Saturday, 17 April 2021

कविता--(योग ना हमारे राम ना तुम्हारें रहीम का है )

(योग--न हमारे राम और न तुम्हारे रहिम का है)
योग----------
न हमारे राम और न तुम्हारे रहिम का है।
रुग्ण मन,रुग्ण काया किस काम का बोलो,
शरीर,शरीर पहले है ये कहां--------
किसी हिन्दू या मुसलमान का है।
योग----------
न हमारे राम और न तुम्हारे रहिम का है।
आओ इसके आसन मे प्रेम है अपना ले,
स्वस्थ रहेगे ये मन सभी बना ले,
आखिर घर-घर है दवाखाना नही------
किसी वैद्य या हकिम का है।
योग----------
न हमारे राम और न तुम्हारे रहिम का है।
इसे घूँघट या पर्दानश़ी औरत मे हरगिज़ न बाँटिये,
क्योंकि योग---------
हर शख्स़ और तंजीम का है।
योग-------
न हमारे राम और न तुम्हारे रहिम का है।
पुरी दुनिया हो उठी है कायल,
इसका फक्र है हमें,
क्योंकि हमारा योग एै"रंग"-------
न किसी रसिया न किसी चीन का है।
योग--------
न हमारे राम और न तुम्हारें रहिम का है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758

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