Saturday, 18 December 2021

(इंतज़ार करके रोयी)
खुद को बाँहो में भरके रोयी,
वे तवायफ थी-------
हर रात सजके रोयी।
थिरके पाँव,टुटे घुँघरु ऐ,रंग-------
वे कितना इंतजार करके रोयी।
(इवीयम से छेड़खानी)
जहाँ जिते वहाँ चाँनी--------------
और जहाँ हारे वहाँ इवीयम से छेड़खानी।
वाह रे! काग्रेंस
और पप्पु से अध्यक्ष हुये राहुल,
फड़फड़ाहट बता रही,
कि गुजरात चुनाव के बाद,
फिर याद आनी है-----------
आपको इटली और अपनी नानी।
आप राजनीति के अपरिपक्व है,
इसे आप स्वीकार नही पा रहे,
अपनी डफली अपना राग गा रहे,
जब तलक गुणवत्ता नही होगी,
याद रखिये आपकी ये सत्ता नही होगी,
बस रोते रहेंगे आप-----------
और हँसते रहेंगे आप पे मोदी,शाह,अडानी।
वापसी गर करनी है,
तो खानदानी शार्टकट से कुछ न मिलेगा,
ये लोकतंत्र है आपको सिखनी पड़ेगी,
दिन रात एक कर,
कि किसके साथ कहाँ राम-राम कहना है----
और कहाँ खाना है लंगर घंटो सुन गुरबानी।
गर न सिख पाओगे तो याद रखना,
तो काग्रेंस के हाथ सत्ता नही आनी,
और ये कह आप ज्यादा रो भी नही सकते,
क्योंकि जनता बेवकूफ नही,
कि आपकी हर हार को समझे-------
एै "रंग" महज़ इवीयम से हुई छेड़खानी।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

आज की मतगणना का परिणाम चाहे जो हो पर अगर मिडिया का सर्वे सच हुआ तो इतना जरुर कहुँगा कि "राहुल जी आपके लिये बड़ी कठिन डगर है इस राजनीति के पनघट की"।

Wednesday, 8 December 2021

(माँ)
दिन भर भूख से बच्चा बिल-बिलाता है,
वे-कोशीश करके हार जाती है,
अँधेरी रात मे वही माँ-
एक कटोरे दूध की खातिर
ऐ रंग-
अपने सारे कपड़े खोल देती है।
(बेटी के ब्याह का लिबास दिखाऊ)
आओ अय्याशियो मे डुबे हुये चौथे स्तंभ,
तुम्हे इस मुल्क मे रेप से इतर,
खेत के मेड़ पे पड़ी बीना कफ़न--------
किसान की लाश दिखाऊ।
बंद कमरे मे बरसता सावन,
तीतर-बीतर कपड़े पैमाने से छलकी शराब,
किसान की आँखो मे सुखा,
उसकी दुपट्टे के फंदे से मरी बेटी,
रुदाली सी बीबी,लंबा सन्नाटा
उसकी जंग खाई पेटी में,
एै,रंग------------
बेटी के ब्याह का लिबास दिखाऊ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Tuesday, 7 December 2021

(ये रात गुजरने दो)
तुम संभलो मुझे गिरने दो-----------
मुझे शराबी लत है,कुछ गहरे उतरने दो।
तुम बधे हो,बधे रहो----------
अपने वक्ते नमाज़ और पूजा से!
मेरे रास्ते मे मंदिर-मस्जिद नही मैकदा पड़ता है,
हाथ धोने दो और मुझे शराब से वजू़ करने दो।
ये महज बोतल नहीं गंगा का पानी आबे जमजम है,
ये हमारी शरिकेहयात़ बीबी का बदन है,
तुम दुर रहो हम काफ़िरो से
और नशे में हम इश्क़े शौहरो की,
एै,रंग-------ये रात गुजरने दो।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
(शहीद)
इस गाँव की औरत कभी बेवा नही होती।
इस गाँव मे कभी भी लाशे नही आती,
तिरंगे मे लिपटे शहीद आते है।
यहाँ की कोई भी बुढी माँ-
काशी या काबे नही जाती।
ऐ रंग-
वे फिर से शहीद बेटे की वर्दी का
धुल साफ कर
सरहद की हिफाजत के लिये-
पोते पालती है।

Monday, 6 December 2021

(पानी)
नही होने देता कभी हिन्दू-मुसलमान
हमे शराब का पानी।
वही छीन लेता है एक हसीन चेहरा,
जब कोई चाहने वाला-फेकता है----
चेहरे पे तेज़ाब का पानी।
हम भटकते गिरते चले जाते है,
जब उतरता है हमारे चेहरे से------
हमारी किरदार का पानी।
हमे जोड़ता है,धर्म और मज़हब से,
कभी दोआब---------
तो कभी हरिद्वार का पानी।
हमे फ़ना भी करता है,
चेन्नई की तरह,रंग--------
देख लो वहाँ तमाम लाशे,
और सैलाब का पानी।
( उत्तर-रेलवे )
उत्तर-रेलवे----------
के एक मुसाफ़िर खाने मे बैठी, 
एक चौबीस-पच्चीस साला पगली,
अपने गंदे बाल खुजला रही थी,
मैने देखा---------
उसके आसपास आठ-नौ आवारा बद्चलन,
पुरुष खड़े--------
अश्लील फब्तियां कस रहे थे,
वे इस सबसे बेखबर-----
अपने गंदे बाल खुजलाये जा रही थी,
तो अचानक मेरी नजर भी,
उनका अनुसरण कर,
पगली की गदराई हुई देहयष्टि से चिपक सी गई.
फिर वे सभी मेरी तरफ मुड़े--------
और खिलखिला के हँस पड़े.
मै झेपा---------
और सोचने लगा कि क्या ?
मेरा चरित्र भी अब गिरने लगा है,
शायद नही,
अगर ये सच है तो फिर.
न जाने कल आने वाली पीढ़ी का---
चरित्र क्या होगा.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (उत्तर-प्रदेश)

Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
( गुनगुनी धूप )
मै टैरेस पे---------
कुर्सी निकाल गुनगुनी धूप मे घंटों बैठी,
वे तुम्हारी चाहत के एहसेसात को-----
अपने भीतर कही हौले-हौले टटोल रही.
लेकिन उस टटोलने मे न जाने कहां,
तुम्हारा श्पर्ष मुझे मिला नही,
सच अब तुम्हारे--------
चाहत का बासीपन अब टीस रहा.
याद है मुझे अच्छे से-------
ठंड की ये गुनगुनी धूप,
जब तुम्हारा छुना और श्पर्श करना,
मेरे प्यार के अंतरतक को गुनगुना जाता,
वे शायद युवापन था------
लेकिन आज जैसे टैरेस की गुनगुनी धूप,
एक सखी सी-------
मेरी युवावस्था से कह रही,
नही ऐसा कुछ नही,
ये जीवन के पलछिन की करवट भर है,
फिर यही टैरेस और कुर्सी के बगल-----
दोनों का गुनगुनी धूप मे बैठे,
काफी पीना होगा.
तभी एक झोका सा हवा का आता है,
और उन्हें मै थका मांदा,
आफिस से बैग लटकाये,
टैरेस पे पड़ी हुई एक खाली सी कुर्सी,
निढ़ाल सा पाती हूं,
तब मै-------
उनकी मजबूरियों की गुनगुनी धूप को,
अपने अंतर मे एक बार फिर महसूस कर पाती हूं.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर pin no.222002
Mo.no.7800824758

यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Sunday, 5 December 2021

(घूँघरु बांधती थी)
रईसो के दरमियाँ वे सलिके से आती थी,
कभी ठुमरी,कभी दादरा गाती थी।
ऐ,रंग-----------
वे पाक थी कोठे पे सुना है,
कि वे केवल पाँव मे घूँघरु बांधती थी।
(जीवित कामायनी)
इंतजार करती है-----------
अपने कोठे पे बैठ हर शाम कोई ग्राहक।
न आने पे फिर वहीं से खोलती है,
जहा से उसने मोड़ रखा था--------
जय शंकर प्रसाद की कामायनी।
डबडबाई आँख मे मनू और इडा से ज्यादा,
भर आते है आँसू !
ये अथाह पिड़ा के फफोले का फूटना रोज सहती है,
इसी कोठे पे-----------
जब कोई आता दिखता है,
तो टुटी कुंडी वाले दरवाज़े की तरफ बढ़ चलती है,
ग्राहक की जल्दबाजी में------------
बंद करते दरवाज़े की टुटी कुंडी की आवाज़,
का मतलब वे समझ----------------
अपने एक-एक कपड़े को उतारती है,
और चारपाई पे--------------
उसका ग्राहक पैसे सुलता है!
फिर थकी मादी उठती है----------
मरहूम जय शंकर प्रसाद की ये जीवित कामायनी।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Saturday, 4 December 2021

(तस्वीर बनती रही )
मै रोता रहा---------
मेरे आँसुओं से भी तेरी तस्वीर बनती रही.
जलती रही शमां,
लड़खड़ा-लड़खड़ा के रात भर,
मै करवटो को तड़पा-------
और तु मेरी हीर बनती रही.
तेरी यादे थी जो बहला देती थी कुछ पल,
वरना मै ऊब गया था इस शहर से,
खिड़कियां खुली रहने दी हमने,
कि शायद कही से,
लाये हवा तेरा संदेशा,
पर हाय री! बेबसी,
कुछ बनने की,
कि तुमसे दूर रहके-----
मेरी तकदीर बनती रही.
मै रोता रहा---------
मेरी आँसुओं से भी तेरी तस्वीर बनती रही.

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेद्वी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

Wednesday, 1 December 2021

(लोकतंत्र का गला घोट देता है)
वे किसी को मदिरा,किसी को नोट देता है-
ऐसे प्रत्याशी को भी गाँव वोट देता है।
ऐ,रंग--आओ हम ऐसो को नकार दे---
जो हमारी लोकतंत्र का गला घोट देता है।

ग्राम-प्रधान के चुनाव पे।
(खनकती ये महबूब चुडियां)
मै अक्सर नमाज़ के वक़्त भी घुम जाता हूं,
मस्जिद के बगल से जो गुजरती है------
चंद चुडिहारो की गली!
तकता हु तमाम दुकानो की तरफ,
कि शायद किसी दुकान पे--------
फिर अपनी नर्म नाज़ुक सी कलाई में,
पहनती किसी चुडिहार से चुड़िया--वे दिख जाये,
जैसे दिखी थी अगले जुमें को!
नही दिखी,
शायद वे किसी और शहर से थी,
मै ज्यो घुमा------------
तो नज़र पड़ी वे आ रही थी कुछ सहेलियो के संग,
तभी उसकी चुड़ियो की खनक ने,
जैसे हमें आदाब कर कहा हो,
जनाब मै इसी शहर की हूं!
और इसी शहर की है मेरी कलाईयो मे-----
खनकती ये महबूब चुड़िया।