Tuesday, 28 February 2023

(मूल्क़ जिंदाबाद)
आने वाली सदियाँ,करेंगी उसको याद,
उसने ख़ून के कतरे से लिखा----
मूल्क़ जिंदाबाद।
ऐ हूस्ऩ आज इतनी कागज़ पे जगह छोड
लिखने दे हमे,रंग---
उसके कनपटी की आखिरी गोली----
और मूल्क़ जिंदाबाद।

चंन्द्रशेषर आजाद की याद मे,मेरी भावनाओ के चंद फूल---वंदे मातरम,,,इंकलाब जिंदाबाद।
(बिटियाँ की आजादी अच्छि नही लगती)
बचपन की आजाद चिड़ियाँ को,
बंदिशो मे बांध रहे है!
ऐ,रंग-----आज भी दुनियाँ को देखो----
बिटियाँ की आजादी अच्छि नही लगती।
(होली और समाजवादी कवि-सम्मेलन)
डरिये नही क्योंकि--------------
यहाँ न बीवी न उसके हाथ मे बेलन है,
आज छूट है,आॅफर है,लाभ उठाये
ये हम जैसे बेलन सिद्ध कवियो का-----
एक समाजवादी कवि-सम्मेलन है।
यहाँ सबसे सीनियर कवि को,
आशाराम बापु स्वर्णभष्म सम्मान से अलंकृत कर,
उससे इस कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करवायेंगे,
और किसी महिला कवयित्री को----------
हनीप्रित सम्मान से नवाज कर,
किसी राम-रहीम नेचर के कवि से,
उसके गुलाबी गालो पे अबीर मलवायेंगे।
बैंक से पैसे न निकलपाने के कारण,
इस कवि-सम्मेलन का भुगतान,
हम विथ जियसटी के होली बाद करवायेंगे।
क्योंकि हम कवि है कोई नीरव मोदी नही,
हमारी तो बीस हजार की खातिर,
जाँच पचीसो करवायेंगे-------
और ये निश्चित है कि वे हमे किसी नियम पाँच मे बझायेंगे,
इसलिये हम उनके कथनानुसार,
अपने ही पैसे को होली बाद ही ले पायेंगे।
हे! भगवान अजीब स्थिति है--------
कलम किंग और पीयनबी वाले बड़े-बड़े,
फैंसी फ्राडो का भुगतान करड़ो और अरबो का करवायेंगे,
और हमे हमारे ही चंद हजार के लिये,
बैंक का दिवाल पे लिखा नियम पढ़वायेंगे,
अब तो कालेधन की छोड़िये-----------
उजला धन तो अब काले से ज्यादा जा रहा,
विपक्ष मे राहुल ट्वीट पे ट्वीट कर पुछ रहे,
अपनी अगली होली----------
दो हजार उन्नीस मे ढूंढ रहे,
यानी भाजपा के लिये बसंती,
तो राहुल के लिये अगला चुनाव------
एै "रंग" विदेशी हेलन है।
ये हम जैसे बेलन सिद्ध कवियो का------
एक समाजवादी कवि-सम्मेलन है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर---222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Monday, 27 February 2023

(फटे दुपट्टे को रोज सिलती है)
जहां से रईस की बिटियाँ ने हटा रंखा है---
दुपट्टा अपना!
ऐ,रंग----वही पे गरीब की बिटियाँ,
बदन ढ़कने के लिये-----------
अपने फटे दुपट्टे को रोज सिलती है।

Sunday, 26 February 2023

हिंदी सिनेमा की अमिट सुंदरी को हमारी श्रद्धांजलि 🌹🌹🌹🌹.

 (श्रीदेवी मर गई)

श्रीदेवी आज तु---
लाइट,ऐक्सन,कैमरा 
यानी सबको तन्हा और,
विरान कर गई.

देखो हमारी भीगी नम आँखे--
हम कोई ऐक्टिंग नही करते,
इसमे आज तेरे 
निभाये हर किरदार की वे
हर एक सुरत उतर गई.

तु क्या जाने कि तेरे जाने से,
हमारी मुहब्बत के 
दरख्त़ो के सारे महबूब पत्तो को,
तु दर-बदर-कर गई.

हो सकता है कि 
इन दरख़्तो पे लगे फिर नये पत्ते,
फिर पहले सी बहार आये,
लेकिन तु क्या जाने कि 
किस तरह तेरे जाने से,
हमारे दौरे शाख की बुलबुल,
हमेशा कि खातिर 
हमारे मुहब्बत के शाख से उड़ गई.

शायद आसमां पे भी खुदा को,
अपनी सिनेमा की खातिर 
तेरे जैसे किरदार की जरुरत थी,
शायद आज इसी से-
तु हमसे और हमारे जैसे तमाम 
चाहने वालो से बिछड़ गई।
सच यकीन नही हो रहा 
ए "रंग" आज-----
की हमारे दिल 
और हमारे सिनेमा की श्रीदेवी मर गई.

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर---222002(u p).
(फागुन मोहब्बत के फ्लेवर का महिना है)
ये गुन-गुने मिजाज़,तेवर का महिना है,
वे देखो सज रही है घंटो दर्पण के सामने,
ये उसके पिया के दिये जेवर का महिना है।
भाभी टटोलती है ननद और देवर को,
ऐ,रंग--इस देश मे फागुन----
मोहब्ब़त के फ्लेवर का महिना है।
(खूबसुरत औरत नही देखी)
माथे पे चुह-चुहाता पसीना,
कमर पे खुशी साड़ी!
और सर पे सीमेंट की भदेली,
श्रम की मादक चाल!
ऐ,रंग---मेरी कविता ने कभी-------
इतनी खूबसुरत औरत नही देखी।

Saturday, 25 February 2023

(उर्दू घुट-घुट के परदे मे रही)
मरदे तहज़ीब कत्ल करता रहा,
इसी से ऐ,रंग---सालो-साल,
हिन्दी अपनी पिड़ाओ के घुँघट मे,
और उर्दू----------
घुट-घुट के परदे मे रही।
अलविदा हम और हमारे दौर के कला की बेमिसाल मुरत यानी श्रीदेवी को।
                         (श्रीदेवी मर गई)
श्रीदेवी आज तु----------
लाइट,ऐक्सन,कैमरा यानी सबको तन्हा और,
विरान कर गई।
देखो हमारी भीगी नम आँखे------
हम कोई ऐक्टिंग नही करते,
इसमे आज तेरे निभाये हर किरदार की वे----
हर एक सुरत उतर गई।
तु क्या जाने कि तेरे जाने से,
हमारी मुहब्बत के दरख्त़ो के सारे महबूब पत्तो को,
तु दर-बदर-कर गई।
हो सकता है कि इन दरख़्तो पे लगे फिर नये पत्ते,
फिर पहले सी बहार आये,
लेकिन तु क्या जाने कि किस तरह तेरे जाने से,
हमारे दौरे शाख की बुलबुल,
हमेशा कि खातिर हमारे मुहब्बत के शाख से उड़ गई।
शायद आसमां पे भी खुदा को,
अपनी सिनेमा की खातिर तेरे जैसे किरदार की जरुरत थी,
शायद आज इसी से---------
तु हमसे और हमारे जैसे तमाम चाहने वालो से बिछड़ गई।
सच यकीन नही हो रहा एै "रंग" आज-----
की हमारे दिल और हमारे सिनेमा की श्रीदेवी मर गई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर---222002(u p)।
mo.no.-----7800824758
( दो घाव हो गए )

जिन उरोजों को ढ़क,
वे मासूम देखती थी,
कभी वात्सल्य का सपना.

ए "रंग "
उसके वही दोनों उरोंज,
गरीबी के चलते-
"दो घाव हो गए".

Friday, 24 February 2023

( बसंत हूं )

मै रोज लद उठती हूँ"
आम के बौर सी,

गुलाबी शर्म ओढ़े!
ऐ,रंग--
मै अपने पिया के कमरे की
"बसंत हूं "
(इश्क़ सल्फ़ास की गोली है)

इश्क़ मे कहा मिलन,
कहा डोली है.

