Friday, 30 June 2023

(आखिरी सेल्फी)

(आखिरी सेल्फी)
तुम्हे-------------
कहा था कई मर्तबा,
पर तुम माने कहां,
रोज खिचते रहे-------
हमारी और अपनी निजी पलो की सेल्फी।
आज वे सभी शहर में वायरल हो गये,
मै नंगी गुजर रही हूँ सड़क से,
हर भूखी आँख देख रही है जैसे,
तुम्हारे द्वारा ली गई-------------
सहवास के पलो की वे सारी सेल्फी।
काश तुम मान गये होते!
तो आज ख़ुदकुशी न करती,
और न छोड़ती अपने सिरहाने,
तुम्हारे लिये मै-----------
अपनी आखिरी सेल्फी।
देखना ता उम्र-----------
अपनी डबडबाई आँखो से,
मै तुम्हारे बहुत पास रहुँगी,
कभी डिलिट नही होगी तुम्हारी जेहन से,
ये हमारी आखिरी सेल्फी।

###आधुनिकता नितांत आवश्यक है पर आजकल कुछ घटनाये रोंगटे खड़ी कर दे रही है सेल्फी के द्वारा हमने एक भाव व्यक्त किया है,मेरा उद्देश्य किसी का समर्थन या विरोध नही है,धन्यवाद।

Wednesday, 28 June 2023

(राग मल्हार सा गाता हूं)

(राग मल्हार सा गाता हूँ)
घीर आते है बादल,बरसात बहुत होती है,,
ऐ,रंग----------------
जब मै उसे,राग मल्हार सा गाता हूँ।

(कामायनी की तरह पढ़ो)

("कामायनी" की तरह पढ़ो)

धूल की एक मोटी 
परत सी जम गई हैं,
तेरे जाने के बाद,

मैंने भी पलटे नही,
अपने जिस्म के पन्ने,

आओ तुम मुझे,
दुर तलक ले चलो,
मेरे मनु---

और
अगले प्रलय तक
मुझे 

"कामायनी" की तरह पढ़ो,

(ज्यादा देवता मिलते हैं)

(ज्यादा देवता मिलते है)
हाँ!मै तलाशता हूँ------------
अँधेरी रात में आवारा गज़ल,,,,,,,,,,,
क्योकि ऐ,रंग------------
उजाले में ज्यादा देवता मिलते है।

(इस्लाम और मां)

(इस्लाम और माँ)
ऐ इस्लाम़ के चंद काफ़िरो!
तुम्हारी बेज़ा फतवो से---
इसकी ईज्जत कम नही होती।
क्यूँकि ऐ,रंग--------
मूल्क़ वे मुकद्दस माँ है,
जो कभी मज़हब नही होती।

@@कुछ तथाकथित बेज़ा फतवे के खिलाफ ऐक सच।

(इश्क करके)

(इश्क़ करके)

ना पढ़ सकी कोई किताब, 
मै इश्क़ करके.

मै औरत सुफि हो गई 
इश्क़ करके.

मौलाना और तकरीरे मस्जिद, 
तुम्हे मुबारक!
मै खुद हो गई----
मुकम्मल मुसलमान 
इश्क़ करके.

ये हिज़ाब,ये परदे,ये चारदीवारी 
कैद है औरत की,

तुम क्या निकालोगे इस कैद से मुझको,
मै खुद ही छोड़े जा रही,
अपने जिस्म का मकान, 
ऐ,रंग-
इश्क़ करके. 

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (उत्तर-प्रदेश ).

Monday, 26 June 2023

(विधवा विना हूं)

(बिधवा विणा हूँ)
मै पथरीली------------------
कंटक राहो की ब्यथा लिये,
जिये जा रही उस चिड़ियाँ सी,
जिसके निड़ का तिनका-तिनका,
हर आँधी ने नष्ट किया!
है क्षिण हृदय में पीड़ा मेरे,
मै जयशंकर प्रसाद की आँसू हूं।
ना बदली ना सावन आये,
मेरी यौवन के गाँव कभी,
तपती धूप में देह जले
और तड़पे अंतर घट मेरा,
मै तार-तार टूटी नारी,
जो बज न सकु जीवन तट पे----
मै एैसी बिधवा विणा हूँ।

(कोई दीवाना रोया है)

(कोई दिवाना रोया है)
ये जो बरसात हुई है,सारी रात शहर में,,,
ऐ,रंग--------------
कही शायद,कोई दिवाना रोया है।

Sunday, 25 June 2023

(रोटी)

(रोटी किस कौम की है)
भरे पेट हिंन्दू-मूसलमां होना आसान है,,,,,
पर ऐ,रंग---किसी भूखे से पुछ------
कि उसकी रोटियाँ किस कौम की है।

(जुल्फों में बांध लेती है)

