कहानी---(मसखरा)
अजय शहर की कॉलोनी-कॉलोनी घूम-घूमकर मसखरे के गेटप में लोगों को खुब हँसाता,जब वह हँसा कर खाली होता तो कॉलोनी के कुछ एक लोग उसकी मसखरी से खुश होकर दो-चार रूपए उसकी मासूम हथेली पर रख देते, जिसे वह अपनी एक फटी हुई जेब की बगल वाली जर्जर जेब में रखकर अगली कॉलोनी की तरफ अपने मसखरे बाजी के करतब दिखाने के लिए चल पड़ता.
हालांकि 15 वर्षीय अजय कोई जन्मजात मसखरा नही था, लेकिन उसके घर की परिस्थितियों और हालात ने उसे एक स्कूल में पढ़ने वाले किसी छात्र की उम्र में ही शहर की इस कॉलोनी से उस कॉलोनी का मसखरा बनाकर रख दिया. आज वह अपनी बीमार माँ की दवा और अपनी छोटी बहन का पेट अपने इसी मसखरेपन के तमाशे से वह भर रहा है.
कॉलोनी के लोग तो उसके इस मसखरेपन की करतब से हंस लेते है, लेकिन अजय खुद कभी नही हंस पाता, क्योंकि उसे अपनी खुद की जिंदगी ही किसी मसखरे की तरह मिली है. जहाँ उसके मासूम होठों पर कोई हंसी नही बस आंसू है, जो अब उसकी आँखों से इसलिए नही बहते कि कही उसके मसखरेपन का किया हुआ उसका मेकप ना छूट जाए,जिसे देखकर ही लोग हंसते है.
वह सारा दिन जी तोड़ इस कॉलोनी से उस कॉलोनी जब अपने मसखरेपन के करतब को दिखाकर खाली होता है, तो वह इस करतब और धंधे से मिलें सारे सिक्के और नोटों को निकालकर गिनती करता है. उस गिनती में जब दस-बीस रूपए दवा और खाने के कम पड़ते है तो वह एकाध और कॉलोनी में बेमन से अपने मसखरेपन के करतब दिखाकर उन पैसो को इकट्ठा कर जब अपने झोपड़े की तरफ लौटता है तो उसके नन्हें पैरो में एक असीम थकन और पीड़ा होती है.
एक शाम ऐसे ही अपने मसखरेपन के धंधे से जब अजय खाली होकर अपनी झोपड़ी के दरवाज़े के पास पहुंचा तो उसने देखा कि उसके उस झोपड़े रूपी घर के आस-पास उसके अगल-बगल की दो-तीन औरते उसकी छोटी बहन जो कि काफी जोर-जोर से और हिचक-हिचक कर रो रही थी, उसको वह औरते किसी तरह चुप कराने और ढाढ़स बधाने का प्रयास कर रही थी. अजय यह सब देखकर चौक गया और उसके मन में किसी अनहोनी की आशंका उत्पन्न हुई.अतः उसने बिना किसी से कुछ पूछें या अपनी बहन को देखें वह सीधे झोपड़ी के अंदर चला गया और उसने अपनी माँ को टूटी हुई चारपाई पर हमेशा की तरह लेटे हुए देखा.
लेकिन उसने एक फर्क अवश्य देखा कि उसकी माँ के और दिनों के लेटने में और आज के लेटने में काफी फर्क था. पहले जब अजय शाम को अपने घर की झोपड़ी में लौटता तो उसकी माँ दो-तीन बार जोर से खांसती फिर खुद को सामान्य कर अजय से पुछती कि तुम आ गए अजय बेटा! लेकिन आज अजय की माँ ने ना तो खांसा और ना ही उसने अजय से यह पुछा कि तुम आ गए अजय बेटा.
अजय समझ गया कि आज उसकी माँ भी उसके शराबी बाप की तरह उसे और उसकी छोटी बहन को हमेशा के लिए छोड़ के इस दुनिया से चली गई. दरअसल अजय का बाप एक भयंकर शराबी था. अतः वह सारा दिन जो कुछ भी कमाता था उसे वह अपने शराब की लत में उड़ा देता था. इतना ही नही कभी-कभी जब जरूरत से ज्यादा पीकर आता तो वह बेतहासा ना सिर्फ माँ को मारता पीटता था बल्कि वह उसकी माँ को ढ़ेर सारी गंदी-गंदी माँ बहन गालियां भी देता,जिसकी वजह से अजय की माँ सारी रात रोती रहती थी.
