Wednesday, 31 December 2025

अयोध्या आ रहे हैं

(अयोध्या आ रहे हैं)

सुना है कि
प्रभु श्री राम की नगरी अयोध्या में
विलुप्त हुए,गिद्ध आ रहें हैं.

लेकिन राजनीतिक गिद्ध
अभी भी अयोध्या आने से कतरा रहे हैं

देखना यह सभी गिद्ध
चुनाव हार जाएंगे 
क्योंकि यह सिर्फ
कुछ जातियों की डाल पर
मंडरा रहें हैं
 
इन सभी के राजनीतिक  
पंख जल जाएंगे
तब देखना
हे राम हे राम कहते हुए
यह गिद्ध भी
अयोध्या आएंगे.

लेकिन तब तलक समय का जटायू
अपने राम का हो चुका होगा
बस यह सरयू को देखेंगे
और इसके पानी को 
खून से लाल करने का पश्चाताप करेंगे.

और दिल्ली
के कुछ राजनीतिक गिद्ध
राम को काल्पनिक कह 
अपनें अयोध्या ना आ पाने
की पीड़ा से 
हे राम हे राम का विलाप कर 
अपने मन के पश्चाताप की अयोध्या में
एक असह्य पीड़ा से
तड़ पड़ाएंगे.

क्योंकि
अब उनके अवरोधों के राम का 
राजनीतिक रावण परास्त हुआ
और वह टेंट के लंबे वनवास से 
निकल,
एक बार फिर 
अपनी अयोध्या आ रहें हैं.

"इस रचना का आशय किसी को आहत या पीड़ा पहुंचाना नहीं है बस यह प्रभु श्री राम के प्रति मेरी स्वयं की अभिव्यक्ति है"

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर (U P).

हरित क्रांति

🌹🌹मोबाइल के प्रादुर्भाव की वजह से प्रेमी और प्रेमिकाओं के बीच पहली बार "प्रेम की हरित क्रांति आई थी"😀😀
@highlight

Saturday, 27 December 2025

(देवता हो जाऊंगा)

(देवता हो जाऊगाँ)
चंद होठों तक सिमट के,दास्ताँ हो जाऊगाँ।
आदमी रहने दे,खुद लापता हो जाऊगाँ।
न छेड ऐ दुनियाँ तु मेरे दिल के अहम को,
ऐ,रंग-
गर ठेस लगी दिल को,
तो देवता हो जाऊगाँ।

Sunday, 21 December 2025

मुसलमान बना दो

(मुसलमान बना दो)
गर मासुमो का कत्ल इतने से-
थम जाये वहसियो,
तो हमे शौक से हिंन्दू या मुसलमान बना दो।
ढहा दो मेरे जेहन का मंदिर,
मै शायर हूँ,मुहब्बत मेरी भूख है,
गर मै तेरी पूजा ना बन सका तो,
अज़ान बना दो।
बेशक मेरे हाथो से तुम छिन लो गीता
ऐ रंग-ये ख्वाहिश है
कि मासुमो का कत्ल ना हो,
चाहो तो इसके लिये,
इस ब्राह्मन को मुसलमान बना दो।

पेशावर मे मासुमो की कत्ल पे।

साड़ी दिवस

💞💕साड़ी दिवस के दिन जो पत्नियां अपनी साड़ी कमर में खोसकर,,गुस्से से लाल-पीली हो अपने पति की तरफ देखेंगी,उनके पति पूरे वर्ष किसी गैर महिला की साड़ी के पल्लू से दूर रहेंगे😀😀

Friday, 19 December 2025

(सिद्धांत सारे खोखले निकले)

(सिध्दांत सारे खोखले नीकले)
कैसे नयी पौध,नयी कोपले नीकले
मेरे अपने ही आस-पास कुछ दोगले नीकले।
क्या खुब सियासत है हँसते शख्श की,
ऐ ,रंग-
सिध्दांत बडे ऊँचे पर खोखले नीकले।

(मेरी रूह बोलेगी )

(मेरी रुह बोलेगी)
मेरा कत्ल इतना आसान नही,
मै सच का मुहाफिज़ हूँ ,
ऐ,रंग----गर दफ्ऩ भी हुआ-----
तो मेरी रुह बोलेगी।

मैं लिखता हूं कोई गीत

(मै लिखता हूँ कोई गीत)
जब बेचैन कर देता है------------
मेरे अंदर का मरुस्थल मुझको,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
शब्द के होंठ पे चुभती है कोई नागफनी,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब पथ की रेत पे-----------
चलता जाता हूँ दूर पथिक सा
और फूट जाते है पाँव के छाले,
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
जब------------
बहुत सन्नाटा मेरे भीतर का,
उधेड़ता है मुझको---------
तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत।
बोता हूँ रेत पे कुछ शब्द,
पर कटिले वृक्ष के विरवे ही पनपते है,
उन्ही वृक्षो की------------
खरोंच जब आ जाती है बन के पीर,
तब मै लिखता हूँ कोई गीत।

