लघुकथा----( फ्रॉक )
आज रविवार, छुट्टी का दिन होने की वजह से सारिका घर के तमाम कपड़े धुलने के लिए निकाल रही थी, तभी उसने अपनी मुन्नी की फ्रॉक को भी धुलने के लिए निकाला, तो उसे अपनी मुन्नी की फ्रॉक को देखकर अपने बचपन के दिनों की याद हो आई.
वह भी तो अपनी प्यारी मुन्नी की तरह ही कभी फ्रॉक पहने, पूरे घर में धमाचौकड़ी मचाई करती थी, कभी-कभी तो उसकी मां सारिका उसकी इस धमाचौकड़ी से इतनी परेशान हो जाया करती थी कि, उसे गुस्से में लाल पीली होते हुए कहती थी.हे राम! आखिर तू कब सुधरेगी, इतनी बड़ी तो हो गई, अब तु बच्ची थोड़ी ही लगी है.
इतना ही नहीं सारिका को यह कहकर भी उसकी मां उसे इस धमाचौकड़ी से रोकने के लिए कहती थी की आने दे आज तेरे पापा को मैं शिकायत करती हूं कि तू मुझे कितना परेशान करती है मैं मां के इस कथन से थोड़ी देर के लिए चुप हो जाया करती थी. लेकिन फिर उसके बाद वही शरारत वही धमाचौकड़ी. करने लगती थी.
और जैसे ही पापा आफ़िस से लौटते मैं उन्हें पापा पापा कहते हुए दौड़ पड़ती और पापा मुझे अपनी गोद में उठा लेते और प्यार से मेरी पीठ थपकने लगते थे. वह यह भी नहीं देखते थे कि दिनभर खेलने की वजह से मेरी फ्रॉक कितनी गंदी हो गई है.मै पापा की गोद में बैठी हुई अपनी मां को चिढ़ाने वाले अंदाज में देखती थी, जैसे उनसे चिढ़ाने वाले अंदाज में कह रही हो कि अब करो तुम पापा से मेरी शिकायत, मां उन दिनों मुस्कुरा कर रह जाया करती थी.
सारिका अपने इन्ही ख़्यालो में खोई हुई जब मुन्नी की फ्रॉक को अपने सीने से लगाती है, तो उसे ऐसा लगता है कि जैसे उसने फिर से अपने बचपन वाली वही फ्रॉक एक बार फिर से पहन ली हो.तभी सारिका को उसकी मुन्नी उसे मम्मी-मम्मी कहकर बुलाती है और सारिका अपने बचपन की यादों से बाहर निकल आती है, और सारे कपड़े को धुलने के लिए बाथरूम की तरफ चल पड़ती है.
यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.
परिवार ( राजस्थान पत्रिका )21/7/21
लेखक---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P )
Mo. no.7800824758
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