लघुकथा---
(मजदूर की दिहाड़ी)
आज रामलाल को लगातार तीन दिनों से कोई दिहाड़ी नहीं मिली थी. वे मजदूरों के बैठने वाले अड्डे पर बिना नागा किए जाता और कोई काम ना मिलने के तनाव में 2 - 3 बीड़ियां पीता और अपने घर लौट आता.उसका 3 दिनों से लगातार बिना दिहाड़ी या मजदूरी के घर लौटना कितना असह्य था, यह वही जानता था. जब उसकी पत्नी बिना कुछ बोले बस रामलाल को देख कर चुपचाप घर में लौट जाती थी और उसकी जवान बिटिया जब अपने बापू को पीने के लिए पानी वाला लोटा पकड़ाती तो, उस लोटे को पकड़ जब रामलाल पानी पीता तो वे पानी रामलाल के गले में कांटे की तरह चुभता था.
चौथे दिन भी रामलाल मजदूरों के बैठने वाले अड्डे पर गया. जबकि आज उसका पूरा शरीर बुखार से तप रहा था. ज्यों - ज्यों धूप चढ़ता रहा, त्यों - त्यों रामलाल के शरीर का बुखार बढ़ता रहा. बढ़ते - बढ़ते जब उसके शरीर से ज्यादा उसके मन का बुखार बढ़ा, तो उसने अपने कपकपाते हाथ से अपने कुर्ते की जेब को टटोला तो उसे अपनी जेब में से एक आखरी बची हुई टूटी बीड़ी मिलती है जिसे निकालकर वेे उसे किसी तरह जलाता है और उसे जलाकर वह बीड़ी को अपनी होंठ सेे लगाकर ढेर सारा धुआँ अपनी नाक से निकालता है और जैसे ही रामलाल दूसरी बार बीड़ी को अपने होठों सेे खींचता है तो उसी के साथ ही उसकी जिंदगी की साँस भी, उसकी टूटी हुई बीड़ी की तरह टूट जाती है. और वे बिना किसी दिहाड़ी या मजदूरी के मर जाता है.
जब काफ़ी सारा दिन चढ़ आया तो उस अड्डे के अन्य मजदूर जिन्हें की रामलाल की ही तरह दिहाड़ी नहीं मिली थी उन सभी नेे साथ में घर से लाया हुआ खाना खाने के लिए रामलाल को आवाज दी, तो रामलाल ने कोई भी जवाब नहीं दिया. फिर उसके मजदूर साथियोंं ने उसे बुलाया तो भी कोई जवाब नहीं. तो एक शंका बस उसके मजदूर साथियों ने रामलाल के पास जाकर देखा तो रामलाल भयंकर चिलचिलाती धूप में एक तरफ होंठ से लगी सुलगती बीड़ी सहित बिना किसी हरकत के पड़ा हुआ था. उसके सभी साथियों ने उसेे जोर सेेे झिझोड़ा तो उन सभी को पता चला कि रामलाल तो मर गया.
तो उसके सभी मजदूर साथियों ने रामलाल की लाश को अपने कंधे पर लाादकर उसके घर पहुंचे, तो दरवाजे पर खड़ी उसकी पत्नी आज दिहाड़ी में लौटे अपने पति की लाश को बस यूं ही चुपचाप तकती रही. जवान बिटिया भी लोटे में पानी लेकर अपने बापू के सिरहाने खड़ी रही. फिर कुछ देर बाद उसकी पत्नी और उसकी बिटिया चीख-चीख कर कुछ इस तरह रोने लगी कि पूरी बस्ती की आँख गीली हो गई. सच तो यह है कि यह लाश केवल इस गांव या बस्ती के आखिरी रामलाल की लाश नहीं,बल्कि बिना किसी दिहाड़ी या मजदूरी के खाली हाथ अपने घर लौटे हर गांव व बस्ती के रामलाल की लाश है.
यह लघुकथा अगस्त 2021 के "पाखी" पत्रिका में प्रकाशित है.
लेखक -- रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर (उत्तर प्रदेश)
222002
Mo. No. -- 7800824758
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