करने वाले पहले से जानते है,
ऐ,'रंग"
कि इश्क़----
सल्फ़ास की गोली है.
(उम्र की किताब)

पुरे बदन में--
झुरझुरी सी उठ रही,

हे सखी!
बसंत पढ़े छेड़-छेड़,
मेरे उम्र की किताब.

Wednesday, 22 February 2023

(मोहब्बत हैंग कर रहा है)
पहले तुम-एक खुबसुरत सेट थी,
मै कायल था-----
तुम्हारी मुस्कुराहट के फंक्शन का!
हाय!रे निकाह की तब्दिली,
कि दिल तो वही है--------
बस मोहब्बत हैंग कर रहा है।

Tuesday, 21 February 2023

कॉलेज के दिनों की एक खूबसूरत याद "स्पंदन" के साझा काव्य संकलन में 💞💞❤❤

(याद तुम्हारी नही गई)

अभी तलक याद तुम्हारी नही गई,
वे पिंक से सूट मे तुम्हे देखना,
जैसे अभी कल की बात हो,
तुम गई तो बेशक---------
पर मेरी जेहन में ज्यो की त्यो तुम आज भी हो,
तुम्हारी कसम मौसम बदले,साल बदला
लेकिन तुम्हें चाहते रहने कि--------
मेरी खुमारी नही गई,
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई.

वे पतझड़ की हवा,
और उनकी शाखो से गिरते पत्ते,
और तुम्हारे कालेज से छुटने का वे वक़्त,
जब तुम्हारे खुले बाल,
हवाओ से इधर-उधर बिखर जाते थे,
फिर उन्हे तुम अपनी नाज़ुक अँगुलियो से,
जब पिछे की तरफ करती थी,
वे मेरा तुम्हे देखने का खूबसूरत लम्हा था,
मै आज भी उसी लम्हें से मोहब्बत करता हूँ,
सच तो ये है कि----------
बिना तुम्हारी याद के हमसे,
कोई दिन या रात गुजारी नही गई!
अभी तलक याद तुम्हारी नही गई.

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin. no.222002 (U P)
mo.no.-----7800824758
(एक आवारा शाम हूं )
धुँधला जाते है एै "रंग"----------
मेरी आगोश मे चेहरे,
मै शरीफ़ो के शहर की----
एक आवारा शाम हूं ।

Monday, 20 February 2023

(राम बोला जाये)
आओ अमन के लिये इस शहर मे------
एक मदरसा खोला जाये!
ऐ,रंग-------------
जहां हिन्दू लबो से अल्लाह हो अक़बर,
और मुस्ल़िम लबो से राम बोला जाये।
(जूड़े का गुलाब)👌👌💐
अब भी रखा है,हमनें अपने कमरे में,
उनके जूड़े का गुलाब।
वही ख़ुशबू, वही सुगंध, वही चाहत,
ऐ"रंग"हमसे गुफ़्तगू करता है,-------
उनके जूड़े का ग़ुलाब।।👸👨😍😍💟🌹🌹🌹🌹
(हर साल खिलती है।)💐💐
जो लगाई थी तुमने ------
कह के अपने मोहब्बत की निशानी,
वे गुलदावदी---------
तुम्हारी तरह हर साल खिलती है।।।🌺🌻💐🌸😍😍💟💟
(औरत दर्द की मीना कुमारी है)

औरत प्यार मे
इस कदर डुब जाती है,
कि वार देती है खुद को,
फरेब की बाँहो मे।
फिर रोती बहुत है--
तन्हाई-घुटन जीती है,
बनके सुलगती है गीली लकड़ी,
ऐ,रंग--
औरत दर्द की मीना कुमारी है।

Sunday, 19 February 2023

(पेट्रोल सी लागे है )

वे धीरे-धीरे मुझको कब्जाती जा रही है,
अपने रूप के जादू से,
ए "रंग" मुझे अब वे 
अच्छे दिन के धोखे में--
पेट्रोल सी लागे है.

