Sunday, 29 June 2025

कामायनी की तरह पढ़ो

("कामायनी" की तरह पढ़ो)

धूल की एक मोटी परत सी जम गई है
तेरे जाने के बाद,

मैंने भी पलटे नहीं 
अपनी जिस्म के पन्ने,

आओ तुम मुझे 
दूर तलक ले चलो,
मेरे मनु---

और
अगले प्रलय तक
तुम मुझे 

"कामायनी" की तरह पढ़ो.

✍️✍️यह मेरे द्वारा स्व-रचित व अप्रकाशित है इसका बिना मेरी अनुमति के कही अन्य फेसबुक पर ना लगाए अगर शेयर भी करे तो पूर्णतः मेरे नाम और पते के साथ 🙏🙏

रचनाकार--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)

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