Friday, 23 July 2021

(चूल्हा नही जलता)

तुम तो-----
बात-बात मे शहर जलाना जानते हो.

तुम्हारे पास---
तो कौमो को जलाने का ईधन है.

पर यहाँ फाकाकश़ी सोने नही देती, 
पेट तो जलता है ऐ,रंग------
पर इस बस्ती में अक्सर चूल्हा नही जलता. 

रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर.

Wednesday, 21 July 2021

(शीकारे वाली लड़की)
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की!
डलझील की मदमस्त लहरो को,
वे उसका एकटक देखना,
फिर जादुई हँसी,
हाय!जाने कहाँ खो गई,
वे अदभुत नजारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
वे उसका तिलिस्मी बदन,
और उसके जुड़े से निकलती वे गुलाब की खुशबू,
अब कही नही मिलती सुघने को,
और कही नही दिखती मुझे,
वे लश्कारे वाली लड़की,
मुझे बार-बार याद आती है,
वे शीकारे वाली लड़की।
पहाड़ो की वे ढ़लती शाम,
वे संगीतमय आवाजे,वे बाँसुरी के स्वर
कही कुछ नही!
बस तन्हाई मे यादो की चंद तस्बीर,
जो हवाओ के झोके से फड़फड़ाती है,
और मै निकल आता हु यादो से उसकी,
बस रह जाती है याद जेहन में,
वे शीकारे वाली लड़की।

###न जाने कब घाटियो मे अब अमन के दिन लौटेगे,न जाने फिर कब डलझील में दिखेगी हम शायरो और कवियो की वे शीकारे वाली लड़की।

Tuesday, 20 July 2021

यह लघुकथा देश के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले दैनिक राजस्थान पत्रिका के परिवार पृष्ठ में प्रकाशित है---( फ्रॉक )


लघुकथा----( फ्रॉक )

आज रविवार, छुट्टी का दिन होने की वजह से सारिका घर के तमाम कपड़े धुलने के लिए निकाल रही थी, तभी उसने अपनी मुन्नी की फ्रॉक को भी धुलने  के लिए  निकाला, तो उसे अपनी मुन्नी की फ्रॉक को  देखकर अपने बचपन के दिनों की याद हो आई.


वह भी तो अपनी प्यारी मुन्नी की तरह ही कभी फ्रॉक पहने, पूरे घर में धमाचौकड़ी मचाई करती थी, कभी-कभी तो उसकी मां सारिका उसकी इस धमाचौकड़ी से इतनी परेशान हो जाया करती थी कि, उसे गुस्से में लाल पीली होते हुए कहती थी.हे राम! आखिर तू कब सुधरेगी, इतनी बड़ी तो हो गई, अब तु बच्ची थोड़ी ही  लगी है.


इतना ही नहीं सारिका को यह कहकर भी उसकी मां उसे इस धमाचौकड़ी से रोकने के लिए कहती थी की आने दे आज तेरे पापा को मैं शिकायत करती हूं कि तू मुझे कितना परेशान करती है मैं मां के इस कथन से थोड़ी देर के लिए चुप हो जाया करती थी. लेकिन फिर उसके बाद वही शरारत वही धमाचौकड़ी. करने लगती थी.


और जैसे ही पापा आफ़िस से लौटते मैं उन्हें पापा पापा कहते हुए दौड़ पड़ती और पापा मुझे अपनी गोद में उठा लेते और प्यार से मेरी पीठ थपकने लगते थे. वह यह भी नहीं देखते थे कि दिनभर खेलने की वजह से मेरी फ्रॉक कितनी गंदी हो गई है.मै पापा की गोद में बैठी हुई अपनी मां को चिढ़ाने वाले अंदाज में देखती थी, जैसे उनसे चिढ़ाने वाले अंदाज में कह रही हो कि  अब करो तुम पापा से मेरी शिकायत, मां उन दिनों मुस्कुरा कर रह जाया करती थी.

सारिका अपने इन्ही ख़्यालो में  खोई हुई जब मुन्नी की फ्रॉक को अपने सीने से लगाती है, तो उसे ऐसा लगता है कि जैसे उसने फिर से अपने बचपन वाली वही फ्रॉक एक बार फिर से पहन ली हो.तभी सारिका को उसकी मुन्नी उसे मम्मी-मम्मी कहकर बुलाती है और सारिका अपने बचपन की यादों से बाहर निकल आती है, और सारे कपड़े को धुलने के लिए बाथरूम की तरफ चल पड़ती है.


यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.
परिवार ( राजस्थान पत्रिका )21/7/21


लेखक---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P )
Mo. no.7800824758

Sunday, 18 July 2021

(मिट्टी मेरी मईयत के साथ रख देना)
हो सकता है एक पल ही सही---------
छत पे आये बेवफ़ा,
उसकी सड़क पे--------
कुछ देर मेरी लाश रख देना।
हो सकता है मै उसे मरके भी तकु,
मेरी लाश को वहा कुछ पल-------
खुली आँख रख देना।
उठा लेना थोड़ी सी उसके गली की मिट्टी,
और जब दफ्ऩ होने लगू,
तो एै,रंग---------यही मिट्टी 
मेरी मईयत के साथ रख देना।

Saturday, 17 July 2021

कहानी--(गोदावरी मर गई )


कहानी--(गोदावरी मर गई )

लखनपुर गांव से थोड़ी दूर पर पड़ने वाले नदी की  पूल के पास पूरे गांव के लोग भीड़ की शक्ल में एकत्रित थे,उस भीड़ में बड़े, बुढ़े,जवान,बच्चे और गांव की महिलाऐ  भी शामिल थी.वह सब मारे कौतुहल के नदी के पूल के इर्द-गिर्द उचक के यह देख रहें थे की बढ़ी हुई नदी के पानी में जाल डालकर आखिर गांव के चार पांच आदमियों से वहां उपस्थित दो पुलिस वाले किस महिला या लड़की कि लाश निकलवा रहें थे,लेकिन जिस तरह जाल से लाश बाहर निकालने के लिए उन सभी आदमियों को मसक्क़त करनी पड़ रही थी इससे यह साफ पता चल रहा था कि यह लाश कम से कम आज की तो नही थी.