Saturday, 18 February 2023

(तेरे रुप की मदिरा)
तेरे रुप की मदिरा-----
मै बैठ के पीता रहा,अपनी आँख के चुल्लु से।
तेरे रुप की मदिरा-----
पढ़ने लगा कशीदा,ज्यो-ज्यो नशा हुआ,
ऐ,रंग--दिल शायर था,शब्द थे चीखने मे।
तेरे रुप की मदिरा----
मै बैठ के पीता रहा,अपनी आँख के चुल्लु से।
(याद के हर एक बूर्ज़ पे बैठी हो)
जुदा कर लोगी हमसे ये हुस्ऩे बदन लेकिन,
तुम उड़ न सकोगी,मेरी मौत से पहले!
क्यूँकि तुम हमारी----------
याद के हर एक बूर्ज़ पे बैठी हो।
(रोटियो के से जलने के निशान मिलते है)
अँधेरी रात वे औरत है--------
जो सिसकती है फूटपाथ पे होंठ कुचलकर!
इसे पति की छुअन नही मिलती,
इसके पुरे बदन पे ऐ,रंग---------
बस रोटियो के से जलने के निशान मिलते है।
(सावधान!सामने चुनाव है)
सावधान!
सामने चुनाव है।
आपको अपना बताना------
इनका राजनीतिक दाव है!
सावधान !
सामने चुनाव है।
इतने दिन याद नही आये,
अब कहते है----------
ये इनके पुरखो का गाँव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
मुसहर बस्ती की दशा ज्यो की त्यो,
भूखो मरा बुनकर,
उसकी बेवा के सामने घड़ियाली आँसू,
कुछ करने के वादे--------
चेहरे पे ताव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
झोपड़ी की रोटी-चटनी छक रहे,
खाट पे बैठे हँस रहे-------
बढ़ा काका और काकी से इनका लगाव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
इनका चरित्र समझ से परे,
एै,रंग----ये लोकतंत्र की आड़ है,
वरना कोयल की कुक में-----
ये कौवो की काँव है!
सावधान!
सामने चुनाव है।
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222002
mo.no.7800824758