जब अजय से अपनी माँ का रोना नही देखा जाता था तो वह अपनी नन्ही-नन्ही हथेलियों से अपनी माँ के आंसू पोछता और उसे किसी तरह चुप कराने कि कोशिश करता रहता. माँ तब कभी-कभी मुझे जोर से अपने सीने से लगाकर भींच लेती और थोड़ी देर रो लेने के बाद कहती कि बेटे! मैं तेरी कितनी अभागी माँ हूं कि मैं तुम लोगो को कोई खुशी नही दे सकती सिवा आंसू के. पर क्या करु बेटा ? मुझे शादी से पहले तेरे बापू के बारे में यह सब पता नही था.
फिर एक दिन अजय को पता चला कि उसका शराबी बाप अतिसय शराब के नशे में घर लौट रहा था तो एक तेज रफ़्तार ट्रक ने उसे बुरी तरह कुचल दिया जिसकी वजह से उसकी मौके पर ही मौत हो गई थी.उस दिन उसकी माँ बहुत रोई थी और अजय ने भी अपनी माँ को चुप कराने कि कोई कोशिश नही की थी. बल्कि एक तरह से अजय मन ही मन यह सोचकर खुश था कि चलो! अब कम से कम उसकी माँ को उसका शराबी बाप मारेगा तो नही.
लेकिन माँ को अपने पति की मौत का तगड़ा सदमा लगा था और लगता भी क्यों ना क्योंकि उसका बापू चाहे जैसा भी था, लेकिन था तो उसकी माँ का सुहाग ही. अतः इसके बाद से उसकी माँ अक्सर बीमार रहने लगी दो-चार दिन किसी तरह बीत गए लेकिन माँ के बीमार होनें से वह आय भी बंद हो गई जो उसकी माँ दो-चार बड़े घर के लोगों के यहां बर्तन, झाड़ू और कपड़े की साफ सफाई करके पा जाती थी. लेकिन अगर ईश्वर ने पेट दिया है तो उसके साथ ही उसने रोटी की भूख भी दी है.
इसी भूख और रोटी के लिए अजय हफ्तों इधर-उधर भटकता रहा और अपने लिए किसी काम कि तलाश करता रहा. लेकिन कहते है कि बिना किसी परिचय या पहचान के यहां काम भी नही मिलता. यही हाल अजय का भी हुआ. लेकिन उसने हिम्मत नही हारी फिर भी वह काम तलाशता रहा ऐसे ही एकदिन वह एक चाय-नाश्ते की दुकान पर गया और बड़े ही कातर भाव से उसने दुकानदार से कहा कि मुझे कोई काम दे दो सेठ!
लेकिन जैसे दुकानदार ने अजय कि कोई बात ही ना सुनी हो अतः उसने एक बार फिर किसी तरह अपनी हिम्मत जुटाकर दुकानदार से कहा कि मुझे कोई काम दे दो. सेठ!लेकिन इस बार शायद उस दुकानदार ने अजय की बात सुन ली हो.वह बोला कौन हो? कहाँ के रहने वाले हो? तुम्हारा यहां कोई अपना जान पहचान का है? अजय बोला नही सेठ! तो फिर यहां क्या करने आए हो. चलो हटो! दुकान के सामने से धंधे का टाइम है. खोटी मत करो, लेकिन फिर भी अजय कुछ देर और दुकान पे यह सोचकर खड़ा रहा कि शायद सेठ को दया आ जाए और वह उसे कोई काम दे दे.
लेकिन ऐसा नही हुआ बल्कि उसने अजय को देखा और जोर से कहा अभी गया नही तू! सूरज,छोटू उसने उस दुकान में काम कर रहें अपने दो हट्टे-कट्टे नौकरो को बुलाया और कहा अरे इसे जल्दी यहां से मार के भगावों.पता नही कहाँ -कहाँ से चले आते है. साले! उसके दोनों नौकर तेजी से अजय की तरफ बढ़े और बेमुरौवत उसकी कमजोर और मासूम बांहो को पकड़कर उसे जोर से सड़क की तरफ ढ़केल दिया.