###धन्यवाद आपका निर्मेश भईया मेरी रचना को आज के वर्तमान अंकुर मे जगह देने के लिये।

Monday, 15 December 2025

मुझे टूट के चाहने वाले

(मुझे टूट के चाहने वाले)
मुझे भुलना मत-----------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
मै फ़ना हो जाऊंगा तेरी लहरो मे शौक से,
बस मुझे अपने से अलग मत करना-------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
जलने देना मेरा मासूम चरागे दिल किसी कोने मे,
बेसक बुझ जाऊंगा सहर होने तक,
पर तु बेरुख़ी से ना बुझाना----------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
बेशक मेरी ख्व़ाहिशे मईयत गुजरे तेरे कुचे से,
पर आँख मे आँसू लिये ना आना अपनी छत पे,
मै तड़प उठुंगा मर के भी ,
क्योंकि तुम्हें इस हाल मे देखु एैसी हिम्मत नही मुझमें------------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
@@@एक बेहद उम्दा मोहब्बत करने वालो के नाम नज्म़।
सहर----सुबह।
रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

@@@धन्यवाद डेली वर्तमान अंकुर और निर्मेश के त्यागी भईया मेरी नज्म़ को अपना बेशकिमती प्यार देने के लिये।

(गुजराती नीच से हारे)

(गुजराती नीच से हारे)
ना आधे और नाही बीच से हारे-----------
राहुल तो बस और बस गुजरात मे,
अपनी पार्टी के मणिशंकर अय्यर के कहे---
उस गुजराती नीच से हारे।
बड़ी मेहनत की मंदिर गये रैलियां की,
बताया भी की विकास पगला गया है,
लेकिन फिर भी वे--------
अपनी किस्मत के मोहर्रम का क्या करते?,
उफ!एक बार फिर,
राहुल गुजरात मे वहाँ के तीन बेटो के साथ---
अपनी इद से हारे।
यानी मणिशंकर अय्यर के--------
गुजराती नीच से हारे।
जीयसटी,नोटबंदी,विकास दर,बेरोजगारी
सारे बारुद थे फिर फटे क्यू नही,
आखिर क्या चूक रही ये बड़े समझे,
लेकिन मेरा दावा है कि------
काग्रेंस के राहुल किसी मुद्दे से नही,
बल्कि वे सिर्फ और सिर्फ पुरा चुनाव,
मणिशंकर अय्यर के कहे एक जुमले----
गुजराती नीच से हारे।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

Wednesday, 10 December 2025

फेंकी गई सीता

(फेकी गयी सीता)
रावण के यहाँ-
कितनी सुरक्षित थी सीता।
यहाँ लक्ष्मण के हाथो पुरी रात,
नोची-खसोटी गयी सीता।
ऐ रंग-
कैसा बदलाव है देखो,
कि बलात्कार करके-
राम के पिछवारे फेकी गयी सीता।

दिल्ली में हुऐ बलात्कार पर।

टूट कर चाहने वाले

(मुझे टूट के चाहने वाले)
मुझे भुलना मत-----------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
मै फ़ना हो जाऊंगा तेरी लहरो मे शौक से,
बस मुझे अपने से अलग मत करना-------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
जलने देना मेरा मासूम चरागे दिल किसी कोने मे,
बेसक बुझ जाऊंगा सहर होने तक,
पर तु बेरुख़ी से ना बुझाना----------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।
बेशक मेरी ख्व़ाहिशे मईयत गुजरे तेरे कुचे से,
पर आँख मे आँसू लिये ना आना अपनी छत पे,
मै तड़प उठुंगा मर के भी ,
क्योंकि तुम्हें इस हाल मे देखु एैसी हिम्मत नही मुझमें------------
एै मुझे टूट के चाहने वाले।

@@@एक बेहद उम्दा मोहब्बत करने वालो के नाम नज्म़।
सहर----सुबह।
रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

पगली बना दो

(पगली बना दो)

नन्हे-नन्हे पाँव,
छोटी-छोटी अँगूली बना दो,
ऐ,खुदा--
मुझे फिर से वही
बचपन की तितली बना दो.

मै तैरु गाँव के पोखर,
और तोडू बाग से अंम्बिया,
मुझे अम्मी की डाँट,
और अपने अब्बू के दुलार की 
वही फिर से पगली बना दो.