(जूल्फों में बांध लेती है)
उतरते है,घिरते है उसकी जूल्फों की तरफ बादल,
और वे इन बादलो को-------------
अपनी जूल्फों में बांध लेती है।
वे हुस्ऩ-ए-ज़ीनत है शहर की,
लोग तकते है उसके छत की तरफ,
वे उम्मीद-ए-बरसात है,
जो एक अदा से------------
अपनी जूल्फ़ो में सावन बांध लेती है।
है तैरने भर का पानी उसकी आँखो में,
ऐ,रंग-------------------
वे हम शायरो का सागर भी,
अपनी जूल्फ़ो में बांध लेती है।

Saturday, 24 June 2023

(भूख ने अपना बदन बेचा है)

(भूख ने अपना बदन बेचा है)
स्याह अँधेरी रात में सन्नाटे को चीरती,,,,,
पुल के उस तरफ की चीख,,,,,,,,,,,,,
उफ!शायद ऐ,रंग----फिर भूख ने किसी को----------------
अपना बदन बेचा है।

Thursday, 22 June 2023

(बांझ)

(एक बाँझ औरत)
एक बाँझ औरत---------------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।
क्या करती----------
सास,ससुर,शौहर की उम्मीदे उसपे तलाक का डर,
वे भीगी आँख------------
इस दर पे अपना घर बचाने आ गई।
एक बाँझ औरत--------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।
औरत को तो ये भी हक नही कि वे कह सके,
कि बाँझ वे नही!
एै! पीर उठ और जग इस मज़ार से,
और देख एक औरत----------
अपने शौहर का मज़हब बचाने आ गई।
एक बाँझ औरत--------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(अखबार भी धंधे की तरह है)

(अखबार भी धंधे की तरह है)
सच लिखने की कुबत न रही,,,,,,,,,,,,,
अब इस मूल्क में ऐ,रंग---------
अखबार भी धंधे की तरह है।
(परीयो की तरह ज़मी पर हो)
झील हो,झरना हो,समंदर हो,,,,,,,,,,,,,
तुम बहुत सुंदर हो।
फूल हो,पुष्प हो,गुल हो-----------
तुम्हे देखता है पागलो सा कवि मन,,,,,,,,,
तुम परीयो सी ज़मी पर हो।

(हम पर हंसे है बदरवा सखी)

(हमपे हँसे है बदरवा सखी)
अँखिया मे लोरन के पानी बहे-----
ढुढ़े मीले ना कजरवा सखी,,,,,,,,,,
ड़से है मनवा के पोर-पोर हमरा----
हमपे हँसे है,बदरवा सखी।
नीक ना लागे घर अँगनईया------
सौतन लगे है ओसरवा सखी।
ऐ,रंग-----
हियरा के आह लग जातई,,,,,,,,,,,,
बस पीके कोठरियाँ सलामत रहत--
बाकी जरी जातई पुरा शहरवा सखी।
ड़से है मनवा के पोर-पोर हमरा----
हमपे हँसे है बदरवा सखी।

###हमारे यहा की स्थानिय भाषा की एक रचना।

Tuesday, 20 June 2023

(पतंजलि ने गढ़ा है)

( पतंजलि ने गढ़ा है)

हां!ये लम्हा बड़ा है 
कि पुरा विश्व़
योग की मुद्रा में खड़ा है,,,,
ऐ,रंग--आओ
हम भी सियासत छोड़े,,,,,,,
क्योकि,योग को
मोदी या रामदेव ने नही-
बल्कि
कृष्ण और पतंजलि ने गढ़ा है।

(योग हर इंसान मे उतरा है)

(योग हर इंसान में उतरा है )

कौन कहता है कि
योग केवल-
"कृष्ण" और "राम" में उतरा है,
ये महज़ एक सियासत है--
वरना योग "इस्लाम" में उतरा है।

किसी पे "ऊँ" या "अल्लाह" क्यू थोपे,
गौर करिये--
मंदिर और मस्जिद मे कभी,
तो पूजा के तौर तरीके
गर योग से मिलते है,
तो योग का हर तरीका
उसी तरह--------
इनकी "नमाज़" में उतरा है।

आओ हम
भारत पे गर्व करे,
और पुरी दुनिया को दिखा दे,
कि हमारा योग--
मजहब या धर्म में नही,
बल्कि ऐ,रंग--
इस मूल्क के
हर एक इंसान में उतरा है।

(प्रेटीकल देते है)

(प्रेटिकल देते है)
ऐ दुनियाँ मोहब्ब़त को विज्ञान मान ले,,,,,,,
क्योकि,चाहने वाले ख्व़ाहिशो की लैब में,,,
ऐ,रंग------------------
खुद को मिटा करके प्रेटिकल देते है।

Monday, 19 June 2023

(तमाशे करता रहा)