उनके ढ़केलने की वजह से उसके दोनों हाथों और पैरो के मासूम घुटने छिल गए वह सुबकता हुआ उठा और वही पास में सड़क के उस तरफ नाली के किनारे रखे हुए एक पत्थर पर बैठ गया, अभी उस पत्थर पर अजय को बैठे बमुश्किल दस मिनट भी नही हुआ था कि उसे लगा कि कोई उसके पास आकर खड़ा हुआ हो उसने अपना सर उठाकर जब देखा तो वाकई उसके पास पचास साल का एक अधपके बालों वाला व्यक्ति लुंगी और शर्ट पहने खड़ा था जिसने अपने कंधे पर एक बड़ा सा तमाशा दिखाने वाला झोला भी टांग रखा था.
उसने अजय से कहा बेटा! जब तुम उस सेठ की दुकान पर काम मांग रहें थे.उस समय मैं उस दुकान पर बैठा चाय पी रहा था.मेरे तुम तक पहुंचने से पहले उसके दोनों नौकरो ने तुम्हें सड़क पर जोर से धक्का दे दिया था. फिर तुम्हें सड़क के इस तरफ पत्थर पर यूँ उदास बैठा हुआ देखकर मैं खुद को तुमसे मिलने से नही रोक पाया.उसके इतना कहते ही मेंरे आंसू झर-झर आँखों से बहने लगे और ना जाने किस भावना के तहत अजय ने अपने पास खड़े उस अजनबी से अपनी सारी मजबूरी बता दी.
फिर कुछ देर बाद उस अजनबी ने कहा, बेटे मैं तुम्हें काम दे सकता हूं अगर तुम करना चाहो तो. हां! बहुत ज्यादा तो नही कमा पाओगे लेकिन इससे तुम और तुम्हारे परिवार को दो वक़्त की रोटी अवश्य मिल जाएगी.अजय ने भी आव देखा ना ताव झट उसने अपने सामने खड़े अजनबी से हां कह दिया. फिर उसके बाद उसने कहा कि लगता है कि तुमने सुबह से लेकर अभी तक कुछ खाया नही है. आओ! पहले तुम कुछ खालो अतः उसने सामने चाय और समोसे की दुकान पर ले जाकर उसे तीन समोसे खिलाने के साथ एक कप चाय पिलाया.
फिर इससे निवृत होनें के बाद उसके मददगार ने उसे बताया कि उसका नाम राम आसरे है और वह शहर की कचहरी में मजमा व तमाशा दिखाकर लोगों को उनके अच्छे किस्मत की अंगूठी बेचता है. इतना बताने के बाद उसने कहा, अब कल से तुम डेली मुझसे ठीक नौ बजे यही मिलना फिर हम दोनों साथ कचहरी चलेंगे. दुसरे दिन से मैं भी कचहरी उनके साथ जाने लगा उसने इस बीच मुझे अपने तमाशे का जमुरा बनने की पुरी ट्रेनिंग दे दी. मेरे जमुरा बनने के बाद उनकी भी कमाई काफी बढ़ गई थी.
फिर एक दिन राम आसरे ने अजय से खुद कहा, बेटे! मैंने तुम्हें अपने सगे बेटे की तरह प्यार दिया है, इसलिए मैं आज तुमसे कुछ कहना चाहता हूं.देखो बेटे! तुम्हारें पास अपनी बीमार माँ के अलावा तुम्हारी एक छोटी सी बहन भी है जिसकी सारी जिम्मेदारी तुम्हारें कमजोर कंधो पर है. इसलिए मैं नही चाहता कि तुम मेरे साथ कचहरी में तमाशे या मजमें करो मैं तुम्हें यह बहुत पहले ही बता देता लेकिन मैं चाहता था कि तुम्हारें अंदर की वह सारी झिझक दुर हो जाए जिससे तुम इस कठोर और पत्थर दुनिया का बहादुरी के साथ सामना और मुकाबला कर सको.