धन्यवाद!दैनिक भारत संवाद के संपादक बड़े भईया अशोक सत्यवीर जी का जिन्होने आज के साहित्यिक परिशिष्ट मे मेरी कविता"सावधान!सामने चुनाव है"को अपना बहुमूल्य स्नेह दिया।
(सपेरे की बिटिया)
कभी पढ़ने आती थी हमारे स्कूल में,
सपेरो की बस्ती से---------------
एक सपेरे की बिटिया।
वे तमाम किस्से सुनाती थी साँपो के अक्सर,
वे खुद भी साँपो से खेलना जानती थी,
पर वे मासुम नही जानती थी,
इंसानी साँपो का जहर,
एक दिन-----------
उसी मासूम की नग्न लाश,
उसकी बस्ती से पहले--------
पड़ने वाले एक झुरमुट में पाई गई,
मै सिहर गया!
उस नग्न मासूम की लाश देख,
मै अब भी इतने सालो बाद भी-----
अपनी उस मासूम छात्रा को भूल नही पाता,
हर नाग पंचमी को वे मेरी जेहन मे
उभर आती है,
और पुछती है मुझसे कि बताईये न सर,
कि कैसे चुक गई,
अपने पुरे बदन पे रेंगे हुये नाखूनि साँपो से,
एक सपेरे की बिटिया।
@@@आप सभी को नाग पंचमी की बधाई।
## # रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
(पूजा या अजा़न से ढ़कती है)
मुझे उस मजबूर औरत की----------
टूटी चुड़ियो की आवाज़ ईधन की लगती है,
वे अपने ग्राहक की गर्म साँसो पे,
अपनी मजबूरीयो का-------------
कई दिनो से पड़ा हुआ ठंडा तवा रखती है।
उसकी चीख और पीड़ा में,
उसके भूखे बच्चो के खाली पेट भरने वाली रोटी-----------------
की खुशी दिखती है।
वे अपने कपड़े समेट ब्लाउज पहन,
जब अपनी उरोजो में ये रुपये रखती है,
तभी उसकी नज़र उसी कमरे मे--------
टंगे हुये एक माँ के नंंगे उरोज वाले,
कैलेंडर पर पड़ती है,
जो अपने मासूम बच्चे का पेट इसी उरोज से भरती है।
वे एक मर्तबा फिर-------------
इस कमरे मे से निकलने से पहले,
अपने बंद ब्लाउज में--------------
रंखे पैसो को अपने जख्मी उरोजो के बीच टटोलती है।
न जाने क्यू उसके वे दोनो उरोज,
हमारे दो किरदार से लगते है!
एै,रंग-----मुआफ करना
मैले हो जाते है फिर भी कभी-कभी ,
कुछ औरतो के यही उरोज,
चाहे वे इसे पूजा के आँचल या-------
किसी मस्जिद के अजान से ढ़कती है।
लगाये बैठा है—————-
होंठो पे अपनी वे सुलगती सिगरेट!
बगल में अनगिनत टुकड़े गिरे है,
धुआँ है!
उस कमरे में जिस कमरे में कभी तुम,
छिन के फेक दिया करती थी,
उसकी अधजली सिगरेट।
अब होंठ पे लगा भुल जाता है,
वे तो सुलगते-सुलगते,
जब होंठ के आखिरी सिरे पे पहुँचती है,
तो वे चौकता है!
फिर जला होंठो पे रख लेता है,
वे अपने एक नई सिगरेट।
और तकने लगता है दरवाजे की तरफ,
कि शायद तुम लौट के आओ,
छिन के फेकने इसके होंठो से,
अधजली सिगरेट।
एक सुबह———-
दरवाज़ा खुला था लोगो की भिड़ थी,
शायद कुछ देर पहले ही मरा है,
क्योंकि—————-
अभी भी उसकी होंठो पे एै,रंग
धीरे-धीरे आगे बढ़ रही बुझने के लिये,
बिल्कुल इसके जीवन की तरह——-
ये सुलगती सिगरेट।
बहुत उदास है—————
आज हमारे तुम्हारे मोहब्बत की,
कैंडिल नाईट।
मै वही बैठी हूँ ठिक सामने,
बस वे जगह खाली है-
जहां तुम बैठते थे,
आज बहुत उदास है मेरे अंदर जिंदगी,
मै टुट रही हूँ!
मेरे संग बीत रही है,
बस तुम्हारे खूबसूरत यादो की—–
कैंडिल नाईट।
शायद कही चुक गये हम,
इसी से हमारे रिश्ते में गलतफ़हमी बढ़ती गई!
तुम अलग हो गये मै अलग हो गई,
अब तो अक्सर————–
डिनर मेज पे ही रह जाता है,
और मै कुर्सी पे बैठी यु ही,
गुजार देती हू————-
अपनी कैंडिल नाईट।
गर गुंजाइश हो तो लौट आओ,
एक मर्तबा ही सही मुआफ करने,
क्योंकि ऐ,रंग—–कही ऐसा न हो,
कि तेरा इंतजार करते-करते,
हमेशा के लिये बुझ जाये,
मेरी ये कैंडिल नाईट।
ओढ़नी
याद है बचपन---------
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी।
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-माँ ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी-----------
अब अपने सीने पे तुम रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी-----------------
कि ये अचानक माँ को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी----
सीने पे ओढ़नी।
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ माँ ने कहा था-रखने को ओढ़नी।
मै बाहर निकली----------
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा माँ कि कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------वही जहां माँ ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी।
### # एक सयानी होती हुई लड़की के वे तमाम चित्र इस रचना में है!गर सच लिखु तो इस कविता की ओढ़नी वाली वे तेरह साल की लड़की बन मैने--इस कविता को जिवंत लिखने की कोशिश की है,इसपे मै कितना खरा उतरा ये तो आप सभी सुधीजन पाठको पे।
(औरत के अंग)

हा मै औरत हू-----------
इसलिए तो तुम्हारे उन अंग विशेष,
को मै तकने भर से जान जाती हू,
कि तुम्हारी मंशा मेरे उन अंगो के-----
बस नोचने-खसोटने और मसलने से है।
जबकि एक औरत के वही अंग विशेष,
अपने पती के प्यार पाने के वक़्त भी,
शर्म ओढ़े रहते है,
क्योंकि उसमें किसी तरह की नोच-खसोट नही,
बल्कि एक-दुसरे के परम विश्वास का देव श्पर्श है।
हा!शायद तुम्हारा पुरुषपन अंदर से सध नही पाता,
किसी एक समर्पित अंग से बध नही पाता,
वरना तकते तो तुम्हें भी अपनी पत्नी का वे अंग,
उतना ही आकर्षित करता------------
जीतना की पर स्त्री या औरत का।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

