइन-डे पर लिखा हुआ लेख मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है.

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
पता--जज कालोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. No. 7800824758