Monday, 28 June 2021

(ज्यादा देवता मिलते है)
हाँ!मै तलाशता हूँ------------
अँधेरी रात में आवारा गज़ल,,,,,,,,,,,
क्योकि ऐ,रंग------------
उजाले में ज्यादा देवता मिलते है।
(इश्क़ करके)

ना पढ़ सकी कोई किताब, 
मै इश्क़ करके.

मै औरत सुफि हो गई 
इश्क़ करके.

मौलाना और तकरीरे मस्जिद, 
तुम्हे मुबारक!
मै खुद हो गई----
मुकम्मल मुसलमान 
इश्क़ करके.

ये हिज़ाब,ये परदे,ये चारदीवारी 
कैद है औरत की,

तुम क्या निकालोगे इस कैद से मुझको,
मै खुद ही छोड़े जा रही,
अपने जिस्म का मकान, 
ऐ,रंग-
इश्क़ करके. 

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (उत्तर-प्रदेश ).

Sunday, 27 June 2021

(रोटी किस कौम की है)

भरे पेट हिंदू- मुसलमान होना आसान है, 

पर ऐ, "रंग"
किसी भूखे से पुछ------

कि उसकी रोटियाँ किस कौम की है.
(गालिब न लिखे)
भूख के सिरहाने,मै सिसकुँगा सारी रात,,,
ऐ,रंग-----
भले मेरे दौर के लोग,मुझे गालिब न लिखे।
(बिधवा विणा हूँ)
मै पथरीली------------------
कंटक राहो की ब्यथा लिये,
जिये जा रही उस चिड़ियाँ सी,
जिसके निड़ का तिनका-तिनका,
हर आँधी ने नष्ट किया!
है क्षिण हृदय में पीड़ा मेरे,
मै जयशंकर प्रसाद की आँसू हूं।
ना बदली ना सावन आये,
मेरी यौवन के गाँव कभी,
तपती धूप में देह जले
और तड़पे अंतर घट मेरा,
मै तार-तार टूटी नारी,
जो बज न सकु जीवन तट पे----
मै एैसी बिधवा विणा हूँ।

Friday, 25 June 2021

(जूल्फों में बांध लेती है)
उतरते है,घिरते है उसकी जूल्फों की तरफ बादल,
और वे इन बादलो को-------------
अपनी जूल्फों में बांध लेती है।
वे हुस्ऩ-ए-ज़ीनत है शहर की,
लोग तकते है उसके छत की तरफ,
वे उम्मीद-ए-बरसात है,
जो एक अदा से------------
अपनी जूल्फ़ो में सावन बांध लेती है।
है तैरने भर का पानी उसकी आँखो में,
ऐ,रंग-------------------
वे हम शायरो का सागर भी,
अपनी जूल्फ़ो में बांध लेती है।
(रोटी किस कौम की है)
भरे पेट हिंन्दू-मूसलमां होना आसान है,,,,,
पर ऐ,रंग---किसी भूखे से पुछ------
कि उसकी रोटियाँ किस कौम की है।

Thursday, 24 June 2021

(हमपे हँसे है बदरवा सखी)
अँखिया मे लोरन के पानी बहे-----
ढुढ़े मीले ना कजरवा सखी,,,,,,,,,,
ड़से है मनवा के पोर-पोर हमरा----
हमपे हँसे है,बदरवा सखी।
नीक ना लागे घर अँगनईया------
सौतन लगे है ओसरवा सखी।
ऐ,रंग-----
हियरा के आह लग जातई,,,,,,,,,,,,
बस पीके कोठरियाँ सलामत रहत--
बाकी जरी जातई पुरा शहरवा सखी।
ड़से है मनवा के पोर-पोर हमरा----
हमपे हँसे है बदरवा सखी।