Friday, 17 February 2023

(जींस और टी-शर्ट वालि औरते)
मुझे ये जींस और टी-शर्ट पहनी औरतो से,
ज्यादा खूबसूरत लगती है--------------
घर की गृहस्थ साड़ी पहनी औरते।
जिम्मेदारियो की इनके लोच और खम की रोमांटिकता,
मेरे अंदर एक सिहरन भर देती है,
उसके बालो का इधर-उधर का बिखरापन,
फिर उसकन लिये,
जूठे पड़े घर के बरतनो का माजना,
और उसपे हल्की-हल्की चुड़ियो की आवाज का संगीत,
ये संगीत क्या जाने?
क्लब मे भौंडे म्यूजिक पे थिरकती------
ये जींस और टी-शर्ट वाली औरते।
सेक्स अपील की विद्रुपता और अश्लील फिगर से,
कही ज्यादा खूबसूरत लगती है,
अपनी साड़ी खोसे,
उस गृहस्थ औरत का थकी-मादी उठ,
टाॅवल ले बाथरुम में,
शाॅवर के नीचे नहाना,
उसके नहाने की शालिनता का ये शास्त्रियपन,
को क्या जाने?
स्विमिंग-पुलो मे अर्धनग्न नहाती-------
ये जींस और टी-शर्ट वाली औरते।

@@@इस रचना का आशय किसी माडर्न या आधुनिक औरत को आहत करना कतई नही है ये महज़ एक रचना मात्र है।

रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Thursday, 16 February 2023

(कलम तवायफ़ हो गई)
पुरस्कार की खातिर----------
उसके सीने से दुपट्टा गिर गया,
उफ! अदब को ये दिन भी देखना था,
की दो-कौड़ी की सियासत की खातिर----
सच लिखने वाली कलम तवायफ़ हो गई।
थू मै गुमनाम मर जाऊ कुबूल लेकिन,
मुझे मेरे मालिक बचाये रखना,
वरना किसी गरीब की दहलीज़ का सच कौन लिखेगा?
गर औरो की तरह------------
मेरी कलम भी तवायफ़ हो गई।
इमारत,महफ़िले,रौशनी के उस तरफ
कुछ लाशे है जो दिख नही रही,
ये कुछ एैसे शख्स है,
जो ईधन है इनकी सियासत के,
मै इनकी झूठी तारीफ़ो मे थिरकू भरी बज्म़,
एै "रंग" इसका मतलब है कि हालातो के मद्दे-नज़र----
मेरी कलम भी तवायफ़ हो गई।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)
पीन नं-----222002 ।
mo.no.-----7800824758
(आवारा मुसाफ़िर हूँ)
किसी के गेसुओ के तले---------
मै जीवन गुजारु ये मुमकीन नही!
क्यूँकि ऐ,रंग----मै शौहर नही-----
खुद की जिंदगी का,
आवारा मुसाफ़िर हूँ।

Wednesday, 15 February 2023

(हिन्दी और उर्दू नही आती)
चिलचिलाती धूप मे-------------
माथे से पसीना टपकता है साहब,
हम गरीबो के बदन से कभी-------
परफ्यूम की खुशबू नही आती।
हम इमारते मंदिर--मस्जिद सब बनाते है,
हमारे छाले फूटते है,भरते है,फिर फूटते है
साहब! हम गरीबो को रोटी के लाले रहते है,
आपके कुत्ते तलक केक खाते है,
हमारे झोपड़े तलक एक दिन की भी खातिर----
कभी ये अय्यासी नही आती।
हम अखबार,गीता--कुरान,मजहब का क्या करे?
हम गरीबो को तुम्हारे जाती-मजहब और दंगे की----
ठीक से हिन्दी और उर्दू नही आती।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758
आज, की डाक से राजनीति की सर्वाधिक पढ़ी जाने मासिक पत्रिकाओं में से एक "रविवार " के फरवरी अंक की प्राप्ति हुई ,इसके लिए मैं संपादक बड़े भाई प्रमोद शर्मा को कोटिशः धन्यवाद देता हूं.
*पाकिस्तान के व्यंग्यकार करेगें उर्दू में अनुवाद.....*