जब लाश किसी तरह से नदी के पानी से बाहर निकली तो लोगों ने देखा कि वह एक 18या 20 वर्ष की किसी जवान लड़की की लाश थी. जो कि नदी के पानी में कूदकर या डुबकर मरने की वजह से काफी फुल चुकी थी. तभी उन दोनों पुलिस वालों में से एक ने थोड़ी पुलीसिया रौब के साथ कहा कि, रमुआ! जो कि उन्हीं पांचो में से एक का नाम था वह हाथ जोड़े हुए और थर-थर कापते हुए बोला कि, जी हुजूर!जरा इस लड़की की  लाश को पीठ की बजाए मुँह की तरफ करके लिटा तो,शायद इनमें से कोई इस लड़की का चेहरा देख करके इसे पहचान लें.वैसे मुझे देखने से लग रहा है कि यह ससुरी यही कही आस-पास की है.

तभी दूसरा पुलिस वाला जो कि काफी गौर से उस लड़की की लाश को देख रहा था.वह बोला, अरे! यह तो जैसे पांच-छ: महिने के पेट से भी है.उसका साथी पुलिस वाला बोला, अरे! इस तरफ तो मेरा ध्यान भी नही गया इतना ही नही यार इसकी शादी भी नही हुई है. अरे! भाई अर्जुन क्यू इतने झटके दे रहा है भाई?  यह तुझे कैसे पता चला जरा मैं भी तो जानू मेरे जेम्सबांड, वह मजाक में बोलकर जब हंसा तो उसकी निकली हुई पेट भी उसके साथ करीब दो-तीन मिनट हिलती रही,जैसे की उसकी वह निकली हुई पेट उसके साथ ही हँसने की अभ्यस्त हों.


तो उसका साथी अपने दूसरे पुलिस वाले साथी जिसका की पेट निकला हुआ था, उसको उसने रामदरस कहकर सम्बोधित किया था,इससे यह स्पष्ट हो गया कि उस पेट निकले हुए पुलिस वाले का नाम राम दरस था. वह फिर इसके बाद आगे बोला कि यह लड़की अगर शादी शुदा होती तो इसकी उस मांग से पता चल जाता जहां कि औरते शादी होनें के बाद सिंदूर पहनती है,राम दरस खुश होकर बोला कि--जिओ मेरे शेर! तब तो उस लिहाज से तो यह ससुरी पुरी छिनाल हुई. अरे रमुआ! जल्दी  पलट यार मुझसे बर्दाश्त नही हों रहा, मैं अब इस लड़की की  सुंदर सुरत तुरंत देखना चाहता हूं. तभी रमुआ ने अपने चारो सहयोगियों कि मद्त से उसने लड़की की लाश का मुँह अपनी और वहां मौजुद भीड़ के सामने कर दिया.

और जब उस भीड़ में मौजुद सभी स्त्री पुरुषों ने उस लड़की की लाश को देखा तो सभी लोगों के  मुँह से एक साथ निकल पड़ा अरे! यह तो संतोष की बिटिया गोदावरी की लाश है. इसी के साथ वहां मौजूद सभी आदमी और औरतो ने एक दूसरे की कान के पास अपना मुँह ले जाकर आपस में फुसफुसा कर बात करना शुरू कर दिया.जब आठ-दस मिनट वह सभी आपस में केवल फुस-फुसाते रहें और कोई कुछ भी नही बोला.

तो उन्हीं दोनों पुलिस वाले में से एक ने जब बहुत जोर से माँ बहन की  गाली के साथ डाटा तो सारे लोगों के फुसफुसाने की आवाज़ जैसे किसी जादू के जोर से थम गई हो.उसने उसी भीड़ में से दो आदमी और दो औरतों को अपने पास बुलाया तो वह सब थर-थर कापते हुए अपने दोनों हाथों को जोड़कर उन दोनों पुलिस वालों से थोड़ी सी दुरी पर खड़े हों गए. इतना ही नही बल्कि पेट निकाले हुए राम दरस ने उन्हीं में से एक को अपने सामने बुलाकर उसकी गाल पर एक जोरदार तमाचा रसीद कर दिया और दुसरे को बुलाकर हाथ में पकड़ी हुई अपनी पुलीसिया लाठी से दो लाठी उसके पिछवाड़े पर रसीद कर दिया. फिर उसने पुछा, बताओ! सालो तुम दोनों का नाम क्या है?  एक बोला अलगू साहब! साले जोर से बता सुबह से कुछ खाया पिया नही है क्या?  उसने इस बार थोड़ा जोर से कहा अलगू साहब!

और तू  बता बे  तेरा नाम क्या है?  उसने अलगू की हालत पहले ही देख ली थी इसलिए उसने एक बार में ही हिम्मत कर कहा जी पांचू साहब!  फिर इससे खाली हों वह औरतों की तरफ घुमा दोनों औरतों की हालत तो पहले से ही पतली थी. उस पर राम दरस जब लाठी सहित कड़क आवाज़ में बोला,साली चुड़ैल उसने चुड़ैल कुछ इस तरह कहा की  उसके बगल वाली खड़ी औरत यह सुनकर हिलते-डुलते बस किसी तरह खड़ी थी. लग तो ऐसा रहा था कि अगर कोई उसे हल्का सा भी छू दे तो वह मारे डर के जमीन पर ऐसी गिरेगी कि, फिर वह कभी जिंदगी में दोबारा उठ नही पाएगी.


राम दरस एक बार फिर पूरी पुलीसिया रूआब के साथ बोला साली चुड़ैल अपना नाम बता तो वह लड़खड़ाती हुई जुबान में बोली साहब म म मेरा नाम
सुगनी है. हूं कहकर उसने ढ़ेर सारी सांस अपनी नाक से छोड़ी फिर दुसरी औरत से बोला और तू बता तेरा क्या नाम है? स स साहब मेरा नाम बुधमतिया है.अच्छा. फिर इतना कहने के बाद उसने अर्जुन से कहा लाश इनसे बंधवाकर इन तीनो को इस लड़की गोदावरी की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार कर लो जब इन सबको जेल और फाँसी होंगी तब पता चलेगा कि किसी की हत्या क्या होती है?

फिर वह चारो,दोनों पुलिस वालों यानी कि अर्जुन और राम दरस के पैरो पर गिरकर जोर-जोर से रोने लगे. साहब! हमने कोई हत्या नही की. साहब! चाहे तो आप हमार पति और बच्चों का कसम खिला लो साहब. हालांकि यह बात राम दरस और अर्जुन को भी अच्छे से पता थी कि इन चारो ने गोदावरी की हत्या नही की थी.यह तो उन दोनों ने एक पुलीसिया तरीका अपनाया था,ताकि गोदावरी की मौत का कारण पता चल सके.