###हमारे यहा की स्थानिय भाषा की एक रचना।
आज! दिल्ली के प्रखर गूँज प्रकाशन की "रेलनामा" प्राप्त हुई, जिसमें मेरा लिखा यात्रा-वृत्तांत "पहली रेलयात्रा" भी शामिल है,धन्यवाद संपादक डॉक्टर अलका जैन "अराधना जी" व नीलू सिन्हा जी का।
(भूख ने अपना बदन बेचा है)
स्याह अँधेरी रात में सन्नाटे को चीरती,,,,,
पुल के उस तरफ की चीख,,,,,,,,,,,,,
उफ!शायद ऐ,रंग----फिर भूख ने किसी को----------------
अपना बदन बेचा है।

Wednesday, 23 June 2021

(अखबार भी धंधे की तरह है)
सच लिखने की कुबत न रही,,,,,,,,,,,,,
अब इस मूल्क में ऐ,रंग---------
अखबार भी धंधे की तरह है।
(केरल से लौट आई है)
शायद जल्द ही घिर जाये,,,,,,,,,,,,
हमारे शहर में-मानसून के बादल-----
क्योकि ऐ,रंग--हमने सुना है,,,,,,,,,,,,,
कि मेरी मोहब्बत-------
केरल से लौट आई है।
(एक बाँझ औरत)
एक बाँझ औरत---------------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।
क्या करती----------
सास,ससुर,शौहर की उम्मीदे उसपे तलाक का डर,
वे भीगी आँख------------
इस दर पे अपना घर बचाने आ गई।
एक बाँझ औरत--------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।
औरत को तो ये भी हक नही कि वे कह सके,
कि बाँझ वे नही!
एै! पीर उठ और जग इस मज़ार से,
और देख एक औरत----------
अपने शौहर का मज़हब बचाने आ गई।
एक बाँझ औरत--------
किसी पीर की मज़ार पे बच्चे मांगने आ गई।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Saturday, 19 June 2021

(प्रेटिकल देते है)
ऐ दुनियाँ मोहब्ब़त को विज्ञान मान ले,,,,,,,
क्योकि,चाहने वाले ख्व़ाहिशो की लैब में,,,
ऐ,रंग------------------
खुद को मिटा करके प्रेटिकल देते है।
(तमाशे करता रहा)
मै--
अपने ही चेहरे पे तमाँचे करता रहा,,,,,,,
ऐ,भूख मै तेरी खातीर----------
पुरे शहर में तमाशे करता रहा।
(सावन के अंधो को बहार लगती हो)
हे!प्रिये------तुम मेकप में
सौन्दर्य प्रसाधन का------
इश्तहार लगती हो।
मै न्यूज चैनल सा लगता हूं------
और तुम चित्रहार लगती हो।
जब तुम्हे देखता है कोई गैर,
तो मै सलगता हु--------------
मजूरे की बीड़ी की तरह अंदर-अंदर,
मै उन्हें मोहर्रम का दर्द लगता हू,
और तुम उन्हे ईद का त्योहार लगती हो।
हे!प्रिये----------------
मेरे अच्छे दिन गये,
मै पतझड़ का पत्ता----------
तुम सावन के अंधो को बहार लगती हो।

Monday, 14 June 2021

कौन कहता है कि ये सिर्फ 
सीजनल मुसलमान है,
गौर से देखिए हुजूर
ये हमारे भारत के,
ओरिजनल मुसलमान है,









(बेजा तलाक न दो)
ख्वा़हिशो को खाक न दो!
एै मेरे शौहर-----------
सरिया के नाम पे,
मुझे बेजा तलाक न दो।
बख्श दो---------
कहा जाऊँगी ले मासुम बच्चे,
मुझ बेगुनाह को-------
इतना भी शाॅक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न उड़ेलो कान में पिघले हुये शीशे,
मुझ बांदी को सजा तुम--------
इतनी खौफ़नाक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न छिनो छत,न लिबास
खुदा के वास्ते रहने दो,
मेरी बेगुनाही झुलस जाये-------
मुझे वे तेजाब न दो,
बेजा तलाक न दो।
सी लुंगी लब,रह लुंगी लाशे जिंदा,
लाके रहना तुम दु जी निकाहे औरत,
मै उफ न करुंगी!
बस मेरे बच्चो की खुशीयो को कोई बेजा,
इस्लामी हलाक न दो-------
बेजा तलाक न दो।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
____तलाक एक दर्द है जो इसे भुगत रही कोई औरत ही समझ सकती है!अगर संभव है तो मेरी इस रचना के पढ़ने वालो से मेरी कलम अनुरोध करती है प्लीज कभी किसी भी औरत से बेजा तलाक न ले,शुक्रिया।