(तमाशे करता रहा)
मै--
अपने ही चेहरे पे तमाँचे करता रहा,,,,,,,
ऐ,भूख मै तेरी खातीर----------
पुरे शहर में तमाशे करता रहा।

(सावन के अंधों को बहार लगती है)

(सावन के अंधो को बहार लगती हो)
हे!प्रिये------तुम मेकप में
सौन्दर्य प्रसाधन का------
इश्तहार लगती हो।
मै न्यूज चैनल सा लगता हूं------
और तुम चित्रहार लगती हो।
जब तुम्हे देखता है कोई गैर,
तो मै सलगता हु--------------
मजूरे की बीड़ी की तरह अंदर-अंदर,
मै उन्हें मोहर्रम का दर्द लगता हू,
और तुम उन्हे ईद का त्योहार लगती हो।
हे!प्रिये----------------
मेरे अच्छे दिन गये,
मै पतझड़ का पत्ता----------
तुम सावन के अंधो को बहार लगती हो।

Friday, 16 June 2023

(पतझड़ की तरह रोई)

(पतझड़ की तरह रोई)
बहुत खूबसूरत थी मै लेकिन--------
रोशनी में तन्हा घर की तरह रोई।
कोई ना पढ़ सका कभी मेरा दर्द------
मै लहरो में अपने ही,समंदर की तरह रोई।
सब ठहरते गये----------------
अपनी अपनी मील के पत्थर तलक,
मै पीछे छुटते गये सफर की तरह रोई।
लोग सावन में भीग रहे थे,
ऐै "रंग"----मै अकेली अभागन थी
जो सावन में पतझड़ की तरह रोई।

@ रंगनाथ द्विवेदी
# 7800824758

(मां)

भारत के अमर सपूतो को मेरा शत-शत नमन------

(माँ)

तेरा हर बेटा मुल्क की खातिर-------
यूं शहीद और कुर्बान हो माँ!

ना बटने दे किसी को मजहब के नाम पे,
समय से पूजा समय से अजा़न हो माँ.

फक्र हो तुम्हे अपने आँचल और दूध पे,
तेरी लोरी में राष्ट्र हो और राष्ट्रगान हो माँ.

ना पंजाब,ना गुजरात,ना महाराष्ट्र निकले,
आखिरी लम्हें गर लब भी फड़फड़ाये,
तो लब पे तुम और हिन्दुस्तान हो माँ.

गर सुपुर्द-ऐ-खाक होने लगू,
तो मुट्ठी में मुल्क की मिट्टी-------
और डालने वाले के होंठो पे मुस्कान हो माँ.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

(मोहब्बत की है)

(मोहब्बत की है)

हां!इस ब्राह्मण ने,
इस शहर की मशहूर---
फिरदौस से मोहब्बत की है.
कोई गुनाह नही--
हमने तो बस 
एक औरत की इज्ज़त की है.

मांग भरा हैं---
उसे निकाल कर इस गलीज गली से,
उसके नाम हमने--
एक मकान और पुरी छत की है.

हां इस ब्राम्हण ने,
इस शहर की मशहूर---
फिरदौस से मोहब्बत की है.

मै श्लोक पढ़ता हूं---
वे नमाज़ पढ़ती है मेरे पूजा के कमरे में
उसे ये इजाज़त ए,रंग--
मेरे मोहब्बत के शरीयत की है.

हां इस ब्राम्हण ने,
इस शहर की मशहूर---
फिरदौस से मोहब्बत की है

(इज्जत की है)

(औरत की इज्ज़त की है)
हाँ!इस ब्राह्मन ने-------------------
इस शहर की मशहूर फिरदौस से मोहब्बत की है,
कोई गुनाह नही-----------------
हमने तो बस एक औरत की इज्ज़त की है।
माँग भरा है-----------------
उसे निकाल कर इस गलिज़ गली से,
उसके नाम हमने----------
एक मकान और पुरी छत की है।
कोई गुनाह नही---------------
हमने तो बस एक औरत की इज्ज़त की है।
मै श्लोक पढ़ता हूँ----------------
वे नमाज़ पढ़ती है मेरे पूजे के कमरे में,
उसे ये इजाज़त ऐ,रंग----------------
मेरे मोहब्बत के शरियत की है,
कोई गुनाह नही--------------
हमने तो बस एक औरत की इज्ज़त की है।

Thursday, 15 June 2023

(राग झूमर सुन रहा हूं)

