Sunday, 17 November 2019

(वाह कटे)

     ( वाह कटे)

आओ पतंग उड़ाये,वाह कटे.
छत पर चिल्लाये, वाह कटे.
सद्दी डोरी और मंझे को,
पूरे छत फैलाये, वाह कटे.

इधर-उधर चारो ओर नचाये आसमान मे,
अपनी पतंग को सबसे बचाये,
फिर किसी पतंग को हत्थे से,
हम काट चिल्लाये,वाह कटे.

खाना भुले,पीना भुले
समय का कुछ भी पता नही,
बस परेती और पतंग ले,
हम छत पर चिल्लाये,वाह कटे.

उफ! दिल टुटा---
जब सबसे अच्छी पतंग मेरी,
पीपल मे फंस गई,
तब पता चला कि,--
बगल के छत पर,
कोई और चिल्लाये,वाह कटे.

तब बेमन से उठाके अपनी परेती,
ज्यो रखा-तो ऐसा लगा कि,
जैसे परेती मुझको समझाये,ऐ मुन्ना-
दुःखी ना हो,
तुम कल फिर चिल्लाना,
पतंग उड़ाना 
और हँसकर कहना वाह कटे.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

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