@@@शुक्रिया!साप्ताहिक समाचारपत्र अकोदिया सम्राट(म.प्र.)मेरी इस कविता को अपना बेशकिमती स्नेह देने के लिये।
(पगली बना दो)
नन्हे-नन्हे पाँव----------
छोटी-छोटी अँगूली बना दो,
ऐ,खुदा----------
मुझे फिर से बचपन की तितली बना दो।
मै तैरु गाँव के पोखर,
और तोडू फिर बाग से अंम्बिया,
मुझे माँ की डाँट-------
और बापू के दुलार की पगली बना दो।
( पांव मे चप्पल देखना)

गंजा सर ---
दो- चार दांत गायब ,
मूंछों के बाल पके,
अपनी ----
ये स्मार्ट सी शकल देखना,
चली जायेगी बची-खुची भी
मेरा मशवरा है, दोस्त !!
उसकी खुबसूरती नहीं,
पहले ---
पांव मे चप्पल देखना.
(पुजारी आ गये)
कुछ पंडे कुछ पुजारी आ गये,
चुनाव लड़ने कुछ मौलाना कुछ बुखारी आ गये।
ठाकुर साहब टहलते रहे,
उन्ही के विधानसभा से तिवारी आ गये,
कुछ पंडे कुछ पुजारी आ गये।
वे नारी भरे मंच से ललकारती रही,
उससे लड़ने पुरुष नही,
लखनऊ से एक ब्रह्मचारी आ गये,
कुछ पंड़े कुछ पुजारी आ गये।
बिकास,नौकरी,बिजली वादो की झड़ी,
स्वर्ग बना देंगे!
ऐ,रंग----------इस प्रदेश मे फिर
कुछ महिनो के चमत्कारी आ गये,
कुछ पंड़े कुछ पुजारी आ गये।

###चुनावी चक्कलस।

Wednesday, 9 June 2021

47वर्षो से अनवरत प्रकाशित देश की सबसे पुरानी और चर्चित मासिक पत्रिकाओं में से एक "नूतन कहानियाँ " के मई 2021 के अंक में चौथे (4) नंबर पर मेरी कहानी "रुदाली--एक घाव " प्रकाशित.कहानी---(रुदाली---एक घाव )

47वर्षो से अनवरत प्रकाशित देश की सबसे पुरानी और चर्चित मासिक पत्रिकाओं में से एक "नूतन कहानियाँ " के मई 2021 के अंक में चौथे (4) नंबर पर मेरी कहानी "रुदाली--एक घाव " प्रकाशित.

कहानी   (रुदाली----एक घाव )

 रुकमणी जब अपने मायके से ब्याह कर शादी के जोड़े में ससुराल आई थी, तो उसके सारे  कुंवारे  सपने बिल्कुल अन्य ब्याह कर आई लड़कियो व  दुल्हनों  की तरह कितने सुर्ख व गुलाबी थे.उसकी कल्पनाओं के पाँव में-"एक नारी सुलभ थीरकन थी" हर दो घंटे बाद खुद को कमरे के दर्पण में देखना और खुद को देख खुद शर्मा जाना ये नव-ब्याहता रुक्मणि की आदत में जैसे शुमार होता गया, और वे अपने पिया के ना आने तलक, कमरे के उसी दर्पण  से--ढ़ेर सारी अपनी व अपने मन की बाते किया करती थी. 