यह मेरी स्वरचित रचना हैं.

रंगनाथ द्विवेदी,,,
जौनपुर, उत्तर-प्रदेश

Sunday, 7 December 2025

दिसंबर लिखता हूं

(दिसंबर लिखता हूं)

तुम्हें---
धुंधली और गुनगुनी,,,
धूप का,अंबर लिखता हूं.
तुम्हे--
अपनी गीतो में 
मैं,,दिसंबर लिखता हूं.

अब भी तुम 
वैसे ही आती हो
छत पे
अपने गीले बालों को सुखाने

तुम्हारे होंठो पे 
पानी की,बूंदों के चंद कतरे 
जो तेरी इन
गीले बालो से होके 
तेरी इन खूबसूरत
होंठो पे गिरे हैं 
यूं लगे रहे हैं कि,,जैसे 
ओस से भीगे हो, 
तुम्हारी होंठो के ये 
 "गुलाब" सारी रात

उसपे ये ,ठंड की हवा 
जब चूमती है तेरा बदन 
और 
तुम सिहर उठती हो
तो जी करता हैं
कि मैं चला आऊं 
तेरी छत पे 
और हौले से थाम लूं
तुम्हारी वे कलाई
जिस कलाई को तेरे
मैं अपनी गीतों में
दिसंबर लिखता हूं.
 
मेरे गीतों की जब किताब 
पूरी होगी 
तो उसकी कवर पे
तुम ऐसे ही छपोगी
ताकि
ये शहर जान ले 
कि तू वही लड़की हैं 
जिसे मैं अपनी गीतों में 
दिसंबर लिखता हूं.

"क्या आप भी किसी को दिसंबर लिखते हैं अगर नही लिखते हैं तो लिखिए"

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जौनपुर--222002 (U P)

Friday, 5 December 2025

शिवरानी देवी

शिवरानी देवी 

प्रेमचंद को समझना है तो शिवरानी देवी को पढ़ना ही पड़ेगा…….

‘अजी तुम्हारे साथ मेरी पहली शादी हुई होती तो मेरा जीवन इससे आगे होता’ @ मुंशी प्रेमचंद 

प्रेमचंद का नाम से शायद ही कोई अनभिज्ञ हो, पर शायद हर कोई यह नहीं जानता होगा कि उनकी पत्नी भी एक प्रतिभाशाली साहित्यकार थी जिनकी कृतियों में नारीवादी मुद्दों का बखूबी वर्णन है। क्यों ऐसे एक लेखिका को अपने पति की सफलता की परछाई में सीमित रहना पड़ा?? क्यों उन्हें अपने योग्य सम्मान नहीं मिल सका? 

“यह कहना मुनासिब है कि हिंदी समाज जितना प्रेमचंद को जानता है, उतना वह शिवरानी देवी को नहीं जानता।” वह उन्हें अधिक से अधिक प्रेमचंद की पत्नी या ‘प्रेमचंद घर में’ की लेखिका के रूप में ही जानता है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि वे अपने समय की महत्वपूर्ण कहानीकार भी थीं। वे ऐसी बेबाक और साहसी कथाकार थीं, जो स्त्री मुक्ति के मुद्दे पर प्रेमचंद से आगे का सोचती थीं। सहित्य में इस बारे में उन्होंने अपने पति की तुलना में अधिक तीखे सवाल उठाए थे और समाज को बदलने के लिए स्त्री-पुरुष समानता स्थापित करने का पुरजोर आह्वान किया था। दुर्भाग्य से, हिंदी की दुनिया में उनकी कहानियों की चर्चा नहीं हुई। 

शिवरानी देवी के जन्म और जीवन के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। शिवरानी प्रेमचंद की दूसरी पत्नी थीं। शिवरानी के साथ प्रेमचंद का बरताव बड़ा दोस्ताना था। वह उनके लिए वह कोई भी काम कर देते, स्त्री-पुरुष का भेद न रखते। पत्नी के नाम ‘प्रिय रानी’ संबोधन से लिखे उनके पत्र बड़े सहज हैं। अंत में लिखते- तुम्हारा धनपत (या धनपतराय)। अक्सर दोनों के बीच अनेक विषयों पर बातें होतीं, जिनमें शिवरानी कहीं न दबतीं। उनके गुस्से का जवाब प्रेमचंद हंसी से देते। वह उन्हें भोंदू कहतीं तो प्रेमचंद कहते पागल, पागलराम या पगली। प्रेमचंद स्वीकार करते दिखते हैं कि ‘अजी तुम्हारे साथ मेरी पहली शादी हुई होती तो मेरा जीवन इससे आगे होता’। 

