Wednesday, 13 September 2017
(गुलाबी शाल)
(गुलाबी शाल)
वे ठंड दिसंबर की----------
मै भुल नही पाती जब तुम आये थे छुट्टियां ले,
और मै इंतज़ार कर रही थी,
अपने कमरे मे तेरे आने का,
कमरे मे आते ही---------
तुमने पिछे से मेरी आँख मूँद,
फिर हौले से खोलने को कहा,
तो देखा तुम्हारी हाथो ने बड़े प्यार से पकड़ा था---------
एक गुलाबी शाल।
फिर उसे खोलकर तुमने कहा था,
बिल्कुल हूबहू तुम्हारी तरह है,
इसकी भी गुलाबी शर्म!
बस इसी से खरीद लाया कि जब तुम इसे ओढ़ोगी,
तो एक तरफ तुम्हारी शर्म होगी,
तो एक तरफ होगी-------
हमारी गुलाबी शाल।
फिर फौज की छुट्टी बिता तुम लौट गये,
इस दिसंबर तुम नही हो------------
तो तुम्हे अपने श्पर्श मे पाने की खातिर,
मैने दराज से निकाला है-------
गुलाबी शाल।
सच इसको छुना तुम्हे छुने सा लगता है,
जब इसे मै रखती हूं कंधे पे,
तो लगता है जैसे,
तुम्हारा लिया चुंबन है-------
गुलाबी शाल।
## # दिसंबर की ठंड मे लिखी एक रोमांटिक कविता है गुलाबी शाल।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
यह कविता मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
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