लेकिन कहते है कि--हर कैनवास को जरूरी नही की उसके मन का चाहा हुआ ही रंग मिले,  "अक्सर जिंदगी को बदमजा रंग भी मिलते है"  जैसा कि रुक्मणि के साथ हुआ. उसकी बेटी कहने वाली सासु माँ नकली किरदार को अपने यथार्थ से कब तलक अलग रखती एक दिन उसने अपनी उस नकली शास्त्रीयता का त्याग कर अपनी कड़वी व कसैली वाणी का प्रयोग जैसे ही किया वैसे ही जैसे आज रुक्मणि के  देखे गये-"सुर्ख व गुलाबी सपनो ने अपनी रंगत खो दी हो".जिस ननद की चुलबुली बाते सुनकर वे आनंद से भर उठती थी आज उसी ननद ने जैसे उसके वात्सल्य रूपी भाभी को अपने नाख़ून से गहरे घाव कर उनपे नमक और मिर्च का लेपन कर दिया हो. 

रुक्मणि को आज--अपने देवर की आँखों में भी एक कामुक और खुंखार सी चमक अपने युवा शरीर  को लेकर दिख रही थी. पहले रुक्मणि ने इसे अपना धोखा समझा--"लेकिन ये उसका धोखा नही बल्कि यथार्थ था".क्योंकि उसका देवर आज बार-बार किसी ना किसी बहाने से उसके घर का काम करते समय इधर-उधर फ़िसल जा रहे या गिर जा रहे आँचल पर ही जैसे लगी हुई सी थी, आज वे अपने देवर की उन आँखों से बचने के लिए जल्द से जल्द सारा काम निपटाकर ज़ब अपने कमरे में आई तो कमरे को उसने भीतर से बंद कर--"कई गहरी-गहरी सांसे ली उसे यूँ लगा की उसने जिंदगी में कभी इतनी गहरी और थकी सांसे नही ली थी जैसी की रुक्मणि ने आज ली है". 

आज रुक्मणि को अपनी संजोई दुनिया या उसके देखे सारे सुन्दर सपने सब जैसे बिखरे व खत्म होते दिख रहे थे. उसे आज अपने कमरे का वे दर्पण भी अपना नही लग रहा था  जिस दर्पण से वे कभी घंटो नजरें नही फेरा करती  थी आज उसने उसी दर्पण से अपने आप को एक झटके के साथ हटा लिया. आज रुक्मणि को अपने कमरे की सुहागन बिस्तर का बेवापन कचोट रहा था,जिस बिस्तर पे कभी उसके पति के प्यार की सीलवट व चुंबन थी आज उसी बिस्तर पर रुक्मणि अपनी करवट बदलकर नागफनी की चुभन जी रही. 

ऐसा हो भी क्यों ना आखिर घुटन और मन की चीड़-चिड़ाहट का एक दिन यही अंजाम होना था, जैसा की रुक्मणि के साथ हुआ एक रात उसके पति और उसके बीच ऐसी तू तू, मैं मैं हुई जिसने एक सीधी-साधी सी रुक्मणि को वे घाव दिये जिसकी टीस व पीड़ा ने उसका सबकुछ छीन लिया, वे फिर भी सबकुछ सहन करती रही महज अपने पति के एक कतरे प्यार के लिये. लेकिन रुक्मणि ये नही जानती थी कि उसके पति का सबंध विवाह से पूर्व भी अन्य औरतों से भी था. उस दिन उसके पति ने उसे उस बिस्तर पर इतनी बेरहमी से अपने चमड़े की बेल्ट से पिटा व मारा जिस बिस्तर पर कभी उसके प्यार को इस रुक्मणि ने जिया था. आज रुक्मणि का वे पुरा बिस्तर सिसक रहा उसके जिस्म के घाव तो भर जायेंगे लेकिन वे घाव कैसे भरेंगे जिस घाव ने रुक्मणि से इसे अब हमेशा के लिये ना भरने वाले अंतर्मन के घावो की रुदाली बना दिया.