उनका यह निशाना काफी सटीक बैठा था इसीलिए राम दरस के गुस्से को थोड़ा ठंडा करने की गरज से अर्जुन बोला हालांकि यह भी उनका एक नाटक ही था. कि यार! आखिर  इनकी बात एक बार सुन लेने में बुराई ही क्या है? राम दरस कहता है कि चल ठीक है. अगर तू  कहता है तो मैं तेरी बात मान लेता हूं, लेकिन याद रखना अगर इन लोगों ने झूठ बोला तो थाने में लें जाकर इनकी ऐसी धुलाई करूंगा कि इन ससुरो को अपनी अम्मा याद आ जाएगी.राम दरस ने एक बार अपनी थोड़ी बड़ी और लाल आँखों से उन्हें देखा फिर एक सिगरेट जलाकर कुछ इस तरह वह धुँआ फेकने लगा कि वह और भी डर गए.


अर्जुन जानता था कि राम दरस की  ऐसी आँखें ऐसे मौको पे बड़ा काम करती थी.वह एक बार फिर उन चारो से मुख़ातिब हुआ और बोला मैं तुम लोगों को अपनी जान बचाने का एक आखिरी मौका देता हूं. अगर तुम सबने सब कुछ सच सच मुझे बता दिया तो मैं दावा करता हूं कि मैं तुम्हें कोई भी सजा नही होनें दूंगा. अगर जरा सा भी झूठ बोले तो समझ लो तुम्हारी सजा और फाँसी दोनों ही कंफर्म है. वे सभी एक सुर से बोले नही साहब! हम सभी सच-सच बोलेंगे.


दरअसल संतोष की बिटिया गोदावरी हम सभी गांव वालो कि बहुत प्यारी और दुलारी बिटिया थी. अगर हम सभी दिन में उसे एकाध बार देख नही लेते थे, तो उस दिन हमारा मन बहुत खाली सा लगता, जबकि उसका बाप संतोष नीरा पियकक्ड़ और शराबी था. जिसकी वजह से गोदावरी की माँ बीमार और दुःखी रहा करती थी. कभी-कभी तो उसके बाप के साथ के पियक्कड़ उसके बापू को ज्यादा शराब का नशा हो जाने पर वह उसके घर भी छोड़ने रात-बिरात आ जाया करते थे.

ऐसा नही कि वह सारे पियक्कड़ गोदावरी के बापू को किसी त्याग या सेवा भाव कि वजह से घर छोड़ने आते थे साहब.दरअसल गोदावरी 18 वर्ष की बहुत ही सुंदर लड़की थी,जिसको वे सारे पियककड़ अंधेरी रात में उसके बापू को छोड़ने के बहाने कभी-कभी अपनी कामुक नजरों से उसके शरीर के उस अंग विशेष को देखते जिसे की वह बेचारी अपने फटे दुपट्टे से ढ़के रहती थी. उसके बापू को संभालने के बहाने जान बूझकर वह लोग उसके उस अंग को या तो छू लेते थे या जोर से जानबूझकर चिकोट लेते थे.जिसकी वजह से किसी-किसी दिन वह चीख उठती थी.

ऐसे ही एक दिन जब किसी ने उसके युवा स्तन को चीकोटा तो वह चीख उठी. माँ गोदावरी ने झट पास आकर उससे पुछा क्या हुआ बेटी! जब कहा तो गोदावरी माँ के सीने से लगकर रोने लगी. उसका इस तरह से रोने का कारण गोदावरी की माँ अच्छे से समझ गई. आखिर थी तो वह भी एक औरत ही.उस दिन गोदावरी की माँ ने गोदावरी के बापू से खुब झगड़ा किया, लेकिन गोदावरी के शराबी बाप ने उसकी माँ को पांच छ: तमाचे मारे गाली दी इतना ही नही उसने नशे में गोदावरी से कहा हरामजादी तू  खुद छिनाल है और दूसरो पर इल्जाम लगाती है.


उस दिन गोदावरी पूरी रात रोती रही साहब! फिर आठ-दस दिन तक सब सामान्य रहा हालांकि इस बीच तब भी गोदावरी का बापू शराब पिता रहा.लेकिन एक दिन रात को जब पूरा गांव सोया हुआ था साहब तो दुसरे गांव के मुखिया का दबंग बेटा बब्बन उसके बापू को अपने दो अन्य साथियो के साथ घर छोड़ने आए थे उस दिन तो गोदावरी का बापू अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत ही ज्यादा पीए हुए था.सच तो यह है साहब की उस रात शाम से ही मूसलाधार बरसात हों रही थी, जिसकी वजह से उस रात गांव वाले अन्य रात की अपेक्षा जल्दी  सो गए थे.


इसलिए उस रात जानबूझकर उन लोगों ने गोदावरी के बापू संतोष को बहुत ज्यादा शराब पीला दी थी, फिर उसे घर पहुंचाया. घर क्या पहुंचाया साहब! जब उसे कुछ होश ही नही था तो उसके लिए क्या घर, क्या बाहर. उसे लाकर उन लोगों ने एक तरफ टूटी चारपाई पर लेटा दिया. तभी उस कमरें में उन सभी ने गोदावरी को देखा तो उनकी कामुकता चरम पर पहुंच गई. क्योंकि बब्बन बहुत पहले से इसी मौके की ताक में था. उसके एक साथी ने कमरें को अंदर से बंद कर दिया इतना ही नही उन्होंने गोदावरी की माँ के भी कमरें की कुण्डी लगा दी.

फिर बब्बन ने जबरदस्ती उस रात अपने दोनों साथियो के साथ गोदावरी को दो-दो, तीन-तीन बार बुरी तरीके से बलात्कार किया.गोदावरी की माँ अंदर से दरवाजा पीटती रही, रोती रही,गाली देती रही. और इधर गोदावरी चीख चिल्ला, गिड़गिड़ा रही थी.उसके होंठ से खून निकल रहा था, पूरे शरीर को तीनो लोग जानवरो से भी ज्यादा बेरहमी से नोच-खसोट रहें थे और गोदावरी का बापू संतोष इससे बेखबर टूटी चारपाई पर पूरे खर्राटे के साथ सोता रहा.फिर गोदावरी बहुत जोर से किसी हलाल होते बकरे की तरह चिखी और बेहोश हों गई.