इक्कीसवीं सदी के श्रेष्ठ 251 व्यंग्यकार

 *भारत...* 
मॉरीशस...
 *कनाडा...* 
यूएसए... 
 *ऑस्ट्रेलिया...* 
यूके... 
 *न्यूज़ीलैंड...* 
दुबई
एवं 
 *नेपाल के* व्यंग्यकारों को समेटे अंतर्राष्ट्रीय व्यंग्य संग्रह में  मेरे व्यंग्य का सम्मिलित करना मुझे अल्हादित कर रहा है ..

आज  ख़बर आई कि पाकिस्तान के व्यंग्यकार इसका उर्दू में अनुवाद करेंगे ...

 *सम्मिलित सभी व्यंग्यकारो को शुभकामनाएं, प्रकाशक और संपादक द्वय  लालित्य ललित जी एवम्*  *प्रो. राजेश कुमार जी को हार्दिक बधाई* 💐*

🌹🌹इस व्यंग संग्रह में शामिल होना हमें एक और खुशी दे रहा है🌹🌹🙏🙏🙏🙏

Monday, 13 February 2023

14 फरवरी यानी वेलेनटाइन-डे के उपलक्ष्य मे लिखा एक रोमांटिक हास्य-व्यंग्य--------------------
                      (इंण्डेन गैस है भाइ)
कुँवारो की खातिर------------
ये वेलेनटाइन-डे और 14 फरवरी है भाइ,
किसी शादीशुदा से पुछो तो मुँह लटकाये कहेगा,
कि खुशकिस्मत हो,
वरना हमारे हिस्से--------------
तो तीज और करवा चौथ है भाइ।
सच पुछो तो बिना निर्णय के,
ये टेंशन देने वाला--------
एक ट्वन्टी-ट्वन्टी का मैच है भाइ।
अच्छि बैटिंग,खराब बैटिंग कुछ नही
थर्ड इंम्पायर गया तेल लेने यानि ये----
बेइमानी से पकड़ा कैच है भाइ।
तुम रेस्टोरेन्ट जाओ डिनर करो,
गुलाब दो क्षमा है---------
यहाँ तो हिम्मत नही पड़ती व्याह के बाद से,
सच पुछो तो भाइ,
कि पत्नी कब गुर्राने लगे क्या पता?
यानि कि ये खत्म होने की कगार पे खड़ी,
एै "रंग" हमारे जिंदगी के किचन की-------
इंण्डेन गैस है भाइ।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Friday, 10 February 2023

(ड्यूटी देंगे)
न जाने कैसे-कैसे वादो की ये बूटी देंगे,
किसी जनसभा मे लैपटॉप तो किसी जनसभा में स्कूटी देंगे!
सब चुनावी फरेब की ये महज़ लिफाफेबाजी है,
इतने सालो से दिया नही अब कह रहे है कि एै"रंग"----
हम हर बेरोजगार को प्रदेश मे कोई न कोई काम,
या कोई न कोई ड्यूटी देंगे।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

धन्यवाद!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और आज के मेरे चुनावी कटाक्ष का।

Thursday, 9 February 2023

बड़ी मेहनत से कमाई थी बाप ने इज्जत,

एक गुलाब और चाकलेट पर बेटी गिरवी रख कर आ गई।


किसी और की लाइन ✍️✍️

Wednesday, 8 February 2023

(मेरे जुड़े मे गुलाब)