लेकिन नही उस दिन जब रुक्मणी की आँख सुबह के धुंधलके मे खुली तो ये वे रुक्मणी नहीं नही थी, बल्कि ये एक नई रुक्मणी थी जिसने अपने बदन के उन चोट के निशान को एक बार देखा और फिर उसे छुवा, छुने के बाद वे उठी और अपनी समस्त दैनिक दिनचर्या से निवृत हो. अपने सभी आवश्यक सामान को एक अटैची मे रख कर उस कमरें की चाभी अपनी सास को पकड़ाते हुए कहा कि एक बार इस अटैची को देख लीजिए की कही मैं इस अटैची मे आपके घर का कोई किमती सामान तो नही लेते जा रही, तभी उसकी सास पहले की तरह कर्कश आवाज़ मे बोली तुम्हारी यह हिम्मत कि तुम घर छोड़कर जा रही हों, इतना सुनते ही घर के सभी सदस्य वहां आ गए और रुक्मणी के हाथ से उसकी अटैची छोड़ने के लिए आगे बढ़े तो रुक्मणी बोल उठी, खबरदार अगर किसी ने मेंरे हाथ से इस अटैची को छोड़ने की कोशिश की तो.

क्योंकि अब तलक तुम सभी लोग जिस रुक्मणी से उसका सुख-चैन छीनते रहे हों वे रुक्मणी और थी और आज जो तुम लोगों के सामने खड़ी है ये रुक्मणी और है, इतना सुनते हीं सभी सहम गए किसी कि हिम्मत नही हुई कि वे रुक्मणी के हाथ से उसकी अटैची छिन ले, फिर रुक्मणी एक छण भी उस घर मे रुकी नही, वहां से निकलने के बाद रुक्मणी ने ऑटो कर, ऑटो वाले से कहा  भैया मुझे स्टेशन छोड़ दो, ऑटो वाले ने रुक्मणी को स्टेशन पर उतारा तो रुक्मणी ने ऑटो वाले का किराया देकर अपने सामान सहित स्टेशन के अंदर गई, फिर थोड़ी देर बाद वे टिकट खिड़की के पास जाकर बोली जी एक लुधियाना की टिकट दे दीजिए, टिकट लेने के बाद रुक्मणी ने पुछा यह बताइये कि लुधियाना वाली ट्रेन कब तलक आएगी, तो उसने कहा आज अपने निर्धारित समय से एक घंटे लेट आएगी.

फिर रुक्मणी वही प्लेटफार्म के पास खाली बेंच पर बैठी और ना चाहते हुए भी वे अपने बीते हुए कल के ख़्यालो मे खो गई, उसे होश तो तब आया जब उसे किसी औरत ने जोर से झिझोड़ा और इस झिझोड़ने के तुरंत बाद ही जब रुक्मणी ने उस औरत को देखा तो आवाक रह गई क्योंकि जो औरत उसे झिझोड़ रही थी वे कोई और नही बल्कि उसके बचपन कि बहुत ही प्यारी सहेली पुष्पा थी, जो उसे रुक्मणी, रुक्मणी कहकर झिझोड़ रही थी, जब रुक्मणी थोड़ी सामान्य हुई तो उसने पुछा, अरे! मेरी रुक्मणी किन ख़्यालो मे खोई हुई थी, जरा मैं भी तो जानू? इतना सुनने के बाद बरबस रुक्मणी की आँख भर आई और वह ना चाहते हुए भी, पुष्पा के कंधे से लग सिसक पड़ी, कुछ देर पुष्पा ने रुक्मणी को सिसक लेने दिया.

