( हमारे देश का परचम है )
यूँँहि नही फहर रहा आज लाल-किले से-----
हमारे देश का परचम है.
पुरे बदन पे कोड़े के निशान,टूटती और थमती साँसे
और उसपे भी आँसू नही इंकलाब जिंदाबाद------
तमाम-तमाम अग्रेजों के जुल्मों-सितम है.
यूँही नही फहर रहा आज लाल किले से------
हमारे देश का परचम है.
जेल मे आखिरी मर्तबा--------
अपने बेटे से मिलने आई भगत सिंह की माँ है,
जिसके होठ पे एक आजादी की हँसी है-------
और दिल मे इस शहीद बेटे के खोने का गम है.
यूँही नही फहर रहा आज लाल-किले से-----
हमारे देश का परचम है.
वे सामने है बाग जलियां का----
जहा बम,गोली,बारुद और लाशें है,
वे लाशों का बदला ले रहा कोई और नही "रंग"-----
भारत माँ का ऊधम है.
यूँही नही फहर रहा आज लाल-किले से-----
हमारे देश का परचम है.
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर.
जिला---जौनपुर, pin.no.---222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.---7800824758.
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
No comments:
Post a Comment