मेरे इस कुछ पैसे से तुम्हारा कुछ भी भला नही होगा लेकिन चाचा इस बीच उनके अपनत्व और लगाव ने कब मुझे उनसे चाचा और भतीजे के रिश्ते से जोड़ दिया इसका मुझे कुछ पता नही चला.लेकिन मैंने कहा कि मुझे तो इस आपके मजमें और तमाशे के सिवा कुछ नही आता. मेरे इतना कहते ही वे खिलखिला कर हंसते हुए बोले,अजय जब तुमने मुझे अपना चाचा कह ही दिया है तो तुम चिंता क्यों करते हो. मैं हूं ना.
दरअसल मेरे बाबा के बारे में आज भी बताने वाले बताते है कि उनके जैसा मसखरे का तमाशा दिखाने वाला आज तक इस शहर में कोई दुसरा पैदा नही हुआ.
उन्होने मुझे बचपन में अपना यह हुनर सिखाया था. लेकिन मेरा मन कभी भी मसखरे के धंधे में नही लगा दरअसल इस धंधे की एक शर्त है कि जो भी मसखरा, मसखरे का धंधा करेगा उसे अपने खुद के दर्द को चेहरे पर कभी भी व्यक्त नही होनें देना है. अब इस बात में मेरे बापू के कितनी सच्चाई थी मैं बता नही सकता अजय क्योंकि मैंने यह धंधा कभी किया नही.
लेकिन मैं इसे तुम्हें सिखाऊंगा ताकि तुम अपनी बीमार माँ और अपनी छोटी बहन की परवरिश अच्छे से कर सको.
मुझे एक महिने के अंदर ही चाचा ने मसखरे के धंधे की सारी खूबियां बहुत अच्छे से सीखा दी. सिखने के बाद उस दिन जब मैं उन्हें छोड़कर आने लगा तो वह मुझे अपने बेटे की तरह गले से लगाकर फुट-फुटकर रोने लगे और जब मैं भी जोर-जोर से रोने लगा तो अचानक उन्होंने मुझे अपने कंधे से झटकर एक तमाचा बड़ी जोर से मेरे मासूम गाल पर मारा मैं आवाक रह गया. कुछ देर मानो समय थम सा गया हो.
फिर उन्होंने ही कहा मैं जान-बूझकर तुम्हें अपने गले से लगाकर रोने का नाटक कर रहा था. मैं यह देखना चाहता था कि तुम्हें इस मसखरे के धंधे की ट्रेनिंग देने में मेरे कही कोई कमी तो नही रह गई. आज तुम्हारें उसी दी हुई ट्रेनिंग कि परीक्षा थी और मेरी तुम्हें इस तमाचे के रूप में एक आखिरी सीख भी. कि एक मसखरा चाहे जो भी हो जैसे भी हालात हो चाहे उसके अपने खुद का ही दर्द क्यों ना हो पर वह कभी रो नही सकता.
फिर अजय इस मसखरे के धंधे को करने लगा हालांकि यह धंधा इतना आसान नही. इस धंधे में जाने से पहलें घंटो अजीबो गरीब मेकप की एक मोटी पर्त चेहरे पर चढ़ानी होती है.अजय अब पुरी तरह से एक मसखरा हो चुका था. आज उसने अपने मसखरे होनें की एक और परीक्षा पास कर ली थी. दरअसल आज वह अपनी माँ की लाश के पास चुपचाप बिना रोए खड़ा रहा, फिर वह झोपड़ी से बाहर निकल अपनी छोटी बहन को डाटकर चुप कराने लगा.
अगल-बगल खड़ी उन तीन औरतों में से किसी ने कानाफूसी के लहजे में कहा! देख तो माँ मर गई लेकिन जैसे मुए को कोई फर्क ही नही.कैसे कसाई की तरह अपनी मासूम बहन को डाट रहा.लेकिन अजय पर इन सारी बातो का कोई फर्क नही पड़ा क्योंकि अजय तो एक मसखरा था. अतः किसी तरह बस्ती में रहने वाले लोगो ने ही आपस में चंदा जुटाकर उसकी माँ का अंतिम संस्कार किया. कुछ दिनों के बाद फिर सबकुछ पहले की तरह ही सामान्य हो गया.
