Friday, 18 April 2025

(कश्मीरी पंडित)

(कश्मीरी पंडित)

वे बांगा दी बुलबुल-
वे डलझील वे शीकारे.
हमारी मिट्टी-ए-मोहब्बत
कश्म़ीर,,
हमे ख्वाबो मे पुकारे.

ये सियासत-ए-साजिश
ये अलगाव,
कि हम कश्म़ीरी पंडित पड़े है-
खानाबदोशो से बदतर ऐ दिल्ली,
तेरी सड़को के किनारे.

वे गुल,वे केशर,वे सेब के बगीचे,
उफ!नही आती वे खूशबु
ना आती है--
वैसी यहाँ तक हवा रे!

ये लाशे मईयत,ये रुह-ए-तड़प है,
ऐ,"रंग"
हम कैसे होगे आखिर 
जन्नतनशी--
कश्मीर कि खाक-ए-मिट्टी
के बीना रे।

ये, बिस्थापित कश्मीरी पंडितो का एक दर्द है.

रंगनाथ द्विवेदी, जज कॉलोनी
मियांपुर, जौनपुर-222002 (U P )
Mo.no.7800824758

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