फिर जब लगा कि रुक्मणी अब थोड़ी ठीक है तो उसने पुछा रुक्मणी ये मैं क्या देख रही हूं, तु तो ऐसी ना थी फिर ऐसा क्या हुआ कि तु इतनी कमजोर हों गई, फिर रुक्मणी ने एक-एक कर अपने सारे दर्द को पुष्पा से बताती चली गई, बताने के बाद रुक्मणी ने कहा पुष्पा अब मैं एक नए फैसले के साथ एक बार फिर से मैं नया जीवन जीना चाहती हूं, लेकिन रुक्मणी आखिरी  तु जाएगी कहा! तो रुक्मणी ने कहा अब जहा मुझे मेरी किस्मत लें जाए. तो पुष्पा ने कहा रुक्मणी तुम्हें याद है तु कॉलेज के जमाने मे कितना बेहतरीन और लाजवाब लिखा करती थी, इतना ही नही बल्कि तुमने पुरे कॉलेज मे एम काम टाप भी किया था, तु एक काम कर,अभी-अभी मेंरे चाचाजी की कंपनी मे अकाउंटेंट का एक पद खाली हुआ है, मैं अपने चाचा से कह दुंगी तो वे तुम्हें आसानी से अपनी कंपनी मे रख लेंगे और इतना ही नही मैं तुम्हें कोई अच्छा सा फ्लैट भी किराए पर अपने आस-पास कही दिला दुंगी.

फिर पुष्पा कि मद्त से रुक्मणी ने अपने एक अलग और नए जीवन कि शुरुआत की, इस बीच उसने इतनी मेहनत और ईमानदारी से काम किया कि वे कंपनी तीन वर्षो से लगातार अपनी अच्छी गुणवत्ता के लिए पुरस्कृत हुई, इसी बीच काम से खाली होनें के बाद रुक्मणी ने उपन्यास "रुदाली " लिखना प्रारम्भ किया और रुक्मणी का यह उपन्यास लिखने मे उसे दो वर्ष लगा, जब उपन्यास पुरा हों गया तो उसे रुक्मणी ने देश के सबसे चर्चित पॉकेट बुक्स से प्रकाशित कराया. प्रकाशित होनें के बाद जैसे पुरे देश मे इस उपन्यास को खरीदने और पढ़ने कि होड़ लग गई,अतः  "रुदाली " उपन्यास मात्र आठ महिने मे सात बार रिप्रिंट एडिशन आई जो कि उपन्यास कि दुनिया मे एक रिकार्ड था.

फिर एक सुबह रुक्मणी ने जब अखबार के पहले पृष्ठ पर यह समाचार मोटे-मोटे अक्षरों में पढ़ा कि "रुदाली " उपन्यास के लिए रुकमणी को, भारत सरकार ने 15 अगस्त को 500000 / रुपए के साथ प्रशस्ति पत्र देने की घोषणा की. रुक्मणी 15 अगस्त के दिन फ्लाइट से दिल्ली जाने के लिए तैयार होकर घर से निकली, उसे फ्लाइट की टिकट अग्रिम भेजी गई थी. रुकमणी दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरकर अपना सारा सामान लेकर बाहर आई तो उसने एक टैक्सी को हाथ दिया तो टैक्सी उसके पास आ कर  रुक गई, उसने जब टैक्सी ड्राइवर से टैक्सी में अपना सामान रखने के लिए कहा तो,उस टैक्सी ड्राइवर ने रुक्मणी का सामान उठाने के लिए जब अपना हाथ बढ़ाया तो जैसे रुक्मणी को एक शॉक सा लगा क्योंकि वह टैक्सी ड्राइवर कोई अन्य नहीं बल्कि रुक्मणी का वही पति था जिसने रुकमणी को ना सिर्फ चमड़े की बेल्ट से मारा था, बल्कि उसने एक स्त्री की संवेदना की हत्या भी की थी.

रुकमणी बिना कुछ बोले चुपचाप टैक्सी में बैठ गई और उसे जहां जाना था उसने वह कार्ड, अपने पूर्व पति यानी की वर्तमान टैक्सी ड्राइवर को दे  दिया, तो रुकमणी की नजर टैक्सी में रखे हुए अपने उपन्यास  "रुदाली " पर पड़ी, आधा रास्ता तय होने के बाद किसी तरह हिम्मत करके उसके पति यानी कि टैक्सी ड्राइवर ने उससे कहा कि रुक्मणी तुम्हें ढेर सारी बधाई इस उपलब्धि के लिए, रुक्मणी ने भी जैसे रूटीन की तरह अन्य को धन्यवाद या थैंक्स  कहती थी वैसे ही उसने टैक्सी ड्राइवर को भी कहा.

