(मैं महिला दिवस हूँ।)
संसद से सड़क तक,
मैं अब भी विवश हूँ,
कहने को केवल------
मैं महिला दिवस हूँ।
अब भी हालात बदले नहीं हैं,
वहीं चुभते नाखून और चुभती आँखें,
ऐसी ही पीड़ा की------
ऐ "रंग"मैं एक कशमकश हूँ।
संसद से सड़क तक,
मैं अब भी विवश हूँ,
कहने को केवल -----
मैं महिला दिवस हूँ।
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