Monday, 2 August 2021

दैनिक अमर उजाला के साप्ताहिक मनोरंजन पृष्ठ के हास्यरंजनी में दिनांक 1,8,2021 को प्रकाशित मेरा व्यंग्य--(बाबू की महिमा )

दैनिक अमर उजाला के साप्ताहिक मनोरंजन पृष्ठ के हास्यरंजनी में दिनांक 1,8,2021 को प्रकाशित मेरा व्यंग्य---( बाबू की महिमा )

चापलूसी करना काफी टिपिकल और शास्त्रीय कला है.यह कला ज्यादातर सरकारी विभागों के बाबुओ या क्लर्को में सर्वाधिक पाई जाती है.जब भी इनके विभाग में किसी नवागांतुक साहब का आगमन होता है तो यह उस विभाग के सारे कर्मचारियों से बहुत पहले साहब के स्वभाव की सारी ए बी सी डी जान लेते है और फिर यह साहब के स्वभाव के हिसाब से ही उनके साथ अपना रजिस्टर्ड वातानुकूलित व्यवहार करना शुरू कर देते है.

क्लर्क या बाबू किसी भी विभाग में काम करने वाले व्यक्ति या मनुष्य की गिरगिट प्रजाति है.अगर वास्तव गिरगिटो में जरा सी भी मनुष्यगत बुद्धि होती तो यह सच जानिए की इस देश के समस्त गिरगिट मिलकर इनके खिलाफ इस आशय का एक मुकदमा दर्ज़ करते कि साहब यह मनुष्य हमारे रंग बदलने की हुनर को अपने रंग बदलने की हरकतों से बदनाम कर रहा है.अतः हमारे इस प्राकृतिक स्वभाव की रक्षा की जाए.


जैसे ही कोई व्यक्ति ऑफ़िस में अपना काम करवाने के लिए प्रवेश करता है, तो उसे सबसे पहले अपनी डिजिटल मुस्कुराहट बाबू या क्लर्क की तरफ सरकानी पड़ती है. इस मुस्कुराहट का गुरुत्वाकर्षण बल तभी ठीक तरिके से काम करता है जब आप बाबू को अर्थ रूपी आइंस्टीन के नियम से संतुष्ट कर लेते है.नही तो वह आपको अपनी एक मीठी सी रसमलाई टाईप की  मुस्कुराहट के साथ काम ना हों पाने के तमाम गलत-सलत सॉफ्टवेयर आपकी बुद्धि की मोबाईल में चढ़ा देगा, फिर आप भी यही समझेंगे कि आपके काम में ही कही वायरस है.


अतः उस विभाग में आपका आवश्यक कार्य कही से हैंग ना हों इसके लिए अगर आप उस विभाग का चरित्र सही ढंग से नही समझ पा रहें है तो इसके लिए उस विभाग के आस-पास टहल रहें किसी प्राइवेट विद्वान का सहारा लें,जो कि इन बाबुओ या क्लर्को के ही इसारे पर काम करने वाले इनके चचेरे भाई है.


अतः बाबू या क्लर्क के संबंध को आप मेडिकल की भाषा में भी समझ सकते है, अर्थात जो अंदर है वे डिग्री धारी है और जो आफ़िस के बाहर है वे शुद्ध रूप से झोलाछाप है.जो कि आपका केश बहुत बिगड गया है,को समझाते हुए इतना डरा देगे कि आप तुरंत ही कही से पैसे का जुगाड़ कर एक बार फिर लौट के "बुद्धू घर को आए, " के बुद्धू की तरह एक बार फिर अपनी बत्तीसी चियारे बाबू या क्लर्क के पास पहुंच जाएंगे.


और बाबू आपको देखते ही एक बार फिर अपनी होलमार्क मुस्कुराहट का प्रदर्शन आपके सामने करेगा और जैसे ही आप पैसा देंगे वैसे ही आपके काम के अवरोध का सारा प्रदूषण नष्ट हो जाएगा.कहावत है कि बाबू या क्लर्क कि भाषा का व्याकरण किसी भी हिंदी साहित्य कि किताब में लिखा नही जा सका. हां! यह शायद कभी किसी कालखंड में हों सकता है कि कोई बाबू या क्लर्क कि भाषा के व्याकरण पर कुछ लिख सकने वाला कोई हरिशंकर परसाई पैदा हों.


यह व्यंग्य मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.


लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जौनपुर 222002 (U P )
mo. no.7800824758

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