उसी घटना के भय को हमने शब्द देने की कोशिश की थी, लेकिन इसका आशय यह कतई नही कि हर थाना, और पुलिस कर्मी ऐसा ही है, फिर भी अगर किसी पुलिस कर्मी को हमारी इस रचना से थोड़ी-बहुत ठेस पहुंचती है, तो उसके लिए हमें क्षमा करें😢😢
(रेप के घाव)
थाने पे---
एक गरीब की बिटिया,
अपनी सलवार उतारे---
जगह-जगह हुये
रेप के घाव दिखा रही है,
दरोगा---
बार-बार थप थपाके देख रहा,
उसके दाँत और नाखून चुभे--
उरोजो को बार-बार.
लड़की सिहर उठी---
उसी रेप के छुअन का सा,
ऐहसास हुआ उसे!
वे समझ गई
आँख भर-भरा आई उसकी,
कि अब एक रात और चीखेगी थाने पे,
फिर हरे हो जायेंगे---
ना भरने के लिये
उसकी उरोजो पे ताजिंदगी,
एै,रंग---
ये "रेप के घाव".
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
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