दूसरे दिन जब सुबह हुई तो कराहते हुए गोदावरी ने जब अपनी आँखें खोली तो एक बार फिर उसकी आँखों के सामने रात का सारा मंजर ताज़ा हों गया और फिर इसके बाद जब गोदावरी ने उठने का प्रयास किया तो उसका पूरा शरीर किसी पके हुए फोड़े कि तरह दर्द कर उठा अर्थात उससे अपनी जगह से उठा नही गया.तभी उसकी नज़र अपने टांगो से नीचे उतरी  हुए सलवार की तरफ गई तो वह बिल्कुल नंगी थी उसके आस-पास खून बहकर सुख चुका था.


जब गोदावरी ने अपने बापू के पास खड़ी अपनी माँ के सुख चुके आंसू भरी आँखों की तरफ देखा तो वह माँ से बोली.माँ! आज तो बापू को दिन में भी खुब शराब पीनी चाहिए है कि नही, माँ! आखिर आज तो पीने में इन्हें और भी मजा आना चाहिए क्योंकि इनके बिटिया का शराब पीकर कुछ इनके साथियो ने बलात्कार किया है. तुमको भी थोड़ा-बहुत बलात्कार करने का मन है क्या बापू? करना देखो ना आखिर आपको बहुत मेहनत भी नही करनी पड़ेगी क्योंकि आपके पीने वाले साथियो ने मेरी सलवार पहले से ही उतार रखी है. फिर माँ जोर-जोर रोते हुए गोदावरी के पास बैठ गई और बोली बस कर बेटी.

फिर इसके बाद साहब गोदावरी का बापू घर से निकला और आज तलक नही लौटा. फिर पंद्रह बीस दिन तक गोदावरी अपने घर से नही निकली साहब. वह घर में ही अपना इलाज करती रही. उसकी माँ उसे गरम हल्दी और दूध का काढ़ा देती रही.जब उसने गांव में निकलना भी शुरू किया साहब, तो वह पहले वाली गोदावरी की तरह ना थी. बिल्कुल बदल चुकी थी.अब वह किसी से गांव में उतना बात भी नही करती थी.इसी तरह चार महीने बाद एक दिन उसे उल्टी हुई और वह गांव के सामने वाले नल के पास गिर पड़ी.

गांव की औरतों ने उसके चेहरे पर पानी के छींटे भी मारे जब उसे होश आ गया तो गांव की बड़ी-बूढ़ी औरतों ने कानाफूसी करते हुए कहा कि पता नही की  इसके पेट में किसका पाप है. देख तो छिनाल को जैसे कोई शरम ही नही आ रही.वह इतना सुनते ही रोते हुए वहां से चली गई. फिर उसके तीन-चार दिन बाद उसकी लाश नदी में मिल रही है साहब. इतना कहते ही वह औरत जोर-जोर से रोते हुए बोली,साहब! इसके मारने वाले को छोड़ना मत साहब.अब वह औरत बिल्कुल ही नही डर रही थी.

अब राम दरस और अर्जुन दोनों ने पूछा तुम्हें यह सब आखिर कैसे पता. दरअसल साहब! मुझे गोदावरी भाभी की तरह नही बल्कि अपने बड़ी बहन की  तरह चाहती थी.इसलिए साहब मुझे गांव की औरतों की बातो का जरा सा भी विश्वास नही हुआ और मैं चोरी से उस दिन गोदावरी के घर गई तो उसने मुझसे रोते हुए सारी बात बता दी. उसके बाद से ही गोदावरी से फिर मैं मिल नही पाई और मुझे गोदावरी मिली भी तो ऐसे हाल में कि मैं उससे कुछ बात भी नही कर सकती.


फिर इसके बाद राम दरस और अर्जुन ने कहा ठीक है अब तुम सभी मेरी नज़र में बेगुनाह हों दरअसल हम भी क्या करे हमारे पास भी कोई जादू की छड़ी नही होती की हाथ बढ़ाकर मुजरिम या कि उसके गुनहगार को पकड़ लें. इसलिए ऐसा करना हमारी मजबूरी है, लेकिन हां!  उन हत्यारो के साथ आप सभी भी दोषी है. जब ऐसी लड़कियो के  मद्त की  जरुरत समाज़ में सबसे ज्यादा होती है. तभी यह समाज़ बिना कुछ सोचे समझे सारा दोष लड़कियो पर ही मढ़ देता है जबकि आप सभी गांव वाले जानते थे कि गोदावरी ऐसी नही फिर आप सभी ने उसे गाली दी.


जिसकी वजह से उसे इस नदी में कूदकर अपनी जान देनी पड़ी. यही आप सभी अगर सामूहिक रूप से इसे यानी की  अपने गांव की गोदावरी के लिए उस मुखिया के बेटे और उसके साथियो को सजा दिलाते तो हर गांव की गोदावरी मजबूत होती. राम दरस की  इतनी बात सुनकर यूँ  लगा कि जैसे उन सबकी अपनी बेटी गोदावरी आज नदी में कुदकर मर गई हों.




यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.


लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
mo. no.7800824758











Friday, 16 July 2021

व्यंग्य---(गधा )


व्यंग्य---(गधा )

कही सादे कागज़ पर आप बड़े मन से गधा लिख दीजिए फिर आपको घंटो व्यंग्य लिखने की जहमत नही उठानी पड़ेगी क्योंकि गधा शब्द व्यंग्य विधा के प्रयोग में आने वाली शब्दों की समस्त बिरादरी में से एक ऐसा शब्द है जिसे हम व्यंग्य के शब्दों का पारिवारिक सदस्य भी कह सकते है. वैसे भी गधे केवल जानवरो में ही नही पाए जाते बल्कि अब तो उससे भी कही ज्यादा गधे तो आजकल हमारे मनुष्य बिरादरी में पाए जा रहें.

सच तो यह है कि अगर हम चौबीस घंटे में से दो-चार बार किसी आदमी को अगर ठीक ढंग से गधा ना कह लें तो ऐसा लगता है कि सामने वाले आदमी से कही ज्यादा बड़े गधे तो हम खुद ही है. कभी-कभी तो गधा कहने कि तलब इतनी ज्यादा बढ़ जाती है कि किसी और के ना मिलने पर हम अपने बेटे को ही गधा कहकर काम चला लेते है. वैसे भी बेटे को गधा कहने से पूरे परिवार को गधा कहने का सुख मिल जाता है.