कुछ देर के बाद उसने कहा कि रुक्मणी क्या तुम मुझे एक बार माफ नहीं कर सकती, तो रुकमणी ने कुछ देर बाद कहा कि माफ करिए मैं आपको नहीं पहचानती, क्योंकि जो रुकमणी कभी आपको पहचानती थी वे रुकमणी कोई और थी आज जो रुकमणी आपके सामने है, वह रुकमणी कोई और नहीं बल्कि अपने लिखें उपन्यास की " रुदाली" है . फिर रुकमणी अपने गंतव्य तक  पहुंचने के बाद उसे उसका किराया दे अपने होटल के कमरे की तरफ चल पड़ी, रुकमणी को यह भली प्रकार पता था कि उसका पति उसे अभी भी वही खड़ा एकटक देख रहा है, लेकिन रुकमणी अब उसे दोबारा नहीं देखना चाहती थी, इसलिए वे बीना मुडे अपने होटल के कमरें मे चुपचाप चली गई.

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कालोनी, मियांपुर 
जिला-जौनपुर pin.no.222002 (U P)
मोबाइल नंबर--7800824758

Tuesday, 8 June 2021

(केरल से लौट आई है)
शायद जल्द ही घिर जाये,,,,,,,,,,,,
हमारे शहर में-मानसून के बादल-----
क्योकि ऐै, "रंग"----हमने सुना है,,,,,,,,,,,,,
कि मेरी मोहब्बत-------
केरल से लौट आई है।
(आज रात)
ऐ बेवफ़ा सामने बैठ और सभल आज रात,
मै पढुँगी तेरे शहर में गज़ल आज रात।
लब पे हँसी होगी दिल में आँसू ,
रोशनी लुटाऊँगी-----------------
मै चराग की तरह जल आज रात।
तड़प उठेगी चाँदनी मेरी सदा से,
पछतायेगी वे भी निकल आज रात।
मै ये मुशायरा छोड़ जाऊँगी,
उस बेवफ़ा के दिल में--------
ऐ,रंग----रह जायेगी एक कसक आज रात।

Monday, 7 June 2021

(पेन किलर है)
हाँ!मेरी तबियत पहले से कही बेहतर है,,,,
क्योकि ऐ,रंग-----मेरे रुबरु-------
मेरे दिल की पेन किलर है।
(आखिरी रात लिखी,उसनें)

जला के चराग़---
आखिरी रात लिखी, उसनें.
हर्फ-दर-हर्फ,तड़पी कागज़ पे,
जब---
आखिरी बात लिखी, उसनें.
उफ!! जोर से लड़खड़ाई,
कलम छूट गई,
ऐ "रंग"-अपने ही,
खुदकुशी की---
आखिरी रात लिखी, उसनें.

@@ रंगनाथ द्विवेदी
##   7800824758

Saturday, 5 June 2021

दिनांक-6/6/21 को मध्य प्रदेश से प्रकाशित "दैनिक जागरण" के "साहित्यिक पुननर्वा " मैं प्रकाशित लघुकथा ----"तवा ठंडा हो गया "

दिनांक--6/6/21 को मध्य प्रदेश के "दैनिक जागरण" के. "साहित्यिक पुननर्वा " में प्रकाशित.



लघुकथा---(तवा ठंडा हों गया )

शहर से दुर पड़ने वाली बस्ती की एक जर्जर झोपड़ी के बाहर,उस बस्ती की तमाम औरते जुटी आपस में कानाफूसी कर रही थी, उसका कारण था उस झोपड़ी में रहने वाली वह औरत जो झोपड़ी के बाहर काफी सारा दिन निकल आने के बावजुद भी पागलो की तरह बैठी अपनी गोदी में लिटाए हुए बिटिया को थपक रही थी.


लेकिन उस औरत के थपकने के बाद भी उसकी बिटिया में कोई भी हरकत नही हों रही थी. तभी उन औरतों में से एक औरत जो कि देखने और अपने बात करने से ही साफ लग रही थी कि वह औरत इस बस्ती की सारी औरतों की चोधरी थी, ने जाकर उस गोद में ली हुई बिटिया की माँ को जोर से झिझोड़ा तो अचानक उस औरत ने कहा धीरे बोलो चाची अभी मुन्नी जाग जाएगी.


