Sunday, 27 March 2022

आज फिर से मुहब्बत याद आई,
मौसम से पहले आँखो मे सावन सी बरसात आई,
लौट आ एै दिल फिर अपने शहर,
खिड़की,दरवाजे सब बिरान हुये कुछ इस तरह----
हमे आज तेरे छत की याद आई।

                     (मै शम्म-ऐ-चराग हूँ)
मै शम्म-ऐ-चराग हूँ खामोश हो जलुंगी!
ये घुटन है हासिल महज़ यहाँ शमा को,
बुझ जाऊँगी सहर से पहले,
वफा तो न मिली मुझको कही किसी महफ़िल
लेकिन फक्र है मुझे की बेवा हुई तो क्या ?
मैने शौहरे शहर को,
आखिरी लम्हे तक रौशनी तो दी,
बस इतनी खुशी लेके मै मौत से मिलुंगी,
हाँ! वादा रहा फिर भी मुझको जब भी जलाओगे,
हर एक सब पहले की तरह----------
मै हूबहू जलुंगी।
मै शम्म-ऐ-चराग हूं खामोश हो जलुंगी।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर----222001(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

कुछ रचना के शब्दो का अर्थ-------
सब------रात
सहर----सुबह।

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