वैसे इस धरती पर किसी को पहली बार गधा कहने का कोई भी प्रमाणिक व ऐतिहासिक साक्ष्य नही मिलता फिर भी मुझे जहां तक लगता है कि जिस किसी भी व्यक्ति ने किसी को पहली बार गधा कहा होगा वह व्यक्ति निश्चित ही व्यंग्य का कोई बहुत बड़ा पहुंचा हुआ प्रकांड विद्वान रहा होगा.क्योंकि इस शब्द का पूरा चरित्र व्यंग्य से मिलता जुलता है.वैसे बताने वाले बताते है कि इन्हें बैसाख नंदन भी कहा जाता है, मनुष्यों में भी ज्यादातर ये बैसाख नंदन टाईप के गधे सर्वाधिक राजनीति में मिलते है.


वैसे भी नेता और किसी गधे के बोलने में काफी समानता है वे बोलते है तो पूरी घास को अकेले चर जाने की खुशी में बोलते है जबकि नेता अपने बिधानसभा से अकेले ही चुनाव जीत जाने की खुशी में बोलता है. यह दोनों भ्रम ही इन्हें एक दूसरे से ज्यादा श्रेष्ठ गधा साबित करते है वैसे दोनों के ही बोलने में हास्य अलंकार की प्रधानता है.इसलिए हम यह भी कह सकते है कि जब शायद चार-छ: गधे एक साथ देश में मरते है तो अगले जन्म में इन्ही मरे हुए गधो की सहानुभूति के तहत भगवान इन्हें  नेता टाईप के श्रेष्ठ गधे के रूप में धरती पर भेज देता है.

हमारे देश में अब गधो को सम्मान देने की परम्परा शुरू कर देनी चाहिए और इस गधे कि परम्परा का प्रथम पुरस्कार या सम्मान व्यंग्य लिखने वाले किसी ऐसे व्यक्ति को दिया जाए जिसने अपनी पूरी जिंदगी में ज्यादातर व्यंग्य गधो पर ही लिखा हों, किसी और विषय पर नही. ठीक इसी तरह का कोई गधा राजनीति से या अन्य क्षेत्रों से भी लिया जाए और सारी पुरस्कृत गधो को, किसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की तरह सुविधाएं दी जाए.इससे सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि पूरे देश में वर्षभर गधा होनें की होड़ मची रहेगी. 



Tuesday, 13 July 2021

(पैजनी की धुन)
संगीत से बेहतर है--------
सीधे दिल मे उतर जाती है,,,,,,,,,,
ऐ,रंग----इतनी क्लासिकल है-----
उसके पैजनी की धुन।
(सुकरात को भी ज़हर दे दो)
गर सच की ज़ुबां को खामोश़ करना है,
तो ऐ,रंग---------------
इस कलम के सुकरात को भी ज़हर दे दो।

Thursday, 8 July 2021

(सावन चला गया)
झूले चले गये,कज़री चली गई------
मेहमान तो आते रहे गाँव मे लेकिन,,,,,,,
पर पहले जो आता था--------
वे पाहून चला गया।
ऐै "रंग"----धीरे-धीरे ये हादसा हुआ,,,,,,,,
बारिश तो हुई लेकिन--------
गाँव से मेरे सावन चला गया।
(ताज़ महल)
ताज़ महल----------
मूहब्ब़त की पाकीज़गी है,
यहाँ मूमताज़ लेटी है।
मत करो इन पत्थरो पे,तुम सियासी वार-
ये आबरु-ए-हिन्द है-------
ना कि मूसलमान।
ऐ,रंग----यहाँ मोहब्ब़त------
आज भी साँस लेती है।

Wednesday, 7 July 2021

(राम कहेंगे)
ये चुनावी सीजन है,सावधान हो जाओ!
क्योंकि अब खद्दर पहने लोग--------
आयेंगे अयोध्या।
फिर सहम उठेगा सरयू का पानी,
एै "रंग"---ये मुस्लिम बस्तियो में अल्लाह हू!
और हिन्दू बस्तियो में राम कहेंगे।
(मौते बड़ी विरान होती है) 

बेशक----
सारे शहर का हुज़ूम उमड़ता है, 
शख्शे शोह़रत के जनाज़े मे.

पर ऐ,रंग----
ऐसी मौते बड़ी विरान होती है।

Tuesday, 6 July 2021

कहानी---(मसखरा )


कहानी---(मसखरा)

अजय शहर की कॉलोनी-कॉलोनी घूम-घूमकर मसखरे के गेटप में लोगों को खुब हँसाता,जब वह हँसा कर खाली होता तो कॉलोनी के कुछ एक लोग उसकी मसखरी से खुश होकर दो-चार रूपए उसकी मासूम हथेली पर रख देते, जिसे वह अपनी एक फटी हुई जेब की बगल वाली जर्जर जेब में रखकर अगली कॉलोनी की तरफ अपने मसखरे बाजी के करतब दिखाने के लिए चल पड़ता.

हालांकि 15 वर्षीय अजय कोई जन्मजात मसखरा नही था, लेकिन उसके घर की परिस्थितियों और हालात ने उसे एक स्कूल में पढ़ने वाले किसी छात्र की उम्र में ही शहर की इस कॉलोनी से उस कॉलोनी का मसखरा बनाकर रख दिया. आज वह अपनी बीमार माँ की दवा और अपनी छोटी बहन का पेट अपने इसी मसखरेपन के तमाशे से वह भर रहा है.


कॉलोनी के लोग तो उसके इस मसखरेपन की करतब से हंस लेते है, लेकिन अजय खुद कभी नही हंस पाता, क्योंकि उसे अपनी खुद की जिंदगी ही किसी मसखरे की तरह मिली है. जहाँ  उसके मासूम होठों पर कोई हंसी नही बस आंसू है, जो अब उसकी आँखों से इसलिए नही बहते कि कही उसके मसखरेपन का किया हुआ उसका मेकप ना छूट जाए,जिसे देखकर ही लोग हंसते है.

वह सारा दिन जी तोड़ इस कॉलोनी से उस कॉलोनी जब अपने मसखरेपन के करतब को दिखाकर खाली होता है, तो वह इस करतब और धंधे से मिलें सारे सिक्के और नोटों को निकालकर गिनती करता है. उस गिनती में जब दस-बीस रूपए दवा और खाने के कम पड़ते है तो वह एकाध और कॉलोनी में बेमन से अपने मसखरेपन के करतब दिखाकर उन पैसो को इकट्ठा कर जब अपने झोपड़े की तरफ लौटता है तो उसके नन्हें पैरो में एक असीम थकन और पीड़ा होती है.

