Saturday, 28 June 2025

(इश्क करके)

(इश्क़ करके)

ना पढ़ सकी कोई किताब, 
मै इश्क़ करके.

मै औरत सुफि हो गई 
इश्क़ करके.

मौलाना और तकरीरे मस्जिद, 
तुम्हे मुबारक!
मै खुद हो गई----
मुकम्मल मुसलमान 
इश्क़ करके.

ये हिज़ाब,ये परदे,ये चारदीवारी 
कैद है औरत की,

तुम क्या निकालोगे इस कैद से मुझको,
मै खुद ही छोड़े जा रही,
अपने जिस्म का मकान, 
ऐ,रंग-
इश्क़ करके. 

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर (उत्तर-प्रदेश ).

No comments:

Post a Comment