लेकिन 1905 में विवाह के बाद प्रेमचंद की सोहबत में साहित्य में उनकी दिलचस्पी विकसित हुई। प्रेमचंद ने उन्हें आगे बढ़ाया और 1924 में जब शिवरानी देवी की उम्र 35 वर्ष थी, तो उनकी पहली कहानी चांद पत्रिका में साहस शीर्षक से छपी थी। प्रेमचंद ने ‘सौत’ शीर्षक से एक कहानी लिखी थी। इसी शीर्षक से शिवरानी देवी ने भी एक कहानी लिखी थी। हालांकि उसका रचना काल और विषय वस्तु अलग हैं। शिवरानी देवी ने पांच ऐसी कहानियां लिखीं, जिनके शीर्षक प्रेमचंद की कहानियों से मिलते थे। इनमें पछतावा, विमाता, और बलिदान जैसी कहानियां हैं। पछतावा और विमाता तो कौमुदी (1937) में संकलित हैं। बलिदान कहानी अभी तक असंकलित है। यह कहानी 1937 में चांद में प्रकाशित हुई थी।

यह प्रेमचंद के संगत का ही असर था कि जो शिवरानी जैसी अशिक्षित महिला जिनकी साहित्य में कोई रुचि भी न थी, वे साहित्य की ओर अग्रसर हुईं। हिंदी का दुर्भाग्य है कि शिवरानी देवी के कहानी संग्रह वर्षों तक अनुपलब्ध रहे। पिछले दिनों नई किताब प्रकाशन ने शिवरानी देवी के दूसरे कहानी संग्रह कौमुदी को फिर प्रकाशित किया है।

प्रेमचंद पर अनगिनत शोध हुए होंगे, किंतु जितनी प्रामाणिक व सूत्र-शैली में शिवरानी की लेखनी ‘प्रेमचंद घर में’ चली है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।

हिंदी के इतिहासकारों और आलोचकों ने शिवरानी देवी या उस दौर की महिला कथाकारों-साहित्यकारों की कोई विशेष चर्चा नहीं किया कि उस दौर में किस तरह अन्य महिलाएं, कथा के क्षेत्र में सक्रिय थीं। न ही कभी किसी ने इस पर रुचि दिखाई। यही वजह है कि वे इतिहास से ओझल हो गईं। आज उनका कोई नामलेवा भी नहीं है। वे सभी उपेक्षा का शिकार हुईं। शिवरानी देवी इसी त्रासदी की शिकार रहीं। 5 दिसंबर 1976 तक जीवित रहीं पर हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया।

49वीं पुण्यतिथि पर विस्मृत साहित्यकार शिवरानी देवी के सादर स्मरण

कामायनी

(जीवित कामायनी)
इंतजार करती है-----------
अपने कोठे पे बैठ हर शाम कोई ग्राहक।
न आने पे फिर वहीं से खोलती है,
जहा से उसने मोड़ रखा था--------
जय शंकर प्रसाद की कामायनी।
डबडबाई आँख मे मनू और इडा से ज्यादा,
भर आते है आँसू !
ये अथाह पिड़ा के फफोले का फूटना रोज सहती है,
इसी कोठे पे-----------
जब कोई आता दिखता है,
तो टुटी कुंडी वाले दरवाज़े की तरफ बढ़ चलती है,
ग्राहक की जल्दबाजी में------------
बंद करते दरवाज़े की टुटी कुंडी की आवाज़,
का मतलब वे समझ----------------
अपने एक-एक कपड़े को उतारती है,
और चारपाई पे--------------
उसका ग्राहक पैसे सुलता है!
फिर थकी मादी उठती है----------
मरहूम जय शंकर प्रसाद की ये जीवित कामायनी।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

मां

हिन्दी सिनेमा के महान सपुत शशी कपुर को मेरी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि
          (शशी कपूर के पास उसकी माँ है)
एै हिन्दी सिनेमा------------
तु भी आँख नम कर शायद तुझे पता नही,
कि तेरे पर्दे पे----------
इस फानी दुनिया को छोड़े जा रहे,
शशी कपूर की माँ है।
इसके रुबरु दौलत और शोहरत सब बेजा है,
क्योंकि सबसे बड़ी दौलत--------
आज भी सिर्फ और सिर्फ माँ है।
हर बेटा शशी कपूर की तरह ये---
फख्र से कह सकता है कि,
देख एै दीवार के अमिताभ बच्चन
आज भी सब कुछ रहके भी तु हार गया,
क्योंकि सिनेमा में तु चाहे जितनी ऊँचाई पे खड़ा है,
पर एेक्टिंग मे सच है कि------
आज भी शशी कपूर के पास उसकी माँ है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियापुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758