एक शाम ऐसे ही अपने मसखरेपन के धंधे से जब अजय खाली होकर अपनी झोपड़ी के दरवाज़े के पास पहुंचा तो उसने देखा कि उसके उस झोपड़े रूपी घर के आस-पास उसके अगल-बगल की दो-तीन औरते  उसकी  छोटी बहन जो कि काफी जोर-जोर से और हिचक-हिचक कर रो रही थी, उसको वह औरते  किसी तरह चुप कराने और ढाढ़स बधाने का प्रयास कर रही थी. अजय यह सब देखकर चौक गया और उसके मन में किसी अनहोनी की आशंका उत्पन्न हुई.अतः उसने बिना किसी से कुछ पूछें या अपनी बहन को देखें वह सीधे झोपड़ी के अंदर चला गया और उसने अपनी माँ को टूटी हुई चारपाई पर हमेशा की तरह लेटे हुए देखा.


लेकिन उसने एक फर्क अवश्य देखा कि उसकी माँ के और दिनों के लेटने में और आज के लेटने में काफी फर्क था. पहले जब अजय शाम को अपने घर की झोपड़ी में लौटता तो उसकी माँ दो-तीन बार जोर से खांसती फिर खुद को सामान्य कर अजय से पुछती कि तुम आ गए अजय बेटा! लेकिन आज अजय की  माँ ने ना तो खांसा और ना ही उसने अजय से यह पुछा कि तुम आ गए अजय बेटा.

अजय समझ गया कि आज उसकी माँ भी उसके शराबी बाप की तरह उसे और उसकी छोटी बहन को हमेशा के लिए छोड़ के इस दुनिया से चली गई. दरअसल अजय का बाप एक भयंकर शराबी था. अतः वह सारा दिन जो कुछ भी कमाता था उसे वह अपने शराब की लत में उड़ा देता था. इतना ही नही कभी-कभी जब जरूरत से ज्यादा पीकर आता तो वह बेतहासा ना सिर्फ माँ को मारता पीटता था बल्कि वह उसकी माँ को ढ़ेर सारी गंदी-गंदी माँ बहन गालियां भी देता,जिसकी वजह से अजय की माँ सारी रात रोती रहती थी.

जब अजय से अपनी माँ का रोना नही देखा जाता था तो वह अपनी नन्ही-नन्ही हथेलियों से अपनी माँ के आंसू पोछता और उसे किसी तरह चुप कराने कि कोशिश करता रहता. माँ तब कभी-कभी मुझे जोर से अपने सीने से लगाकर भींच लेती और थोड़ी देर रो लेने के बाद कहती कि बेटे! मैं तेरी कितनी अभागी माँ हूं कि  मैं तुम लोगो को कोई खुशी नही दे सकती सिवा आंसू के. पर क्या करु बेटा ? मुझे शादी से पहले तेरे बापू के बारे में यह सब पता नही था.

फिर एक दिन अजय को पता चला कि उसका शराबी बाप अतिसय शराब के नशे में घर लौट रहा था तो एक तेज रफ़्तार ट्रक ने उसे बुरी तरह  कुचल दिया जिसकी वजह से उसकी मौके पर ही मौत हो गई थी.उस दिन उसकी माँ बहुत रोई थी और अजय ने भी अपनी माँ को चुप कराने कि कोई कोशिश नही की  थी. बल्कि एक तरह से अजय मन ही मन यह सोचकर खुश था कि चलो! अब कम से कम उसकी माँ को उसका शराबी बाप मारेगा तो नही.

लेकिन माँ को अपने पति की मौत का तगड़ा सदमा लगा था और लगता भी क्यों ना क्योंकि उसका बापू चाहे जैसा भी था, लेकिन था तो उसकी माँ का सुहाग ही. अतः इसके बाद से उसकी माँ अक्सर बीमार रहने लगी दो-चार दिन किसी तरह बीत गए लेकिन माँ के बीमार होनें से वह आय भी बंद हो गई जो उसकी माँ दो-चार बड़े घर के लोगों के यहां बर्तन, झाड़ू और कपड़े की साफ सफाई करके पा जाती थी. लेकिन अगर ईश्वर ने पेट दिया है तो उसके साथ ही उसने रोटी की भूख भी दी है.

इसी भूख और रोटी के लिए अजय हफ्तों इधर-उधर भटकता रहा और अपने लिए किसी काम कि तलाश करता रहा. लेकिन कहते है कि बिना किसी परिचय या पहचान के यहां काम भी नही मिलता. यही हाल अजय का भी हुआ. लेकिन उसने हिम्मत नही हारी फिर भी वह काम तलाशता रहा ऐसे ही एकदिन वह एक चाय-नाश्ते की दुकान पर गया और बड़े ही कातर भाव से उसने दुकानदार से कहा कि मुझे कोई काम दे दो सेठ!


लेकिन जैसे दुकानदार ने अजय कि कोई बात ही ना सुनी हो अतः उसने एक बार फिर किसी तरह अपनी हिम्मत जुटाकर  दुकानदार से कहा कि मुझे कोई काम दे दो. सेठ!लेकिन इस बार शायद उस दुकानदार ने अजय की बात सुन ली हो.वह बोला कौन हो? कहाँ  के रहने वाले हो? तुम्हारा यहां कोई अपना जान पहचान का है? अजय बोला नही सेठ! तो फिर यहां क्या करने आए हो. चलो हटो! दुकान के सामने से धंधे का टाइम है. खोटी मत करो, लेकिन फिर भी अजय कुछ देर और दुकान पे यह सोचकर खड़ा रहा कि शायद सेठ को दया आ जाए और वह उसे कोई काम दे दे.


लेकिन ऐसा नही हुआ बल्कि उसने अजय को देखा और जोर से कहा अभी गया नही तू! सूरज,छोटू उसने उस दुकान में काम कर रहें अपने दो हट्टे-कट्टे नौकरो को बुलाया और कहा अरे इसे जल्दी  यहां से मार के भगावों.पता नही कहाँ -कहाँ  से चले आते है. साले! उसके दोनों नौकर तेजी से अजय की तरफ बढ़े और बेमुरौवत उसकी कमजोर और मासूम बांहो को पकड़कर उसे जोर से सड़क की तरफ ढ़केल दिया.