(राग झुमर सुन रहा हूँ)
मै उसके कान की बाली का राग झुमर सुन रहा हूं,
कंगन,बिछुवे,चुड़ियां संगत कर रही,
कोई घराना नही दिल है-----------
जिससे मै राग चाहत सुन रहा हूं,
मै उसके कान की बाली का राग झुमर सुन रहा हूं।
उसका इस कमरे,उस कमरे आना-जाना,
एक सुर,लय,ताल का मिलन है
उस मिलन से उपजी-----------
मै राग पायल सुन रहा हूं,
मै उसके कानो की बाली का राग झुमर सुन रहा हूं।
कपकंपाते होंठ सुर्खी गाल की,
तील जैसे लग रही उसकी सखी,
और कर रही छेड़छाड़ भर बदन,
उफ!उसकी उम्र के उन्माद का------
मै राग काजल सुन रहा हूं,
मै उसकी कान की बाली का राग झुमर सुन रहा हूं।
घन-गरज है,बिजलियाँ है
काँधे पे वे श्वेत आँचल लग रहा कि मछलियाँ है,
उन मछलियो के प्रेम की--------
मै राग बादल सुन रहा हूं,
मै उसके कानो की बाली का राग झुमर सुन रहा हूं।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

(बिना शौहर की हो गई)

( बीना शौहर की हो गई)

मै जबसे--
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
मेंरे सूख गये अरमान
मैं पत्थर की हो गई.

क्या-क्या नही छोड़ा
खातिर उसके,
वालिद का दिल तोड़ा!
और अम्मी का यकीन

मैं कहां बसने आई थी---
भागकर घर से, 
देख लो आज मैं 
बिना घर की हो गई.

मै जबसे---
उस बेवफा सितमगर की हो गई.

सुर्ख जोड़े,हिना,आईना सिसके
अज़ीब निकाह किया मैंने 
कुबूल कर भी ए,"रंग"--
मै बीना "शौहर की हो गई".

Wednesday, 14 June 2023

(पुजारी आ गए)

(पुजारी आ गये)
कुछ पंडे कुछ पुजारी आ गये,
चुनाव लड़ने कुछ मौलाना कुछ बुखारी आ गये।
ठाकुर साहब टहलते रहे,
उन्ही के विधानसभा से तिवारी आ गये,
कुछ पंडे कुछ पुजारी आ गये।
वे नारी भरे मंच से ललकारती रही,
उससे लड़ने पुरुष नही,
लखनऊ से एक ब्रह्मचारी आ गये,
कुछ पंड़े कुछ पुजारी आ गये।
बिकास,नौकरी,बिजली वादो की झड़ी,
स्वर्ग बना देंगे!
ऐ,रंग----------इस प्रदेश मे फिर
कुछ महिनो के चमत्कारी आ गये,
कुछ पंड़े कुछ पुजारी आ गये।

###चुनावी चक्कलस।

(बेजा तलाक ना दो)

(बेजा तलाक न दो)
ख्वा़हिशो को खाक न दो!
एै मेरे शौहर-----------
सरिया के नाम पे,
मुझे बेजा तलाक न दो।
बख्श दो---------
कहा जाऊँगी ले मासुम बच्चे,
मुझ बेगुनाह को-------
इतना भी शाॅक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न उड़ेलो कान में पिघले हुये शीशे,
मुझ बांदी को सजा तुम--------
इतनी खौफ़नाक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न छिनो छत,न लिबास
खुदा के वास्ते रहने दो,
मेरी बेगुनाही झुलस जाये-------
मुझे वे तेजाब न दो,
बेजा तलाक न दो।
सी लुंगी लब,रह लुंगी लाशे जिंदा,
लाके रहना तुम दु जी निकाहे औरत,
मै उफ न करुंगी!
बस मेरे बच्चो की खुशीयो को कोई बेजा,
इस्लामी हलाक न दो-------
बेजा तलाक न दो।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
____तलाक एक दर्द है जो इसे भुगत रही कोई औरत ही समझ सकती है!अगर संभव है तो मेरी इस रचना के पढ़ने वालो से मेरी कलम अनुरोध करती है प्लीज कभी किसी भी औरत से बेजा तलाक न ले,शुक्रिया।

@@@शुक्रिया!साप्ताहिक समाचारपत्र अकोदिया सम्राट(म.प्र.)मेरी इस कविता को अपना बेशकिमती स्नेह देने के लिये।

(पगली बना दो)

(पगली बना दो)
नन्हे-नन्हे पाँव----------
छोटी-छोटी अँगूली बना दो,
ऐ,खुदा----------
मुझे फिर से बचपन की तितली बना दो।
मै तैरु गाँव के पोखर,
और तोडू फिर बाग से अंम्बिया,
मुझे माँ की डाँट-------
और बापू के दुलार की पगली बना दो।

Sunday, 11 June 2023

(पपिहा मुआं)

(पपीहा मुँआ)