हां, अब अजय भी अपने मसखरे के धंधे के लिए कॉलोनी-कॉलोनी जाने लगा लगा था.अब अजय और उसकी छोटी बहन भी बड़ी होनें लगी थी. अतः अजय अपनी छोटी बहन का एडमिशन शहर के एक महंगे बोर्डिंग स्कूल में करा दिया और उसकी पढ़ाई के लिए अब उसे और भी ज्यादा पैसे कि आवश्यकता महसूस होनें लगी. इसके लिए वह अब कभी इस शहर, कभी उस शहर अपने मसखरे का धंधा दिखाने लगा.
अब उसकी कमाई भी काफी पर्याप्त होनें लगी थी. इसी बीच कभी-कभार उसकी छोटी बहन भी अपने भाई से मिलने उस झोपड़ी में आ जाती थी . फिर धीरे-धीरे वक़्त का पहिया घूमता रहा. इस बीच ना जाने कब अजय के आधे से अधिक बाल पक गए और आँखों पे उसके पावर का चश्मा लग गया. और उसकी छोटी बहन अंजली अब पढ़ लिखकर डॉक्टर बन चुकी थी.
एक दिन अजय जब अपने मसखरे के धंधे से खाली होकर घर लौटा तो उसने अंजली को एक खुबसूरत लड़के के साथ कार से उतरते हुए देखा तो अजय अंदर ही अंदर चौक गया. क्योंकि अंजली ने सुर्ख साड़ी के साथ ही अपनी मांग में सिंदूर भी पहन रखा था. दोनों अजय के पास आए और आकर उन्होंने अजय का पैर छुवा, पैर छूने के बाद अंजली बोली भैया मैंने और महेश ने आज अपनी रजामंदी से कोर्ट में जाकर शादी कर ली.
महेश भी मेरे साथ एक ही कॉलेज में पढ़ता था. इसने भी डॉक्टरी की है. हम दोनों साथ में ही अपना एक अस्पताल खोलना चाहते है.इतना सुनते ही जैसे अजय के अंदर कोई चीज़ बहुत जोर से टूटी हो. लेकिन उसने अपने अंदर की पीड़ा को बाहर नही आने दिया और आने भी कैसे देता आखिर वे एक मसखरा था. जिसका कभी अपना कोई दर्द नही होता.अतः उसने उन दोनों को सदा खुश रहने का आशीर्वाद दिया.
अंजली ने उससे आशीर्वाद ले लेने के बाद यह भी नही सोचा कि आखिर बेशक उसका भाई एक मसखरा है लेकिन उसके अंदर भी एक दिल है. क्या उसका यह मसखरा भाई इस काबिल भी नही था कि एक बार शादी करने से पहले उसकी बहन उससे यह पुछ सके कि भैया मैं महेश से अपनी शादी करना चाहती हूं? लेकिन नही उसने उससे पूछा तलक नही बल्कि आशीर्वाद लेकर वह पुनः उसी कार में बैठकर जिस तेजी से और अचानक मेरे पास आई थी उसी तेजी के साथ वह कार में महेश के साथ बैठकर चली गई.
अजय समझ गया कि यहां अंजली केवल आशीर्वाद लेने ही नहि बल्कि अपने मसखरे भाई से शायद यह अघोषित रूप से बताने आई थी कि भैया तुम मसखरे हो तुमने अपना खुद का जीवन तो बर्बाद कर लिया है लेकिन मैं अपने जीवन में अब कभी तुम्हारें मसखरेपन कि परछाई भी नही पड़ने देना चाहती. इसलिए अगर हो सके तो तुम अपनी इस बहन को भूल जाना.
अजय के आँखों से जब अंजली कि कार ओझल हो गई तो अजय कि इच्छा हुई कि वह बहुत जोर-जोर से और खुब फुट-फुटकर रोए. लेकिन तभी अजय को लगा कि जैसे उसके उस्ताद ने एक और चाटा खींचकर अजय कि गाल पर यह कहते हुए मारा हो कि तुम्हें मैंने पहले ही बता दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए लेकिन एक धंधा करने वाले मसखरे को रोने का कोई अधिकार नही. फिर इसके कुछ ही देर बाद अजय खुब खिलखिलाकर हंसता रहा और हंसते-हंसते अचानक से वह वही गिरा और गिरते ही उस मसखरे ने हमेशा के लिए अपनी आँखें इस दुनिया से मूंद ली.
यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.
लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P )
mo.no.7800824758