उनके ढ़केलने की वजह से उसके दोनों हाथों और पैरो के मासूम घुटने छिल गए वह सुबकता हुआ उठा और वही पास में सड़क के उस तरफ नाली के किनारे रखे हुए एक पत्थर पर बैठ गया, अभी उस पत्थर पर अजय को बैठे बमुश्किल दस मिनट भी नही हुआ था कि उसे लगा कि कोई उसके पास आकर खड़ा हुआ हो उसने अपना सर उठाकर जब देखा तो वाकई उसके पास पचास साल का एक अधपके बालों वाला व्यक्ति लुंगी और शर्ट पहने खड़ा था जिसने अपने कंधे पर एक बड़ा सा तमाशा दिखाने वाला झोला भी टांग रखा था.

उसने अजय से कहा बेटा! जब तुम उस सेठ की  दुकान पर काम मांग रहें थे.उस समय मैं उस दुकान पर बैठा चाय पी रहा था.मेरे तुम तक पहुंचने से पहले उसके दोनों नौकरो ने तुम्हें सड़क पर जोर से धक्का दे दिया था. फिर तुम्हें सड़क के इस तरफ पत्थर पर यूँ  उदास बैठा हुआ देखकर मैं खुद को तुमसे मिलने से नही रोक पाया.उसके इतना कहते ही मेंरे आंसू झर-झर आँखों से बहने लगे और ना जाने किस भावना के तहत अजय ने अपने पास खड़े उस अजनबी से अपनी सारी मजबूरी बता दी.

फिर कुछ देर बाद उस अजनबी ने कहा, बेटे मैं तुम्हें काम दे सकता हूं अगर तुम करना चाहो तो. हां! बहुत ज्यादा तो नही कमा पाओगे लेकिन इससे तुम और तुम्हारे परिवार को दो वक़्त की रोटी अवश्य मिल जाएगी.अजय ने भी आव देखा ना ताव झट उसने अपने सामने खड़े अजनबी से हां कह दिया. फिर उसके बाद उसने कहा कि लगता है कि तुमने सुबह से लेकर अभी तक कुछ खाया नही है. आओ! पहले तुम कुछ खालो अतः उसने सामने चाय और समोसे की दुकान पर ले जाकर उसे तीन समोसे खिलाने के साथ एक कप चाय पिलाया.


फिर इससे निवृत होनें के बाद उसके मददगार ने उसे बताया कि उसका नाम राम आसरे है और वह शहर की कचहरी में मजमा व तमाशा दिखाकर लोगों को उनके अच्छे किस्मत की अंगूठी बेचता है. इतना बताने के बाद उसने कहा, अब कल से तुम डेली मुझसे ठीक नौ बजे यही मिलना फिर हम दोनों साथ कचहरी चलेंगे. दुसरे दिन से मैं भी कचहरी उनके साथ जाने लगा उसने इस बीच मुझे अपने तमाशे का जमुरा बनने की पुरी ट्रेनिंग दे दी. मेरे जमुरा बनने के बाद उनकी  भी कमाई काफी बढ़ गई थी.


फिर एक दिन राम आसरे ने अजय से खुद कहा, बेटे! मैंने तुम्हें अपने सगे बेटे की तरह प्यार दिया है, इसलिए मैं आज तुमसे कुछ कहना चाहता हूं.देखो बेटे! तुम्हारें पास अपनी बीमार माँ के अलावा तुम्हारी एक  छोटी सी बहन भी है जिसकी सारी जिम्मेदारी तुम्हारें कमजोर कंधो पर है. इसलिए मैं नही चाहता कि तुम मेरे साथ कचहरी में तमाशे या मजमें करो मैं तुम्हें यह बहुत पहले ही बता देता लेकिन मैं चाहता था कि तुम्हारें अंदर की वह सारी झिझक दुर हो जाए जिससे  तुम इस कठोर और पत्थर दुनिया का बहादुरी के साथ सामना और मुकाबला कर सको.


मेरे इस कुछ पैसे से तुम्हारा कुछ भी भला नही होगा लेकिन चाचा इस बीच उनके अपनत्व और लगाव ने कब मुझे उनसे चाचा और भतीजे के रिश्ते से जोड़ दिया इसका मुझे कुछ पता नही चला.लेकिन मैंने कहा कि मुझे तो इस आपके मजमें और तमाशे के सिवा कुछ नही आता. मेरे इतना कहते ही वे खिलखिला कर हंसते हुए बोले,अजय जब तुमने मुझे अपना चाचा कह ही दिया है तो तुम चिंता क्यों करते हो. मैं हूं ना.
दरअसल मेरे बाबा के बारे में आज भी बताने वाले बताते है कि उनके जैसा मसखरे का तमाशा दिखाने वाला आज तक इस शहर में कोई दुसरा पैदा नही हुआ.


उन्होने मुझे बचपन में अपना यह हुनर सिखाया था. लेकिन मेरा मन कभी भी मसखरे के धंधे में नही लगा दरअसल इस धंधे की एक शर्त है कि जो भी मसखरा, मसखरे का धंधा करेगा उसे अपने खुद के दर्द को चेहरे पर कभी भी व्यक्त नही होनें देना है. अब इस बात में मेरे बापू के कितनी सच्चाई थी मैं बता नही सकता अजय क्योंकि  मैंने यह धंधा कभी किया नही.
लेकिन मैं इसे तुम्हें सिखाऊंगा ताकि तुम अपनी बीमार माँ और अपनी छोटी बहन की परवरिश अच्छे से कर सको.


मुझे एक महिने के अंदर ही चाचा ने मसखरे के धंधे की सारी खूबियां बहुत अच्छे से सीखा दी. सिखने के बाद उस दिन जब मैं उन्हें छोड़कर आने लगा तो वह मुझे अपने बेटे की तरह गले से लगाकर फुट-फुटकर रोने लगे और जब मैं भी जोर-जोर से रोने लगा तो अचानक उन्होंने मुझे अपने कंधे से झटकर एक तमाचा बड़ी जोर से मेरे मासूम गाल पर मारा मैं आवाक रह गया. कुछ देर मानो समय थम सा गया हो.


फिर उन्होंने ही कहा मैं जान-बूझकर तुम्हें अपने  गले से लगाकर रोने का नाटक कर रहा था. मैं यह देखना चाहता था कि तुम्हें इस मसखरे के धंधे की ट्रेनिंग देने में मेरे कही कोई कमी तो नही रह गई. आज तुम्हारें उसी दी हुई ट्रेनिंग कि परीक्षा थी और मेरी तुम्हें इस तमाचे के रूप में एक आखिरी सीख भी. कि एक मसखरा चाहे जो भी हो जैसे भी हालात हो चाहे उसके अपने खुद का ही दर्द क्यों ना हो पर वह कभी रो नही सकता.

