Tuesday, 9 May 2017
राम अयोध्या और आडवाणी
(राम,अयोध्या और आड़वाणी)
भाजपा जैसी पार्टी को प्रथमबार जिस व्यक्ति ने राष्ट्रीय फलक पे स्थापित व महिमा मंडित किया---आज वही विराट व्यक्ति किसी शापित सा प्रतिदिन यानि की महाभारत के उस भिष्म पितामह की तरह दर्द या पिड़ा के शतसैया पर पड़ा अपनो की गला काट प्रतिस्पर्धा के बीच जीवन की असह्य पिड़ा को,अपनी मौन कराह के साथ जिने को बाध्य लग रहा।
शायद आड़वाणी ने राजनैतिक उदय होते भाजपा के यौवन काल की उस---"राजनैतिक सुंदरी का अपमान किया जो कभी महाभारत के भिष्म पितामह ने की थी"।काश आड़वाणी ने----"कुर्सी के उस प्रणय को स्वीकार कर लिया होता,तो आज कुर्सी उनसे अपमानित अपने यौवन उन्मादो का बदला न लेती"।
और वैसे भी सदियो से यानि की युगो-युगो से तमाम विद्वत लोगो ने अपनी नीतियो मे ये कहा है कि---"सत्ता का सर्वोच्च कभी भी संवेदना के मोल नही जानती,ये निर्णय की वे पराकाष्ठा है जिसे लेते हुये व्यक्ति के चेहरे पे कंपन या सिकन नहीं होनी चाहिये"।
आज भाजपा की मूर्छाकाल का ये सुखैन वैद्य सत्ता के लक्ष्मण को ठीक कर खुद इतना असहाय और बीमार हो गया है कि---खुद अयोध्या के राम इस कलयुग के वैद्य की कोई भी मदद करने मे असमर्थ है।
याद करिये बाबरी बिध्वंस को तो दिल और दिमाग में एक-एक चित्र उभर आयेंगे,आज के विवाद की बाबरी ने तमाम को सत्ताशीन किया।इसी बाबरी को एक क्रांति का रुप देकर पुरे देश में मर्यादा पुरुसोत्तम भगवान श्री राम को--राष्ट्रीय चिंतन मे परिवर्तित कर उस धर्म की नगरी"अयोध्या के पवित्र सीने पे बाबर जैसे वाह्य आक्रांता के खड़े किये मस्जिद को ढ़हा दिया"।
केवल उस भगवान श्री राम के लिये जो----महज राम नही अपितु शत-प्रतिशत भारतियो के लिये एक मर्यादा का वे मूर्तरुप है,जिसकी परिकल्पना आज भी रामराज्य के रुप मे की जाती है। और वैसे भी अगर हमारे धर्म और आस्था से"भगवान शिव,कृष्ण और राम निकाल दिये जाये तो करोड़ो हिंदू अनुआईयो के पास धर्म के नाम पे बचेगा ही क्या ?"।
आज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिस तरह से---मुरली मनोहर जोशी,
उमा भारती और आडवाणी को दिखाया जा रहा वे अकिंचन उनके जीवनकाल के सबसे दुखद और पीड़ित चेहरे का आभास करा रहे जिस व्यक्ति ने एक हनुमान की तरह भारत रत्न श्री अटल बिहारी को सत्ता सौपी वे आज की प्रदुषित राजनीति मे अब शायद ही दिखे।आज उन्हीं के लगाये या रोपित किये विरवे"इतने विशाल और शक्तिशाली हो गये है कि इन्हें हाशिये पे कर इनकी अघोषित उपेक्षा कर रहे है"।
तमाम झंझावतो के इतर एक उम्मीद थी कि ये दिया अपनी राजनीति के अवशान के दिनो मे शायद इस विशाल भारत के राष्ट्रपति की गरिमा को प्राप्त करअपने जीवन के बचे-खुचे युग को एक गरिमा के साथ जी कर अलविदा कहेगा।
लेकिन अब हालात और परिस्थितियो ने कुछ एैसी करवट ले ली है जिसे देख लग रहा कि अब शायद इस उम्मीद के आखिरी चेहरे पे भी वे चादर पड़ गई है अर्थात "'जिसके बाद राजनीति के कमरे की वे झिर्री भी बंद हो जाती है और इच्छाओ के सारे पदचाप मौन हो जाते है"।
मै अपने इस लेख की सारी वेदना को बस इतने शब्दो मे कह सकता हूँ कि जिस आडवाणी के साथ-----"जन-जन लोगो ने जय श्री राम कहा था आज सबकुछ ठीक उलट है!सभी चले गये बस आडवाणी रह गये और उनके होंठो पे भी जैसे महात्मा गाँधी के उस आखिरी अनूगुंज की तरह रह गया हे!राम"।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment