Friday, 14 February 2020

व्यंग्य---(हमारी लोटा विरादरी )

व्यंग्य-----
             (हमारी लोटा बिरादरी)

वे एक बित्ते की मोटी चुटिया और भर माथे ललाट पे-उगते सूर्य की तरह का चंदन लेप,वे खटर-पटर करता खड़ाऊँ, हष्टपुष्ट शरीर पे सुती जनेऊ, ये मनोहारी आकार-प्रकार किसी और का नही अपितु,हमारी ब्राह्मण बिरादरी का है,जिसे ब्राह्मण के अलावा लोग "लोटा बिरादरी के नाम से भी जानते  है".

हमारे कुलवंश में पैदा हुआ बच्चा हमेशा से ही अपने--"लोटे का मजबूत माना जाता है". इस लोटे की तासीर ही कुछ ऐसी थी कि--"जितना लोग ब्राह्मण के ज्ञान से प्रभावित होते थे,उतने ही प्रभावित वे उसके लोटे से होते थे". कही कथा,प्रसाद,भोजन की बात होती थी तो यजमान मय-परिवार के ब्राह्मण के लोटे या अपने लोटे से उनका अलौकिक चरण-रज धोता था .एक तरह से ब्राह्मण के साथ ही लोटा भी इस संम्मान के आनंद को महसूस करता था.

"ब्राह्मण का लोटा भी कोई सामान्य लोटा नही होता था,ये पीतल का बना दो से ढाई किलो का होता था". ये लोटा काफी सारगर्भित व ब्राह्मण की ही तरह विद्वान दिखता था. अग्रेंजी मे एक कहावत भी है कि--"फस्ट इम्प्रेशन इज द लास्ट इम्प्रेशन" ऐसा ही कुछ काम काफी हद तक ब्राह्मण का चर्चित ये लोटा कर जाता था.

कई गाँव-गिराव मे आज भी बहुत सारे किस्से ब्राह्मण बिरादरी के इस ऐतिहासिक लोटे को लेकर बतायी व सुनाई जाती है. "जिसे लोग रासो काल के साहित्य की तरह सुनाते है". जिसे सुन मुझे ब्राह्मण होने के गर्व का आभास होता है. ऐसा ही एक किस्सा था-- कि एक ब्राह्मण राज-पुरोहित जो की उस समय ब्राह्मण ही होता था अपने अलौकिक लोटे के साथ मैदान निपटने गये थे,तो अचानक से एक शेर आ गया लेकिन वे इतने हिम्मती व साहसी थे कि उन्होंने--"अपने उसी लोटे से शेर को धराशायी कर दिया था".

ये ब्राह्मण या लोटा बिरादरी केवल दुसरी बिरादरी ही नही अपितु अपनी बिरादरी के कुमार्गी ब्राह्मण को भी "अपने समाज़ के लोटे से वंचित कर देते थे". फिर कोई ब्राह्मण उसके यहा खाना-पीना,आना-जाना तक छोड़ देता था ये सजा और दंड का एक तरीका भी था. आज की पीढ़ी भी लोकतंत्र के चुनाव मे हम ब्राह्मणो से ये जानने को बेचैन दिखती है कि ये--"बिरादरी इस बार अपना लोटा कहा बजायेगी अर्थात किस पार्टी के पक्ष मे मतदान करेगी".लोगो को ये विश्वास है कि "हमारी लोटा बिरादरी जिसके पक्ष मेंं मतदान करती है लगभग सरकार उसी की बनती है".

लेकिन आज हमारी ये लोटा-बिरादरी हासिये पे है,इसके दोषी भी हमारी अपनी लोटा-बिरादरी के ही लोग है,आज बिल्कुल अलग-थलग से हो गये है सच तो ये है कि--"हमने अपने लोटे की कद्र नही की" . गर हमने अपने लोटे का कद्र किया होता तो आज--"हमारी आपकी लोटा-बिरादरी यु विलुप्त-प्राय व नष्ट-प्राय न होती". आईये हम सब सामुहिक शपथ ले कि--"हम अपनी इस लोटा-बिरादरी के पुराने गौरव को फिर से हासिल करेंगे".


यह व्यंग्य लेख मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है.

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