फिर अजय इस मसखरे के धंधे को करने लगा हालांकि यह धंधा इतना आसान नही. इस धंधे में जाने से पहलें घंटो अजीबो गरीब मेकप की एक मोटी पर्त चेहरे पर चढ़ानी होती है.अजय अब पुरी तरह से एक मसखरा हो चुका था. आज उसने अपने मसखरे होनें की एक और परीक्षा पास कर ली थी. दरअसल आज वह अपनी माँ की लाश के पास चुपचाप बिना रोए खड़ा रहा, फिर वह झोपड़ी से बाहर निकल अपनी छोटी बहन को डाटकर चुप कराने लगा.

अगल-बगल खड़ी उन तीन औरतों में से किसी ने कानाफूसी के लहजे में कहा! देख तो माँ मर गई लेकिन जैसे मुए को कोई फर्क ही नही.कैसे कसाई की  तरह अपनी मासूम बहन को डाट रहा.लेकिन अजय पर इन सारी बातो का कोई फर्क नही पड़ा क्योंकि अजय तो एक मसखरा था. अतः किसी तरह बस्ती में रहने वाले लोगो ने ही आपस में चंदा जुटाकर उसकी माँ का अंतिम संस्कार किया. कुछ दिनों के बाद फिर सबकुछ पहले की तरह ही सामान्य हो गया.

हां, अब अजय भी अपने मसखरे के धंधे के लिए कॉलोनी-कॉलोनी जाने लगा लगा था.अब अजय और उसकी छोटी बहन भी बड़ी होनें लगी थी. अतः अजय अपनी छोटी बहन का एडमिशन शहर के एक महंगे बोर्डिंग स्कूल में करा दिया और उसकी पढ़ाई के लिए अब उसे और भी ज्यादा पैसे कि आवश्यकता महसूस होनें लगी. इसके लिए वह अब कभी इस शहर, कभी उस शहर अपने मसखरे का धंधा दिखाने लगा.

अब उसकी कमाई भी काफी पर्याप्त होनें लगी थी. इसी बीच कभी-कभार उसकी छोटी बहन भी अपने भाई से मिलने उस झोपड़ी में आ जाती थी . फिर धीरे-धीरे वक़्त का पहिया घूमता रहा. इस बीच ना जाने कब अजय के आधे से अधिक बाल पक गए और आँखों पे उसके पावर का चश्मा लग गया. और उसकी छोटी बहन अंजली अब पढ़ लिखकर डॉक्टर बन चुकी थी.


एक दिन अजय जब अपने मसखरे के धंधे से खाली होकर घर लौटा तो उसने अंजली को एक खुबसूरत लड़के के साथ कार से उतरते हुए देखा तो अजय अंदर ही अंदर चौक गया. क्योंकि अंजली ने सुर्ख साड़ी के साथ ही अपनी मांग में सिंदूर भी पहन रखा था. दोनों अजय के पास आए और आकर उन्होंने अजय का पैर छुवा, पैर छूने के बाद अंजली बोली भैया मैंने और महेश ने आज अपनी रजामंदी से कोर्ट में जाकर शादी कर ली.

महेश भी मेरे साथ एक ही कॉलेज में पढ़ता था. इसने भी डॉक्टरी की है. हम दोनों साथ में ही अपना एक अस्पताल खोलना चाहते है.इतना सुनते ही जैसे अजय के अंदर कोई चीज़ बहुत जोर से टूटी हो. लेकिन उसने अपने अंदर की पीड़ा को बाहर नही आने दिया और आने भी कैसे देता आखिर वे एक मसखरा था. जिसका कभी अपना कोई दर्द नही होता.अतः उसने उन दोनों को सदा खुश रहने का आशीर्वाद दिया.

अंजली ने उससे आशीर्वाद ले लेने के बाद यह भी नही सोचा कि आखिर बेशक उसका भाई एक मसखरा है लेकिन उसके अंदर भी एक दिल है. क्या उसका यह मसखरा भाई इस काबिल भी नही था कि एक बार शादी करने से पहले उसकी बहन उससे यह पुछ सके  कि भैया मैं महेश से अपनी शादी करना चाहती हूं?  लेकिन नही उसने उससे पूछा तलक नही बल्कि आशीर्वाद लेकर वह पुनः उसी कार में बैठकर जिस तेजी से और अचानक मेरे पास आई थी उसी तेजी के साथ वह कार में महेश के साथ बैठकर चली गई.

अजय समझ गया कि यहां अंजली केवल आशीर्वाद लेने ही नहि बल्कि अपने मसखरे भाई से शायद यह अघोषित रूप से बताने आई थी कि भैया तुम मसखरे हो तुमने अपना खुद का जीवन तो बर्बाद कर लिया है लेकिन मैं अपने जीवन में अब कभी तुम्हारें मसखरेपन कि परछाई भी  नही पड़ने देना चाहती. इसलिए अगर हो सके तो तुम अपनी इस बहन को भूल जाना.
अजय के आँखों से जब अंजली कि कार ओझल हो गई तो अजय कि इच्छा हुई कि वह बहुत जोर-जोर से और खुब फुट-फुटकर रोए. लेकिन तभी अजय को लगा कि जैसे उसके उस्ताद ने एक और चाटा खींचकर अजय कि गाल पर यह कहते हुए मारा हो  कि तुम्हें मैंने पहले ही बता दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए लेकिन एक धंधा करने वाले मसखरे को रोने का कोई अधिकार नही. फिर इसके कुछ ही देर बाद अजय खुब खिलखिलाकर हंसता रहा और हंसते-हंसते अचानक से वह वही गिरा और गिरते ही उस मसखरे ने हमेशा के लिए अपनी आँखें इस दुनिया से मूंद ली.


यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.


लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P )
mo.no.7800824758

Monday, 5 July 2021

(वेदना की पगडंडी हूँ)
हाँ मै उसके जाने----------
और लौटने का दर्द जानती हूँ,,,,,,,
तुम उसे बस एक वेश्या जानते हो--
मै उसे एक औरत जानती हूँ।
ऐ,रंग----मै उसके घर की तरफ जाती हूई,
उसकी वेदना की पगडंडी हूँ।