(एकलौता दीया सरहद पर रख दिया है)
और घर रौशन हो---------------
इस खातिर माँ ने अपना एकलौता दीया,
सरहद पे रख दिया है।
वे दिवाली की रात छत पे खड़ी है,
बहु रखे जा रही मुंडेर पर दीये,
माँ जानती है कि बहु ने भी तो,
अपने अमर-सुहाग का दीया------
सरहद पे रख दिया है।
और घर रौशन हो---------
इस खातिर माँ ने अपना एकलौता दीया,
सरहद पे रख दिया है।
पोते भी बस दिखाने को खुश है,
पटाखे और रौशनी के धुँये को माँ तक रही,
जानती है कि उसके मासूम पोतो ने,
अपने पापा के प्यार का दीया-----------
सरहद पे रख दिया है।
और घर रौशन हो-----------
इस खातिर माँ ने अपना एकलौता दीया,
सरहद पे रख दिया है।
@@@उन तमाम सरहद के दीयो को मेरी लेखनी का प्रणाम जो हमारी और मुल्क की रौशनी के लिये सरहद पे खड़े है।----वंदे मातरम।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
No comments:
Post a Comment