आज हमसे हमारी बहुत सारी पारिवारिक व वैदिक संवेदनाएं काफी जर्जर हो चुकी है,या अगर जर्जर नही हुई है तो नष्ट होने की कगार पर है.उन्हीं उत्कृष्ट परंपरा या संवेदना मे से एक प्रमुख है,अपने वृद्धों का आदर पूर्वक किया गया उनका श्राद्घ चूँँकिं श्राद्ध का आशय श्रद्धा से है,अगर ये श्रद्धा मर जाये तो हमारे देश की समृद्ध वैदिक परंपरा भी मर जायेगी. तब केवल और केवल मनुष्य हाड़-मांस का बना यंत्र भर रह जायेगा, जिसमें सब कुछ रहेगा बस संवेदना नही रहेगी.
आज पूरी दुनिया में संवेदना मे आ रही लगातार गिरावट का ये भयंकर दौर है,जिसकी भयंकरता का मापन हम दुनिया के किसी भी वैज्ञानिक रिएक्टर पैमाने पे नही कर सकते.इसका स्पष्ट असर अब हमारे देश में भी केवल श्राद्ध के महीने मे ही नही अपितू अपने वृद्ध माँ-बाप की उपेक्षा मे भी हमे स्पष्ट दिख रहा है.जबकि हम सभी भारतीय कभी इस दौलत की खान थे. पूरी दुनिया हमारी संवेदना और यहां की समृद वैदिक परंपरा को बड़ी श्रद्धा से देखती थी.लेकिन हमीं अब अपनी इस संवेदना की समृद्ध व गौरवशाली परंपरा को खुद जर्जर व नष्ट कर रहे.
"हमें विदेशों की अतिशय नकल परंपरा के इस ओलंपिक से बाहर निकलना होगा". और हमें जिन बुढ़े माँ-बाप ने पाला-पोशा अपने सारे सुख-सुविधाओं को त्यागकर अपना वात्सल्य दिया.उन्हें हम कही उपेक्षा तो नही दे रहे,हमारा बागबान कही हमारी उपेक्षा से आहत या पीड़ित हो अकेले में रोतो नही रहा, गर ऐसा है तो फिर ये देश भी "विदेशी मूल के कुत्तों के मार्निंग वाक और इवनिंग वाक का देश होने जा रहा". बुढ़े माँ-बाप का श्रवण कुमार वाला देश अब मिस्टर कुमार होने जा रहा.यानि हमारी समृद्ध परंपरा का देश उन्हें अपनों से अलग रखने वाले वृद्धाश्रम का देश होने जा रहा.
हम सभी अपनी समृद्ध वैदिक परंपरा को जर्जर करने का दोषारोपण अब किसी विदेशी के सर नही मढ़ सकते.क्योंकि इसको जर्जर व नष्ट हम स्वयं कर रहे न कि कोई विदेशी वाह्य आक्रांता. अगर हम सभी समय रहते अपनी इन परंपराओं को न बचा पायेंगे तो फिर हम उस दरिद्र की तरह होंगें जिसके पास सबकुछ वैभव होगा लेकिन वे उस वैभव से अपने दो घड़ी चैन की नींद भी नही ले पायेगा.आईये हम अपनी उस वैदिक, सामाजिक व समृद्ध परंपरा को सहेजे. "जहां मनुष्य तो मनुष्य सुना है, कि देव भी पैदा होने को तरसते है".
आज भगवान राम,कृष्ण, बुद्ध, गाँधी की वैदिक परंपरा का देश हमें कुछ आहत व पीड़ित लग रहा शायद ये लेख उसी पीड़ा के कुछ आँसू है. और हो भी क्यों न जिस देश मे इतना तक कहा गया हो की "माँ पुरी दुनिया का एकलौता पूर्ण शब्द है ,"माँ ऊँ है."माँ कहने वालो के लिये गीता या कुरान से भी ज्यादा शबाब उसे केवल माँ कहने में है". "पिता हिमालय की तरह है."माँ और पिता केवल एक रिश्ते का औपचारिक या मशीनी नाम नही अपितू हमारा संम्पूर्ण जीवन है.
"हम अपने वृद्धो की संस्कारों से पुष्पित व पल्लवित एक बोधि वृक्ष है" .यही कारण है कि- "हमारा ये देश मानसिक पीड़ितो की विश्व दवा है". ये देश कबीर के प्रेम के ढा़ई आखर का देश है और हमारे बुढ़े माँ-बाप उस ढा़ई आखर के प्राण तत्व. बम,बारुद, मिसाइल के ढ़ेर पे बैठी दुनिया भी ये कहने से गुरेज नही करती कि, माँ के छुवन या स्पर्श की थिरैपी मेडिकल थिरैपी से कही ज्यादा कार-आमद है.ये थिरैपी हमारी समृद्ध वैदिक परंपरा की ही देन है. यशोदा माँ व नंद बाबा के प्यार की थिरैपी में पले भगवान कृष्ण की "गीता का उपदेश" जीवन-मृत्यु-युद्ध को इतना स्पष्ट परिभाषित करता है, जितना की दुनिया की कोई अन्य किताब नही.आईये हम सभी इस श्राद्ध के पवित्र महीने में,अपनी इस वैदिक अनमोल धरोहर की संवेदना व उसकी समृद्ध परंपरा को जर्जर व नष्ट होने से बचाये.
यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.
लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758
No comments:
Post a Comment