मेरी पीर बढ़ाये पपीहा मुँआ,
वे भी तो तड़पे है मेरी तरह,
वे पी पी करे और मै पी पी पिया।
मेरी पीर बढ़ाये पपीहा मुँआ।
वे रोये है आँखो से देखे है बादल,
मै रोऊँ तो आँखो से धुलता है काजल,
वे विरहा का मारा मै विरहा की मारी,
देखो दोनो का तड़पे है पल-पल जिया,
मेरी बढ़ाये पपीहा मुँआ।
हम दोनो की देखो मोहब्बत है कैसी?
वे पीपल पे बैठा मै आँगन में बैठी,
की भुल हमने शायद कही पे,
या कि भुल हमने जो दिल दे दिया,
मेरी पीर बढ़ाये पपीहा मुँआ।
चल रे पपीहे हुई शाम अब तो,
ना बरसेगा पानी ना आयेंगे ओ,
मांगो ना अब और रब से दुआ,
मेरी पीर बढ़ाये पपीहा मुँआ।

###दैनिक समाचार पत्र सच का हौसला मे इस रचना को स्थान देने के लिये वंदना दी का शुक्रिया ।

(इश्क की जुबान उर्दू)

(इश्क़ की जुबान उर्दू )
एक अलहदा कशिश है इसके हूश्ऩ मे,
ये एक तहज़ीबे दुपट्टा है,
गर सर पे रख ले तो,
है चौदवी का चाँद उर्दू--------------
है इश्क़ की जुबान उर्दू ।
ये खते दौर के चाहने वालो को पता है,
कि कैसे पसंद करती थी,
इनकी जान उर्दू----------
है इश्क़ की जुबान उर्दू ।
वे पाजेब की छनक का मिठापन,
जब दिल लुट लेती थी,
तो लगता था जैसे,
कि यही रहती है इस पुरे मकान उर्दू----
है इश्क़ की जुबान उर्दू ।
ये जब अपने छत पे चढ़ तकने लगी,
तो यू लगा कि जैसे,
हो गई हो सुरमई शाम,
और पुरा आसमान उर्दू------
है इश्क़ की जुबान उर्दू।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758

(मंटो मर नही सकता)

(मंटो मर नही सकता)
जब तलक----------
भूख की वेश्या!
काली सलवार पहने,
ग्राहक तलाशेगी!
ऐै "रंग" ----तब तलक
बदनाम मंटो मर नही सकता।

Saturday, 10 June 2023

मुझे अपनी खुबसूरती की रोमांटीकता
एहसास,
औरों के खुबसूरत कहने 
या फिर 
औरों के मूंह से सुनने पर नहीं होता
लेकिन जब तुम मुझे खूबसूरत कहते हो
तब एहसास होता हैं
कि वाकई मैं खूबसूरत हूं
क्योंकि रोमांटिक तरीके से
मुझे खूबसूरत कहने का अधिकार
सिर्फ़ और सिर्फ तुम्हें हैं 
मैं औरों की आंखों में
अधूरी खुबसूरत हू
क्योंकि उनकी सारी खुबसूरती
मेरी देह के इर्द गिर्द तक सीमित हैं
लेकिन तुम
मेरी इस खुबसूरत सी देह के
दूर तलक फैले एहसास
को उस अधिकार से छूते हो
जहा
मैं अकेली खुबसूरत नही रह जाती
बल्कि मैं केवल मैं रह जाती हूं
मेरी इस स्त्री देह में
तुम और सिर्फ तुम खुबसूरत रह जाते हो
यही खुबसूरती पाने और जीने की
मरीचिका ही
खुबसूरती के घाट

(उफ! जरा नही करते)

(उफ!जरा नही करते)
मोहब्ब़त करने वाले मशवरा नही करते,,,,
ये अईसी आग है-जो लगी तो बस लगी-
ऐ,रंग--गर इसमें मौत भी आये------
तो उफ!जरा नही करते।

Friday, 9 June 2023

(कुछ औरते गुजर रही)

दिल्ली में चाकु और पत्थर से कुचकर की गई लड़की की नृशंस हत्या पर मेरी भाव श्रद्धांजलि ✍️✍️

(कुछ औरते गुजर रही)
😢😢😢😢

वे नृशंस चाकुओं से मार रहा,
पत्थर से कुचल रहा,
वही बगल से उसके 
कुछ स्तन शुदा औरते 
गुजर रही.
निर्भया
के गुप्तांग के सरिए से फिर 
खून बह रहा
लेकिन इस बार
मोमबत्तियां जली नही
चलो ! अच्छा है
कि, दिल्ली
का अपना मुर्दापन बच गया.
आखिर राजधानी है
यही तो आना है
कुछ लोगो को 
सदन में घड़ियाली आसूं बहाने
कुछ वोट
टटोलने,
लव जेहाद, हिंदू मुसलमान,जाति
नही, नही
फिर किसी लड़की का कटा स्तन
उछल रहा
और उसके गुप्तांग से
खून की एक पतली धार 
बह रही.
पता नही की राजधानी की तरफ
या फिर, हमारी सूख चुके
आंख के पानी की तरफ
लेकिन हां! कुछ
स्तन शुदा औरते 
उसकी बगल से गुजर रही. 😢😢😢😢

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर (U P)
mo.no.7800824758

(लव जिहाद करे)

(लव जिहाद नहीं )

जिस 
लड़के और लड़की को
अपने वालिदो की मोहब्बत याद नही,
वे हवस है
लव जिहाद नही.

ये महज दो जिस्मों की,
इजाजत-ए-हम बिस्तरी है 
इसी से इस रिश्ते की,
कोई उम्र या कोई मयाद नही,
ये हवस है
लव जिहाद नही .

ये कत्ल
ये लाश के टुकड़े
इबलिश-ए-ख्वाहिश के अंजाम है 
इसमें,
किसी रिश्ते की मुहर नही
ये एक आह! है
मैय्यत है,मातम है
बेरहमी है
यहा, कोई फरियाद नही
ये हवस है
लव जिहाद नही.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758

Thursday, 8 June 2023

(केरल से लौट आई है)

(केरल से लौट आई है)
शायद जल्द ही घिर जाये,,,,,,,,,,,,
हमारे शहर में-मानसून के बादल-----
क्योकि ऐ,रंग--हमने सुना है,,,,,,,,,,,,,
कि मेरी मोहब्बत-------
केरल से लौट आई है।

(आज रात)

(आज रात)
ऐ बेवफ़ा सामने बैठ और सभल आज रात,
मै पढुँगी तेरे शहर में गज़ल आज रात।
लब पे हँसी होगी दिल में आँसू ,
रोशनी लुटाऊँगी-----------------
मै चराग की तरह जल आज रात।
तड़प उठेगी चाँदनी मेरी सदा से,
पछतायेगी वे भी निकल आज रात।
मै ये मुशायरा छोड़ जाऊँगी,
उस बेवफ़ा के दिल में--------
ऐ,रंग----रह जायेगी एक कसक आज रात।

(आखिरी रात लिखी उसने)

(आखिरी रात लिखी,उसनें)

जला के चराग़---
आखिरी रात लिखी, उसनें.

हर्फ-दर-हर्फ,तड़पी कागज़ पे,
जब---
आखिरी बात लिखी, उसनें.

उफ!! जोर से लड़खड़ाई,
कलम छूट गई,

ऐ "रंग"-अपने ही,
खुदकुशी की---
आखिरी रात लिखी, उसनें.

@@ रंगनाथ द्विवेदी
## 7800824758

Wednesday, 7 June 2023

(कल से रमजान है)

(कल से रमज़ान है)
चाँद दिख गया है-------------
कल से रमज़ान है।
बरसेगा नूर इलाही का,
आयेगे फरिश्ते,
पढ़ेगे ये भी ज़मी पे ये भी नमाज़-----
आयद इनपे भी ये अजा़न है।
चाँद दिख गया है-------------
कल से रमज़ान है।
बच्चे बुज़ुर्गो मे है एक खुशी,
ना निगलेंगे थूक,ना पियेंगे पानी,
चारो तरफ़ एक मुकद्दस ईमान है।
चाँद दिख गया है-----------
कल से रमज़ान है।
मेरी बधाई के हर्फ़ में,
ऐ रोजे़दारो-----------
सबके लिये ये खजूरे ईरान है।
चाँद दिख गया है--------------
कल से रमज़ान है।

###आप सभी को मुकद्दस महिने रमज़ान की बधाई।
(आखिरी रात लिखी,उसनें)

जला के चराग़---
आखिरी रात लिखी, उसनें.
हर्फ-दर-हर्फ,तड़पी कागज़ पे,
जब---
आखिरी बात लिखी, उसनें.
उफ!! जोर से लड़खड़ाई,
कलम छूट गई,
ऐ "रंग"-अपने ही,
खुदकुशी की---
आखिरी रात लिखी, उसनें.

@@ रंगनाथ द्विवेदी
## 7800824758

Tuesday, 6 June 2023

(मूल्क के मिट्टी की)
आ गई खुशबू मेरे मूल्क के मिट्टी की,
महक उठी साँसे याद की फिर,
मुँह मे आ गया पानी------------
ले नाम माँ के चोखे और लिट्टी की।
आ गई खुशबू मेरे मूल्क के मिट्टी की।
सारी मकबूल किताबे पढ़ डाली,
पर कही इतने जिंदा हर्फ न मिले,
मैने इज्ज़त की गर कूरआन के बाद,
तो अपने मूल्क के खत और चिट्ठी की।
आ गई खुशबू मेरे मूल्क के मिट्टी की।
यु ही नही है अमी असतो मूल्क मेरा,
जितने बीमार है इस गैरे मूल्क मे,
ऐ,रंग-----उतने इलाज की तासीर है,
मेरे मूल्क के मिट्टी की।
आ गई खुशबू मेरे मूल्क के मिट्टी की।

Monday, 5 June 2023

कविता---(भूख जिंदा है)

