Rangnath Dubey's Poems
Saturday, 7 May 2022
(अंदर एक मीर तड़पता है)
जब भी शहर में कोई भूख से मरता है,
मेरी नज्म़ो का कूनबा उजड़ता है।
ऐ,रंग----मैं सीसक उठता हूँ लफ्ज़-लफ्ज़,
और मेरे अंदर एक मीर तड़पता है।
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