शिवरानी देवी
प्रेमचंद को समझना है तो शिवरानी देवी को पढ़ना ही पड़ेगा…….
‘अजी तुम्हारे साथ मेरी पहली शादी हुई होती तो मेरा जीवन इससे आगे होता’ @ मुंशी प्रेमचंद
प्रेमचंद का नाम से शायद ही कोई अनभिज्ञ हो, पर शायद हर कोई यह नहीं जानता होगा कि उनकी पत्नी भी एक प्रतिभाशाली साहित्यकार थी जिनकी कृतियों में नारीवादी मुद्दों का बखूबी वर्णन है। क्यों ऐसे एक लेखिका को अपने पति की सफलता की परछाई में सीमित रहना पड़ा?? क्यों उन्हें अपने योग्य सम्मान नहीं मिल सका?
“यह कहना मुनासिब है कि हिंदी समाज जितना प्रेमचंद को जानता है, उतना वह शिवरानी देवी को नहीं जानता।” वह उन्हें अधिक से अधिक प्रेमचंद की पत्नी या ‘प्रेमचंद घर में’ की लेखिका के रूप में ही जानता है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि वे अपने समय की महत्वपूर्ण कहानीकार भी थीं। वे ऐसी बेबाक और साहसी कथाकार थीं, जो स्त्री मुक्ति के मुद्दे पर प्रेमचंद से आगे का सोचती थीं। सहित्य में इस बारे में उन्होंने अपने पति की तुलना में अधिक तीखे सवाल उठाए थे और समाज को बदलने के लिए स्त्री-पुरुष समानता स्थापित करने का पुरजोर आह्वान किया था। दुर्भाग्य से, हिंदी की दुनिया में उनकी कहानियों की चर्चा नहीं हुई।
शिवरानी देवी के जन्म और जीवन के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। शिवरानी प्रेमचंद की दूसरी पत्नी थीं। शिवरानी के साथ प्रेमचंद का बरताव बड़ा दोस्ताना था। वह उनके लिए वह कोई भी काम कर देते, स्त्री-पुरुष का भेद न रखते। पत्नी के नाम ‘प्रिय रानी’ संबोधन से लिखे उनके पत्र बड़े सहज हैं। अंत में लिखते- तुम्हारा धनपत (या धनपतराय)। अक्सर दोनों के बीच अनेक विषयों पर बातें होतीं, जिनमें शिवरानी कहीं न दबतीं। उनके गुस्से का जवाब प्रेमचंद हंसी से देते। वह उन्हें भोंदू कहतीं तो प्रेमचंद कहते पागल, पागलराम या पगली। प्रेमचंद स्वीकार करते दिखते हैं कि ‘अजी तुम्हारे साथ मेरी पहली शादी हुई होती तो मेरा जीवन इससे आगे होता’।
लेकिन 1905 में विवाह के बाद प्रेमचंद की सोहबत में साहित्य में उनकी दिलचस्पी विकसित हुई। प्रेमचंद ने उन्हें आगे बढ़ाया और 1924 में जब शिवरानी देवी की उम्र 35 वर्ष थी, तो उनकी पहली कहानी चांद पत्रिका में साहस शीर्षक से छपी थी। प्रेमचंद ने ‘सौत’ शीर्षक से एक कहानी लिखी थी। इसी शीर्षक से शिवरानी देवी ने भी एक कहानी लिखी थी। हालांकि उसका रचना काल और विषय वस्तु अलग हैं। शिवरानी देवी ने पांच ऐसी कहानियां लिखीं, जिनके शीर्षक प्रेमचंद की कहानियों से मिलते थे। इनमें पछतावा, विमाता, और बलिदान जैसी कहानियां हैं। पछतावा और विमाता तो कौमुदी (1937) में संकलित हैं। बलिदान कहानी अभी तक असंकलित है। यह कहानी 1937 में चांद में प्रकाशित हुई थी।
यह प्रेमचंद के संगत का ही असर था कि जो शिवरानी जैसी अशिक्षित महिला जिनकी साहित्य में कोई रुचि भी न थी, वे साहित्य की ओर अग्रसर हुईं। हिंदी का दुर्भाग्य है कि शिवरानी देवी के कहानी संग्रह वर्षों तक अनुपलब्ध रहे। पिछले दिनों नई किताब प्रकाशन ने शिवरानी देवी के दूसरे कहानी संग्रह कौमुदी को फिर प्रकाशित किया है।
प्रेमचंद पर अनगिनत शोध हुए होंगे, किंतु जितनी प्रामाणिक व सूत्र-शैली में शिवरानी की लेखनी ‘प्रेमचंद घर में’ चली है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।
हिंदी के इतिहासकारों और आलोचकों ने शिवरानी देवी या उस दौर की महिला कथाकारों-साहित्यकारों की कोई विशेष चर्चा नहीं किया कि उस दौर में किस तरह अन्य महिलाएं, कथा के क्षेत्र में सक्रिय थीं। न ही कभी किसी ने इस पर रुचि दिखाई। यही वजह है कि वे इतिहास से ओझल हो गईं। आज उनका कोई नामलेवा भी नहीं है। वे सभी उपेक्षा का शिकार हुईं। शिवरानी देवी इसी त्रासदी की शिकार रहीं। 5 दिसंबर 1976 तक जीवित रहीं पर हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया।
49वीं पुण्यतिथि पर विस्मृत साहित्यकार शिवरानी देवी के सादर स्मरण