(भूख जिंदा है)
पेट तो भर गया लेकिन भूख जिंदा है,
ऐ तरक्की---------------------
तेरी आड़ में हर झूठ जिंदा है।
हरिया की लाश आज भी है लहूलुहान,
कातिलो के हाथ में बंदूक जिंदा है।
लुट रही है आबरु हर एक स्याह रात,
पुरे बदन पे अबला के ये जूठ जिंदा है।
ख़ुदकुशी कर ली कल किसान ने,
ऐ,रंग-----आज अखबार में
उसकी कर्ज माफी और छुट जिंदा है।
पेट तो भर गया लेकिन भूख जिंदा है।

###इस रचना को पुरा पढ़े ये अनुरोध है।

Sunday, 4 June 2023

कविता---(निवाले के लिए लेटी हू)

(निवाले के लिए लेटी हूं )

मैं शरीर नहीं
और ना ही तुम्हारे शहर की बेटी हूं
मैं तमाशा हूं,मेरी फोटो 
किसी अखबार के लिए मत खींचो .

इन खाली बोतलों पर मैंने
अपने छोटे भाई बहनों की भूख का तवा रखा हैं .

धूप तुम्हें लग रही होगी
छाए में खड़े हो जाओ साहब 
तुम्हारे वहा से फेके हुए कुछ सिक्कों से 
इस चूल्हे का ईधन सुलगेगा.

और मैं खुद को 
जब इन बोतलों के इधर उधर पलटूंगी
तो सिकेंगी कुछ रोटियां.

मैं जानती हूं ,कि कुछ लोग
तमाशे की आड़ में 
देखते हैं
मेरी दुपट्टे के उस तरफ का अंकुरण 
उनकी लार टपकती हैं.

वे खाना चाहते हैं
किसी बंद कमरे में उधेड़ कर
मेरे "जिस्मानी पराठे"
लेकिन मैं
किसी आवारा बांह के तकिए से दूर
इस खुरदरे फुटपाथ पर
निवाले के लिए लेटी हूं.

"सर्वाधिकार सुरक्षित" 

रचनाकार----
रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी,मियापुर 
जौनपुर,222002 (U P)
mo.no.7800824758
(खूबसूरत आँखो से इश्क़ कर लो)
गर छोड़नी हो शराब,
तो उनकी खूबसूरत आँखो से इश्क़ कर लो।
गर बहक के लौटना हो,
तो उनकी लहराती हुई जूल्फ़ो से इश्क़ कर लो।
गर तोड़ना हो तुमको ये पैमाना-ऐ-गिलास,
तो उनकी होंठो से इश्क़ कर लो।
ऐ,रंग----गर छोड़ना हो चखना,
उनकी हर एक साँस-------------
और बाँहो से इश्क़ कर लो।
गर छोड़नी हो शराब----------
तो उनकी खूबसूरत आँखो से इश्क़ कर लो।

Saturday, 3 June 2023

( घुँघट नही दिखता)

हा!मेरी खता है कि-
मै अब चाँद नही लिखता

पर क्या?करु ऐ,"रंग"
तरक्की के दौर मे

हमे औरत तो दिखती है--
पर उसका घुँघट नही दिखता!
शमीम रहती थी

कभी सामने नीम के———
एक घर था,
जिसमें मेंरी शमीम रहती थी।
वे महज़———
एक खूबसुरत लड़की नही,
मेंरी चाहत थी।
बढ़ते-बढ़ते ये मुहल्ला हो गया,
फिर काॅलोनी बन गई,
हाय!री कंक्रिट——–
तेरी खातिर नीम कटा,
वे घर ढ़हा——–
जिसमें मेरी शमीम रहती थी।
अब तो बीमार सा बस,
डब-डबाई आँखो से तकने की खातिर,
यहाँ आता हूँ!
शुकून मिल जाता है इतने से भी,
ऐ,रंग———–
कि यहाँ कभी,
मेरे दिल की हकिम रहती थी!
कभी सामने नीम के——–
एक घर था,
जिसमें मेरी शमीम रहती थी।
(हाँ!मै भी बुनकर हूँ)
हाँ!मै भी बुनकर हूँ------------
तुम तिनका-तिनका कालीन बुनते हो,,,,,,
और मै शब्द-शब्द गीत बुनता हूँ।
हाँ!मै भी बुनकर हूँ।
( बीना शौहर की हो गई)

मै जबसे----
उस बेवफ़ा सितमगर की हो गई,
मेंरे सूख गये अरमान
मैं पत्थर की हो गई.

क्या-क्या नही छोड़ा
खातिर उसके,
वालिद का दिल तोड़ा!
और अम्मी का यकीन

मैं कहां बसने आई थी---
भागकर घर से, 
देख लो आज मैं 
बिना घर की हो गई.

