चंचल
चाची कि दुकान
ख़बर है - लंका (बनारस ) में चाची की और पहलवान की दुकान तोड़ दी गई । सरकारी बुलडोजर और मजदूरों के चले हथौड़े चाची की दुकान पर नहीं , काशी विश्व विद्यालय के छात्रों की पीठ पर गिरे हैं । यह कोई युक्ति या तंज नहीं है , यही हकीकत है । चाची केवल कचौड़ी , तरकारी या जलेबी भर नहीं देती थी , साथ में जबरदस्त गालियाँ भी देती थी । शब्दों की तहक़ीक़ात की जाय तो कई दफ़े गालियों की तासीर जलेबी के सीरे से भी ज़्यादा मीठी मिलेगीं । गालियाँ बनारस की मान्यताप्राप्त कुटीर संस्कार है । चाची तो फिर भी एक संस्थान थी , जिस पर दैश के उस हर हिस्से में चाची की गालियां ज़ेरे बहस होती आ रही हैं जहाँ विश्व विद्यालय से पढ़ कर निकला एक भी छात्र होगा । इसी अनुपात में विदेशों में भी चाची चर्चित है । चाची का एक बेटा काशी विश्वविद्यालय में ओहदेदार है , उससे दरियाफ़्त करिए चाची के इस बेटे की पूरी तनख़्वाह विदेशों से आते ख़तों के जवाब देने में खर्च होते रहे । हम और हमारे जैसे अनगिनत लोग मिल जाएँगे जो नियमित रूप से चाची की गाली सुनने जाते थे । इनमें डॉ निर्मल , डॉ मलिक , महावीर , वगैरह ऐसे लोग रहे जो चाची की बनाई कचौड़ी और जलेबी उधार में तो खाते ही थे , सिगरेट का नकद पैसा भी लेकर हटते थे । हम कई बार चाची की गाली “झेले” हैं । दो एक की बानगी सुनिए । 78 का वाक्या है हम छात्र संघ अध्यक्ष पद से मुक्त हुए थे । हम विश्वविद्यालय के मल्टी फ़्लैट में रह रहे थे । हमारे बगल में एक स्काटिस लड़की रहती थी , मेव मुहिन । वह यूनेस्को और वर्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन की तरफ़ से - वह भारत के परिवार नियोजन की विफ़ताओं पर काम कर रही थी , एक दिन उसने प्रस्ताव रखा कि तुम हमारे प्रोजेक्ट के स्केचेज तैयार कर दो । हमसे अच्छी दोस्ती हो गई । एक दिन उसने प्रस्ताव रखा - चलो चाची की दुकान पर कचौड़ी खाया जाय !
- चचिया गाली भी देती है जानती हो कि नहीं ?
- जानती हूँ इसी लिए तो कह रही हूँ
- तुम जानो तुम्हारा काम जाने ! चलो
और हम रिक्शे पर बैठ कर सामने दुकान पर रुके ही थे कि चाची की निगाह पड़ गई । कचौड़ी बेलते - बेलते चाची ने पहला जुमला सुनाया -
- का रे ! ई अंग्रेज़ कहाँ से फँसाये ?
हम कुछ बोलें इसके पहले ही मेव ने भोजपुरी में जवाब दिया - चाची ! ई हमे ना फँसाये , हम ही इन्हें फँसाये हैं । चाची हँसने लगी - ई त हिंदी बोले ला रे ! ले कचौड़ी खा । इस तरह चाची की दोस्ती मेव मुहिन से हो गई । लंदन वापस जाने के बाद भी चाची और मेव में खतो किताबत जारी रहा ।
दूसरा वाक़या हुआ काका यानी राजेश खन्ना के साथ । एक साँझ हम काका के साथ बैठे थे कि अचानक काका ने कहा - साहिब बनारस घूमने का मन है , तैयारी होने लगी , पूरी फ़ेहरिस्त बनी कहाँ कहाँ और किस किस से मिलना है । बाबा विश्वनाथ दर्शन , चाची की कचौड़ी , केशव का पान , असलम ( हमारे दोस्त असलम परवेज ) के घर बिरयानी , डॉ नजीर बनारसी के घर उनसे मिलना वगैरह वगैरह । फिर विंध्याचल । पंडा कौन होगा वह भी तय हो गया हमारे मित्र रति शंकर जी की सारी जिम्मेदारी होगी । काशी की वह यात्रा बहुत बढ़िया हुई । झाम फँसा चाची की दुकान पर , जब हम चाची की दुकान पर पहुँचे तो अच्छी भीड़ थी , ज्यों हम गाड़ी से उतरे और चाची की तरफ़ बढ़े तो चाची ने एक नज़र से हम सब को देख लिया । कचौड़ी तलते - तलते ब आवाजे बुलंद बोली - का बे चंचल ! भोसड़ी के ! ई राजेश खन्ना के कहाँ घुमावत बाड़े ? भीड़ हल्का बक्का । काका को हम पहले ही बता चुके थे चाची के बारे में । सबसे बड़ी गाली काका को और उनके साथ आए नरेश जुनेजा को , । नरेश जी की गलती रही वे पेमेंट के लिए अपना बटुआ निकाल लिए थे ।
- भो स के तोर औकात बा कचौड़ी के दाम देवे क ? किसी तरह हम वहाँ से निकले । चाची ने फिर रोका - केशव पान के हियाँ जात अहे ? राजेंदरवा ( केशव पान के मालिक राजेन्द्र ) भो के बड़ा कंजूस है ले पैसा देई दिहे । कहते हुए चाची ने दस रुपये गल्ले से निकाल कर काका के बढ़े हुए हाथ की गदोरी पर रख दिया । काका ने उसे माथे से लगाया - चाची यह दस रुपये अब हमारे साथ रहेगा ता उम्र । उन दोनों के अलावा कइयों की आँख नम हो गई थी ।
चाची लाखों की माँ रही । आज जब प्रशासन का बुलडोजर दुकान तोड़ रहा होगा तो बनारस चुप क्यों रहा ?
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