लेकिन उस चाची ने मानो कुछ भी ना सुना हों उसने बड़ी जोर से उस औरत की गाल पर तमाचा मारा और कहा कि पागल हों गई हों चंपा तुम्हारी बिटिया तो ना जाने रात में कब कि मर चुकि है. इतना सुनते ही चम्पा चीख उठी नही और फिर बेहोश हों गई.


जब चंपा को पानी के छींटे मारकर उसे होश में लाया  गया तो चंपा चुपचाप उठी और अपनी झोपड़े के अंदर से जब वह लौटी तो उसके हाथ में एक लोहे का तवा था जिसे वह बस्ती की सभी औरतों को दिखाती हुई बोली देखो तो चाची यह तवा कितना गरम है ना  अभी मैं इसपे गरम-गरम रोटियां सेक कर मुन्नी को खिलाऊंगी.


उसकी इस हरकत से बस्ती की सारी औरतें जान गई कि चंपा को बिटिया के मर जाने का तगड़ा झटका लगा है और लगे भी क्यों ना आखिर सारी रात उसने अपनी भूख से बिलबिला रही बिटिया को गोल से रोटी के आकर के चाँद को दिखा-दिखाकर अपनी बेटी को  उस रोटी के पक जाने का झूठा दिलाशा देकर सुलाने की कोशिश करती रही, लेकिन इस दिलाशा को टूटना था और अंततः इस दिलाशा के टूटते ही इसकी मासूम बेटी के प्राण-पखेरू उड़ गए.और एक माँ के वात्सल्य का तवा हमेशा-हमेशा के लिए ठंडा हो गया.



यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.


लेखक---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo. no.7800824758

(भूख जिंदा है)
पेट तो भर गया लेकिन भूख जिंदा है,
ऐ तरक्की---------------------
तेरी आड़ में हर झूठ जिंदा है।
हरिया की लाश आज भी है लहूलुहान,
कातिलो के हाथ में बंदूक जिंदा है।
लुट रही है आबरु हर एक स्याह रात,
पुरे बदन पे अबला के ये जूठ जिंदा है।
ख़ुदकुशी कर ली कल किसान ने,
ऐ,रंग-----आज अखबार में
उसकी कर्ज माफी और छुट जिंदा है।
पेट तो भर गया लेकिन भूख जिंदा है।

###इस रचना को पुरा पढ़े ये अनुरोध है।
(वृक्ष को बेटियो की तरह पाले)
प्यार,दुलार और स्नेह की खाद चलो डाले,,
ऐ,रंग----आओ-------------
हम वृक्ष को बेटियो की तरह पाले।

Thursday, 3 June 2021

शमीम रहती थी

कभी सामने नीम के———
एक घर था,
जिसमें मेंरी शमीम रहती थी।
वे महज़———
एक खूबसुरत लड़की नही,
मेंरी चाहत थी।
बढ़ते-बढ़ते ये मुहल्ला हो गया,
फिर काॅलोनी बन गई,
हाय!री कंक्रिट——–
तेरी खातिर नीम कटा,
वे घर ढ़हा——–
जिसमें मेरी शमीम रहती थी।
अब तो बीमार सा बस,
डब-डबाई आँखो से तकने की खातिर,
यहाँ आता हूँ!
शुकून मिल जाता है इतने से भी,
ऐ,रंग———–
कि यहाँ कभी,
मेरे दिल की हकिम रहती थी!
कभी सामने नीम के——–
एक घर था,
जिसमें मेरी शमीम रहती थी।
(हाँ!मै भी बुनकर हूँ)
हाँ!मै भी बुनकर हूँ------------
तुम तिनका-तिनका कालीन बुनते हो,,,,,,
और मै शब्द-शब्द गीत बुनता हूँ।
हाँ!मै भी बुनकर हूँ।