यह कविता 2019 में "अहा!जिंदगी " और 2021 में सुरभि में प्रकाशित है (सौतन बांसुरी )
रहती है, हर पल अधर पे,
हम गोपियों की------
सौतन बांसुरी.
रह-रह के हँसती है,
जब भी हमारे दर्द पे,
तो हमें लगती है,
सौतन बांसुरी.
उफ! उन पर भी गुस्सा आ रहा,
पर क्या करें हम गोपियाँ??
हमें भुलकर,
कितने मजे से छू रहे है खुद,
हम गोपियों के-----
नारायण बांसुरी.
काश! मिलती तो इसे हम तोड़ देती,
पर ये लगता है,संभव नही,
बड़ी बेहया,बड़ी निर्लज्ज है,
ये सौतन बांसुरी.
अधर तो अधर था,
कमर मे लटक के भी उनके,
हमारे जी को जलाती है
ये सौतन बांसुरी.
रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758
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