मै आज भी----
आपके उस पहली छुवन सी,
सिहर उठती हूं!
जब आप टांकते हो मेरे जुड़े मे गुलाब.
उस समय आपको 
शायद मेरी इस खुशनसीबी का अंदाज़ा,
ना होता हो,
पर मै अपनी शर्मिली आँख मुँदे,
जुड़े मे टांकते हुए गुलाब की
तरह मै,
आपकी अंगुलियों के स्पर्श को
अपने पुरे बदन पे महसुस करती हूं!
ये रोमानियत ही----
हमारे और आपके प्यार के बीच,
कि वे घूँघट है,
जिसे मै आधे निकले हुये चाँद की तरह,
अपने चेहरे पे डाले रखना चाहती हूं,
और नहाना चाहती हू--
आपके मेरे जुड़े में टांके हुये,
इस गुलाब की तरह हर मौसम,
कि उस गुलाबी बूँद से,
जिससे निखर के खिलती है ये गुलाब--
और इस गुलाब की एक-एक पंखुड़ी।
बस यही इच्छा है कि----
मुझे एैसे ही चाहना ता-उम्र,
और एैसे ही टांकना
आप मेरे जुड़े में गुलाब.

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर-222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no-7800824758
(संगम)
संगम----------
हमारी आस्था के मदिने की तरह है!
ऐ,रंग-----जहां---------
आसमाँ से रुह़े भी आती है,डुबकी लगाने।
(पिया आ जाओ)
होली मे दुखे है अंग-अंग------
कि पिया आ जाओ!
भरो पिचकारी से रंगो अंग-अंग-------
कि पिया आ जाओ।
छेड़ो मै छिटकु,भागु फिर पकड़ो,
मै शर्माऊ तेरे सीने से लग,
जीऊँ मै होली के सारे उमंग,तेरे संग-----
कि पिया आ जाओ।
फिर हँसे अँगना और मोरा कंगना,
नथिया करे ननद सी शरारत,
मै हारु तुम जीतो,ये होली की जंग------
कि पिया आ जाओ।
नयनो मे सब कुछ,नयनो मे मदिरा,
आँचल मे महुवा,
और साँसो में महके अमवा की बौर,
कुके है चोली मे कोयल,
कि होली मे सिसके ना हमारी पलंग-----
कि पिया आ जाओ।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

धन्यवाद!निर्मेश के त्यागी भईया दैनिक वर्तमान अंकुर मे मेरी रचना"पिया आ जाओ" को स्नेह देने के लिये।

Monday, 6 February 2023

(बेवकूफ मुसलमान नही है)
सपा,बसपा किसी कि भी राह आसान नही है,
अपनी जीत पक्की बताओ लेकिन गौर करो-------
तो तुम्हारी चीख मे वे जान नही है!
बस मुसलमान-मुसलमान तुम सब रट रहे,
शायद अबकी उत्तर-प्रदेश,
तुम्हारी नज़र मे हिन्दुस्तान नही है!
एै"रंग" सारा मुलम्मा तेरे धोखे का उतर जायेगा------
क्योंकि इतना भी बेवकूफ मुसलमान नही है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान-अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और हमारे चुनावी कटाक्ष का।
(फरेबी मुस्कूराहट)
मै जब तलक कैद था,
उसके रुप के पिंजड़े में।
ऐ,रंग----वे रोज डालती थी----
मेरी चाहत के बरतन मे अपनी फरेबी मुस्कूराहट।
(शायर का दिवान छपा)
ये शायर जीते जी बहुत तड़पा,
इसकी टुटी संदुक से निकले थे,भूख के किस्से।
क्या?खूब है तंज़े दौलत भी,
कि बिकने के सारे रिकार्ड टुटे,ऐ रंग------
जब भूख से मरे इस शायर का दिवान छपा।

@@काॅपीराइट----रंगनाथ द्विवेदी।

Sunday, 5 February 2023

(बेवकूफ मुसलमान नही है)
सपा,बसपा किसी कि भी राह आसान नही है,
अपनी जीत पक्की बताओ लेकिन गौर करो-------
तो तुम्हारी चीख मे वे जान नही है!
बस मुसलमान-मुसलमान तुम सब रट रहे,
शायद अबकी उत्तर-प्रदेश,
तुम्हारी नज़र मे हिन्दुस्तान नही है!
एै"रंग" सारा मुलम्मा तेरे धोखे का उतर जायेगा------
क्योंकि इतना भी बेवकूफ मुसलमान नही है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

धन्यवाद!आपका दैनिक वर्तमान-अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया और हमारे चुनावी कटाक्ष का।