Saturday, 7 November 2020

( कश्मीरी पंडित)

(कश्मीरी पंडित)
वे बांगा दी बुलबुल-------
वे डलझील वे शीकारे--------
हमारी मिट्टी-ए-मोहब्बत कश्म़ीर,,
हमे ख्वाबो मे पुकारे।
ये सियासत-ए-साजिश-ए-अलगाव,
कि हम कश्म़ीरी पंडित पड़े है-------
खानाबदोशो से बदतर ऐ दिल्ली,
तेरी सड़को के किनारे।
वे गुल,वे केशर,वे सेब के बगीचे,
उफ!नही आती वे खूशबु ना आती है--
वैसी यहाँ तक हवा रे।
ये लाशे मईयत,ये रुह-ए-तड़प है,
ऐ,रंग---हम कैसे होगे जन्नतनशी----
ऐ कश्म़ीर तेरी पाक-ए-मिट्टी के बीना रे।

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