Monday, 3 August 2020

कविता----(गीतों का सर्कस )

( गोपालदास नीरज के गीतो का सर्कस) 
नीरज ने मेरा नाम जोकर लिखा था, 
लोग आते रहे, लोग जाते रहे
अँधेरा--उजाला होता रहा, 
ये सर्कस सा जीवन--------
कभी इस शहर, कभी उस शहर चलता रहा. 
कोई बसा, कोई ठहरा कुछ ही दिन, 
फिर चल पड़ा ,
सर्कस ही सर्कस चारो तरफ, शहर दर शहर 
वे सिनेमा का सर्कस 
ये जीवन का सर्कस, जोकर के आँसू भी 
एक तमाशा, 
वे जोकर थे नीरज जो हँसे और रोये,
कभी खाली तो कभी भरी पेट सोये,
फिर थिएटर भरा और तमाशा हुआ, 
खाली हुआ फिर एक दिन-------
वे देखो चला दुनिया को छोड़े कोई नीरज नही,
गीतो का अपने वे राजू जोकर. 

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी. 
जज कालोनी, मियाँपुर 
जिला---जौनपुर पिन नं. --222002 (उत्तर-प्रदेश)
मो. नं. --7800824758.

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है. 
महा-गीत पुरूष को हमारा प्रणाम ।

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