Sunday, 2 August 2020

लघुकथा---(चितचोर )

लघुकथा----(चितचोर )

हां आनंद मेरा चितचोर ही तो था, जो--"धीरे-धीरे मुझे चुराता रहा और मैं चोरी होती रही". उसके बात करने की कशिश, चलने का अंदाज सब कुछ मुझे मंत्रमुग्ध कर देता. 

मैं उसकीआगोश में घंटो-घंटो तक खोई रहती शाम धुंधला कर कब रात होने की तरफ बढ़ने का इशारा कर देती मुझे यह भी तभी पता चलता जब आनंद मुझे अपनी आगोश से अलग कर यह कहता कि चलो अब काफी शाम हो गई आओ अब घर चलते हैं तब मुझे न जाने क्यों शाम के इतनी जल्दी ढल जाने और उसके गहराने से चिढ़ होती. 


मैं और आनंद हरदिन रेत पर घर बनाते उन्हें सजाते लेकिन कोई ना कोई समंदर की एक तेज लहर ना सिर्फ उस- "रेत के घर को बहा ले जाती बल्कि उसके निशानात  को भी मिटा देती थी'.

तब शायद सपनों के घर के टूटने का वे दर्द उस तरह चेहरे पर नहीं दिखता था, जैसा कि आज मेरी चेहरे पर दिख रहा है. क्योंकि उन दिनों मुझे और आनंद को यह अच्छे से पता था कि कल फिर हम इसी तरह मिलके एक नये रेत का घर बना लेंगे. 

लेकिन उस रेत के घर के--"टूटने के पीछे की जो हकीकत थी उससे हमें समंदर की लहरें आगाह करती थी". जिसे मैं नासमझ तब समझी जब सब कुछ मेरा तबाह व बर्बाद हो गया. 

यानी मेरे चितचोर आनंद ने एक दिन मेरा वह भी चुरा लिया जिसे कि मुझे हरगिज भी नहीं चोरी होने देना चाहिए था उस चोरी के दाग को यह दुनिया आज भी माफ नहीं करती. 

लेकिन उन दिनों मैं आनंद के प्यार में इतनी अंधी व पागल थी कि मुझे आनंद के सिवा कुछ ना दिखता था और ना ही समझ में आता था मैं आज उसी चितचोर की चुराई दुश्वारियां जी रही हूं. आनंद मेरी जिस्मानी चोरी के बाद फिर नहीं लौटा मैं बस केवल उसका इंतजार करती रही. 

लेकिन यह इंतजार भी मैं कब तलक करती क्योंकि उसकी चोरी का अंश अब तलक मेरे पेट में पांव पसारने लगा था और धीरे-धीरे वे 3 महीने से ज्यादा का हो गया लोगों ने कानाफूसी शुरू कर दी और इस कानाफूसी का मैं विरोध भी नहीं कर पाई करती भी कैसे मैं उनके सवालों के क्या जवाब देती? अतः आनंद के बच्चे को जन्म दे मैं हमेशा के लिए वे शहर वह अपना घर बार छोड़ आई.

आज मैं एक अजनबी और अनजान शहर में जीने के लिए संघर्ष कर रही, बहुत ढूंढने के बाद बमुश्किल एक प्राइवेट ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिल गई है जिससे मेरा और मेरे मासूम बच्चे का जीवन चल रहा.

आज ऑफिस से लौटते समय अचानक मेरी नजर  चितचोर आनंद पर पड़ गई वे एक नई और खूबसूरत लड़की के साथ खिलखिला कर हंसता हुआ बाहों में बाहें डाले चला जा रहा था, मैं समझ गई कि यह लड़की भी अब आनंद के चितचोर वाले धोखे से बच नहीं पाएगी यानी इस लड़की का नसीब भी इसे किसी अजनबी या अनजान शहर की तरह धीरे-धीरे ले जा रही.


यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758

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