मै जबसे---
उस बेवफा सितमगर की हो गई.

सुर्ख जोड़े,हिना,आईना सिसके
अज़ीब निकाह किया मैंने 
कुबूल कर भी ऐ,"रंग"--
मै बीना "शौहर की हो गई".

Friday, 2 June 2023

(पोयम ने छिन लिया)
हिन्दी की कविता की संवेदना को-------
अंग्रेज़ी के पोयम ने छिन लिया।
दूध-कटोरी,माँ की लोरी,आँचल और गाँव को--
इस कंकरीट की सीटी ने छिन लिया।
पति और पत्नी के रिश्ते गुम हो गये,
क्योंकि सारा प्यार नंगे बदन लौटती----
उसकी नाइट ड्यूटी ने छिन लिया।
बच्चो का खेलना-कुदना,धमाचौकड़ी को,
नौ साल की उम्र से ही कान्वेंट,ट्यूशन और-----
मोटी-मोटी फिजिक्स,कमेस्ट्री ने छिन लिया।
गाँव मे बुढ़े और गरीब माँ-बाप ने कर्ज ले पढ़ाया था,
उनकी उस पीड़ा को वाइफ के माम-डैड और------
उसकी छोटी सिस्टर स्विटी ने छिन लिया।
हिन्दी की कविता की संवेदना को-------
अंग्रेज़ी के पोयम ने छिन लिया।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.----7800824758
(गीत गुम है)
भीड़ है लाखो की लेकिन प्रीत गुम है----
हम नही रह पायेगे ऐसे शहर मे,,,,,,,,,,,,,,
ऐ,रंग---------------
जहाँ होठ तो लाखो है,लेकिन गीत गुम है।
(मुमताज़ सोई है)

ढक दो आज उसे--
एै मेरी गज़लो के हर्फ,
वे कोई और नही मेरी महबूब है--
जो बेलिबास सोई है.

रख दो कुछ मिट्टी उसके सिरहाने,
एै मेरी गज़लो के हर्फ,
वे कोई और नही 
मुझ गरीब और मुफलिस की---
मुमताज़ सोई है।
(चिखती निर्भया है)

इसकी आँखो मे ना कोई पानी,
और ना कोई हया है,
ए "रंग "---
"दिल्ली" वे बे-हया है.

जहाँ मिटती है श़कूर बस्ती,
और सड़को पे
चिखती निर्भया है.

Thursday, 1 June 2023

(दिल्ली की फुटपाथ पे रहते है)

ऐ दिल्ली ----
आखिर क्यों??
कश्मीरी पंडित इतने बदतर हाल,
तेरी फुटपाथ पे रहते है.
सिसकते है ,अपने मिट्टी को,
दहशतगर्द रोज जलाते है, सुलगाते है
और भरते है, इसकी सांसो मे बारुद की बू,
वे इनके कश्मीर पे कब्जा जमा,
अलगाववादियों की शाख पे रहते है.
उफ!! जिनका हक है, कश्मीर पे,
वे बेचारे पंडित ,बहुत बदतर हाल,
दिल्ली की फुटपाथ पे रहते है.

@@ रंगनाथ द्विवेदी
## 7800824758
(चुनावी दलितनामा)
1------------
अयोध्या छोड़ अब काशी आ रहे है,
चोला बदल के सियासत के संन्यासी आ रहे है।
ऐ,रंग-----महिनो चलेगा इनका ये कुम्भ,
कुर्सी के भक्त बनके कल्पवासी आ रहे है।
                 (2)
पहले राम ठिकाने लगे है,
सावधान हो जाओ-------
हे!लोकतंत्र की शबरी,
ये तुमको दलित बता------
अब तुम्हारे घर खाने लगे है।
पहले राम ठिकाने लगे है।

@@@ये साहित्यकार की अभिब्यक्ती है इसका आशय किसी पार्टी से जुड़े ब्यक्ति को आहत करना नही है,गर संयोग वस ऐसा है तो मै पहले ही इसके लिये क्षमा मांग लेता हूँ।
(शहनाज़ का मेकप नही करती)

हमारी गज़ल वे खूबसूरत औरत है,
जो कभी शहनाज़ का मेकप नही करती.

वे सादगी और सलिके की रस्म़ है,
वे जिधर से गुजरती है निगाहे पाकिज़ा,
अपने सर से दुपट्टे को ओझल नही करती.

हमारी गज़ल----
जीनत है ज़मी की आयत है,
ये ज़न्नत से घर को कभी दोज़ख नही करती.

ऐ,रंग---
इसकी दुनिया फकत शौहर है,
ये हवस के मारो की तरह कभी ब्रेकप नही करती.

हमारी गज़ल वे खूबसूरत औरत है,
जो कभी शहनाज़ का मेकप नही करती.

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी
जिला-जौनपुर, (U P )
mo. no.7800824758